राजस्थान के प्रमुख पर्यटन स्थल

प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए राजस्थान के सभी 41 आधिकारिक जिलों, 10 तुलनात्मक विषयवार पुनरावृत्ति खंडों, त्वरित सार तालिकाओं और अलग अभ्यास परीक्षाओं में व्याख्या सहित 306 बहुविकल्पीय प्रश्नों से युक्त संपूर्ण अध्ययन मार्गदर्शिका।

प्रशासनिक संदर्भ: 3 अक्टूबर 2026। राजस्थान सरकार की आधिकारिक 41-जिला व्यवस्था पर आधारित। यदि किसी परीक्षा प्रश्न में पूर्व का वर्ष उल्लिखित हो तो सीमाओं को उसी ऐतिहासिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। सांस्कृतिक क्षेत्र, पूर्व रियासत और वर्तमान प्रशासनिक जिले के मध्य सूक्ष्म अंतर स्पष्ट किया गया है।

इस अध्याय को कैसे पढ़ें

  1. प्रत्येक स्थल को चार मुख्य आधारों से समझें: वर्तमान जिला, भौगोलिक स्थिति, स्थापत्य विशेषता और ऐतिहासिक शासक/कालक्रम।
  2. प्रत्येक जिले की विशिष्ट पहचान के अंतर्गत प्रसिद्ध खान-पान, पारंपरिक दस्तकारी, कृषि फसलें और प्रमुख खनिजों का गहराई से अध्ययन करें।
  3. अभ्यास प्रश्न हल करने से पूर्व सामान्य भ्रम और मिलते-जुलते नामों वाले स्मारकों के तुलनात्मक अंतर को ध्यानपूर्वक पढ़ें।
  4. प्रत्येक जिले के अंत में दी गई त्वरित पुनरावृत्ति सारणी से मुख्य तथ्यों को दोहराएँ।
  5. जिला समूह पूरा करने के बाद संबंधित लेवल की अभ्यास परीक्षा देकर अपनी तैयारी का मूल्यांकन करें।

दायरा: सभी 41 जिलों के परीक्षा-उपयोगी ऐतिहासिक स्थलों, दुर्गों, मंदिरों, झीलों, अभयारण्यों, खान-पान, हस्तशिल्प और खनिजों का प्रामाणिक संकलन। लोकश्रुतियों और प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्यों के मध्य स्पष्ट अंतर दर्शाया गया है।

अध्याय की विषयसूची

मानचित्र पुनरावृत्ति के लिए जिला सूची

जिला तीन प्रमुख पहचान
अजमेर अजमेर शरीफ दरगाह; आनासागर; पुष्कर
अलवर बाला किला; सरिस्का; सिलीसेढ़
बालोतरा नाकोड़ा; आसोतरा; जसोल
बाँसवाड़ा त्रिपुरा सुंदरी; अर्थूणा; मानगढ़
बारां भांडदेवरा; शेरगढ़, बारां; सीताबाड़ी
बाड़मेर किराडू; बाड़मेर गढ़; महाबार के धोरे
ब्यावर बदनोर दुर्ग; टॉडगढ़; प्रज्ञा शिखर
भरतपुर केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान; लोहागढ़; भरतपुर महल
भीलवाड़ा शाहपुरा रामद्वारा; बिजौलिया; मेनाल
बीकानेर जूनागढ़; करणी माता, देशनोक; रामपुरिया हवेलियाँ
बूंदी रानीजी की बावड़ी; चित्रशाला, बूंदी; नवल सागर
चित्तौड़गढ़ विजय स्तंभ; कीर्ति स्तंभ; चित्तौड़गढ़ दुर्ग
चूरू चूरू दुर्ग; ताल छापर; सालासर बालाजी
दौसा चाँद बावड़ी; दौसा दुर्ग; मेहंदीपुर बालाजी
डीग डीग महल; डीग दुर्ग; कामां
धौलपुर मचकुंड; शेरगढ़, धौलपुर; तालाब-ए-शाही
डीडवाना-कुचामन कुचामन दुर्ग; डीडवाना नमक झील; लाडनूँ
डूंगरपुर जूना महल; बेणेश्वर; गलियाकोट
हनुमानगढ़ कालीबंगा; भटनेर दुर्ग; गोगामेड़ी
जयपुर आमेर दुर्ग; हवा महल; जंतर मंतर
जैसलमेर जैसलमेर दुर्ग; सम के धोरे; पटवों की हवेली
जालौर जालौर दुर्ग; सुंधा माता; भीनमाल
झालावाड़ गागरोन दुर्ग; झालरापाटन सूर्य मंदिर; कोलवी की गुफाएँ
झुंझुनूँ खेतड़ी महल; रानी सती मंदिर; लोहार्गल
जोधपुर मेहरानगढ़; जसवंत थड़ा; उम्मेद भवन
करौली कैला देवी; श्री महावीरजी; तिमनगढ़
खैरथल-तिजारा तिजारा जैन मंदिर; तिजारा दुर्ग; बाबा मोहन राम मंदिर
कोटा कोटा गढ़ पैलेस; जगमंदिर, कोटा; सेवन वंडर्स पार्क
कोटपूतली-बहरोड़ नीमराना दुर्ग; बैराठ (विराटनगर); नीमराना की बावड़ी
नागौर अहिछत्रगढ़ दुर्ग (नागौर किला); तारकीन की दरगाह; दधिमती माता मंदिर
पाली रणकपुर जैन मंदिर; जवाई बाँध एवं लेपर्ड रिजर्व; ओम बन्ना मंदिर (बुलेट बाबा)
फलौदी खींचन; कोलू पाबूजी (कोलू मंड); बाप बोल्डर बेड
प्रतापगढ़ थेवा कला; सीता माता अभयारण्य; जाखम बाँध
राजसमंद कुंभलगढ़ दुर्ग; श्रीनाथजी मंदिर (नाथद्वारा); राजसमंद झील
सलूंबर जयसमंद / ढेबर झील; सलूंबर दुर्ग; ईडाणा माता मंदिर
सवाई माधोपुर रणथंभौर दुर्ग; त्रिनेत्र गणेश मंदिर; रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान
सीकर खाटू श्यामजी; जीण माता मंदिर; हर्षनाथ मंदिर
सिरोही माउंट आबू एवं गुरु शिखर; देलवाड़ा जैन मंदिर; अचलगढ़ दुर्ग एवं अचलेश्वर महादेव
श्रीगंगानगर अनूपगढ़ दुर्ग; गंग नहर; गुरुद्वारा बुड्ढा जोहड़
टोंक सुनहरी कोठी; बीसलपुर बाँध; रेढ़ (टाटा नगर)
उदयपुर सिटी पैलेस (उदयपुर); पिछोला झील एवं जगमंदिर; सज्जनगढ़ दुर्ग (मानसून पैलेस)

01. अजमेर

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

सपादलक्ष चौहानों की ऐतिहासिक राजधानी, मध्य अरावली का केंद्र, 'राजस्थान का हृदय' और 'भारत का मक्का' उपनाम से विख्यात। प्रमुख नगर: अजमेर, पुष्कर, किशनगढ़, नसीराबाद।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

अजमेर शरीफ दरगाह

13वीं शताब्दी में स्थापित ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की विश्वप्रसिद्ध सूफी दरगाह.

वार्षिक उर्स (1 से 6 रजब) आयोजित करने वाला चिश्ती संप्रदाय का प्रमुख तीर्थ; इसमें अकबर द्वारा प्रदत्त बड़ी देग (4800 किग्रा) और जहाँगीर द्वारा प्रदत्त छोटी देग (2400 किग्रा) स्थित हैं।

आनासागर

1137 ईस्वी में चौहान शासक अर्णोराज द्वारा निर्मित ऐतिहासिक झील.

चंद्रा नदी पर बांध बनाकर निर्मित; जहाँगीर द्वारा निर्मित दौलत बाग (सुभाष उद्यान) और शाहजहाँ द्वारा 1637 ई. में स्थापित 5 संगमरमर की बारादरियाँ यहाँ की मुख्य पहचान हैं।

पुष्कर

पवित्र 52 घाटों वाला सरोवर और 1809 ईस्वी में पुनर्निर्मित विश्वप्रसिद्ध ब्रह्मा मंदिर.

रत्नागिरि पहाड़ी पर सावित्री मंदिर, रंगजी मंदिर और कार्तिक पूर्णिमा मेले वाला प्रमुख तीर्थ; सोहन हलवा, गुलाब की खेती और फेल्सपार खनन के लिए प्रसिद्ध।

दुर्ग एवं महल

  • तारागढ़ दुर्ग (अजयमेरु / गढ़ बीठली): 1113 ईस्वी में चौहान शासक अजयराज द्वारा बीठली पहाड़ी पर निर्मित। मेवाड़ के राजकुमार पृथ्वीराज सिसोदिया (उड़ना राजकुमार) ने अपनी पत्नी ताराबाई के नाम पर 'तारागढ़' नाम रखा। बिशप हेबर ने इसे 'राजस्थान का जिब्राल्टर' कहा। इसमें मीरां साहब की दरगाह और घोड़े की मजार स्थित है।
  • मैगजीन दुर्ग (अकबर का किला / दौलतखाना): 1570 ईस्वी में अकबर द्वारा निर्मित; राजस्थान का एकमात्र मुस्लिम/मुगल दुर्ग शैली में निर्मित किला। 10 जनवरी 1616 ई. को ब्रिटिश राजदूत सर थॉमस रो ने यहीं जहाँगीर से भेंट की थी। 1857 क्रांति में अंग्रेजों का शस्त्रागार रहा, वर्तमान में राजकीय संग्रहालय।
  • किशनगढ़ दुर्ग (रूपनगढ़ किला): 1648 ई. में महाराजा रूपसिंह द्वारा निर्मित।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह: 13वीं सदी की सूफी दरगाह; रजब माह में 1 से 6 तारीख तक वार्षिक उर्स।
  • पुष्कर ब्रह्मा मंदिर: 1809 ई. में गोकुलचंद पारेख द्वारा पुनर्निर्मित प्रमुख ब्रह्मा मंदिर; रत्नागिरि पहाड़ी पर सावित्री मंदिर (रोपवे), वराह मंदिर (12वीं सदी अर्णोराज), रंगजी मंदिर।
  • अढ़ाई दिन का झोंपड़ा: 1153 ई. में विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) द्वारा संस्कृत पाठशाला के रूप में निर्मित ('हरकेलि' नाटक उत्कीर्ण); 1199 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक ने मस्जिद में बदला; 16 खंभों का भवन।
  • सोनीजी की नसियाँ (लाल मंदिर): आदिनाथ (ऋषभदेव) को समर्पित दिगंबर जैन मंदिर, 1864-1865 ई. में सेठ मूलचंद व टीकमचंद सोनी द्वारा निर्मित; स्वर्णनगरी (अयोध्या का स्वर्ण मॉडल) प्रसिद्ध।
  • नारेली जैन तीर्थ: आधुनिक संगमरमर का ज्ञानोदय तीर्थ।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • आनासागर झील: 1137 ई. में अर्णोराज द्वारा चंद्रा नदी पर निर्मित; दौलत बाग (सुभाष उद्यान) और 5 संगमरमर बारादरियाँ (1637 ई.)।
  • पुष्कर सरोवर: 52 घाटों वाला पवित्र सरोवर (ब्रह्म घाट, वराह घाट, गऊ घाट जहाँ गांधीजी की अस्थियाँ विसर्जित हुईं)।
  • फॉयसागर झील: 1891-1892 ई. में इंजीनियर फॉय के निर्देशन में बाँडी नदी पर अकाल राहत हेतु निर्मित।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • बड़ली का शिलालेख: 443 ई.पू. का राजस्थान का सबसे प्राचीन शिलालेख, अजमेर संग्रहालय में सुरक्षित।
  • गुंदोलाव झील व अरावली श्रेणियाँ: किशनगढ़ व पुष्कर घाटी में प्रवासी पक्षियों का प्राकृतिक आवास।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • किशनगढ़ चित्रशैली: राजा सामंतसिंह (नागरीदास) के काल में मोरध्वज निहालचंद द्वारा चित्रित 'बनी-ठनी', जिसे एरिक डिकिंसन ने 'भारत की मोनालिसा' कहा।
  • राजकीय संग्रहालय: अकबर के मैगजीन दुर्ग में स्थित प्राचीन मूर्तियों और सिक्कों का संग्रह।

मेले एवं उत्सव

  • पुष्कर मेला: कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक; विश्वप्रसिद्ध रंगीला सांस्कृतिक व ऊँट पशु मेला।
  • ख्वाजा साहब का उर्स: रजब 1 से 6; भीलवाड़ा के गौरी परिवार द्वारा बुलंद दरवाजे पर झंडा फहराने से शुभारंभ।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: अजमेर का सोहन हलवा, कढ़ी-कचौड़ी, और पुष्कर के प्रसिद्ध मालपुए व रबड़ी।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: गोटा-किनारी का काम, किशनगढ़ की बनी-ठनी लघु चित्रकला, और पुष्कर का गुलाब जल व गुलकंद।
  • कृषि एवं फसलें: गुलाब की व्यावसायिक खेती (पुष्कर में दमिश्क/चेती गुलाब), ज्वार और बाजरा।
  • प्रमुख खनिज संपदा: फेल्सपार (मकरेड़ा व दादिया से राजस्थान का 90% से अधिक उत्पादन), क्वार्ट्ज और एस्बेस्टस।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

अजमेर का तारागढ़ दुर्ग 1113 ई. में अजयराज चौहान ने बनवाया, जबकि बूंदी का तारागढ़ दुर्ग 1354 ई. में राव बरसिंह ने बनवाया। पुष्कर के अतिरिक्त आसोतरा (बालोतरा) और छींच (बाँसवाड़ा) में भी ब्रह्मा मंदिर हैं। जिला पुनर्गठन के बाद टॉडगढ़ ब्यावर में और सरवाड़ केकड़ी में शामिल है।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
तारागढ़ दुर्ग गिरि दुर्ग 1113 ई., अजयराज चौहान गढ़ बीठली, राजस्थान का जिब्राल्टर, मीरां साहब दरगाह
मैगजीन दुर्ग मुगल दुर्ग 1570 ई., अकबर सर थॉमस रो भेंट 1616 ई., 1857 का ब्रिटिश शस्त्रागार
अढ़ाई दिन का झोंपड़ा मस्जिद/स्मारक 1153/1199 ई., विग्रहराज चतुर्थ / ऐबक संस्कृत पाठशाला, 16 खंभे, हरकेलि नाटक उत्कीर्ण
आनासागर झील ऐतिहासिक झील 1137 ई., अर्णोराज दौलत बाग (जहाँगीर), 5 संगमरमर बारादरियाँ (शाहजहाँ 1637)
पुष्कर ब्रह्मा मंदिर तीर्थ स्थल प्राचीन / 1809 ई. जीर्णोद्धार 52 घाट, कार्तिक पूर्णिमा मेला, पवित्र सरोवर
सोनीजी की नसियाँ जैन तीर्थ 1865 ई., सेठ मूलचंद सोनी आदिनाथ मंदिर, स्वर्णनगरी (अयोध्या का स्वर्ण मॉडल)

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02. अलवर

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

प्राचीन मत्स्य प्रदेश का क्षेत्र, 'राजस्थान का सिंहद्वार' और 'पूर्वी राजस्थान का कश्मीर' उपनाम से विख्यात। प्रमुख नगर: अलवर, राजगढ़, थानागाजी।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

बाला किला

हसन खां मेवाती द्वारा पुनर्निर्मित और कछवाहा शासकों द्वारा विस्तारित प्राचीन पहाड़ी दुर्ग.

अलवर नगर के ऊपर 1000 फीट ऊँची पहाड़ी पर स्थित; 52 बुर्ज और 6 प्रवेश द्वार; खानवा युद्ध के बाद बाबर यहाँ रुका था और राजकुमार सलीम (जहाँगीर) को यहाँ नजरबंद रखा गया था (सलीम महल)।

सरिस्का

1978 में स्थापित प्रसिद्ध बाघ अभयारण्य और बाघ पुनर्स्थापन का अग्रणी केंद्र.

अरावली के शुष्क पर्णपाती वनों में फैला जहाँ बाघ, तेंदुए, सांभर और कल्पवृक्ष पाए जाते हैं; पांडुपोल हनुमान मंदिर और कंकवाड़ी किला (जहाँ औरंगजेब ने दारा शिकोह को कैद रखा) स्थित हैं।

सिलीसेढ़

1845 ईस्वी में महाराजा विनय सिंह द्वारा निर्मित सुंदर झील और लेक पैलेस.

महाराजा विनय सिंह ने रानी शीला के लिए बनवाया; इसे 'उत्तरी राजस्थान का लेक पैलेस' कहा जाता है; यह अलवर की जयसमंद झील और सलूंबर की ढेबर झील से पूरी तरह अलग है।

दुर्ग एवं महल

  • बाला किला (अलवर दुर्ग): 15वीं-16वीं सदी में हसन खां मेवाती द्वारा पुनर्निर्मित; 52 बुर्ज, सलीम सागर, सलीम महल और सूरज पोल।
  • सिटी पैलेस (विनय विलास महल): 1793 ई. में बख्तवार सिंह द्वारा निर्मित; राजपूत-मुगल स्थापत्य का संगम; प्रसिद्ध अलवर संग्रहालय स्थित है।
  • कंकवाड़ी दुर्ग: सरिस्का के घने जंगलों में स्थित दुर्ग जहाँ औरंगजेब ने अपने भाई दारा शिकोह को कैद रखा था।
  • भानगढ़ दुर्ग: 1573 ई. में राजा भगवंत दास द्वारा अरावली तलहटी में निर्मित; ऐतिहासिक खण्डहरों वाला प्राचीन दुर्ग।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • पांडुपोल हनुमान मंदिर: सरिस्का में स्थित; हनुमान जी की शयन मुद्रा वाली प्रतिमा; मान्यता अनुसार भीम ने गदा मारकर मार्ग बनाया था।
  • नीलकंठ महादेव (राजगढ़): 10वीं सदी का गुर्जर-प्रतिहार कालीन शिव मंदिर समूह, बड़गूजर शासकों द्वारा निर्मित।
  • भर्तृहरि तीर्थ: सरिस्का के पास; उज्जैन के राजा भर्तृहरि की समाधि व तपोभूमि, नाथ संप्रदाय का प्रमुख तीर्थ।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • सिलीसेढ़ झील: 1845 ई. में विनय सिंह द्वारा निर्मित 10.5 वर्ग किमी की झील व लेक पैलेस।
  • जयसमंद झील (अलवर): अलवर शहर के निकट मीठे पानी का बड़ा जलाशय।
  • पांडुपोल जलप्रपात: सरिस्का घाटी में स्थित प्राकृतिक मौसमी जलप्रपात।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • सरिस्का बाघ अभयारण्य: 1955 में वन्यजीव अभयारण्य और 1978 में टाइगर रिजर्व घोषित; 2008 में हेलीकॉप्टर से बाघों का सफल पुनर्स्थापन करने वाला विश्व का पहला रिजर्व।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • मूसी महारानी की छतरी: 1815 ई. में महाराजा विनय सिंह द्वारा बख्तवार सिंह और महारानी मूसी की स्मृति में निर्मित; 80 खंभों की छतरी, नीचे लाल बलुआ पत्थर और ऊपर सफेद संगमरमर व रामायण भित्तिचित्र।
  • फतेह गुंबद: 1547 ई. में निर्मित पाँच मंजिला ऐतिहासिक गुंबद।

मेले एवं उत्सव

  • भर्तृहरि मेला: भाद्रपद शुक्ल अष्टमी; नाथ संप्रदाय के साधुओं और भक्तों का विशाल लक्खी मेला।
  • पांडुपोल मेला: भाद्रपद शुक्ल दशमी; हनुमान जी को समर्पित विशाल मेला।
  • मत्स्य उत्सव: मत्स्य क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत का वार्षिक पर्यटन उत्सव।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: अलवर का कलाकंद / मिल्क केक (मावे की प्रसिद्ध मिठाई), और अलवरी कचौड़ी।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: कागजी टेराकोटा / कागजी बर्तन (कागज जैसे पतले मिट्टी के बर्तन), पत्थर तराशी, और पीतल के बर्तन।
  • कृषि एवं फसलें: सरसों (अलवर राजस्थान का प्रमुख सरसों उत्पादक जिला है), गेहूँ और बाजरा।
  • प्रमुख खनिज संपदा: तांबा (खो-दरीबा तांबा खान), संगमरमर (राजगढ़/झिरी का बादामी व गुलाबी संगमरमर), और स्लेट पत्थर।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

नीमराना दुर्ग और विराटनगर अब कोटपूतली-बहरोड़ जिले में हैं, तथा तिजारा जैन मंदिर खैरथल-तिजारा जिले में है। सिलीसेढ़ लेक पैलेस अलवर में है, जबकि ढेबर झील (जयसमंद) सलूंबर जिले में है।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
बाला किला गिरि दुर्ग 15वीं सदी, हसन खां मेवाती 52 बुर्ज, सलीम महल, बाबर और जहाँगीर प्रवास
सरिस्का टाइगर रिजर्व बाघ अभयारण्य 1978 (अभयारण्य 1955) 2008 में बाघ पुनर्स्थापन, पांडुपोल, कंकवाड़ी दुर्ग
सिलीसेढ़ लेक पैलेस झील व महल 1845 ई., महाराजा विनय सिंह उत्तरी राजस्थान का लेक पैलेस, रानी शीला हेतु निर्मित
मूसी महारानी की छतरी राजकीय स्मारक 1815 ई., महाराजा विनय सिंह 80 खंभों की छतरी, लाल बलुआ पत्थर व सफेद संगमरमर
नीलकंठ महादेव मंदिर समूह 10वीं सदी, बड़गूजर राजपूत राजगढ़ में गुर्जर-प्रतिहार स्थापत्य कला
भर्तृहरि तीर्थ तपोभूमि/तीर्थ प्राचीन नाथ पीठ राजा भर्तृहरि की समाधि, भाद्रपद शुक्ल अष्टमी मेला

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03. बालोतरा

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

बाड़मेर से नवगठित जिला; लूणी नदी बेसिन का ऐतिहासिक मालाणी क्षेत्र। प्रमुख नगर: बालोतरा, सिवाना, पचपदरा, आसोतरा, जसोल।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

नाकोड़ा

मेवा नगर में पार्श्वनाथ और नाकोड़ा भैरव को समर्पित प्रसिद्ध जैन तीर्थ.

प्राचीन जैन तीर्थ (वीरमपुर); 13वीं सदी में आलमशाह के आक्रमण से सुरक्षित प्रतिमा; पौष कृष्ण दशमी को मेला; आचार्य कीर्तिरत्नसूरी द्वारा नाकोड़ा भैरव की प्रतिमा प्रतिष्ठित।

आसोतरा

1984 में संत खेतारामजी महाराज द्वारा स्थापित भव्य ब्रह्मा मंदिर.

पुष्कर के बाद राजस्थान का दूसरा प्रमुख ब्रह्मा मंदिर; राजपुरोहित समाज द्वारा पूर्णतः मकराना संगमरमर से निर्मित; यह तथ्य इस भ्रम को दूर करता है कि पुष्कर एकमात्र ब्रह्मा मंदिर है।

जसोल

लोकदेवी रानी भटियाणी (माजीसा) को समर्पित प्रमुख शक्ति तीर्थ.

लूणी नदी के किनारे मालाणी क्षेत्र में स्थित पवित्र तीर्थ जहाँ रानी भटियाणी माजीसा के लाखों भक्त आते हैं; यह ऐतिहासिक सिवाना दुर्ग के निकट है।

दुर्ग एवं महल

  • सिवाना दुर्ग (गढ़ सिवाना / कुमट दुर्ग): 954 ईस्वी में वीरनारायण पंवार द्वारा हल्देश्वर पहाड़ी पर निर्मित; मारवाड़ के राजाओं (राव मालदेव और राव चंद्रसेन) की संकटकालीन शरणस्थली; दो ऐतिहासिक साके हुए:
    1. 1308 ई.: अलाउद्दीन खिलजी ने सातलदेव चौहान को हराया और दुर्ग का नाम 'खैराबाद' रखा।
    2. 1582 ई.: जोधपुर के मोटा राजा उदयसिंह के विरुद्ध कल्ला राठौड़ का साका।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • नाकोड़ा जैन तीर्थ (मेवा नगर): 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ और नाकोड़ा भैरव का प्रसिद्ध तीर्थ।
  • आसोतरा ब्रह्मा मंदिर: 1984 में संत खेतारामजी द्वारा स्थापित संगमरमर का ब्रह्मा मंदिर।
  • जसोल धाम: माता रानी भटियाणी (माजीसा) का प्रसिद्ध श्रद्धा केंद्र।
  • खेड़ रणछोड़राय मंदिर: लूणी नदी किनारे राव आस्थान/सीहा द्वारा स्थापित प्राचीन वैष्णव तीर्थ।
  • हल्देश्वर महादेव (पीपलूद): छप्पन की पहाड़ियों में स्थित शिव मंदिर, जिसे 'मारवाड़ का लघु माउंट आबू' कहा जाता है।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • पचपदरा नमक झील: 98% शुद्ध सोडियम क्लोराइड युक्त खारी झील, जहाँ खारवाल जाति द्वारा मोरली झाड़ी के उपयोग से नमक बनाया जाता है।
  • छप्पन की पहाड़ियाँ: सिवाना से बालोतरा तक फैली गोलाकार ग्रेनाइट पहाड़ियाँ।
  • बाटाडू का कुआँ: रावल गुलाब सिंह द्वारा संगमरमर से निर्मित भव्य कुआँ, जिसे 'थार का जलमहल' कहा जाता है।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • तिलवाड़ा पुरातात्त्विक स्थल: लूणी नदी के तट पर वी.एन. मिश्र द्वारा उत्खनित मध्यपाषाणकालीन स्थल, जहाँ प्राचीन पशुपालन और सूक्ष्म पाषाण औजार मिले।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • अजरक और मलीर प्रिंट: जीआई टैग प्राप्त पारंपरिक ब्लॉक प्रिंटिंग; नील (नीला) और लाल ज्यामितीय ठप्पा छपाई।
  • वस्त्र रंगाई-छपाई उद्योग: बालोतरा लूणी नदी पर स्थित राजस्थान का प्रमुख वस्त्र प्रसंस्करण केंद्र है।

मेले एवं उत्सव

  • मल्लीनाथ पशु मेला (तिलवाड़ा): चैत्र कृष्ण एकादशी से चैत्र शुक्ल एकादशी तक लूणी नदी तल में आयोजित राजस्थान का सबसे प्राचीन पशु मेला।
  • नाकोड़ा मेला: पौष कृष्ण दशमी को पार्श्वनाथ जयंती पर।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: बालोतरा का प्रसिद्ध गोंद पाक, खीर-चूरमा, और पचपदरा की नमकीन कचौड़ी।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: अजरक प्रिंट (जीआई टैग - नीला व लाल ज्यामितीय ठप्पा) और मलीर प्रिंट (काला व कत्थई प्रिंट)।
  • कृषि एवं फसलें: बाजरा, मूंग और अरंडी।
  • प्रमुख खनिज संपदा: खनिज तेल (बाड़मेर-बालोतरा बेसिन के मंगला, भाग्यम व ऐश्वर्या तेल क्षेत्र), पचपदरा का नमक, और बेंटोनाइट।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

नाकोड़ा जैन तीर्थ, आसोतरा ब्रह्मा मंदिर, सिवाना दुर्ग और पचपदरा नमक झील पहले बाड़मेर जिले में पढ़े जाते थे; वर्तमान जिला व्यवस्था में ये सभी बालोतरा जिले में आते हैं।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
नाकोड़ा जैन तीर्थ जैन तीर्थ प्राचीन / 13वीं सदी पार्श्वनाथ व नाकोड़ा भैरव, मेवा नगर
आसोतरा ब्रह्मा मंदिर तीर्थ स्थल 1984 ई., संत खेतारामजी सफेद मकराना संगमरमर, राजस्थान का दूसरा बड़ा ब्रह्मा मंदिर
सिवाना दुर्ग गिरि दुर्ग 954 ई., वीरनारायण पंवार कुमट दुर्ग, मारवाड़ शासकों की शरणस्थली, 1308 साका
जसोल धाम शक्ति तीर्थ लोक तीर्थ रानी भटियाणी (माजीसा) का प्रसिद्ध मंदिर
पचपदरा नमक झील खारी झील प्राकृतिक / औद्योगिक 98% शुद्ध NaCl, मोरली झाड़ी से नमक उत्पादन
तिलवाड़ा मेला व पुरातत्व प्राचीन / मध्यपाषाण मल्लीनाथ पशु मेला, वी.एन. मिश्र मध्यपाषाण उत्खनन

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04. बाँसवाड़ा

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

वागड़ क्षेत्र का हृदय स्थल, माही जलाशय के द्वीपों के कारण 'सौ द्वीपों का शहर' उपनाम से विख्यात। प्रमुख नगर: बाँसवाड़ा, कुशलगढ़, तलवाड़ा, घाटोल।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

त्रिपुरा सुंदरी

तलवाड़ा में स्थित तरताई माता के नाम से प्रसिद्ध 18 भुजाओं वाली प्राचीन शक्ति पीठ.

परमार और सोलंकी शासकों द्वारा पूजित प्राचीन शाक्त तीर्थ; काले पाषाण की 18 भुजाओं वाली सिंहवाहिनी देवी प्रतिमा, जिसके आधार पर श्रीयंत्र उत्कीर्ण है।

अर्थूणा

11वीं-12वीं सदी के अलंकृत मंदिरों वाली मध्यकालीन परमार राजधानी के अवशेष.

प्राचीन नाम उत्थूणक; यहाँ मंडलेश्वर शिव मंदिर, नीलकंठ महादेव और चौमुखा जैन मंदिर स्थित हैं; वागड़ क्षेत्र का प्रमुख पुरातात्त्विक व मूर्तिकला स्थल।

मानगढ़

गोविंद गुरु के नेतृत्व में 1913 के भील शहादत की स्मृति में पवित्र जनजातीय स्मारक.

17 नवंबर 1913 को ब्रिटिश सेना द्वारा गोविंद गुरु के 1,500 से अधिक भील अनुयायियों के नरसंहार का स्थल; राजस्थान-गुजरात सीमा पर 'राजस्थान का जलियांवाला बाग' कहा जाता है।

दुर्ग एवं महल

  • बाँसवाड़ा राज मंदिर (सिटी पैलेस): 16वीं सदी में महारावल जगमाल सिंह द्वारा पारंपरिक राजपूत शैली में निर्मित भव्य महल।
  • कुशलगढ़ किला: दक्षिणी वागड़ में कुशलगढ़ ठिकाने का ऐतिहासिक गढ़।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • त्रिपुरा सुंदरी (तरताई माता): तलवाड़ा में 18 भुजाओं वाली सिंहवाहिनी देवी की काले पत्थर की प्राचीन प्रतिमा।
  • अर्थूणा मंदिर समूह: 11वीं सदी के परमारों द्वारा निर्मित मंडलेश्वर महादेव, सोमेश्वर व हनुमान मंदिर।
  • छींच का ब्रह्मा मंदिर: 12वीं सदी में राजा जज्ज के शासनकाल में निर्मित भगवान ब्रह्मा का प्राचीन पाषाण मंदिर।
  • अंदेश्वर पार्श्वनाथ: कुशलगढ़ के निकट प्राचीन दिगंबर जैन प्रतिमाओं वाला प्रसिद्ध तीर्थ।
  • मदारेश्वर शिव मंदिर: बाँसवाड़ा के पूर्व में प्राकृतिक पहाड़ी गुफा में स्थित भगवान शिव का मंदिर।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • माही बजाज सागर बाँध: बोरखेड़ा में माही नदी पर निर्मित; राजस्थान का सबसे लंबा बाँध (3,109 मीटर); सौ द्वीपों का विहंगम दृश्य बनाता है।
  • कागदी पिक-अप वियर: बाँसवाड़ा के निकट सुंदर पिक-अप वियर और उद्यान।
  • आनंद सागर झील (लाली बाई झील): रानी लांछी बाई द्वारा निर्मित पूर्वी छोर की कृत्रिम झील।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • मानगढ़ धाम स्मारक: गोविंद गुरु के भगत आंदोलन की स्मृति में मानगढ़ पहाड़ी पर स्थित राष्ट्रीय जनजातीय स्मारक।
  • कालिंजरा पुरातत्व: हिरण नदी के किनारे स्थित 12वीं सदी के जैन मंदिर अवशेष।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • बांस हस्तशिल्प: स्थानीय जनजातियों द्वारा निर्मित बांस की कलात्मक टोकरियाँ, चटाइयाँ और फर्नीचर।
  • तीर-कमान निर्माण: भील जनजाति का पारंपरिक हस्तशिल्प।

मेले एवं उत्सव

  • घोटिया आंबा मेला: चैत्र अमावस्या; पांडवों से जुड़े घोटिया आंबा में विशाल जनजातीय लक्खी मेला।
  • मानगढ़ धाम मेला: मार्गशीर्ष पूर्णिमा; गोविंद गुरु की स्मृति में लगने वाला विशाल आदिवासी मेला।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: मक्के के पनिए (पत्तों के बीच सेके गए), मक्का ढोकला, और दाल-बाटी।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: जनजातीय बांस हस्तशिल्प, पारंपरिक तीर-कमान, और सागवान काष्ठ शिल्प।
  • कृषि एवं फसलें: मक्का (राजस्थान का प्रमुख मक्का उत्पादक; माही कंचन व माही धवल किस्में), धान (माही सुगंधा), और कपास।
  • प्रमुख खनिज संपदा: मैंगनीज (लीलावानी, कालाखूंटा व तलवाड़ा), स्वर्ण भंडार (आनंदपुर-भूखिया व तिमारनमाता), और हरा संगमरमर।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

मानगढ़ धाम बाँसवाड़ा जिले में है, जबकि बेणेश्वर धाम डूंगरपुर जिले में है। छींच में ऐतिहासिक ब्रह्मा मंदिर है, जो यह साबित करता है कि पुष्कर एकमात्र ब्रह्मा मंदिर नहीं है।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
त्रिपुरा सुंदरी शक्ति पीठ प्राचीन / परमार काल तलवाड़ा में 18 भुजाओं वाली तरताई माता, श्रीयंत्र आधार
अर्थूणा मंदिर पुरातात्त्विक स्थल 11वीं-12वीं सदी, परमार वंश उत्थूणक, मंडलेश्वर महादेव, उत्कृष्ट पाषाण मूर्तियाँ
मानगढ़ धाम स्मारक पहाड़ी 17 नवंबर 1913 त्रासदी 1500+ भील शहीद, गोविंद गुरु, राजस्थान का जलियांवाला बाग
माही बजाज सागर बहुउद्देशीय बाँध 1972-1983 ई., माही नदी राजस्थान का सबसे लंबा बाँध (3109 मी.), सौ द्वीपों का शहर
छींच ब्रह्मा मंदिर प्राचीन मंदिर 12वीं सदी, राजा जज्ज भगवान ब्रह्मा की प्राचीन चतुर्मुखी पाषाण प्रतिमा
घोटिया आंबा तीर्थ स्थल लोक तीर्थ चैत्र अमावस्या का मेला, पांडवों से जुड़ा ऐतिहासिक स्थल

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05. बारां

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

हाड़ौती क्षेत्र का पूर्वी जिला, मध्य प्रदेश सीमा पर स्थित, सहरिया जनजाति और रामगढ़ क्रेटर के लिए प्रसिद्ध। प्रमुख नगर: बारां, छबड़ा, शाहाबाद, किशनगंज, मांगरोल।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

भांडदेवरा

रामगढ़ में खजुराहो शैली में निर्मित 10वीं सदी का अलंकृत शिव मंदिर.

रामगढ़ उल्कापिंड क्रेटर के निकट मेद वंशीय राजा मलयवर्मन द्वारा पंचायतन शैली में निर्मित; अपनी कामुक पाषाण मूर्तियों के कारण 'राजस्थान का मिनी खजुराहो' या 'हाड़ौती का खजुराहो' कहलाता है।

शेरगढ़, बारां

परवन नदी के किनारे स्थित प्राचीन जलदुर्ग जिसे कोषवर्धन दुर्ग कहा जाता है.

बौद्ध शिलालेखों में उल्लिखित प्राचीन दुर्ग; शेरशाह सूरी द्वारा पुनर्निर्मित; परवन नदी के जलदुर्ग के रूप में यह धौलपुर के चंबल किनारे वाले शेरगढ़ से अलग पहचाना जाता है।

सीताबाड़ी

केलवाड़ा के निकट वाल्मीकि आश्रम से जुड़ा पवित्र तीर्थ और वार्षिक जनजातीय मेला.

सीता निर्वासन, लव-कुश जन्म और पवित्र कुंडों (सीता कुंड, लक्ष्मण कुंड, सूरज कुंड) से जुड़ा स्थल; ज्येष्ठ अमावस्या को लगने वाला मेला 'सहरिया जनजाति का कुंभ' कहलाता है।

दुर्ग एवं महल

  • शाहाबाद दुर्ग: 1521 ईस्वी में चौहान शासक मुकुटमणि (मुक्तमन) द्वारा भामती पहाड़ी पर निर्मित; घने जंगलों से घिरा; इसमें 19 फीट लंबी प्रसिद्ध 'नवल बाण' तोप स्थित है।
  • शेरगढ़ दुर्ग (कोषवर्धन): परवन नदी के सुरम्य तट पर स्थित ऐतिहासिक जलदुर्ग।
  • नाहरगढ़ दुर्ग बारां: लाल पत्थरों से निर्मित मुगल-राजपूत शैली का ऐतिहासिक किला।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • भांडदेवरा (रामगढ़): 10वीं सदी का खजुराहो शैली का पंचायतन शिव मंदिर।
  • सीताबाड़ी तीर्थ (केलवाड़ा): पवित्र जल कुंड और सीता-लक्ष्मण मंदिर।
  • ब्राह्मणी माता मंदिर (सोरसन): अनोखा मंदिर जहाँ देवी के मुख के स्थान पर पीठ की पूजा और श्रृंगार किया जाता है।
  • काकोनी मंदिर समूह: परवन नदी तट पर स्थित 8वीं से 12वीं सदी के शिव, वैष्णव व जैन मंदिरों के अवशेष।
  • कपिलधारा: शाहाबाद के निकट पवित्र प्राकृतिक झरना और तपोभूमि।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • रामगढ़ उल्कापिंड क्रेटर: लगभग 16.5 करोड़ वर्ष पूर्व उल्कापिंड गिरने से निर्मित 3.5 किमी व्यास का क्रेटर; राष्ट्रीय भू-विरासत स्थल (जियो-हेरिटेज)।
  • बिलासगढ़ के खण्डहर: घने जंगलों में छिपे प्राचीन ऐतिहासिक नगर के अवशेष।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • सोरसन घासस्थल: गोडावण (ग्रेट इंडियन बस्टर्ड), कृष्णमृग और प्रवासी पक्षियों के लिए संरक्षित 35 वर्ग किमी का घास का मैदान।
  • शेरगढ़ वन्यजीव अभयारण्य: परवन नदी के चारों ओर 98 वर्ग किमी में फैला तेंदुओं और भालुओं का अभयारण्य।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • सहरिया सांस्कृतिक संग्रहालय: राजस्थान की एकमात्र आदिम जनजाति (सहरिया) की जीवनशैली और संस्कृति का प्रदर्शन।
  • छीपाबड़ौद ब्लॉक प्रिंटिंग: सूती वस्त्रों पर पारंपरिक काष्ठ ठप्पा छपाई।

मेले एवं उत्सव

  • सीताबाड़ी मेला: ज्येष्ठ अमावस्या; 'सहरिया का कुंभ' नाम से प्रसिद्ध हाड़ौती का सबसे बड़ा जनजातीय मेला।
  • ब्राह्मणी माता गधा मेला (सोरसन): माघ शुक्ल सप्तमी; हाड़ौती का प्रसिद्ध गधों का व्यापारिक पशु मेला।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: बारां के लहसुन युक्त तीखे व्यंजन, हाड़ौती सेव, और दाल-बाटी।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: छीपाबड़ौद की हस्त-ब्लॉक छपाई और सहरिया बांस हस्तशिल्प।
  • कृषि एवं फसलें: लहसुन (बारां राजस्थान का सबसे बड़ा लहसुन उत्पादक है), धनिया, और सोयाबीन।
  • प्रमुख खनिज संपदा: लाल इमारती पत्थर, सिलिका सैंड, और कोयला (छबड़ा सुपर थर्मल पावर प्लांट)।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

बारां का शेरगढ़ दुर्ग परवन नदी पर स्थित है, जबकि धौलपुर का शेरगढ़ दुर्ग चंबल नदी पर है। भांडदेवरा खजुराहो शैली का मंदिर है परंतु यह बारां में है, मध्य प्रदेश के खजुराहो में नहीं।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
भांडदेवरा शिव मंदिर 10वीं सदी, मेद वंश राजस्थान का मिनी खजुराहो, रामगढ़ क्रेटर, पंचायतन शैली
शेरगढ़ दुर्ग बारां जलदुर्ग प्राचीन / शेरशाह सूरी परवन नदी पर कोषवर्धन दुर्ग, प्राचीन बौद्ध अभिलेख
शाहाबाद दुर्ग गिरि दुर्ग 1521 ई., मुकुटमणि चौहान भामती पहाड़ी, 19 फीट लंबी 'नवल बाण' तोप
सीताबाड़ी पवित्र तीर्थ प्राचीन तीर्थ वाल्मीकि आश्रम, सीता-लक्ष्मण कुंड, सहरिया का कुंभ मेला
ब्राह्मणी माता लोकदेवी मंदिर प्राचीन मंदिर सोरसन, देवी की पीठ की पूजा और श्रृंगार का एकमात्र मंदिर
रामगढ़ क्रेटर भू-विरासत स्थल 16.5 करोड़ वर्ष पूर्व 3.5 किमी व्यास का उल्कापिंड क्रेटर, जियो-हेरिटेज स्थल

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06. बाड़मेर

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर स्थित विशाल मरुस्थलीय जिला; लोक संगीत, काष्ठ कला और खनिज तेल भंडारों के लिए प्रसिद्ध। प्रमुख नगर: बाड़मेर, चौहटन, शिव, गुड़ामालानी।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

किराडू

सोलंकी शैली में 11वीं-12वीं सदी का अलंकृत मंदिर समूह, जिसे 'राजस्थान का खजुराहो' कहा जाता है.

हाथमा गाँव में स्थित; सोमेश्वर महादेव और विष्णु को समर्पित गुर्जर-प्रतिहार/सोलंकी शैली के पाँच मंदिर; उत्कृष्ट पाषाण नक्काशी और लोककथाओं के लिए प्रसिद्ध।

बाड़मेर गढ़

1552 ईस्वी में रावत भीमा द्वारा बाड़मेर नगर के ऊपर पहाड़ी पर निर्मित दुर्ग.

रावत भीमा द्वारा जूना बाड़मेर से राजधानी स्थानांतरित कर 1383 फीट ऊँची पहाड़ी पर निर्मित; जगदम्बा माता का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है; बालोतरा बनने के बाद भी यह बाड़मेर में है।

महाबार के धोरे

बाड़मेर नगर के समीप स्थित सुरम्य लहरदार रेतीले धोरों का प्राकृतिक क्षेत्र.

जैसलमेर के सम से अलग थार मरुस्थलीय पर्यटन का बेहतरीन उदाहरण; सूर्यास्त दर्शन, मरु सफारी और फोटोग्राफी का केंद्र; किसी वन्यजीव अभयारण्य से अलग प्राकृतिक स्थलरूप।

दुर्ग एवं महल

  • बाड़मेर गढ़: 1552 ई. में रावत भीमा द्वारा निर्मित; मरुस्थलीय व्यापारिक मार्ग की सुरक्षा करने वाला पहाड़ी दुर्ग।
  • कोटड़ा दुर्ग (शिव): उत्तरी बाड़मेर में परमारों द्वारा निर्मित प्राचीन दुर्ग के अवशेष।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • किराडू मंदिर समूह: सोमेश्वर शिव मंदिर सहित सोलंकी-प्रतिहार शैली के पाँच अलंकृत मंदिर ('राजस्थान का खजुराहो')।
  • चौहटन (विरात्रा माता): गोंद उत्पादन का केंद्र; पहाड़ी पर स्थित विरात्रा माता का प्राचीन शक्ति पीठ।
  • देवका का सूर्य मंदिर: 12वीं सदी का सूर्य देव को समर्पित पाषाण मंदिर।
  • नीमड़ी माता व जूना बाड़मेर: प्राचीन राजधानी के ऐतिहासिक अवशेष व मंदिर।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • महाबार के धोरे: बाड़मेर शहर से 5 किमी दूर स्थित विशाल प्राकृतिक बालूका स्तूप।
  • थार मरुस्थल विस्तार: राज्य पुष्प रोहिड़ा और राज्य वृक्ष खेजड़ी से युक्त ठेठ मरुस्थलीय परिदृश्य।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • मरु राष्ट्रीय उद्यान (बाड़मेर भाग): जैसलमेर (1900 वर्ग किमी) और बाड़मेर (1262 वर्ग किमी) में कुल 3162 वर्ग किमी में विस्तृत; गोडावण, मरु बिल्ली और चिंकारा का मुख्य आवास।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • बाड़मेरी काष्ठ नक्काशी: शीशम की लकड़ी पर बारीक जालीदार नक्काशीदार फर्नीचर।
  • कशीदाकारी व रल्ली (पैचवर्क): हाथ से सिली गई पारंपरिक रल्ली रजाई और शीशे की कढ़ाई।

मेले एवं उत्सव

  • थार महोत्सव: मार्च में आयोजित होने वाला मरुस्थलीय संस्कृति व गैर नृत्य का वार्षिक पर्यटन उत्सव।
  • चौहटन विरात्रा माता मेला: सोमवती अमावस्या; चौहटन के प्रसिद्ध गोंद उत्पादक क्षेत्र में आयोजित लक्खी मेला।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: बाजरे का सोगरा (रोटी) घी व गुड़ के साथ, कैर-सांगरी की सब्जी, और खाटा।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: नक्काशीदार काष्ठ फर्नीचर, कशीदाकारी शीशा कढ़ाई, रल्ली (पैचवर्क), और चमड़े की जूतियाँ।
  • कृषि एवं फसलें: बाजरा (भारत में सर्वाधिक बाजरा बोया जाने वाला क्षेत्र), ईसबगोल, और अनार।
  • प्रमुख खनिज संपदा: खनिज तेल व गैस (रागेश्वरी, सरस्वती तेल कुएं), लिग्नाइट कोयला (कपूरड़ी, जालीपा व गिरल), बेंटोनाइट, और मुल्तानी मिट्टी।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

नाकोड़ा जैन तीर्थ, आसोतरा और सिवाना दुर्ग अब बालोतरा जिले में हैं, बाड़मेर में नहीं। मरु राष्ट्रीय उद्यान जैसलमेर और बाड़मेर दोनों जिलों में विस्तृत है।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
किराडू मंदिर मंदिर समूह 11वीं-12वीं सदी, सोलंकी शैली राजस्थान का खजुराहो, सोमेश्वर महादेव, हाथमा गाँव
बाड़मेर गढ़ गिरि दुर्ग 1552 ई., रावत भीमा शहर के ऊपर पहाड़ी दुर्ग, जगदम्बा माता मंदिर
महाबार के धोरे बालूका स्तूप प्राकृतिक स्थलरूप शहर के पास सुंदर रेतीले धोरे, सूर्यास्त व सफारी स्थल
मरु राष्ट्रीय उद्यान वन्यजीव क्षेत्र 1980 ई., 3162 वर्ग किमी जैसलमेर से साझा; गोडावण (ग्रेट इंडियन बस्टर्ड) व चिंकारा
चौहटन विरात्रा माता शक्ति पीठ प्राचीन तीर्थ पहाड़ी पर विरात्रा माता; चौहटन खाद्य गोंद हेतु प्रसिद्ध
देवका सूर्य मंदिर सूर्य मंदिर 12वीं सदी, पाषाण शिल्प सूर्य देव की प्राचीन पाषाण प्रतिमाएँ

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07. ब्यावर

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

मध्य अरावली दर्रे में स्थित नवगठित जिला; 1835 में कर्नल एरिक डिक्सन द्वारा 'नया शहर' के रूप में बसाया गया। प्रमुख नगर: ब्यावर, बदनोर, टॉडगढ़, रायपुर, जैतारण।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

बदनोर दुर्ग

बदनोर में मेड़तिया राठौड़ों द्वारा निर्मित 15वीं सदी का विशाल बहुमंजिला पहाड़ी दुर्ग.

पुरानी पुस्तकों में भीलवाड़ा में दर्ज; वैराठ दुर्ग के नाम से विख्यात रणनीतिक किला जिसमें जलमहल, सैन्य बैरकें और 1457 ई. में राणा कुंभा द्वारा निर्मित कुशल माता मंदिर स्थित है।

टॉडगढ़

कर्नल जेम्स टॉड द्वारा अरावली पर्वतमाला में स्थापित ऐतिहासिक पहाड़ी बस्ती व दुर्ग.

मूल नाम बोराजगढ़; जेम्स टॉड के नाम पर टॉडगढ़ कहलाया; ब्रिटिश काल में क्रांतिकारी राव गोपाल सिंह खरवा और विजय सिंह पथिक को इसी दुर्ग में नजरबंद रखा गया था।

प्रज्ञा शिखर

टॉडगढ़ में आचार्य तुलसी के सम्मान में निर्मित आधुनिक काले ग्रेनाइट का जैन स्मारक.

तेरापंथ जैन संत आचार्य तुलसी (अणुव्रत आंदोलन के प्रणेता) की स्मृति में निर्मित; भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम द्वारा उद्घाटित; आध्यात्मिक स्मारक।

दुर्ग एवं महल

  • बदनोर दुर्ग (वैराठ दुर्ग): मेवाड़ और मारवाड़ के सीमांत दर्रे पर स्थित 15वीं सदी का सात मंजिला पाषाण दुर्ग।
  • टॉडगढ़ दुर्ग (बोराजगढ़): अरावली चोटी पर स्थित किला जहाँ स्वतंत्रता सेनानियों को नजरबंद रखा गया।
  • गिरि-सुमेल युद्धस्थल (जैतारण): 1544 ईस्वी का प्रसिद्ध युद्धस्थल जहाँ शेरशाह सूरी ने जैता और कूंपा के अदम्य साहस को देखकर कहा था—'मैं मुट्ठी भर बाजरे के लिए हिंदुस्तान की सल्तनत खो देता'।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • कुशल माता मंदिर (बदनोर): 1457 ईस्वी में महाराणा कुंभा द्वारा मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी पर विजय की स्मृति में निर्मित।
  • प्रज्ञा शिखर (टॉडगढ़): आचार्य तुलसी की स्मृति में स्थापित काला ग्रेनाइट स्मारक।
  • दूधलेश्वर महादेव: टॉडगढ़ की हरी-भरी वन घाटी में स्थित प्राचीन प्राकृतिक शिव मंदिर।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • गोरम घाट: अरावली पर्वतमाला के बीच से गुजरने वाला सुंदर रेलवे ट्रैक, जो वर्षा ऋतु में अपने झरनों के कारण प्रसिद्ध है।
  • भीलबेरी जलप्रपात: टॉडगढ़-रावली वन क्षेत्र में स्थित 55 मीटर ऊँचा प्राकृतिक झरना।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • टॉडगढ़-रावली वन्यजीव अभयारण्य: अरावली पर्वतमाला में 495 वर्ग किमी में फैला अभयारण्य, जहाँ तेंदुए, भालू और चौसिंगा पाए जाते हैं।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • दी कृष्णा मिल्स लिमिटेड: 1889 में स्वतंत्रता सेनानी सेठ दामोदर दास राठी द्वारा ब्यावर में स्थापित राजस्थान की पहली सूती वस्त्र मिल।
  • चंग नृत्य परंपरा: होली के अवसर पर ब्यावर में पारंपरिक चंग और गैर नृत्य की समृद्ध परंपरा।

मेले एवं उत्सव

  • बादशाह का मेला (ब्यावर): धुलंडी के अगले दिन आयोजित ऐतिहासिक मेला; इसमें बीरबल द्वारा 'मयूर नृत्य' (मोर नृत्य) किया जाता है।
  • तेजाजी मेला (ब्यावर): भाद्रपद शुक्ल दशमी को तेजा चौक में विशाल मेला।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: ब्यावर की प्रसिद्ध तिलपट्टी (कागज जैसी पतली तिल व खांड से बनी विश्वप्रसिद्ध मिठाई, जीआई टैग प्रक्रियाधीन)।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: अकीक (गोमेद) पत्थर पॉलिशिंग, ऊन व्यापार, और सीमेंट उद्योग।
  • कृषि एवं फसलें: तिल, ज्वार, और कपास।
  • प्रमुख खनिज संपदा: फेल्सपार, क्वार्ट्ज, कैल्साइट, और सीमेंट चूना पत्थर (श्री सीमेंट का प्रमुख केंद्र)।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

बदनोर दुर्ग पूर्व में भीलवाड़ा में और टॉडगढ़ अजमेर में था; अब ये दोनों नवगठित ब्यावर जिले में हैं। ब्यावर को 1835 में कर्नल एरिक डिक्सन ने बसाया था।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
बदनोर दुर्ग गिरि दुर्ग 15वीं सदी, मेड़तिया राठौड़ वैराठ दुर्ग, 1457 में राणा कुंभा द्वारा निर्मित कुशल माता मंदिर
टॉडगढ़ दुर्ग गिरि दुर्ग कर्नल जेम्स टॉड / ऐतिहासिक बोराजगढ़; विजय सिंह पथिक व गोपाल सिंह खरवा की जेल
प्रज्ञा शिखर जैन स्मारक डॉ. कलाम द्वारा उद्घाटित आचार्य तुलसी (अणुव्रत प्रणेता) का काला ग्रेनाइट स्मारक
गिरि-सुमेल ऐतिहासिक युद्धस्थल 1544 ई., जैतारण शेरशाह सूरी और राव मालदेव के सेनापतियों जैता व कूंपा का युद्ध
टॉडगढ़-रावली अभयारण्य वन्यजीव क्षेत्र 1983 ई., 495 वर्ग किमी अरावली वन क्षेत्र, तेंदुआ व भालू आवास
बादशाह मेला सांस्कृतिक मेला धुलंडी के अगले दिन बादशाह की सवारी और बीरबल का प्रसिद्ध मयूर नृत्य

↑ विषयसूची

08. भरतपुर

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

राजस्थान का प्रवेश द्वार, महाराजा सूरजमल द्वारा स्थापित जाट साम्राज्य की राजधानी। प्रमुख नगर: भरतपुर, बयाना, नदबई, वैर, रूपवास।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान

1985 में यूनेस्को प्राकृतिक विश्व धरोहर सूची में शामिल आर्द्रभूमि पक्षी अभयारण्य.

पूर्व में घना पक्षी विहार के नाम से विख्यात; 28.7 वर्ग किमी में 370+ पक्षी प्रजातियों का आवास; 1981 में रामसर स्थल घोषित; प्रवासी पक्षियों और साइबेरियन क्रेन का ऐतिहासिक शीतकालीन बसेरा।

लोहागढ़

1733 ईस्वी में जाट महाराजा सूरजमल द्वारा निर्मित अजेय मिट्टी का दुर्ग.

सुजान गंगा नहर से भरे गहरे परिखा (खाई) से घिरा; 1805 ई. में ब्रिटिश सेनापति लॉर्ड लेक के हमलों को विफल करने वाला अजेय दुर्ग; जवाहर बुर्ज (1765 दिल्ली विजय) और फतेह बुर्ज प्रमुख हैं।

भरतपुर महल

प्रसिद्ध कमरा खास राजकीय संग्रहालय से युक्त भव्य राजमहल परिसर.

मुगल-राजपूत मिश्रित स्थापत्य में निर्मित; बयाना से प्राप्त दुर्लभ पाषाण मूर्तियों और प्राचीन हथियारों का संग्रह; डीग जलमहलों से अलग (जो अब डीग जिले में हैं)।

दुर्ग एवं महल

  • लोहागढ़ दुर्ग: 1733 ई. में महाराजा सूरजमल द्वारा निर्मित; दोहरी कच्ची मिट्टी की दीवारें जो तोप के गोलों को सोख लेती थीं; जवाहर बुर्ज और अष्टधातु दरवाजा (1765 में दिल्ली लाल किले से लाया गया)।
  • बयाना दुर्ग (विजय मंदिर गढ़): दमदमा पहाड़ी पर 1040 ई. में राजा विजयपाल द्वारा निर्मित; इसमें भीम लाट (विष्णुवर्धन गुप्त कालीन 371 ई. का प्रथम विजय स्तंभ) और उषा मंदिर स्थित है।
  • वैर का किला: बदन सिंह के काल में निर्मित ऐतिहासिक दुर्ग।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • गंगा मंदिर: 1845 ई. में महाराजा बलवंत सिंह द्वारा राजपूत, मुगल व द्रविड़ स्थापत्य के सुंदर मिश्रण में निर्मित सफेद पाषाण मंदिर।
  • लक्ष्मण मंदिर: भरतपुर राजवंश के कुलदेवता भगवान लक्ष्मण को समर्पित दुर्लभ मंदिर।
  • उषा मंदिर (बयाना): वाणासुर काल से जुड़ा मंदिर, जिसे सल्तनत काल में मस्जिद में बदला गया, बाद में पुनः मंदिर बना।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • केवलादेव घना आर्द्रभूमि: 18वीं सदी में अजान बाँध के पानी से निर्मित मानव-निर्मित आर्द्रभूमि पक्षी आवास।
  • बंध बरेठा: ककुंद नदी पर स्थित बड़ा जलाशय और पक्षी अभयारण्य।
  • मोती झील: 'भरतपुर की जीवनरेखा' कही जाने वाली झील जो सुजान गंगा नहर को जल आपूर्ति करती है।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान: यूनेस्को विश्व धरोहर; चित्रित सारस, बगुले, पेलिकन, अजगर और साइबेरियन क्रेन का आवास।
  • बंध बरेठा वन्यजीव अभयारण्य: 199 वर्ग किमी का पक्षी विहार।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • कमरा खास संग्रहालय: कुषाण कालीन मूर्तियों, हथियारों और कलाकृतियों का संग्रह।
  • खानवा स्मारक (रूपवास): 17 मार्च 1527 का ऐतिहासिक युद्धस्थल जहाँ बाबर और राणा सांगा के बीच निर्णायक युद्ध हुआ।

मेले एवं उत्सव

  • बृज महोत्सव: होली से पूर्व फाल्गुन माह में रासलीला और लोक नृत्यों का उत्सव।
  • जसवंत पशु मेला: आश्विन माह में आयोजित होने वाला प्रसिद्ध पशु मेला।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: बेढ़मी पूरी और तीखी आलू की सब्जी, दाल मुरादाबादी, और खस का शर्बत।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: खस का इत्र, बलुआ पत्थर की जालीदार नक्काशी, और पीतल शिल्प।
  • कृषि एवं फसलें: सरसों (भरतपुर सरसों का सिरमौर है; सेवर में राष्ट्रीय सरसों अनुसंधान केंद्र ICAR-DRMR 1993 में स्थापित) और गेहूँ।
  • प्रमुख खनिज संपदा: गुलाबी बलुआ पत्थर (बंसी पहाड़पुर - अयोध्या राम मंदिर हेतु प्रयुक्त पाषाण) और सिलिका सैंड।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

डीग के महल और कामां अब नवगठित डीग जिले में हैं; लोहागढ़, केवलादेव और बयाना भरतपुर जिले में ही हैं। केवलादेव 1985 में यूनेस्को प्राकृतिक सूची में शामिल हुआ था (सांस्कृतिक में नहीं)।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
केवलादेव घना राष्ट्रीय उद्यान 1985 यूनेस्को (1981 NP) विश्व धरोहर आर्द्रभूमि, रामसर स्थल, प्रवासी पक्षी व साइबेरियन क्रेन
लोहागढ़ दुर्ग पारिख/मिट्टी दुर्ग 1733 ई., महाराजा सूरजमल अजेय दुर्ग, सुजान गंगा खाई, लॉर्ड लेक के हमले विफल
बयाना दुर्ग गिरि दुर्ग 1040 ई., राजा विजयपाल विजय मंदिर गढ़, भीम लाट (371 ई. का गुप्तकालीन प्रथम विजय स्तंभ)
भरतपुर महल राजमहल परिसर मुगल-राजपूत शैली कमरा खास संग्रहालय, दुर्लभ कुषाण व गुप्तकालीन मूर्तियाँ
गंगा मंदिर विशाल मंदिर 1845 ई., बलवंत सिंह सफेद पाषाण, राजपूत, मुगल व द्रविड़ स्थापत्य का संगम
बंसी पहाड़पुर पत्थर खदान ऐतिहासिक बलुआ पत्थर अयोध्या के राम मंदिर निर्माण हेतु प्रयुक्त प्रसिद्ध गुलाबी पत्थर

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09. भीलवाड़ा

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

भारत की वस्त्र नगरी और 'राजस्थान का मैनचेस्टर', पूर्वी मेवाड़ का ऐतिहासिक औद्योगिक व सांस्कृतिक केंद्र। प्रमुख नगर: भीलवाड़ा, मांडलगढ़, आसींद, शाहपुरा, जहाजपुर।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

शाहपुरा रामद्वारा

संत रामचरणजी द्वारा स्थापित रामस्नेही संप्रदाय की सर्वोच्च आध्यात्मिक पीठ.

1760 ई. में स्थापित; प्रसिद्ध फूलडोल महोत्सव (चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से पंचमी) का आयोजन; इस 41-जिला व्यवस्था में भीलवाड़ा के अंतर्गत अध्ययन किया जाता है।

बिजौलिया

1170 ई. के चौहान शिलालेख और ऐतिहासिक किसान आंदोलन के लिए प्रसिद्ध मंदिर नगर.

प्राचीन विंध्यावली; मंदलेश्वर (उण्डेश्वर) महादेव मंदिर और चौहानों की वंशावली देने वाला 1170 ई. का शिलालेख स्थित; साधु सीताराम दास व विजय सिंह पथिक के नेतृत्व में भारत के सबसे लंबे अहिंसक किसान आंदोलन (1897-1941) का केंद्र।

मेनाल

11वीं सदी का अलंकृत शिव मंदिर समूह और 150 फीट ऊँचा विहंगम मौसमी जलप्रपात.

कोटा-चित्तौड़ मार्ग पर मेनाली नदी की गहरी घाटी में स्थित; पृथ्वीराज चौहान द्वितीय और रानी सुहवदेवी द्वारा निर्मित; उत्कृष्ट पाषाण शिल्प और वर्षाकालीन पर्यटन का संगम।

दुर्ग एवं महल

  • मांडलगढ़ दुर्ग: बनास, बेड़च और मेनाली के त्रिवेणी संगम के पास स्थित प्राचीन दुर्ग; राणा सांगा की कर्मभूमि और हल्दीघाटी युद्ध (1576) से पूर्व मानसिंह का पड़ाव; जगन्नाथ कछवाहा की 32 खंभों की छतरी व राणा सांगा की 8 खंभों की छतरी स्थित है।
  • जहाजपुर दुर्ग: नागदी नदी के तट पर अशोक के पौत्र संप्रति द्वारा निर्मित माना जाने वाला प्राचीन दुर्ग।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • शाहपुरा रामद्वारा: रामस्नेही संप्रदाय की मुख्य पीठ; फूलडोल मेले का केंद्र।
  • आसींद (सवाई भोज मंदिर): खारी नदी के किनारे गुर्जर समाज के आराध्य लोकदेवता भगवान देवनारायण जी का प्रमुख तीर्थ।
  • तिलस्वां महादेव: चर्म रोगों से मुक्ति के लिए प्रसिद्ध प्राचीन शिव मंदिर व कुंड।
  • हरणी महादेव: भीलवाड़ा शहर के निकट पहाड़ी पर स्थित प्रसिद्ध शिव गुफा मंदिर।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • मेनाल जलप्रपात: मेनाली नदी द्वारा गहरी प्राकृतिक घाटी में गिरने वाला 150 फीट ऊँचा मौसमी झरना।
  • त्रिवेणी संगम (बीगोद): बनास, बेड़च और मेनाली नदियों का पवित्र संगम स्थल।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • बागोर पुरातात्त्विक स्थल: कोठारी नदी किनारे वी.एन. मिश्र द्वारा उत्खनित; 'महासतियों का टीला' जहाँ भारत में पशुपालन के प्राचीनतम साक्ष्य (5000-4000 ई.पू.) प्राप्त हुए।
  • ओझियाना: ताम्रपाषाण कालीन स्थल जहाँ सफेद रंग से रंगे मिट्टी के बैल मिले।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • फड़ चित्रकला: शाहपुरा के जोशी परिवार (पद्मश्री श्रीलाल जोशी) द्वारा कपड़े पर की जाने वाली देवनारायण व पाबूजी की विश्वप्रसिद्ध लोक चित्रकला।
  • वस्त्र उद्योग: पॉलिएस्टर विस्कोस सूटिंग्स का विशाल उत्पादन केंद्र ('वस्त्र नगरी')।

मेले एवं उत्सव

  • फूलडोल मेला (शाहपुरा): चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से पंचमी; रामस्नेही संप्रदाय का प्रसिद्ध रंगोत्सव।
  • देवनारायण जी का मेला (आसींद): भाद्रपद शुक्ल सप्तमी को लगने वाला विशाल मेला।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: मक्के के ढोकले, आसींद के गुलाब जामुन, और भीलवाड़ा का सेव-मामरा।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: फड़ चित्रकला (जीआई टैग, शाहपुरा के जोशी परिवार की परंपरा) और सूती/सिंथेटिक वस्त्र निर्माण।
  • कृषि एवं फसलें: मक्का (भीलवाड़ा का मुख्य खाद्यान्न), कपास, और मूँगफली।
  • प्रमुख खनिज संपदा: अभ्रक (माइका - भीलवाड़ा 'अभ्रक नगरी' कहलाता है, अभ्रक ईंट उद्योग), लौह अयस्क (तिरंगा पहाड़ी, जहाजपुर), और घिया पत्थर।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

बदनोर दुर्ग अब ब्यावर जिले में है, भीलवाड़ा में नहीं। बिजौलिया 44 वर्षों तक चले ऐतिहासिक किसान आंदोलन का केंद्र रहा और यहीं 1170 ई. का चौहान अभिलेख है।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
शाहपुरा रामद्वारा आध्यात्मिक पीठ 1760 ई., संत रामचरणजी रामस्नेही संप्रदाय की मुख्य पीठ, फूलडोल महोत्सव
बिजौलिया मंदिर ऐतिहासिक नगर 1170 ई. शिलालेख उण्डेश्वर महादेव, चौहान वंशावली अभिलेख, किसान आंदोलन
मेनाल परिसर मंदिर व जलप्रपात 11वीं सदी, चौहान शासक मेनाली नदी घाटी, 150 फीट मौसमी झरना, अलंकृत शिव मंदिर
मांडलगढ़ दुर्ग गिरि दुर्ग प्राचीन / राणा सांगा त्रिवेणी संगम, 32 खंभों की जगन्नाथ कछवाहा की छतरी
बागोर पुरातात्त्विक स्थल प्रागैतिहासिक स्थल 5000 ई.पू., कोठारी नदी वी.एन. मिश्र द्वारा उत्खनित, भारत में पशुपालन का प्राचीनतम साक्ष्य
आसींद देवनारायण लोक तीर्थ प्राचीन, खारी नदी सवाई भोज मंदिर, गुर्जर समाज के आराध्य देवनारायण जी

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10. बीकानेर

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

प्राचीन जांगलदेश का केंद्र, 1488 ई. में आखातीज पर राव जोधा के पुत्र राव बीका द्वारा स्थापित। प्रमुख नगर: बीकानेर, देशनोक, नोखा, कोलायत, लूणकरणसर।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

जूनागढ़

1589-1594 ईस्वी में राजा रायसिंह द्वारा निर्मित खाई से घिरा मैदानी दुर्ग.

प्रधानमंत्री कर्मचंद की देखरेख में निर्मित; 'जमीन का जेवर' उपनाम से विख्यात; अनूप महल (सोने की कलम का काम), बादल महल, चंद्र महल और जयमल व पत्ता की गजारूढ़ प्रतिमाओं वाला सूरज पोल प्रमुख हैं।

करणी माता, देशनोक

हजारों संरक्षित चूहों (काबा) के लिए विश्वप्रसिद्ध राठौड़ कुलदेवी का विख्यात मंदिर.

बीकानेर से 30 किमी दक्षिण में स्थित; 25,000 से अधिक पवित्र चूहों (काबा) का मंदिर; सफेद चूहे का दर्शन शुभ माना जाता है; संगमरमर का मुख्य द्वार और चांदी के किवाड़ महाराजा गंगा सिंह द्वारा भेंट किए गए।

रामपुरिया हवेलियाँ

विक्टोरियन और राजपूत स्थापत्य वाली लाल दुलमेरा बलुआ पत्थर की भव्य हवेलियाँ.

बीकानेर के परकोटे में प्रसिद्ध रामपुरिया व्यापारी परिवार द्वारा निर्मित; बारीक झरोखे, जालीदार खिड़कियाँ और यूरोपीय अलंकरण; शेखावाटी की चित्रित हवेलियों से अलग पाषाण नक्काशीदार हवेलियाँ।

दुर्ग एवं महल

  • जूनागढ़ दुर्ग (चिंतामणि दुर्ग): 1589-1594 ई. में राजा रायसिंह द्वारा निर्मित; 'जमीन का जेवर', सूरज पोल, अनूप महल, कर्ण महल।
  • लालगढ़ पैलेस: महाराजा गंगा सिंह द्वारा अपने पिता लाल सिंह की स्मृति में 1902-1926 में निर्मित; सर सैमुअल स्विंटन जैकब द्वारा लाल बलुआ पत्थर में इंडो-सारसेनिक डिजाइन।
  • गजनेर पैलेस: गजनेर झील के किनारे महाराजा गंगा सिंह द्वारा निर्मित लाल पत्थर का भव्य शिकार महल।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • करणी माता मंदिर (देशनोक): सफेद व काले चूहों (काबा) वाला विश्वप्रसिद्ध मंदिर।
  • भांडाशाह जैन मंदिर: 1514 ई. में ओसवाल व्यापारी भांडा शाह द्वारा निर्मित, 5वें तीर्थंकर सुमतिनाथ को समर्पित; नींव के गारे में पानी की जगह 40,000 किलो शुद्ध देसी घी का उपयोग किया गया।
  • कपिल मुनि आश्रम (कोलायत): सांख्य दर्शन के प्रणेता महर्षि कपिल की तपोभूमि; पवित्र सरोवर जहाँ कार्तिक पूर्णिमा पर दीपदान होता है।
  • मुकाम (नोखा): बिश्नोई संप्रदाय के संस्थापक गुरु जांभोजी की समाधि व प्रधान तीर्थ स्थल।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • कोलायत झील: 52 घाटों, पीपल के वृक्षों और मंदिरों से घिरी पवित्र प्राकृतिक झील।
  • गजनेर झील: गजनेर वन्यजीव क्षेत्र में स्थित सुंदर झील जहाँ भटतीतर और काले हिरण आते हैं।
  • लूणकरणसर झील: पश्चिमी राजस्थान की खारी झील।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • राष्ट्रीय ऊँट अनुसंधान केंद्र (जोहड़बीड़): 1984 में स्थापित; एशिया का एकमात्र प्रमुख ऊँट प्रजनन और अनुसंधान संस्थान।
  • जोहड़बीड़ गिद्ध संरक्षण रिजर्व: यूरेशियन और हिमालयी गिद्धों का प्रसिद्ध शीतकालीन संरक्षण स्थल।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • उस्ता कला: ऊँट की खाल पर सोने की बारीक नक्काशी व मीनाकारी (मुनाब्बत कार्य), पद्मश्री हिसामुद्दीन उस्ता द्वारा प्रसिद्ध (जीआई टैग)।
  • मथेरण कला: जैन कलाकारों द्वारा चूने और कपड़ों पर पारंपरिक भित्तिचित्र व धार्मिक चित्रांकन।
  • गंगा गोल्डन जुबली संग्रहालय: रंगमहल की कुषाणकालीन टेराकोटा, हड़प्पा अवशेष और हथियारों का अनूठा संग्रह।

मेले एवं उत्सव

  • बीकानेर ऊँट उत्सव: जनवरी माह में आयोजित होने वाला ऊँट दौड़, सजावट और लोक नृत्यों का उत्सव।
  • कोलायत मेला: कार्तिक पूर्णिमा पर कपिल सरोवर में पवित्र स्नान और भव्य दीपदान समारोह।
  • करणी माता मेला: चैत्र और आश्विन नवरात्र में देशनोक में विशाल लक्खी मेला।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: बीकानेरी भुजिया (2010 से जीआई टैग; मोठ के बेसन व मसालों से निर्मित), बीकानेरी रसगुल्ला, पापड़, और घेवर।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: उस्ता कला (जीआई टैग - ऊँट के चमड़े पर स्वर्ण मीनाकारी), मथेरण कला, और बीकानेरी ऊनी कालीन (एशिया की सबसे बड़ी ऊन मंडी)।
  • कृषि एवं फसलें: मोठ, मूँगफली (लूणकरणसर को बंपर उत्पादन के कारण 'राजस्थान का राजकोट' कहा जाता है), और ग्वार।
  • प्रमुख खनिज संपदा: लिग्नाइट कोयला (पलाना - भारत का सर्वोत्तम टर्शियरी लिग्नाइट, बरसिंगसर, गुढ़ा), जिप्सम (जामसर - एशिया की सबसे बड़ी जिप्सम खान), चीनी मिट्टी, और बॉल क्ले।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

जूनागढ़ दुर्ग बीकानेर में है (रायसिंह द्वारा निर्मित), जबकि मेहरानगढ़ जोधपुर में है (राव जोधा द्वारा निर्मित)। भांडाशाह जैन मंदिर 5वें तीर्थंकर सुमतिनाथ को समर्पित है और इसकी नींव में घी का उपयोग हुआ था।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
जूनागढ़ दुर्ग स्थल दुर्ग 1589-1594 ई., राजा रायसिंह जमीन का जेवर, खाई से सुरक्षित, अनूप महल, सूरज पोल
करणी माता मंदिर कुलदेवी तीर्थ प्राचीन, देशनोक 25,000+ पवित्र चूहे (काबा), सफेद चूहा दर्शन, चांदी के किवाड़
रामपुरिया हवेलियाँ हवेली स्थापत्य 19वीं सदी, दुलमेरा पत्थर लाल बलुआ पत्थर के नक्काशीदार झरोखे, विक्टोरियन प्रभाव
भांडाशाह जैन मंदिर जैन मंदिर 1514 ई., भांडा शाह सुमतिनाथ जी को समर्पित, नींव में 40,000 किग्रा देसी घी
कपिल मुनि आश्रम तीर्थ स्थल प्राचीन, कोलायत झील सांख्य दर्शन प्रणेता, 52 घाट, कार्तिक पूर्णिमा दीपदान
ऊँट अनुसंधान केंद्र राष्ट्रीय केंद्र 1984 ई., जोहड़बीड़ एशिया का एकमात्र प्रमुख ऊँट प्रजनन व अनुसंधान संस्थान

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11. बूंदी

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

हाड़ा चौहानों की ऐतिहासिक राजधानी, 50 से अधिक बावड़ियों के कारण 'बावड़ियों का शहर' (स्टेपवेल सिटी) नाम से विख्यात। प्रमुख नगर: बूंदी, केशोरायपाटन, नैनवां, लाखेरी, हिंडोली।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

रानीजी की बावड़ी

1699 ईस्वी में रानी नाथावती द्वारा निर्मित भव्य भूमिगत बावड़ी.

राव राजा अनिरुद्ध सिंह की रानी नाथावती द्वारा निर्मित; 46 मीटर गहरी सीढ़ीदार जल संरचना, जिसमें सुंदर तोरण द्वार और हाथियों के स्तंभ बने हैं; 'बावड़ियों का सिरमौर' कही जाती है।

चित्रशाला, बूंदी

गढ़ महल में बूंदी शैली के भित्तिचित्रों की विश्वप्रसिद्ध राजकीय कला दीर्घा.

18वीं सदी में राव उम्मेद सिंह के शासनकाल में निर्मित (उम्मेद महल); इसकी दीवारें और छतें कृष्ण लीला, रागमाला, शाही दरबार और वनस्पति-पशु पक्षियों के जीवंत भित्तिचित्रों से सुसज्जित हैं।

बूंदी नगर की सुंदर कृत्रिम झील जिसमें वरुण देव का आधा डूबा हुआ मंदिर स्थित है.

ऊँचाई पर स्थित तारागढ़ दुर्ग और गढ़ महल का सुंदर प्रतिबिंब दर्शाती है; बूंदी की मध्यकालीन जल प्रबंधन प्रणाली का हिस्सा; जैत सागर व फूल सागर से अलग।

दुर्ग एवं महल

  • तारागढ़ दुर्ग (स्टार फोर्ट): 1354 ईस्वी में राव बरसिंह द्वारा ऊँची पहाड़ी पर निर्मित; प्रसिद्ध 'गर्भ गुंजन' तोप और विशाल जल कुंड (भीम बुर्ज, दूधा कुंड) स्थित हैं।
  • गढ़ महल: पहाड़ी ढलान पर स्थित महलों का भव्य समूह; रतन दौलत, छत्र महल और बादल महल प्रमुख हैं।
  • सुख महल: जैत सागर झील के किनारे स्थित महल जहाँ ब्रिटिश लेखक रुडयार्ड किपलिंग ने रहकर अपने उपन्यास 'किम' की रचना की थी।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • केशोरायपाटन मंदिर: 17वीं सदी में राव राजा छत्रसाल द्वारा चंबल नदी के तट पर निर्मित भगवान विष्णु का प्रसिद्ध मंदिर।
  • नवल सागर वरुण मंदिर: नवल सागर झील के जल में आंशिक डूबा हुआ जल देवता वरुण का मंदिर।
  • बीजासन माता मंदिर (इंद्रगढ़): इंद्रगढ़ की पहाड़ी पर स्थित प्रसिद्ध देवी तीर्थ।
  • क्षार बाग: बूंदी के हाड़ा शासकों की 66 कलात्मक शाही छतरियाँ।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • भीमलत जलप्रपात: मांगली नदी द्वारा बनाई गई प्राकृतिक घाटी में 60 मीटर ऊँचा जलप्रपात।
  • जैत सागर झील: जैता मीणा द्वारा निर्मित कमल के फूलों से आच्छादित सुंदर झील।
  • फूल सागर झील: 17वीं सदी में महारानी फूल कंवर द्वारा निर्मित सरोवर।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व: 2022 में राजस्थान का चौथा और भारत का 52वां बाघ अभयारण्य अधिसूचित; रणथंभौर और मुकुंदरा के बीच बाघ गलियारा।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • चौरासी खंभों की छतरी: 1683 ई. में राव राजा अनिरुद्ध सिंह द्वारा धाभाई देवा की स्मृति में निर्मित; 84 खंभों पर टिकी दो मंजिला छतरी जिसके मध्य में शिवलिंग स्थापित है।
  • बूंदी चित्रशैली: पशु-पक्षियों के चित्रण, वर्षा ऋतु, बादलों और सघन वनस्पति के लिए विश्वप्रसिद्ध चित्रकला।

मेले एवं उत्सव

  • कजली तीज मेला: भाद्रपद कृष्ण तृतीया; बूंदी में तीज माता की अनूठी व भव्य शाही सवारी निकाली जाती है।
  • बूंदी उत्सव: नवंबर (कार्तिक) माह में आयोजित होने वाला राज्य पर्यटन विभाग का सांस्कृतिक उत्सव।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: बूंदी के प्रसिद्ध लड्डू / नुकती, मावा कचौड़ी, और दाल-बाटी।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: बूंदी लघु चित्रकला (प्राकृतिक हरे रंग, मोर व शिकार दृश्यों के लिए प्रसिद्ध) और तांबे के बर्तन।
  • कृषि एवं फसलें: बासमती चावल (हाड़ौती का चावल कटोरा), सोयाबीन, और गेहूँ।
  • प्रमुख खनिज संपदा: सिलिका सैंड, चूना पत्थर (लाखेरी में 1915 में एसीसी द्वारा राजस्थान की पहली सीमेंट फैक्ट्री स्थापित), और बूंदी पत्थर।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

बूंदी का तारागढ़ दुर्ग 1354 ई. में राव बरसिंह ने बनवाया, जबकि अजमेर का तारागढ़ 1113 ई. में अजयराज ने बनवाया। रानीजी की बावड़ी बूंदी में है, जबकि चाँद बावड़ी दौसा में है।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
तारागढ़ दुर्ग बूंदी गिरि दुर्ग 1354 ई., राव बरसिंह तारा नुमा दुर्ग, गर्भ गुंजन तोप, विशाल जल कुंड
रानीजी की बावड़ी बावड़ी स्थापत्य 1699 ई., रानी नाथावती बावड़ियों का सिरमौर, 46 मी. गहरी, कलात्मक तोरण द्वार
चित्रशाला कला दीर्घा 18वीं सदी, राव उम्मेद सिंह कृष्ण लीला व बूंदी चित्रशैली के विश्वप्रसिद्ध भित्तिचित्र
चौरासी खंभों की छतरी राजकीय स्मारक 1683 ई., अनिरुद्ध सिंह दो मंजिला, 84 खंभे, धाभाई देवा की स्मृति में निर्मित
रामगढ़ विषधारी बाघ अभयारण्य 2022 अधिसूचित (चौथा रिजर्व) भारत का 52वां टाइगर रिजर्व, वन्यजीव गलियारा
केशोरायपाटन मंदिर नगर 17वीं सदी, छत्रसाल चंबल नदी किनारे प्रसिद्ध विष्णु मंदिर, कार्तिक पूर्णिमा मेला

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12. चित्तौड़गढ़

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

शौर्य और बलिदान की पावन मेवाड़ भूमि, जिसे महाराणा कुंभा, राणा सांगा और रानी पद्मिनी ने अमर बनाया। प्रमुख नगर: चित्तौड़गढ़, रावतभाटा, कपासन, बेंगू, निम्बाहेड़ा, राशमी।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

विजय स्तंभ

1440-1448 ईस्वी में महाराणा कुंभा द्वारा निर्मित 122 फीट ऊँचा नौ मंजिला विजय स्मारक.

सारंगपुर युद्ध (1437 ई.) में मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी पर विजय की स्मृति में निर्मित; सूत्रधार जैता और उसके पुत्रों नापा, पोमा, पूंजा द्वारा रचित; भगवान विष्णु को समर्पित; राजस्थान पुलिस और माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का प्रतीक चिह्न; 157 सीढ़ियाँ स्थित हैं।

कीर्ति स्तंभ

प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित 75 फीट ऊँचा सात मंजिला दिगंबर जैन स्तंभ.

चित्तौड़गढ़ दुर्ग में 12वीं सदी में जैन व्यापारी जीजा बघेरवाल द्वारा निर्मित; इसमें आदिनाथ की चार विशाल कायोत्सर्ग मुद्रा वाली प्रतिमाएं हैं; कुंभा के 9 मंजिला विजय स्तंभ से पूरी तरह भिन्न।

चित्तौड़गढ़ दुर्ग

700 एकड़ में मेषा के पठार पर स्थित यूनेस्को विश्व धरोहर पहाड़ी दुर्ग.

7वीं सदी में चित्रांगद मौर्य द्वारा निर्मित; 'राजस्थान का गौरव' और 'दुर्गों का सिरमौर'; तीन ऐतिहासिक साकों (1303 पद्मिनी, 1535 कर्णावती, 1568 जयमल-पत्ता) का साक्षी; पद्मिनी महल, कुंभा महल, गौमुख कुंड और मीरा मंदिर स्थित हैं।

दुर्ग एवं महल

  • चित्तौड़गढ़ दुर्ग: यूनेस्को विश्व धरोहर (2013); भारत का सबसे विशाल 'लिविंग फोर्ट'; 7 विशाल प्रवेश द्वार (पाडन पोल, भैरव पोल, हनुमान पोल, गणेश पोल, जोड़ला पोल, लक्ष्मण पोल, राम पोल)।
  • भैंसरोड़गढ़ दुर्ग: चंबल और बामनी नदी के संगम पर स्थित जलदुर्ग; कर्नल जेम्स टॉड ने कहा था कि यदि उन्हें राजस्थान में कोई जागीर दी जाए तो वे भैंसरोड़गढ़ चुनेंगे ('राजस्थान का वेल्लोर')।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • सांवलिया सेठ मंदिर (मंडफिया): भगवान कृष्ण का विश्वप्रसिद्ध मंदिर जहाँ वे सेठ/व्यापारी के रूप में पूजे जाते हैं।
  • मातृकुंडिया (राशमी): बनास नदी किनारे स्थित 'राजस्थान का हरिद्वार' जहाँ अस्थि विसर्जन होता है; 1921 के मोतीलाल तेजावत के एकी आंदोलन का केंद्र।
  • मीरा बाई मंदिर (कुंभ श्याम): 15वीं सदी का मंदिर जहाँ भक्त शिरोमणि मीरा बाई कृष्ण भक्ति में लीन रहती थीं।
  • कालिका माता मंदिर: 8वीं सदी का मूलतः सूर्य मंदिर, जिसे महाराणा सज्जन सिंह ने कालिका माता मंदिर में पुनर्निर्मित कराया।
  • समीधेश्वर मंदिर: मूलतः परमार राजा भोज द्वारा 'त्रिभुवन नारायण' नाम से निर्मित, महाराणा मोकल द्वारा जीर्णोद्धार।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • गौमुख कुंड: चित्तौड़गढ़ दुर्ग में स्थित प्राकृतिक भूमिगत जलस्रोत का पवित्र कुंड।
  • चूलिया जलप्रपात (रावतभाटा): चंबल नदी पर स्थित 18 मीटर ऊँचा प्राकृतिक जलप्रपात।
  • राणा प्रताप सागर बाँध (रावतभाटा): जल भराव क्षमता में राजस्थान का सबसे बड़ा बाँध; भारत का प्रमुख परमाणु ऊर्जा केंद्र (RAPS)।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • बस्सी वन्यजीव अभयारण्य: 153 वर्ग किमी में फैला तेंदुओं, जंगली सूअरों और पक्षियों का अभयारण्य।
  • भैंसरोड़गढ़ अभयारण्य: चंबल और बामनी नदी घाटियों में 229 वर्ग किमी का वन्यजीव अभयारण्य।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • नगरी (मध्यमिका): शिवि जनपद की प्राचीन राजधानी; डी.आर. भंडारकर द्वारा उत्खनित; शिवि सिक्के और 2री सदी ई.पू. का घोसुंडी शिलालेख (राजस्थान में भागवत/वैष्णव धर्म का प्राचीनतम अभिलेख)।
  • अकोला का दाबू प्रिंट: मिट्टी के दाबू (लेप) से सूती कपड़ों पर की जाने वाली पारंपरिक छपाई।
  • बस्सी काष्ठ कला: लकड़ी की कावड़ (चल मंदिर), बेवाण और लकड़ी के खिलौने बनाने का प्रसिद्ध केंद्र।

मेले एवं उत्सव

  • जौहर मेला: चैत्र कृष्ण एकादशी को चित्तौड़गढ़ दुर्ग में वीरांगनाओं के अमर बलिदान की स्मृति में आयोजित मेला।
  • सांवलिया सेठ जलझूलनी एकादशी मेला: भाद्रपद शुक्ल एकादशी को मंडफिया में विशाल लक्खी मेला।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: चित्तौड़ के भुने हुए मसालेदार चने, मेथी दाल, और चित्तौड़ी खीर।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: अकोला का दाबू प्रिंट (जीआई टैग, मिट्टी की दाबू छपाई), बस्सी की कावड़ व लकड़ी के खिलौने, और तोरण।
  • कृषि एवं फसलें: अफीम (काला सोना - भारत में वैध अफीम की सर्वाधिक खेती), मक्का, और मूँगफली।
  • प्रमुख खनिज संपदा: सीमेंट चूना पत्थर (निम्बाहेड़ा व चंदेरिया - राजस्थान का सबसे बड़ा सीमेंट हब), सीसा-जस्ता-चांदी (चंदेरिया सीसा-जस्ता स्मेल्टर एशिया का सबसे बड़ा संयंत्र है)।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

विजय स्तंभ 9 मंजिला है (राणा कुंभा द्वारा निर्मित), जबकि जैन कीर्ति स्तंभ 7 मंजिला है (जीजा बघेरवाल द्वारा निर्मित)। मातृकुंडिया 'राजस्थान का हरिद्वार' कहलाता है और यह चित्तौड़गढ़ में है, उदयपुर में नहीं। रावतभाटा परमाणु केंद्र चित्तौड़गढ़ जिले में है, कोटा में नहीं।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
विजय स्तंभ विजय स्मारक 1440-1448 ई., राणा कुंभा 9 मंजिला, 122 फीट, सारंगपुर विजय, विष्णु समर्पित, राज. पुलिस प्रतीक
चित्तौड़गढ़ दुर्ग गिरि दुर्ग 7वीं सदी, चित्रांगद मौर्य यूनेस्को धरोहर 2013, 3 ऐतिहासिक साके, पद्मिनी महल, गौमुख
कीर्ति स्तंभ जैन स्तंभ 12वीं सदी, जीजा बघेरवाल 7 मंजिला, 75 फीट, प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित
सांवलिया सेठ कृष्ण मंदिर मंडफिया, प्रमुख तीर्थ सेठ रूप में कृष्ण उपासना, विशाल दानपात्र व लक्खी मेला
मातृकुंडिया पवित्र तीर्थ राशमी, बनास नदी तट राजस्थान का हरिद्वार, अस्थि विसर्जन, 1921 एकी आंदोलन
भैंसरोड़गढ़ दुर्ग जलदुर्ग चंबल-बामनी संगम राजस्थान का वेल्लोर, कर्नल टॉड द्वारा प्रशंसित जलदुर्ग

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13. चूरू

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

थार मरुस्थल का प्रवेश द्वार, शेखावाटी का अंग, अत्यधिक तापमान और अलंकृत हवेलियों के लिए प्रसिद्ध। प्रमुख नगर: चूरू, रतनगढ़, सुजानगढ़, राजगढ़, सरदारशहर, बीदासरा।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

चूरू दुर्ग

1814 ईस्वी के युद्ध में बारूद समाप्त होने पर चाँदी के गोले दागने वाला ऐतिहासिक दुर्ग.

1739 ईस्वी में ठाकुर कुशल सिंह द्वारा निर्मित; 1814 ई. में बीकानेर व ब्रिटिश सेना के घेरे के समय जब सीसा समाप्त हो गया तो नगर सेठों ने चाँदी दी और तोपों से चाँदी के गोले दागे गए; विश्व इतिहास की अनूठी घटना।

ताल छापर

भारत में कृष्णमृगों (काले हिरणों) की सर्वाधिक आबादी के लिए प्रसिद्ध अनूठा वन्यजीव अभयारण्य.

सुजानगढ़ के निकट स्थित 7.19 वर्ग किमी का खुला घासस्थल; 4,000 से अधिक कृष्णमृगों (काले हिरणों), मरु बिल्ली और प्रवासी पक्षी कुरजाँ का बसेरा; यहाँ की विशेष मीठी घास 'मोथिया' प्रसिद्ध है।

सालासर बालाजी

दाढ़ी व मूंछ वाली हनुमान जी की अनूठी प्रतिमा को समर्पित विख्यात चमत्कारी तीर्थ.

1754 ईस्वी में भक्त मोहनदास जी द्वारा स्थापित; आसोटा गाँव में एक जाट किसान को खेत जोतते समय यह स्वयंभू प्रतिमा मिली थी; चैत्र व आश्विन पूर्णिमा को लाखों भक्तों का लक्खी मेला भरता है।

दुर्ग एवं महल

  • चूरू दुर्ग: 1739 ई. में ठाकुर कुशल सिंह द्वारा निर्मित; 1814 ई. में चाँदी के गोले दागने वाला दुर्ग।
  • सुजानगढ़ दुर्ग: 1785 ई. में बीकानेर के महाराजा सूरत सिंह द्वारा निर्मित सीमांत दुर्ग।
  • रतनगढ़ दुर्ग: 1798 ई. में महाराजा रतन सिंह द्वारा स्थापित किला।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • सालासर बालाजी: दाढ़ी-मूंछ वाले हनुमान जी का विश्वप्रसिद्ध मंदिर।
  • ददरेवा: लोकदेवता गोगाजी की जन्मस्थली और राजधानी ('शीर्ष मेढ़ी'); पवित्र तलाई व गोगाजी का मंदिर।
  • द्रोणपुर: सुजानगढ़ के पास स्थित ऐतिहासिक स्थल, जिसे महाभारत कालीन गुरु द्रोणाचार्य की तपोभूमि माना जाता है।
  • इच्छापूर्ण बालाजी (सरदारशहर): दक्षिण भारतीय द्रविड़ शैली में निर्मित आधुनिक भव्य मंदिर।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • ताल छापर प्राकृतिक आवास: धोरों से घिरा खारा समतल मैदान व घासस्थल।
  • थार के बालूका स्तूप: बीदासरा और सरदारशहर के चारों ओर फैले रेत के टीले।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • ताल छापर अभयारण्य: कृष्णमृगों का स्वर्ग; प्रवासी कुरजाँ, शिकरा, सांडा और शिकारी पक्षियों का प्रसिद्ध आवास।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • सुराणा हवेली (चूरू): 1,111 खिड़की-दरवाजों वाली हवेली, जिसे 'शेखावाटी का हवामहल' कहा जाता है।
  • मालजी का कमरा: 1925 ई. में मालचंद कोठारी द्वारा निर्मित इटैलियन प्रभाव वाला कलात्मक भवन।
  • चंदन काष्ठ कला: चूरू के मालचंद जांगिड़ परिवार द्वारा की जाने वाली विश्वप्रसिद्ध चंदन की सूक्ष्म नक्काशी।

मेले एवं उत्सव

  • सालासर बालाजी मेला: चैत्र पूर्णिमा (हनुमान जयंती) और आश्विन पूर्णिमा पर विशाल लक्खी मेला।
  • गोगाजी मेला (ददरेवा): भाद्रपद कृष्ण नवमी (गोगा नवमी) पर जन्मस्थली पर लगने वाला मेला।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: चूरू के प्रसिद्ध पेड़े, दाल कचौड़ी, और बाजरे का खीचड़ा।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: चंदन की काष्ठ कला (राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त सूक्ष्म नक्काशीदार पंखे व डिब्बियाँ) और ऊनी कंबल।
  • कृषि एवं फसलें: मोठ, बाजरा, और चना।
  • प्रमुख खनिज संपदा: जिप्सम, नमक (ताल छापर झील), और भूमिगत पोटाश भंडार।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

ददरेवा (गोगाजी की जन्मस्थली / शीर्ष मेढ़ी) चूरू जिले में है, जबकि गोगामेड़ी (समाधि स्थल / धुर मेढ़ी) हनुमानगढ़ जिले में है। ताल छापर अभयारण्य चूरू में है।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
चूरू दुर्ग मरु दुर्ग 1739 ई., ठाकुर कुशल सिंह 1814 के युद्ध में बारूद खत्म होने पर चाँदी के गोले दागे गए
ताल छापर वन्यजीव अभयारण्य 1971 ई., 7.19 वर्ग किमी कृष्णमृग (काले हिरणों) का संसार, मोथिया घास, प्रवासी पक्षी
सालासर बालाजी हनुमान मंदिर 1754 ई., मोहनदास जी दाढ़ी-मूंछ वाले बालाजी, आसोटा की स्वयंभू प्रतिमा, लक्खी मेला
ददरेवा लोकदेवता तीर्थ प्राचीन, राजगढ़ तहसील गोगाजी चौहान की जन्मस्थली (शीर्ष मेढ़ी), पवित्र तलाई
सुराणा हवेली हवेली स्थापत्य 19वीं सदी शेखावाटी का हवामहल, 1,111 खिड़की-दरवाजे
मालजी का कमरा कलात्मक भवन 1925 ई., मालचंद कोठारी इटैलियन व राजपूत स्थापत्य का मिश्रण, भित्ति व प्लास्टर शिल्प

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14. दौसा

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

ढूंढाड़ में कछवाहों की प्रथम ऐतिहासिक राजधानी, बाणगंगा बेसिन में जयपुर-आगरा मार्ग पर स्थित। प्रमुख नगर: दौसा, बांदीकुई, लालसोट, महवा, सिकराय।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

चाँद बावड़ी

आभानेरी में 8वीं-9वीं शताब्दी में निर्मित विश्व की सबसे गहरी और कलात्मक बावड़ी.

निकुंभ राजपूत राजा चंद्र द्वारा निर्मित; 13 मंजिला गहरी जिसमें 100 फीट नीचे उतरती हुई 3,500 सममित सीढ़ियाँ हैं; हर्षत माता मंदिर के समीप; भारतीय जल स्थापत्य का बेजोड़ नमूना।

दौसा दुर्ग

देवगिरि पहाड़ी पर सूप (छाजले) की आकृति में बना ऐतिहासिक गिरि दुर्ग.

1137 ईस्वी में बड़गूजरों को हराकर दूल्हा राय द्वारा स्थापित कछवाहा राजवंश की प्रथम राजधानी; सूप (छाजले) की आकृति में निर्मित; ऐतिहासिक बावड़ियाँ और बुर्ज स्थित हैं।

मेहंदीपुर बालाजी

नकारात्मक शक्तियों व प्रेत बाधा से मुक्ति के लिए प्रसिद्ध भगवान हनुमान का प्रसिद्ध तीर्थ.

दौसा-करौली सीमा पर दो पहाड़ियों के बीच स्थित; श्री बालाजी महाराज, प्रेतराज सरकार और भैरव जी का त्रिमूर्ति दरबार; मानसिक शांति व व्याधियों से मुक्ति हेतु विख्यात।

दुर्ग एवं महल

  • दौसा दुर्ग: देवगिरि पहाड़ी पर सूपड़े की आकृति में निर्मित; कछवाहा शासक दूल्हा राय की प्रथम राजधानी (1137 ई.)।
  • माधोगढ़ दुर्ग: सवाई माधो सिंह प्रथम द्वारा निर्मित 18वीं सदी का पहाड़ी दुर्ग।
  • गेतोलाव: दौसा के पास स्थित ऐतिहासिक जलाशय व छतरी।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • हर्षत माता मंदिर (आभानेरी): 8वीं सदी का गुर्जर-प्रतिहार कालीन मंदिर, जो हर्ष और उल्लास की देवी को समर्पित है; उत्कृष्ट मूर्तिकला।
  • मेहंदीपुर बालाजी: प्रेतराज व भैरव जी के साथ बालाजी का चमत्कारी आरोग्य धाम।
  • झांझीरामपुरा: अरावली पहाड़ियों में प्राकृतिक जल स्रोतों वाला प्राचीन शिव तीर्थ (रुद्रेश्वर महादेव)।
  • गोपीनाथ मंदिर: दौसा शहर का ऐतिहासिक वैष्णव मंदिर।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • चाँद बावड़ी (आभानेरी): विश्व की सबसे बड़ी ज्यामितीय सीढ़ीदार बावड़ी।
  • भांडारेज की बावड़ी: बाणगंगा बेसिन की प्राचीन बहुमंजिला सीढ़ीदार जल संरचना।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • माधव सागर बाँध: सांवा नदी पर निर्मित जलाशय जो पक्षियों का बसेरा है।
  • मोरेल बाँध: दौसा का प्रमुख सिंचाई बाँध व पक्षी स्थल।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • सिकंदरा पत्थर तराशी: राष्ट्रीय राजमार्ग-21 पर स्थित अलंकृत खंभों और पाषाण नक्काशी का प्रसिद्ध केंद्र।
  • भांडारेज टेराकोटा व दरियाँ: प्राचीन भद्रावती नगरी, जो मिट्टी के बर्तनों और बुनी हुई दरियों के लिए प्रसिद्ध है।
  • लवाण की दरियाँ: सूती और ऊनी कलात्मक दरियों का प्रसिद्ध कुटीर उद्योग।

मेले एवं उत्सव

  • आभानेरी उत्सव: अक्टूबर माह में पर्यटन विभाग द्वारा चाँद बावड़ी पर आयोजित सांस्कृतिक उत्सव।
  • मेहंदीपुर बालाजी मेला: होली और हनुमान जयंती पर लगने वाला विशाल लक्खी मेला।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: दौसा का प्रसिद्ध मिश्री मावा (गाढ़े दूध की अनूठी मिठाई) और भांडारेज के पेड़े।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: सिकंदरा की बलुआ पत्थर नक्काशी (इमारती खंभे व जालियां), भांडारेज टेराकोटा, और लवाण की दरियाँ।
  • कृषि एवं फसलें: गेहूँ, सरसों, और बाजरा।
  • प्रमुख खनिज संपदा: लौह अयस्क (नीमला-राइसेला खानें), घिया पत्थर (सोपस्टोन), और क्वार्ट्ज।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

चाँद बावड़ी आभानेरी (दौसा जिला) में है, जबकि रानीजी की बावड़ी बूंदी में है। कछवाहों की प्रथम राजधानी दौसा थी, उसके बाद माची (जमुआ रामगढ़), फिर आमेर और अंत में जयपुर बनी।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
चाँद बावड़ी बावड़ी स्थापत्य 8वीं-9वीं सदी, राजा चंद्र आभानेरी, 3500 सीढ़ियाँ, 13 मंजिल, विश्व की सबसे गहरी बावड़ी
दौसा दुर्ग गिरि दुर्ग 1137 ई., दूल्हा राय देवगिरि पहाड़ी, सूपड़ा (छाजला) आकृति, कछवाहों की प्रथम राजधानी
हर्षत माता मंदिर प्राचीन मंदिर 8वीं सदी, प्रतिहार काल आभानेरी, हर्ष की देवी को समर्पित, उत्कृष्ट मूर्तिकला
मेहंदीपुर बालाजी चमत्कारी तीर्थ प्राचीन, दौसा सीमा बालाजी, प्रेतराज सरकार व भैरव जी का आरोग्य धाम
झांझीरामपुरा प्राकृतिक तीर्थ प्राचीन शिव मंदिर अरावली में प्राकृतिक जलधाराएँ, रुद्रेश्वर महादेव
भांडारेज ऐतिहासिक कस्बा प्राचीन भद्रावती टेराकोटा मिट्टी के बर्तन, प्राचीन बावड़ी, लवाण दरियाँ

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15. डीग

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

भरतपुर से नवगठित जिला; 'जलमहलों की नगरी' और बृज संस्कृति का प्रमुख केंद्र। प्रमुख नगर: डीग, कामां, कुम्हेर, नगर, सीकरी, जुरहरा।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

डीग महल

महाराजा सूरजमल द्वारा 500 से अधिक फव्वारों के साथ निर्मित विश्वप्रसिद्ध जलमहल परिसर.

1755 से 1760 ईस्वी के मध्य निर्मित; रूप सागर और गोपाल सागर झीलों से घिरा फारसी चारबाग उद्यान; गोपाल भवन (दिल्ली से लाया गया काला संगमरमर झूला), केशव भवन (सावन-भादो फव्वारे) और सूरज भवन प्रमुख हैं।

डीग दुर्ग

1730 ईस्वी में बदन सिंह द्वारा निर्मित ऐतिहासिक मिट्टी का रक्षात्मक दुर्ग.

जाट साम्राज्य का प्रारंभिक सुदृढ़ गढ़; लक्खा बुर्ज और गहरी खाई से रक्षित; 1804 ईस्वी में अंग्रेजों और मराठा-जाट गठबंधन के बीच हुए ऐतिहासिक डीग युद्ध का गवाह।

कामां

84 खंभों के मंदिर और भोजन थाली तीर्थ के लिए विख्यात प्राचीन पवित्र बृज नगर.

प्राचीन कामवन, 84 कोस बृज परिक्रमा का प्रमुख पड़ाव; 84 खंभों का प्राचीन मंदिर समूह (बारीक नक्काशीदार स्तंभ) और कामेश्वर महादेव मंदिर स्थित हैं।

दुर्ग एवं महल

  • डीग दुर्ग (जल दुर्ग): 1730 ई. में राजा बदन सिंह द्वारा निर्मित; लक्खा बुर्ज जैसी विशाल तोपों से सुसज्जित।
  • कुम्हेर दुर्ग: 1754 ई. में मल्हार राव होल्कर और मुगलों ने यहाँ महाराजा सूरजमल को घेरा था (यहीं खांडेराव होल्कर तोप के गोले से मारा गया था)।
  • डीग जलमहल परिसर: 1755-1760 ई. में महाराजा सूरजमल द्वारा निर्मित, राजपूत और मुगल स्थापत्य का अद्भुत संगम।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • चौरासी खंभा मंदिर (कामां): प्राचीन बृज संस्कृति का 84 नक्काशीदार खंभों वाला ऐतिहासिक मंदिर।
  • कामेश्वर महादेव: पांडवों द्वारा स्थापित माना जाने वाला प्राचीन शिवलिंग।
  • भोजन थाली तीर्थ: जहाँ भगवान कृष्ण और बलराम ने ग्वालबालों के साथ बैठकर भोजन किया था।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • रूप सागर व गोपाल सागर: डीग महलों के 500 फव्वारों को गुरुत्वाकर्षण से जल आपूर्ति करने वाली दो विशाल ऐतिहासिक झीलें।
  • केशव भवन: सावन-भादों मंडप, जिसकी छत में धातु के गोलों से बादलों की गड़गड़ाहट और कृत्रिम वर्षा की व्यवस्था थी।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • डीग जलाशय उद्यान: राजमहल के सरोवरों में बगुलों और जलमुर्गियों का सुंदर प्राकृतिक बसेरा।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • गुरुत्वाकर्षण जल अभियांत्रिकी: बिना बिजली के छतों पर बने विशाल टंकियों के दबाव से संचालित होने वाले रंगीन फव्वारे।
  • कामां की रासलीला: राधा-कृष्ण लीलाओं का प्रदर्शन करने वाला पारंपरिक बृज लोक नाट्य।

मेले एवं उत्सव

  • भोजन थाली मेला (कामां): भाद्रपद शुक्ल पंचमी; 84 कोस परिक्रमा का विशाल धार्मिक मेला।
  • डीग फव्वारा उत्सव: बृज होली और श्रावण माह में फव्वारे चलाकर मनाया जाने वाला पर्यटन उत्सव।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: डीग की बेढ़मी-आलू, खाजा, खीर मोहन, और पेठा मिठाई।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: बलुआ पत्थर के फव्वारे तराशने की कला, जालीदार नक्काशी, और पीतल की घंटियाँ।
  • कृषि एवं फसलें: सरसों, गेहूँ, और जौ।
  • प्रमुख खनिज संपदा: गुलाबी बलुआ पत्थर, इमारती पत्थर, और सिलिका सैंड।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

डीग, कामां और कुम्हेर को भरतपुर से अलग कर नया डीग जिला बनाया गया है। केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान डीग में नहीं है (वह भरतपुर में है)।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
डीग जलमहल महल परिसर 1755-1760 ई., सूरजमल 500+ फव्वारे, गोपाल भवन, केशव भवन सावन-भादो मंडप
डीग दुर्ग मिट्टी दुर्ग 1730 ई., राजा बदन सिंह जाटों का प्रारंभिक किला, लक्खा बुर्ज, 1804 का डीग युद्ध
कुम्हेर दुर्ग ऐतिहासिक दुर्ग 18वीं सदी, जाट शासक 1754 का प्रसिद्ध घेरा जहाँ खांडेराव होल्कर मारा गया था
चौरासी खंभा प्राचीन मंदिर मध्यकालीन / प्रतिहार कामां, 84 नक्काशीदार स्तंभ, बृज चौरासी कोस परिक्रमा
भोजन थाली पवित्र तीर्थ बृज संस्कृति, कामां श्रीकृष्ण की लीला स्थली, भाद्रपद शुक्ल पंचमी लक्खी मेला
गोपाल भवन मुख्य महल महाराजा सूरजमल डीग का सबसे बड़ा भवन, दिल्ली से लाया गया काला संगमरमर झूला

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16. धौलपुर

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

राजस्थान का सबसे पूर्वी जिला, प्रसिद्ध लाल बलुआ पत्थर के कारण 'रेड डायमंड सिटी' के नाम से विख्यात। प्रमुख नगर: धौलपुर, बाड़ी, राजाखेड़ा, बसेड़ी, सैंपऊ।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

मचकुंड

तीर्थों का भांजा' कहलाने वाला पवित्र जल कुंड और प्राचीन मंदिर समूह.

मंदिरों और घाटों से घिरा प्राचीन तीर्थ; मान्यता है कि राजा मुचुकुंद ने देवासुर संग्राम के बाद यहाँ शयन किया था और कृष्ण द्वारा जगाए जाने पर मुचुकुंद की दृष्टि से कालयवन भस्म हुआ; ऋषि पंचमी पर पवित्र स्नान।

शेरगढ़, धौलपुर

चंबल नदी के तट पर 1540 ईस्वी में शेरशाह सूरी द्वारा पुनर्निर्मित सामरिक दुर्ग.

11वीं सदी में राव मालदेव / कुशलपाल द्वारा निर्मित; राजस्थान, म.प्र. और उप्र की सीमा पर स्थित; इसमें विशाल ऐतिहासिक 'हुनहुंकार' तोप और सैयद जलालुद्दीन की मजार स्थित है।

तालाब-ए-शाही

1617 ईस्वी में शाहजादा खुर्रम (शाहजहाँ) के लिए निर्मित सुंदर ऐतिहासिक झील व शिकारगाह.

बाड़ी के निकट मुगल मनसबदार सालेह खां द्वारा शाहजहाँ के ठहरने हेतु निर्मित; सर्दियों में प्रवासी बत्तखों, पेलिकन और फ्लेमिंगो के लिए प्रसिद्ध विहंगम झील।

दुर्ग एवं महल

  • शेरगढ़ दुर्ग धौलपुर: चंबल नदी के ऊँचे कगार पर स्थित; दिल्ली-ग्वालियर मार्ग का सामरिक सैन्य दुर्ग; हुनहुंकार तोप स्थित है।
  • धौलपुर राजमहल (राज निवास पैलेस): डच और राजपूत शैली में लाल बलुआ पत्थर से महाराजा राम सिंह द्वारा निर्मित भव्य महल।
  • बाड़ी का किला: 15वीं सदी का ऐतिहासिक किला।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • मचकुंड तीर्थ: 'तीर्थों का भांजा', 108 मंदिरों से घिरा पवित्र सरोवर जहाँ कालयवन भस्म हुआ था।
  • सैंपऊ महादेव मंदिर: पारबती नदी किनारे स्थित विशाल स्वयंभू शिवलिंग वाला प्रसिद्ध प्राचीन शिव मंदिर।
  • चौपड़ा मंदिर: 18वीं सदी का बारीक पाषाण नक्काशी वाला मंदिर।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • तालाब-ए-शाही झील: 1617 ई. में निर्मित मुगलों का ऐतिहासिक सरोवर।
  • रामसागर झील व बाँध: पारबती नदी पर स्थित पक्षी आवास व सिंचाई बाँध।
  • चंबल के बीहड़: चंबल नदी द्वारा अवनालिका अपरदन से निर्मित विश्वप्रसिद्ध बीहड़ (उत्खात भूमि)।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व: 2023 में अधिसूचित राजस्थान का 5वां बाघ अभयारण्य (1075 वर्ग किमी)।
  • राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य: घड़ियाल, मगरमच्छ, गंगा डॉल्फिन और इंडियन स्किमर का संरक्षण करने वाला नदीय अभयारण्य।
  • वन विहार अभयारण्य: चंबल किनारे 60 वर्ग किमी में फैला वन्यजीव क्षेत्र।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • निहाल टावर (घंटाघर): 1880 से 1910 के मध्य महाराजा निहाल सिंह द्वारा निर्मित 150 फीट ऊँचा 8 मंजिला घंटाघर (भारत का सबसे ऊँचा क्लॉक टावर)।
  • धौलपुर लाल बलुआ पत्थर: दिल्ली के लाल किले, राष्ट्रपति भवन और संसद भवन में प्रयुक्त विश्वप्रसिद्ध इमारती पत्थर।

मेले एवं उत्सव

  • मचकुंड मेला: भाद्रपद शुक्ल ऋषि पंचमी पर लगने वाला पवित्र स्नान मेला।
  • बारह शहीद मेला: शेरगढ़ दुर्ग के पास आयोजित होने वाला वार्षिक मेला।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: धौलपुर के प्रसिद्ध दूध के पेड़े, तिल गजब, और चंबल के नमकीन।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: लाल बलुआ पत्थर की नक्काशी और बारीक पाषाण जालियां।
  • कृषि एवं फसलें: बाजरा, सरसों, और आलू।
  • प्रमुख खनिज संपदा: लाल बलुआ पत्थर (धौलपुर रेड स्टोन - 'रेड डायमंड') और इमारती चूना पत्थर।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

धौलपुर का शेरगढ़ दुर्ग चंबल नदी पर है, जबकि बारां का शेरगढ़ दुर्ग परवन नदी पर है। मचकुंड 'तीर्थों का भांजा' है, पुष्कर 'तीर्थों का गुरु' है, और मातृकुंडिया 'राजस्थान का हरिद्वार' है।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
मचकुंड तीर्थ पवित्र तीर्थ प्राचीन, राजा मुचुकुंद तीर्थों का भांजा, कालयवन वध कथा, ऋषि पंचमी स्नान मेला
शेरगढ़ दुर्ग धौलपुर नदीय जलदुर्ग 1540 ई., शेरशाह सूरी चंबल नदी तट, हुनहुंकार तोप, तीन राज्यों का सीमा संगम
तालाब-ए-शाही ऐतिहासिक झील 1617 ई., सालेह खां शाहजहाँ हेतु निर्मित, सर्दियों में प्रवासी पक्षियों का बसेरा
निहाल टावर घंटाघर 1880-1910 ई., निहाल सिंह 8 मंजिल, 150 फीट, भारत का सबसे ऊँचा क्लॉक टावर
धौलपुर-करौली रिजर्व बाघ अभयारण्य 2023 अधिसूचित राजस्थान का 5वां टाइगर रिजर्व, चंबल व डांग के बीहड़
राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य नदी अभयारण्य 1979 ई., बहु-राज्यीय घड़ियाल, गंगा डॉल्फिन, मगरमच्छ और इंडियन स्किमर

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17. डीडवाना-कुचामन

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

नागौर से नवगठित जिला; विश्वप्रसिद्ध मकराना संगमरमर, खारी झीलों और भव्य जागीरी किलों के लिए विख्यात। प्रमुख नगर: डीडवाना, कुचामन सिटी, लाडनूँ, मकराना, नावां, परबतसर।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

कुचामन दुर्ग

जागीरी किलों का सिरमौर' कहलाने वाला 1000 फीट ऊँची खड़ी चट्टान पर स्थित अजेय दुर्ग.

ठाकुर जालिम सिंह मेड़तिया द्वारा निर्मित; इसकी अपनी टकसाल थी जहाँ 'कुचामनी सिक्का' ढलता था; 10 विशाल भूमिगत जल टांके, सूर्य मंदिर, मीना बाजार और सोने की नक्काशीदार शीशमहल; कभी विजित नहीं हुआ।

डीडवाना नमक झील

प्रसिद्ध प्राकृतिक खारी झील और सोडियम सल्फेट रसायन उद्योग का केंद्र.

4 वर्ग किमी में फैली खारी झील; देसवाल जाति द्वारा नमक उत्पादन; 1964 में स्थापित 'राजस्थान स्टेट केमिकल्स वर्क्स' यहाँ सोडियम सल्फेट और सोडियम सल्फाइड का व्यावसायिक उत्पादन करता है।

लाडनूँ

आचार्य तुलसी द्वारा स्थापित जैन विश्व भारती संस्थान और प्राचीन आध्यात्मिक जैन केंद्र.

अणुव्रत आंदोलन के प्रणेता आचार्य तुलसी की जन्मस्थली; 1991 में स्थापित जैन विश्व भारती मानद विश्वविद्यालय, प्रेक्षाध्यान और प्राकृत पांडुलिपियों का विश्वप्रसिद्ध शोध केंद्र।

दुर्ग एवं महल

  • कुचामन दुर्ग: 1000 फीट ऊँची पहाड़ी पर स्थित 'जागीरी किलों का सिरमौर', अपनी टकसाल और 10 विशाल जल टांकों हेतु विख्यात।
  • डीडवाना दुर्ग: प्राचीन परकोटे और दरवाजों से सुरक्षित मध्यकालीन दुर्ग।
  • मारोठ दुर्ग: गौड़ राजपूतों का ऐतिहासिक पहाड़ी गढ़।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • लाडनूँ जैन मंदिर: 10वीं-11वीं सदी का दिगंबर जैन मंदिर जिसमें नक्काशीदार संगमरमर और धातु की प्राचीन तीर्थंकर प्रतिमाएँ हैं।
  • पशुपतिनाथ मंदिर (डीडवाना): प्राचीन पाषाण शिवलिंग वाला ऐतिहासिक शिव मंदिर।
  • पदमपुरी मंदिर: डीडवाना का विख्यात वैष्णव मंदिर।
  • वीर तेजाजी तीर्थ (परबतसर सीमा): लोकदेवता तेजाजी का ऐतिहासिक स्थान।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • डीडवाना खारी झील: सोडियम सल्फेट उत्पादन वाली प्राकृतिक खारी झील।
  • कुचामन झील व नावां सिटी: सांभर झील बेसिन पर स्थित राजस्थान की सबसे बड़ी नमक व्यापारिक मंडी।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • डीडवाना नमभूमि क्षेत्र: वर्षा ऋतु के बाद फ्लेमिंगो और जलपक्षियों का अस्थायी बसेरा।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • मकराना संगमरमर शिल्प: शुद्ध सफेद कैल्साइट संगमरमर, जिससे ताजमहल, कोलकाता का विक्टोरिया मेमोरियल और दिलवाड़ा मंदिर बने।
  • जैन विश्व भारती (लाडनूँ): प्रेक्षाध्यान, अहिंसा और प्राकृत साहित्य का अंतरराष्ट्रीय शोध संस्थान।

मेले एवं उत्सव

  • वीर तेजाजी पशु मेला (परबतसर): भाद्रपद शुक्ल दशमी; राजस्थान का आय की दृष्टि से सबसे बड़ा पशु मेला।
  • डीडवाना गणगौर मेला: मारवाड़ की अनूठी परंपरा से मनाया जाने वाला पारंपरिक उत्सव।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: कुचामन की प्रसिद्ध कचौड़ी, डीडवाना के पेड़े, और खारे-मसालेदार नमकीन।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: मकराना संगमरमर की मूर्तियाँ, जालीदार नक्काशी, और हस्तनिर्मित लोहे के ताले।
  • कृषि एवं फसलें: ग्वार, मूंग, और बाजरा।
  • प्रमुख खनिज संपदा: मकराना का सफेद संगमरमर (कैल्साइट मार्बल - ताजमहल की प्रसिद्ध खानें) और डीडवाना झील का सोडियम सल्फेट व नमक।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

कुचामन दुर्ग, डीडवाना, लाडनूँ और मकराना अब नवगठित डीडवाना-कुचामन जिले में हैं (पहले ये नागौर जिले में आते थे)।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
कुचामन दुर्ग गिरि दुर्ग ठाकुर जालिम सिंह मेड़तिया जागीरी किलों का सिरमौर, निजी टकसाल, 10 जल टांके, शीशमहल
डीडवाना नमक झील खारी झील रासायनिक उत्पादन सोडियम सल्फेट, राजस्थान स्टेट केमिकल्स वर्क्स (1964)
लाडनूँ जैन तीर्थ जैन विश्व भारती (1991) आचार्य तुलसी की जन्मभूमि, प्रेक्षाध्यान व प्राकृत भाषा संस्थान
मकराना संगमरमर पत्थर खदान ऐतिहासिक खदानें ताजमहल और विक्टोरिया मेमोरियल में प्रयुक्त विश्वप्रसिद्ध सफेद मार्बल
नावां नमक मंडी व्यापार केंद्र उत्तरी सांभर क्षेत्र मॉडल सॉल्ट फार्म, राजस्थान की सबसे बड़ी नमक थोक मंडी
परबतसर पशु मेला भाद्रपद शुक्ल दशमी वीर तेजाजी पशु मेला, नागौरी बैलों का ऐतिहासिक व्यापार

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18. डूंगरपुर

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

पहाड़ों की नगरी' (सिटी ऑफ हिल्स) उपनाम से विख्यात दक्षिणी राजस्थान का वागड़ जिला, 1358 ई. में रावल वीर सिंह द्वारा स्थापित। प्रमुख नगर: डूंगरपुर, सागवाड़ा, आसपुर, गलियाकोट, सीमलवाड़ा।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

जूना महल

शीशे के काम, काँच की जड़ाई और भित्तिचित्रों के लिए विख्यात 13वीं सदी का 7 मंजिला दुर्ग-महल.

1282 ईस्वी में रावल वीर सिंह देव द्वारा धनमाता पहाड़ी पर निर्मित; पारेवा पत्थर से बनी 7 मंजिला इमारत; भीतरी दीवारें मेवाड़-वागड़ शैली के भित्तिचित्रों और बेल्जियम काँच की पच्चीकारी से जगमगाती हैं।

बेणेश्वर

सोम, माही और जाखम नदियों के पवित्र त्रिवेणी संगम पर स्थित आदिवासियों का महातीर्थ.

नवाटापरा गाँव में स्थित; 18वीं सदी के संत मावजी महाराज (भविष्यवाणी 'चोपड़ा' ग्रंथ के रचयिता) की तपोभूमि; विश्व का एकमात्र मंदिर जहाँ खंडित शिवलिंग की पूजा होती है; माघ पूर्णिमा पर 'आदिवासियों का कुंभ' भरता है।

गलियाकोट

माही नदी के सुरम्य तट पर दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदाय की अंतरराष्ट्रीय प्रमुख दरगाह.

10वीं सदी के इस्माइली संत सैयदी फखरुद्दीन शहीद की सफेद संगमरमर की पवित्र दरगाह (मजार-ए-फखरी); मोहर्रम की 27 तारीख को विश्वभर के बोहरा श्रद्धालु उर्स में आते हैं; रमकड़ा उद्योग (पारेवा पत्थर) हेतु प्रसिद्ध।

दुर्ग एवं महल

  • जूना महल (पुराना महल): धनमाता पहाड़ी पर 13वीं सदी का 7 मंजिला दुर्ग-महल, जो काँच की नक्काशी और भित्तिचित्रों का अजूबा है।
  • उदय विलास पैलेस: गैबसागर झील के किनारे महारावल उदय सिंह द्वितीय द्वारा निर्मित; एकथम्बिया महल (कृष्ण प्रकाश) और उत्कृष्ट पाषाण शिल्प।
  • बादल महल: गैबसागर झील के किनारे स्थित 17वीं सदी का सुंदर जल महल।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • बेणेश्वर धाम (नवाटापरा): सोम, माही व जाखम का त्रिवेणी संगम; खंडित शिवलिंग पूजा; संत मावजी का मंदिर।
  • सैयद फखरुद्दीन की दरगाह (गलियाकोट): माही नदी तट पर दाऊदी बोहरा संप्रदाय की विश्वप्रसिद्ध मजार-ए-फखरी।
  • देव सोमनाथ मंदिर: सोम नदी किनारे 12वीं सदी का श्वेत पाषाण मंदिर, जो बिना चूने या गारे के केवल पत्थरों के जोड़ पर बना है।
  • श्रीनाथजी मंदिर (गैबसागर): 1623 ई. में महारावल पुंजराज द्वारा निर्मित ऐतिहासिक मंदिर।
  • बाणेश्वर शिव मंदिर: महारावल आसकरण द्वारा निर्मित।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • गैबसागर झील: डूंगरपुर नगर के मध्य में स्थित सुरम्य झील, जो महलों, मंदिरों और विजय राजराजेश्वर मंदिर से सुशोभित है।
  • नवाटापरा त्रिवेणी संगम: सोम, माही और जाखम नदियों का पवित्र संगम।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • कालीबाई स्मारक (रास्तापाल): 19 जून 1947 को अपने शिक्षक नानाभाई खांट व सेंगाभाई को बचाने के लिए प्राण न्यौछावर करने वाली 13 वर्षीय अमर भील वीरांगना कालीबाई का स्मारक।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • रमकड़ा उद्योग (गलियाकोट): मुलायम पारेवा (सोपस्टोन) पत्थर को तराश कर खिलौने, मूर्तियाँ, दीपक और सजावटी बर्तन बनाने का प्रसिद्ध उद्योग।
  • एकथम्बिया महल: उदय विलास पैलेस परिसर में स्थित एक खंभे पर टिका दो मंजिला भव्य कलात्मक महल।

मेले एवं उत्सव

  • बेणेश्वर मेला: माघ शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा; 'आदिवासियों का कुंभ' व 'वागड़ का पुष्कर', जहाँ राजस्थान, गुजरात व म.प्र. के लाखों श्रद्धालु आते हैं।
  • गलियाकोट उर्स: मोहर्रम की 27 तारीख को दाऊदी बोहरा समुदाय का विश्वस्तरीय धार्मिक सम्मेलन।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: मक्का की रोटी के साथ केरी की लौंजी, उड़द दाल-बाटी, और स्थानीय पारंपरिक व्यंजन।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: रमकड़ा उद्योग (पारेवा/सोपस्टोन पत्थर के कलात्मक खिलौने व दीपक) और तीर-कमान।
  • कृषि एवं फसलें: मक्का (वागड़ का मुख्य खाद्यान्न), धान, और अदरक।
  • प्रमुख खनिज संपदा: फ्लोराइट (मांडो की पाल - राजस्थान का सबसे बड़ा फ्लोराइट भंडार), हरा संगमरमर, और घिया पत्थर (सोपस्टोन)।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

बेणेश्वर धाम डूंगरपुर जिले में है (सोम-माही-जाखम संगम पर), जबकि मानगढ़ धाम बाँसवाड़ा जिले में है। देव सोमनाथ मंदिर डूंगरपुर में है जो बिना चूने के बना है।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
जूना महल दुर्ग-महल 1282 ई., रावल वीर सिंह देव 7 मंजिला, पारेवा पत्थर, बेल्जियम काँच पच्चीकारी व भित्तिचित्र
बेणेश्वर धाम जनजातीय महातीर्थ त्रिवेणी संगम, नवाटापरा आदिवासियों का कुंभ, खंडित शिवलिंग पूजा, संत मावजी महाराज
गलियाकोट दरगाह दाऊदी बोहरा तीर्थ मजार-ए-फखरी, माही तट सैयदी फखरुद्दीन शहीद, वैश्विक तीर्थ, रमकड़ा उद्योग
उदय विलास पैलेस राजप्रासाद 1860 का दशक, उदय सिंह द्वितीय एकथम्बिया महल, गैबसागर झील किनारा, राजपूत-गोथिक शैली
देव सोमनाथ प्राचीन मंदिर 12वीं सदी, सोम नदी तट बिना चूने या गारे के केवल पत्थरों के संधान से निर्मित
कालीबाई स्मारक राष्ट्रीय स्मारक रास्तापाल गाँव 1947 में शिक्षक हेतु प्राण देने वाली अमर भील बालिका कालीबाई

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19. हनुमानगढ़

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

प्राचीन सरस्वती-दृषद्वती नदी घाटी, यौधेय जनपद का क्षेत्र, इंदिरा गांधी और भाखड़ा नहरों से सिंचित उत्तरी राजस्थान का जिला। प्रमुख नगर: हनुमानगढ़, नोहर, भादरा, पीलीबंगा, संगरिया।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

कालीबंगा

प्राचीन सरस्वती (घग्घर) नदी किनारे उत्खनित विश्वप्रसिद्ध हड़प्पाकालीन पुरातात्त्विक स्थल.

1952 में अमलानंद घोष द्वारा खोजा गया और 1961-69 में बी.बी. लाल व बी.के. थापर द्वारा उत्खनित; विश्व का सबसे प्राचीन जुता हुआ खेत (प्राक-हड़प्पा), मेसोपोटामिया की बेलनाकार मुहरें, अग्निवेदिकाएँ, लकड़ी की नाली और भूकंप के प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुए।

भटनेर दुर्ग

तीसरी शताब्दी में भाटी राजा भूपत द्वारा निर्मित राजस्थान का सबसे प्राचीन दुर्ग.

घग्घर नदी तट पर पक्की ईंटों से लगभग 285-295 ईस्वी में निर्मित; राजस्थान में सर्वाधिक विदेशी आक्रमण झेलने वाला दुर्ग (महमूद गजनवी 1001 ई. और तैमूर 1398 ई. जिसने 'तुजुक-ए-तैमूरी' में इसे हिंदुस्तान का सबसे मजबूत किला कहा); 1805 में बीकानेर के राजा सूरत सिंह ने मंगलवार को जीतकर 'हनुमानगढ़' नाम दिया।

गोगामेड़ी

नोहर तहसील में लोकदेवता जाहरवीर गोगाजी चौहान की पवित्र समाधि स्थली.

'धुर मेढ़ी' नाम से पूजित; मुख्य मंदिर का स्वरूप फिरोजशाह तुगलक द्वारा मस्जिद जैसा बनवाया गया और प्रवेश द्वार पर 'बिस्मिल्लाह' अंकित है; महाराजा गंगा सिंह ने जीर्णोद्धार कराया; हिंदू और मुस्लिम (चायल) दोनों पुजारियों द्वारा पूजा की अनूठी परंपरा।

दुर्ग एवं महल

  • भटनेर दुर्ग: पक्की ईंटों से निर्मित राजस्थान का सबसे प्राचीन दुर्ग (तीसरी सदी); इसमें बलबन के चचेरे भाई शेर खां की कब्र स्थित है।
  • सूरतगढ़ सीमांत दुर्ग: उत्तरी रक्षा पंक्ति का ऐतिहासिक किला।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • गोगामेड़ी तीर्थ (नोहर): लोकदेवता गोगाजी की समाधि ('धुर मेढ़ी'); सर्वधर्म सद्भाव का प्रतीक।
  • भद्रकाली मंदिर: घग्घर नदी के तट पर स्थित प्राचीन शक्ति पीठ, बीकानेर महाराजा रामसिंह द्वारा जीर्णोद्धार।
  • गुरुद्वारा सुखासिंह मेहताबसिंह: हरमंदिर साहिब की रक्षा करने वाले वीर सिख योद्धाओं की स्मृति में निर्मित ऐतिहासिक गुरुद्वारा।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • घग्घर नदी (मृत नदी / नाली): प्राचीन सरस्वती नदी का अपवाह क्षेत्र; स्थानीय भाषा में 'नाली' कहलाता है।
  • इंदिरा गांधी नहर तंत्र: मरुभूमि को हरे-भरे खेतों में बदलने वाला विशाल नहर तंत्र।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • कालीबंगा पुरातात्त्विक संग्रहालय: 1983 में स्थापित; हड़प्पाकालीन मृद्भांड, मिट्टी की काली चूड़ियाँ, मुहरें और तौल बाट प्रदर्शित।
  • पीलीबंगा व रंगमहल: कुषाण-गुप्तकालीन लाल चमकीले मृद्भांड और टेराकोटा फलक।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • स्वामी केशवानंद स्मारक संग्रहालय (संगरिया): शिक्षा संत स्वामी केशवानंद द्वारा स्थापित प्रसिद्ध ग्रामीण संग्रहालय, जिसमें प्राचीन मूर्तियाँ, सिक्के व अस्त्र-शस्त्र संग्रहित हैं।
  • टेराकोटा खिलौना परंपरा: हड़प्पा सभ्यता से प्रेरित मिट्टी के हस्तनिर्मित कलात्मक खिलौने।

मेले एवं उत्सव

  • गोगामेड़ी मेला: भाद्रपद माह में गोगा नवमी पर आयोजित होने वाला एक माह लंबा विशाल लक्खी व पशु मेला।
  • भद्रकाली मेला: चैत्र नवरात्र में घग्घर नदी तट पर स्थित भद्रकाली मंदिर में लगने वाला प्रसिद्ध मेला।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: सरसों का साग व मक्के की रोटी, नोहर के प्रसिद्ध पेड़े, और पिन्नी।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: हाथ से बुनी सूती दरियाँ, टेराकोटा मिट्टी के बर्तन, और लकड़ी के खिलौने।
  • कृषि एवं फसलें: अमेरिकन कपास (राजस्थान में कपास का प्रमुख उत्पादक), गेहूँ, बासमती चावल, और सरसों।
  • प्रमुख खनिज संपदा: जिप्सम, भूमिगत पोटाश भंडार (लखासर बेसिन), और ईंट बनाने की उपजाऊ मिट्टी।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

कालीबंगा और भटनेर दुर्ग हनुमानगढ़ जिले में हैं, श्रीगंगानगर में नहीं। गोगामेड़ी (धुर मेढ़ी) हनुमानगढ़ में है, जबकि ददरेवा (शीर्ष मेढ़ी / गोगाजी की जन्मस्थली) चूरू जिले में है।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
कालीबंगा हड़प्पा स्थल प्राक-हड़प्पा / विकसित हड़प्पा विश्व का प्राचीनतम जुता हुआ खेत, अग्निवेदिकाएँ, काली चूड़ियाँ, सरस्वती तट
भटनेर दुर्ग पक्की ईंटों का किला तीसरी सदी, राजा भूपत राजस्थान का सबसे प्राचीन दुर्ग, गजनवी व तैमूर के आक्रमण, 1805 में नामकरण
गोगामेड़ी लोकदेवता तीर्थ नोहर, मध्यकालीन गोगाजी की समाधि (धुर मेढ़ी), बिस्मिल्लाह अंकित मस्जिद नुमा मुख्य मंदिर
भद्रकाली मंदिर शक्ति पीठ घग्घर नदी तट बीकानेर महाराजा रामसिंह द्वारा जीर्णोद्धार कराया गया प्राचीन मंदिर
केशवानंद संग्रहालय ग्रामीण संग्रहालय संगरिया, स्वामी केशवानंद ऐतिहासिक मूर्तियों, सिक्कों और दुर्लभ अस्त्र-शस्त्रों का विशाल संग्रह
रंगमहल कुषाण-गुप्त स्थल हन्ना राइड (स्वीडिश दल) 1952-54 में उत्खनित लाल रंग के विशिष्ट चित्रित कुषाणकालीन मृद्भांड

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20. जयपुर

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

राजस्थान की राजधानी, 'गुलाबी नगरी' (पिंक सिटी) और 'भारत का पेरिस', 18 नवंबर 1727 को सवाई जयसिंह द्वितीय द्वारा स्थापित और बंगाली वास्तुकार विद्याधर भट्टाचार्य द्वारा ग्रिड-आयरन प्रणाली पर नियोजित। 2019 में जयपुर परकोटा यूनेस्को विश्व धरोहर बना। प्रमुख नगर: जयपुर, सांगानेर, आमेर, बस्सी, चौमूं।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

आमेर दुर्ग

1592 ईस्वी में राजा मानसिंह प्रथम द्वारा निर्मित यूनेस्को विश्व धरोहर पहाड़ी दुर्ग.

2013 में यूनेस्को विश्व धरोहर घोषित; राजपूत-मुगल स्थापत्य का उत्कृष्ट संगम; दीवान-ए-आम, शीशमहल (जय मंदिर), मावठा झील, केसर क्यारी और शिला देवी मंदिर (राजा मानसिंह प्रथम द्वारा जसोर, बंगाल से लाई गई काले पत्थर की महिषासुरमर्दिनी प्रतिमा) स्थित हैं।

हवा महल

1799 ईस्वी में सवाई प्रताप सिंह द्वारा निर्मित 5 मंजिला मुकुटाकार हवा महल.

वास्तुकार लालचंद उस्ता द्वारा भगवान कृष्ण के मुकुट के आकार में निर्मित; 953 बारीक नक्काशीदार झरोखों वाला महल जहाँ वेंचुरी प्रभाव से ठंडी हवा आती है; बिना किसी गहरी नींव के खड़ा; इसकी 5 मंजिलें—शरद, रतन, विचित्र, प्रकाश और हवा मंदिर कहलाती हैं।

जंतर मंतर

सवाई जयसिंह द्वितीय द्वारा 1728-1734 ई. में निर्मित यूनेस्को विश्व धरोहर पाषाण वेधशाला.

2010 में यूनेस्को विश्व धरोहर घोषित; सवाई जयसिंह द्वितीय द्वारा बनवाई गई 5 वेधशालाओं में सबसे विशाल; इसमें 19 खगोलीय यंत्र हैं, जिनमें वृहत् सम्राट यंत्र (विश्व की सबसे बड़ी पाषाण धूपघड़ी जो 2 सेकंड की शुद्धता से समय बताती है), जयप्रकाश यंत्र व रामयंत्र शामिल हैं।

दुर्ग एवं महल

  • आमेर दुर्ग: 1592 ई. में राजा मानसिंह प्रथम द्वारा निर्मित यूनेस्को विश्व धरोहर दुर्ग; शीशमहल, शिला देवी।
  • जयगढ़ दुर्ग (विजय दुर्ग): 1726 ई. में सवाई जयसिंह द्वितीय द्वारा चील का टीला पहाड़ी पर निर्मित; तोप ढलाई का कारखाना; इसमें 'जयबाण' तोप स्थित है—पहियों पर रखी विश्व की सबसे बड़ी तोप (50 टन भार, चाकसू में 22 मील दूर गोला गिरा था)।
  • नाहरगढ़ दुर्ग (सुदर्शनगढ़): 1734 ई. में सवाई जयसिंह द्वितीय द्वारा निर्मित; सवाई माधोसिंह द्वितीय द्वारा अपनी 9 रानियों के लिए एक जैसे 9 दो-मंजिला महलों वाला 'माधवेंद्र भवन' निर्मित।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • गोविंद देव जी मंदिर: जयपुर राजवंश के आराध्य देव; सवाई जयसिंह द्वितीय द्वारा वृंदावन से मूर्ति लाई गई; बिना खंभों के सबसे बड़े सपाट आरसीसी छत वाले मंडप का रिकॉर्ड।
  • मोती डूंगरी गणेश मंदिर: 18वीं सदी में सेठ जयराम पल्लीवाल द्वारा स्थापित प्रसिद्ध गणेश मंदिर।
  • बिरला मंदिर (लक्ष्मी नारायण मंदिर): 1988 में मोती डूंगरी की तलहटी में शुद्ध मकराना संगमरमर से निर्मित भव्य मंदिर।
  • गलता जी (मंकी टेंपल): कृष्णदास पयहारी द्वारा स्थापित रामानुज संप्रदाय की उत्तर तोताद्रि पीठ; अरावली घाटी में पवित्र प्राकृतिक जल कुंड और सूर्य मंदिर।
  • जगत शिरोमणि मंदिर (आमेर): 1599-1608 ई. में रानी कनकावती द्वारा पुत्र जगतसिंह की स्मृति में निर्मित; इसमें वही कृष्ण प्रतिमा है जिसकी पूजा चित्तौड़गढ़ में मीरा बाई करती थीं।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • मानसागर झील व जलमहल: सवाई जयसिंह द्वितीय द्वारा निर्मित 18वीं सदी का 5 मंजिला जलमहल (जिसकी 4 मंजिलें पानी में डूबी रहती हैं)।
  • रामनिवास बाग: 1868 ई. में सवाई रामसिंह द्वितीय द्वारा अकाल राहत कार्य के तहत निर्मित ऐतिहासिक उद्यान।
  • सेंट्रल पार्क: 206 फीट ऊँचे विशाल राष्ट्रीय ध्वज वाला जयपुर का सबसे बड़ा हरा-भरा पार्क।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • नाहरगढ़ जैविक उद्यान: अरावली तलहटी में स्थित प्राणी उद्यान जहाँ लायन व टाइगर सफारी संचालित है।
  • झालाना लेपर्ड सफारी: भारत का पहला शहरी तेंदुआ संरक्षण रिजर्व (20 वर्ग किमी), जहाँ 40 से अधिक तेंदुए स्वतंत्र विचरण करते हैं।
  • आमागढ़ लेपर्ड रिजर्व: जयपुर शहर में स्थित दूसरा समर्पित तेंदुआ सफारी पार्क।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • सिटी पैलेस (राजप्रासाद): चंद्र महल (7 मंजिला राजनिवास), मुबारक महल, दीवान-ए-खास में रखे 345 किलो वजनी दो विशाल चांदी के पात्र (गंगाजली - गिनीज बुक रिकॉर्ड)।
  • अल्बर्ट हॉल संग्रहालय: 1887 में खुला राजस्थान का सबसे पुराना संग्रहालय; सर सैमुअल स्विंटन जैकब द्वारा इंडो-सारसेनिक शैली में निर्मित; मिस्र की 2300 वर्ष पुरानी ममी (तूतु) संरक्षित।
  • ईसरलाट (सरगासूली): 1749 ई. में सवाई ईश्वरी सिंह द्वारा राजमहल युद्ध विजय की स्मृति में निर्मित 140 फीट ऊँची विजय मीनार।

मेले एवं उत्सव

  • तीज उत्सव: श्रावण शुक्ल तृतीया; परकोटे में जनानी ड्योढ़ी से निकलने वाली माता तीज की विश्वप्रसिद्ध शाही सवारी।
  • गणगौर उत्सव: चैत्र शुक्ल तृतीया; माता गवर और इसर जी की भव्य सांस्कृतिक सवारी।
  • हाथी महोत्सव: होली के अवसर पर आमेर व जयपुर में सजे-धजे हाथियों का वार्षिक उत्सव।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: जयपुर का प्रसिद्ध घेवर (मावा, पनीर व मलाई घेवर), प्याज की कचौड़ी, दाल-बाटी-चूरमा, कैर-सांगरी, और माखन लस्सी।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: ब्लू पॉटरी (जीआई टैग - कृपाल सिंह शेखावत द्वारा पुनर्जीवित), मीनाकारी (जीआई टैग - मानसिंह प्रथम द्वारा लाहौर से लाई गई स्वर्ण मीनाकारी), कुंदन-जड़ाऊ आभूषण, सांगानेरी प्रिंट (जीआई टैग), बगरू प्रिंट (जीआई टैग), संगमरमर की मूर्तियाँ, और कोफ्तगिरी धातु शिल्प।
  • कृषि एवं फसलें: जौ (राजस्थान का अग्रणी उत्पादक), गेहूँ, सरसों, और मौसमी सब्जियाँ।
  • प्रमुख खनिज संपदा: लौह अयस्क (मोरीजा-बानोल खानें), काला संगमरमर (भैंसलाना), सिलिका सैंड, और नमक (सांभर झील - भारत का 8.6% नमक उत्पादन)।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

आमेर दुर्ग (2013), जंतर मंतर (2010) और जयपुर परकोटा शहर (2019) तीन अलग-अलग यूनेस्को विश्व धरोहर हैं। जयबाण तोप जयगढ़ दुर्ग में है, जबकि 9 एक जैसे महल नाहरगढ़ दुर्ग में हैं। विराटनगर (बैराठ) अब कोटपूतली-बहरोड़ जिले में है।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
आमेर दुर्ग गिरि दुर्ग 1592 ई., राजा मानसिंह प्रथम यूनेस्को धरोहर 2013, शीशमहल, मावठा झील, शिला देवी मंदिर
हवा महल हवा महल 1799 ई., सवाई प्रताप सिंह 953 झरोखे, कृष्ण मुकुट आकार, वास्तुकार लालचंद उस्ता, 5 मंजिलें
जंतर मंतर वेधशाला 1728-1734 ई., जयसिंह द्वितीय यूनेस्को धरोहर 2010, वृहत् सम्राट यंत्र (विश्व की सबसे बड़ी धूपघड़ी)
सिटी पैलेस राजप्रासाद 1727 ई., सवाई जयसिंह द्वितीय चंद्र महल, मुबारक महल, चांदी के दो विशाल गंगाजली पात्र
जयगढ़ दुर्ग विजय दुर्ग 1726 ई., सवाई जयसिंह द्वितीय जयबाण तोप (पहियों पर विश्व की सबसे बड़ी तोप), तोप ढलाई कारखाना
अल्बर्ट हॉल राजकीय संग्रहालय 1887 ई., स्विंटन जैकब राजस्थान का सबसे पुराना संग्रहालय, इंडो-सारसेनिक शैली, मिस्र की ममी

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21. जैसलमेर

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान का सबसे बड़ा जिला, 'स्वर्ण नगरी' और 'हवेलियों व झरोखों का नगर' उपनाम से विख्यात, 1156 ई. में भाटी शासक रावल जैसल द्वारा स्थापित। प्रमुख नगर: जैसलमेर, पोकरण, फतेहगढ़, रामगढ़, मोहनगढ़।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

जैसलमेर दुर्ग

1156 ईस्वी में भाटी रावल जैसल द्वारा त्रिकूटा पहाड़ी पर निर्मित यूनेस्को विश्व धरोहर 'सोनार किला'.

सोनार किला, त्रिकूटगढ़ या स्वर्ण दुर्ग नाम से विख्यात; बिना चूने या गारे के पीले पत्थरों की जोड़ से निर्मित; 99 बुर्ज; 2.5 ऐतिहासिक साकों का गवाह (1299 अलाउद्दीन, 1370 फिरोज तुगलक, और 1550 लूणकरण का अर्द्ध साका); जैन मंदिर और दुर्लभ 'जिनभद्र सूरी ज्ञान भंडार' हस्तलिखित ग्रंथ स्थित हैं।

सम के धोरे

ऊँट सफारी, सांस्कृतिक शिविरों और मरुस्थलीय सूर्यास्त के लिए विख्यात विशाल बालूका स्तूप.

जैसलमेर से 42 किमी पश्चिम में स्थित; वनस्पति विहीन लहरदार बरखान बालूका स्तूपों का विशाल सागर; थार मरु महोत्सव और मरु पर्यटन का प्रमुख केंद्र; खुहड़ी और महाबार से अलग विशिष्ट रेतीला क्षेत्र।

पटवों की हवेली

पीले बलुआ पत्थर पर बारीक नक्काशी और 60 झरोखों वाली 19वीं सदी की पाँच हवेलियों का समूह.

1800 से 1860 ई. के मध्य धनी व्यापारी सेठ गुमान चंद पटवा द्वारा अपने पाँच पुत्रों के लिए निर्मित; 'पटवों की हवेली' बारीक पत्थर की जालीदार नक्काशी, 60 झरोखों और सोने की कलम के काम के लिए विश्वप्रसिद्ध है।

दुर्ग एवं महल

  • जैसलमेर दुर्ग (सोनार किला): यूनेस्को विश्व धरोहर (2013); त्रिकूटा पहाड़ी पर पीले पत्थरों से निर्मित 'लिविंग फोर्ट'; 99 बुर्ज; 2.5 साके।
  • पोकरण दुर्ग (बालागढ़): 14वीं सदी में चांपावत राठौड़ों द्वारा जोधपुर-जैसलमेर मार्ग पर निर्मित लाल पत्थरों का सुदृढ़ दुर्ग।
  • लोद्रवा के अवशेष: जैसलमेर से पूर्व भाटी शासकों की प्राचीन राजधानी; कलात्मक तोरण द्वार और पार्श्वनाथ जैन मंदिर के लिए प्रसिद्ध।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • रामदेवरा (रुणेचा): लोकदेवता बाबा रामदेव जी की पवित्र समाधि स्थली; सांप्रदायिक सद्भाव के प्रतीक; कामड़ जाति की महिलाओं द्वारा तेरहताली नृत्य प्रस्तुत किया जाता है।
  • तनोट माता मंदिर: भारत-पाक सीमा के पास स्थित; सीमा सुरक्षा बल (BSF) द्वारा प्रबंधित 'सैनिकों की देवी' व 'रुमाल वाली देवी'; 1965 युद्ध के जीवित बम यहाँ संग्रहालय में सुरक्षित हैं।
  • लक्ष्मीनाथ मंदिर: जैसलमेर दुर्ग के भीतर सबसे प्राचीन हिंदू मंदिर।
  • लोद्रवा जैन मंदिर: 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ को समर्पित मंदिर; पाषाण का कल्पवृक्ष और जीवित नाग का बिल दर्शनीय है।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • सम के धोरे: शहर से 42 किमी दूर; लहरदार बालूका स्तूप, ऊँट सफारी और सूर्यास्त बिंदु।
  • खुहड़ी के धोरे: पारंपरिक मिट्टी की झोपड़ियों वाला शांत मरुस्थलीय गाँव।
  • गड़ीसर सरोवर: 1367 ई. में महारावल घड़सी सिंह द्वारा वर्षा जल संचयन हेतु निर्मित सरोवर; टीलों की प्रोल प्रवेश द्वार।
  • आकल वुड फॉसिल पार्क: 21 हेक्टेयर में फैला राष्ट्रीय भू-स्मारक जहाँ जुरासिक काल (18 करोड़ वर्ष पुराने) के जीवाश्मीकृत वृक्षों के तने संरक्षित हैं।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • मरु राष्ट्रीय उद्यान (जैसलमेर भाग): 1900 वर्ग किमी में फैला थार का संरक्षित मरु क्षेत्र; राज्य पक्षी गोडावण (ग्रेट इंडियन बस्टर्ड), चिंकारा, मरु लोमड़ी और गोह का मुख्य प्रजनन स्थल।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • सलीम सिंह की हवेली (मोती महल / जहाज महल): 1815 ई. में निर्मित 9 मंजिला हवेली, जिसके 38 झरोखे मोर की आकृति के कोष्ठकों पर टिके हैं।
  • नथमल की हवेली: 1885 ई. में हाथी और लालू नामक दो भाइयों द्वारा स्वतंत्र रूप से बिना नक्शे के बनाई गई अद्भुत हवेली।
  • बड़ा बाग की छतरियाँ: भाटी शासकों की नक्काशीदार शाही छतरियों का भव्य समूह।
  • कुलधरा गाँव: पालीवाल ब्राह्मणों द्वारा 1825 ई. में रातों-रात खाली किया गया ऐतिहासिक रहस्यमयी गाँव।

मेले एवं उत्सव

  • मरु महोत्सव (डेजर्ट फेस्टिवल): माघ पूर्णिमा (फरवरी); सम के धोरों पर मिस्टर डेजर्ट, साफा बांधने की प्रतियोगिता व ऊँट दौड़ का विश्वप्रसिद्ध उत्सव।
  • रामदेवरा मेला: भाद्रपद शुक्ल द्वितीया (बाबे री बीज) से एकादशी तक भरने वाला विशाल लक्खी मेला।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: जैसलमेर का प्रसिद्ध घोटुआ लड्डू (मावा, केसर व बेसन की घोटकर बनाई गई मिठाई), कैर-कुमतिया, और पंचकूटा।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: पीले पत्थर की नक्काशी, पट्टू बुनाई (ऊन की गर्म पारंपरिक चादरें/शॉल), और ऊँट के चमड़े पर कशीदाकारी।
  • कृषि एवं फसलें: ग्वार, बाजरा, और जीरा।
  • प्रमुख खनिज संपदा: पीला संगमरमर (येलो मार्बल), प्राकृतिक गैस (तनोट, डांडेवाला व मनिहारी टिब्बा), लिग्नाइट, और मुल्तानी मिट्टी।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

पोकरण जैसलमेर जिले में है, जो बाबा रामदेवरा तीर्थ के साथ-साथ 1974 ('स्माइलिंग बुद्धा') और 1998 ('ऑपरेशन शक्ति') के भारत के ऐतिहासिक परमाणु परीक्षणों का स्थल रहा है। मरु राष्ट्रीय उद्यान जैसलमेर और बाड़मेर दोनों में फैला है।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
जैसलमेर दुर्ग गिरि दुर्ग 1156 ई., रावल जैसल यूनेस्को धरोहर 2013, सोनार किला, पीला पत्थर, 99 बुर्ज, 2.5 साके
सम के धोरे बालूका स्तूप शहर से 42 किमी दूर थार मरु पर्यटन का केंद्र, ऊँट सफारी, सूर्यास्त दर्शन, मरु महोत्सव
पटवों की हवेली हवेली स्थापत्य 1800-1860 ई., गुमान चंद पटवा 5 हवेलियों का समूह, 60 झरोखे, पीले पत्थर की बारीक जालीदार नक्काशी
रामदेवरा (रुणेचा) लोकतीर्थ पोकरण तहसील बाबा रामदेव जी समाधि, सांप्रदायिक सद्भाव, भाद्रपद शुक्ल बीज लक्खी मेला
तनोट माता सीमांत तीर्थ भारत-पाक सीमा के पास BSF द्वारा सेवित, सैनिकों की देवी / रुमाल वाली देवी, 1965 के जीवित बम
आकल वुड फॉसिल पार्क भू-वैज्ञानिक स्मारक 18 करोड़ वर्ष प्राचीन जुरासिक कालीन काष्ठ जीवाश्म, जैसलमेर के निकट 21 हेक्टेयर में

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22. जालौर

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

राजस्थान की 'ग्रेनाइट सिटी' और महर्षि जाबालि की तपोभूमि (जाबालिपुर)। प्रमुख नगर: जालौर, भीनमाल, सांचौर सीमा, आहोर, सायला, जसवंतपुरा।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

जालौर दुर्ग

सोनगढ़ पहाड़ी पर स्थित प्राचीन दुर्ग, जो अलाउद्दीन खिलजी के विरुद्ध कान्हड़देव के शौर्य का गवाह है.

सुकड़ी नदी किनारे 8वीं-10वीं सदी में गुर्जर-प्रतिहारों द्वारा निर्मित; सुवर्णगिरि (सोनगढ़) नाम से विख्यात; 1311 ई. के ऐतिहासिक साके का साक्षी जिसमें कान्हड़देव और वीरमदेव चौहान लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए ('Rai ka bhav raat hi bika'); राजा भोज की संस्कृत पाठशाला (तोपखाना मस्जिद) स्थित है।

सुंधा माता

सुंधा पर्वत पर स्थित चामुंडा देवी का प्रसिद्ध मंदिर जहाँ राजस्थान का प्रथम रोप-वे स्थापित हुआ.

जसवंतपुरा की पहाड़ियों में स्थित; 800 वर्ष पुरानी चामुंडा देवी की बिना धड़ वाली सिर प्रतिमा (अघटेश्वरी); 20 दिसंबर 2006 को यहाँ राजस्थान का प्रथम पैसेंजर रोप-वे (800 मीटर) शुरू हुआ; 1262 ई. का चाचिगदेव का प्रसिद्ध सुंधा शिलालेख।

भीनमाल

गुर्जर-प्रतिहारों की प्राचीन राजधानी, महाकवि माघ और खगोलविद् ब्रह्मगुप्त की जन्मस्थली.

प्राचीन श्रीमाल; 641 ई. में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने यात्रा की और इसे 'पीलोमोलो' कहा; संस्कृत महाकाव्य 'शिशुपाल वधम्' के रचयिता महाकवि माघ तथा शून्य व गुरुत्वाकर्षण प्रणेता 'ब्रह्मस्फुटसिद्धांत' के रचयिता ब्रह्मगुप्त की जन्मभूमि।

दुर्ग एवं महल

  • जालौर दुर्ग (सुवर्णगिरि): गुर्जर-प्रतिहारों/परमारों द्वारा निर्मित; सूरज पोल, ध्रुव पोल, कान्हड़देव स्मारक, तोपखाना।
  • कोट कास्ता का किला: जालौर क्षेत्र का ऐतिहासिक जागीरी दुर्ग।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • सुंधा माता मंदिर: सुंधा पर्वत पर चामुंडा माता का प्रसिद्ध मंदिर जहाँ राज्य का पहला रोपवे बना।
  • सिरे मंदिर (जालौर): जालंधरनाथ की तपोभूमि; जोधपुर महाराजा मानसिंह द्वारा कन्यागिरि (कनकाचल) पहाड़ी पर निर्मित नाथ संप्रदाय का प्रमुख तीर्थ।
  • आशापुरी माता (मोदरा): सोनगरा चौहानों की कुलदेवी महोदरी माता का विख्यात मंदिर।
  • जालौर दुर्ग के जैन मंदिर: 12वीं सदी में कुमारपाल द्वारा निर्मित शांतिनाथ व महावीर मंदिर।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • जसवंतपुरा की पहाड़ियाँ: डोरा पर्वत (869 मी., जालौर की सर्वोच्च चोटी) वाली ग्रेनाइट पहाड़ियाँ।
  • सुंधा भालू अभयारण्य क्षेत्र: भालुओं के संरक्षण हेतु प्रसिद्ध पर्वतीय वन क्षेत्र।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • सुंधा माता भालू कंजर्वेशन रिजर्व: 2010 में स्थापित राजस्थान का पहला भालू संरक्षण रिजर्व (जालौर व सिरोही में 107 वर्ग किमी)।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • भीनमाल पुरातात्त्विक अवशेष: प्राचीन वराह मंदिर, सिक्के और सूर्य मंदिर के ऐतिहासिक अवशेष।
  • कशीदाकारी युक्त मोजड़ियां: भीनमाल की जरी और रेशम से कढ़ाई की गई चमड़े की प्रसिद्ध पारंपरिक जूतियाँ।

मेले एवं उत्सव

  • सुंधा माता मेला: चैत्र और आश्विन नवरात्र में पर्वत शिखर पर विशाल लक्खी मेला।
  • सेवड़िया पशु मेला: चैत्र शुक्ल एकादशी को रानीवाड़ा में भरने वाला प्रसिद्ध पशु मेला।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: जालौर का प्रसिद्ध खाजा, कैर-सांगरी, और माखन वड़ा।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: भीनमाल की कशीदाकारी चमड़े की जूतियाँ (मोजड़ियां) और लेहटाना के प्रसिद्ध खेसले (सूती चादरें)।
  • कृषि एवं फसलें: ईसबगोल (घोड़ा जीरा - भारत में सर्वाधिक उत्पादन जालौर में), जीरा, और अनार।
  • प्रमुख खनिज संपदा: ग्रेनाइट (गुलाबी, पीला व काला ग्रेनाइट - जालौर 'ग्रेनाइट सिटी' कहलाता है) और फ्लोराइट (कादम्बरी)।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

सुवर्णगिरि जालौर दुर्ग है, जबकि स्वर्णगिरि / सोनार किला जैसलमेर दुर्ग है। भीनमाल ह्वेनसांग की यात्रा और महाकवि माघ की जन्मस्थली है, कालिदास की नहीं।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
जालौर दुर्ग गिरि दुर्ग 8वीं-10वीं सदी, प्रतिहार काल सुवर्णगिरि, कान्हड़देव का 1311 का साका, तोपखाना मस्जिद
सुंधा माता मंदिर शक्ति पीठ सुंधा पर्वत, 1262 शिलालेख राजस्थान का प्रथम रोप-वे (2006), सिर विहीन चामुंडा प्रतिमा, भालू रिजर्व
भीनमाल ऐतिहासिक नगरी प्राचीन श्रीमाल, 7वीं सदी गुर्जर-प्रतिहार राजधानी, ह्वेनसांग आगमन, महाकवि माघ व ब्रह्मगुप्त जन्मभूमि
सिरे मंदिर नाथ तीर्थ कनकाचल पहाड़ी जालंधरनाथ तपोभूमि, जोधपुर महाराजा मानसिंह द्वारा निर्मित भव्य मंदिर
लेहटाना खेसला वस्त्र शिल्प पारंपरिक हथकरघा हाथ से बुनी जाने वाली प्रसिद्ध मोटी सूती चादरें (खेसले)
डोरा पर्वत पर्वत चोटी 869 मीटर जसवंतपुरा पहाड़ियों में जालौर जिले की सर्वोच्च चोटी

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23. झालावाड़

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

1838 में अंग्रेजों द्वारा झाला जालिम सिंह के वंशजों हेतु कोटा से अलग कर बनाई गई रियासत; संतरा उत्पादन के कारण 'राजस्थान का छोटा नागपुर' कहलाता है। प्रमुख नगर: झालावाड़, झालरापाटन, डग, पिड़ावा, अकलेरा, खानपुर।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

गागरोन दुर्ग

आहू और कालीसिंध नदियों के संगम पर स्थित यूनेस्को विश्व धरोहर जलदुर्ग (औदक दुर्ग).

2013 में यूनेस्को विश्व धरोहर घोषित; भारत का सर्वश्रेष्ठ जलदुर्ग जो तीन ओर से आहू व कालीसिंध के संगम से घिरा है और बिना नींव के चट्टान पर खड़ा है; 12वीं सदी में बीजलदेव डोड द्वारा निर्मित (डोडगढ़); दो ऐतिहासिक साकों का साक्षी (1423 अचलदास खींची व 1444 पाल्हणसिंह); सूफी संत मीठे शाह की दरगाह और संत पीपा की समाधि स्थित है।

झालरापाटन सूर्य मंदिर

10वीं सदी का शास्त्रीय मंदिर, जिसे 'सात सहेलियों का मंदिर' या पदमनाभ मंदिर कहा जाता है.

झालरापाटन ('घंटियों का शहर') में स्थित; 97 फीट ऊँचे अलंकृत शिखर वाला 10वीं सदी का प्रतिहार कालीन मंदिर; गर्भगृह में सूर्य देव की घुटनों तक जूते पहने हुए कमल धारक प्रतिमा; कर्नल जेम्स टॉड ने इसकी स्थापत्य कला की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

कोलवी की गुफाएँ

5वीं-7वीं सदी की लेटराइट पहाड़ियों में तराशी गई शैलकृत बौद्ध गुफाएँ और स्तूप.

डग के निकट कोलवी गाँव में स्थित; 50 शैलकृत बौद्ध गुफाओं का समूह जिसमें ध्यान कक्ष, चैत्य और बुद्ध की विशाल बैठी व खड़ी प्रतिमाएँ हैं; 'राजस्थान की अजंता-एलोरा' कही जाती हैं; निकटवर्ती विनायका और हथियागौड़ की गुफाएँ भी प्रसिद्ध हैं।

दुर्ग एवं महल

  • गागरोन दुर्ग: आहू व कालीसिंध के संगम पर यूनेस्को विश्व धरोहर जलदुर्ग; मीठे शाह की दरगाह, बुलंद दरवाजा।
  • झालावाड़ गढ़ पैलेस: 1840-1845 ई. में मदन सिंह द्वारा निर्मित; हाड़ौती शैली के सुंदर भित्तिचित्रों वाला महल।
  • मनोहर थाना दुर्ग: परवन और कालीखाड़ (कालीखोन) नदियों के संगम पर स्थित जलदुर्ग।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • झालरापाटन सूर्य मंदिर (पद्मनाभ मंदिर): घुटनों तक बूट पहने सूर्य प्रतिमा वाला 10वीं सदी का मंदिर।
  • चंद्रभागा मंदिर समूह: चंद्रभागा नदी किनारे 6वीं से 8वीं सदी के प्राचीन शिव व विष्णु मंदिर।
  • शांतिनाथ जैन मंदिर (झालरापाटन): 11वीं सदी का भव्य दिगंबर जैन मंदिर।
  • संत पीपा की समाधि (गागरोन): राजपाठ त्यागकर भक्ति मार्ग अपनाने वाले निर्गुण संत पीपा की समाधि।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • आहू-कालीसिंध संगम: गागरोन दुर्ग को तीन ओर से घेरने वाला सुरम्य नदी संगम।
  • चंद्रभागा नदी तट: झालरापाटन के पास बहने वाली पवित्र नदी।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व (झालावाड़ क्षेत्र): झालावाड़ तक फैला सघन वन क्षेत्र जहाँ बाघ और तेंदुए विचरण करते हैं।
  • कोलवी, विनायका व हथियागौड़ गुफाएँ: घने वनक्षेत्र में लेटराइट पहाड़ियों पर बौद्ध पुरातत्व।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • भवानी नाट्यशाला (झालावाड़): 1921 ई. में महाराजा भवानी सिंह द्वारा निर्मित पारसी ओपेरा शैली की अनूठी नाट्यशाला, जिसमें घोड़े और रथ सीधे मंच पर प्रवेश कर सकते थे।
  • झालावाड़ राजकीय संग्रहालय: 1915 में स्थापित; 8वीं सदी की अर्द्धनारीश्वर और नटराज की दुर्लभ मूर्तियाँ।

मेले एवं उत्सव

  • चंद्रभागा मेला (झालरापाटन): कार्तिक पूर्णिमा पर चंद्रभागा नदी में पवित्र स्नान और मालवी नस्ल के पशुओं का विशाल व्यापारिक मेला।
  • गागरोन उर्स: सूफी संत मीठे शाह की दरगाह पर आयोजित होने वाला वार्षिक उर्स।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: झालावाड़ का संतरा हलवा / सिट्रस व्यंजन, दाल-बाफला, और मावा गुजिया।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: स्लेट पत्थर नक्काशी, हाड़ौती लघु चित्रकला, और पीतल के कलात्मक दीप।
  • कृषि एवं फसलें: संतरा (झालावाड़ संतरा उत्पादन हेतु 'राजस्थान का छोटा नागपुर' कहलाता है), धनिया, और सोयाबीन।
  • प्रमुख खनिज संपदा: कोटा स्टोन (स्लैब पत्थर), बलुआ पत्थर, और सिलिका सैंड।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

गागरोन दुर्ग झालावाड़ में आहू व कालीसिंध के संगम पर है, कोटा में नहीं। कोलवी की बौद्ध गुफाएँ झालावाड़ में हैं, जबकि बैराठ के बौद्ध अवशेष कोटपूतली-बहरोड़ में हैं।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
गागरोन दुर्ग जलदुर्ग (औदक) 12वीं सदी, बीजलदेव डोड यूनेस्को धरोहर 2013, आहू-कालीसिंध संगम, मीठे शाह दरगाह, 2 साके
झालरापाटन सूर्य मंदिर सूर्य मंदिर 10वीं सदी, प्रतिहार काल सात सहेलियों का मंदिर, 97 फीट शिखर, घुटनों तक जूते पहने सूर्य प्रतिमा
कोलवी की गुफाएँ शैलकृत बौद्ध गुफाएँ 5वीं-7वीं सदी ईस्वी 50 लेटराइट गुफाएँ, बुद्ध की विशाल प्रतिमाएँ, राजस्थान की अजंता-एलोरा
भवानी नाट्यशाला पारसी रंगमंच 1921 ई., भवानी सिंह यूरोपीय ओपेरा शैली, मंच पर रथ और घोड़ों के प्रवेश की अनूठी व्यवस्था
चंद्रभागा मंदिर मंदिर समूह 6वीं-8वीं सदी चंद्रभागा नदी तट, कार्तिक पूर्णिमा का प्रसिद्ध मालवी पशु मेला
मनोहर थाना दुर्ग जलदुर्ग परवन-कालीखाड़ संगम मालवा सीमा पर स्थित दक्षिणी हाड़ौती का ऐतिहासिक किला

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24. झुंझुनूँ

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

शेखावाटी का सिरमौर और 'सैनिकों का जिला', भित्तिचित्रों वाली हवेलियों के कारण 'ओपन एयर आर्ट गैलरी' के रूप में विश्वप्रसिद्ध। प्रमुख नगर: झुंझुनूँ, नवलगढ़, मंडावा, चिड़ावा, बिसाऊ, उदयपुरवाटी, पिलानी।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

खेतड़ी महल

1760 ईस्वी में ठाकुर भोपाल सिंह द्वारा झुंझुनूँ नगर में निर्मित बहुमंजिला हवादार महल.

जयपुर के हवामहल का प्रेरणा स्रोत; बिना खिड़की-दरवाजों वाला स्तंभों का अनूठा हवादार महल जहाँ प्राकृतिक वायु संचार होता है; झुंझुनूँ शहर में स्थित (खेतड़ी कस्बे से अलग)।

रानी सती मंदिर

नारायणी देवी (दादी जी) को समर्पित सफेद संगमरमर का विश्वप्रसिद्ध विशाल मंदिर परिसर.

झुंझुनूँ शहर में स्थित सदियों पुराना तीर्थ; उत्कृष्ट संगमरमर नक्काशी, चांदी के कपाट और भित्तिचित्र; भाद्रपद अमावस्या को देश-विदेश से श्रद्धालु दर्शनार्थ आते हैं।

लोहार्गल

अरावली पर्वतमाला में स्थित पवित्र तीर्थ जहाँ पांडवों के अस्त्र-शस्त्र गलकर पापमुक्त हुए थे.

नवलगढ़ के पास अरावली की सुरम्य घाटियों में स्थित; सूर्य कुंड जहाँ महाभारत युद्ध के बाद पांडवों के लोहे के हथियार पानी में गल गए थे; भाद्रपद अमावस्या को 24 कोसी परिक्रमा का प्रमुख केंद्र।

दुर्ग एवं महल

  • खेतड़ी महल (झुंझुनूँ शहर): 1760 ई. में निर्मित हवामहल की प्रेरणा स्थली।
  • मंडावा दुर्ग: 1755 ई. में नवल सिंह द्वारा व्यापारिक मार्ग पर निर्मित किला, जो अब उत्कृष्ट भित्तिचित्रों वाले हेरिटेज होटल में तब्दील है।
  • बादलगढ़ दुर्ग: नवाब फजल खां कायमखानी द्वारा पहाड़ी पर निर्मित ऐतिहासिक दुर्ग।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • रानी सती मंदिर: नारायणी देवी का संगमरमर का विशाल मंदिर।
  • लोहार्गल सूर्य कुंड: पांडवों की पापमुक्ति स्थली व पवित्र स्नान कुंड।
  • शाकंभरी माता (उदयपुरवाटी): अरावली पर्वत शृंखला में स्थित चौहानों की कुलदेवी का प्राचीन शक्ति पीठ।
  • कमरुद्दीन शाह की दरगाह: 19वीं सदी की सूफी दरगाह जो सर्वधर्म सद्भाव का केंद्र है।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • लोहार्गल अरावली घाटी: प्राकृतिक झरनों और औषधीय वनस्पति से आच्छादित पर्वतीय घाटी।
  • मोड़ा पहाड़: झुंझुनूँ नगर की सुरम्य पहाड़ी।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • बिरला विज्ञान संग्रहालय (पिलानी): 1954 में स्थापित भारत का पहला निजी विज्ञान संग्रहालय व तारामंडल।
  • सुनारी पुरातात्त्विक स्थल: कांतली नदी तट पर स्थित लौहयुगीन स्थल, जहाँ भारत में लोहा गलाने की प्राचीनतम धौंकनीदार भट्टियाँ मिलीं।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • ओपन एयर आर्ट गैलरी (चित्रित हवेलियाँ):
    • नवलगढ़: 'शेखावाटी की स्वर्ण नगरी'; पोद्दार हवेली संग्रहालय, आठ हवेली, मोरारका हवेली।
    • मंडावा: सराफ, चौखानी और लाडिया हवेलियाँ (पौराणिक कथाओं, रेलगाड़ियों और ग्रामोफोन के भित्तिचित्र)।
    • डूंडलोद: डूंडलोद का किला और गोयनका हवेलियाँ।
  • खेतड़ी व स्वामी विवेकानंद: खेतड़ी महाराजा अजीत सिंह ने स्वामी जी को 'विवेकानंद' नाम दिया और 1893 के शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन में जाने का संपूर्ण प्रबंध किया।

मेले एवं उत्सव

  • लोहार्गल मेला: भाद्रपद अमावस्या; 24 कोसी परिक्रमा का विशाल लक्खी मेला।
  • रानी सती मेला: भाद्रपद अमावस्या को दादी जी का मेला।
  • शाकंभरी मेला: नवरात्र में उदयपुरवाटी में लगने वाला विशाल मेला।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: चिड़ावा के प्रसिद्ध पेड़े (दूध व मावे के लजीज पेड़े), दही बड़ा, और बाजरे की रोटी।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: शेखावाटी भित्तिचित्र (फ्रेस्को पेंटिंग - प्राकृतिक वानस्पतिक रंगों से हवेलियों पर चित्रांकन) और तांबे के बर्तन।
  • कृषि एवं फसलें: बाजरा, दलहन (मूंग, मोठ), और सरसों।
  • प्रमुख खनिज संपदा: तांबा (खेतड़ी कॉपर कॉम्प्लेक्स - सिंघाना, कोलिहान, बबाई; हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड, 'ताम्र नगरी')।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

खेतड़ी महल झुंझुनूँ नगर में है, जबकि खेतड़ी तांबा नगरी 60 किमी दूर है। मंडावा और नवलगढ़ झुंझुनूँ जिले में हैं, जबकि फतेहपुर और लक्ष्मणगढ़ सीकर जिले में हैं।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
खेतड़ी महल हवा महल 1760 ई., भोपाल सिंह झुंझुनूँ शहर, जयपुर हवामहल का प्रेरणा स्रोत, बिना दरवाजों का हवादार भवन
रानी सती मंदिर शक्ति तीर्थ झुंझुनूँ नगर नारायणी देवी (दादी जी), भव्य संगमरमर मंदिर, चांदी के कपाट
लोहार्गल सूर्य कुंड पवित्र तीर्थ महाभारत कालीन पांडवों के अस्त्र गले, 24 कोसी परिक्रमा, अरावली घाटी
नवलगढ़ की हवेलियाँ हवेली स्थापत्य 19वीं सदी का नगर शेखावाटी की स्वर्ण नगरी, पोद्दार हवेली, आठ हवेली, मोरारका
मंडावा दुर्ग व हवेलियाँ हेरिटेज दुर्ग 1755 ई., नवल सिंह सराफ, चौखानी, लाडिया हवेलियाँ, रेलगाड़ी व मोटरकार के भित्तिचित्र
सुनारी उत्खनन लौहयुगीन स्थल कांतली नदी तट भारत में लोहा गलाने की प्राचीनतम धौंकनीदार भट्टी, प्राचीन सिक्के

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25. जोधपुर

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

मारवाड़ की ऐतिहासिक राजधानी, 'सूर्य नगरी' (सन सिटी) और 'नीली नगरी' (ब्लू सिटी) के नाम से विश्वविख्यात, 12 मई 1459 को राव जोधा द्वारा स्थापित। प्रमुख नगर: जोधपुर, मंडोर, बिलाड़ा, लूणी, पीपाड़ सिटी।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

मेहरानगढ़

12 मई 1459 ईस्वी को राठौड़ शासक राव जोधा द्वारा स्थापित विहंगम गिरि दुर्ग.

400 फीट ऊँची चिड़ियाटूंका पहाड़ी पर स्थित; मयूरध्वजगढ़ व गढ़ चिंतामणि उपनाम; रुडयार्ड किपलिंग ने इसे 'परियों और देवताओं द्वारा निर्मित' कहा; मोती महल, फूल महल (अभय सिंह), शीशमहल, चामुंडा माता मंदिर और प्रसिद्ध तोपें (किलकिला, शंभूबाण, गजनीखां) स्थित हैं।

जसवंत थड़ा

1899 ईस्वी में मकराना संगमरमर से निर्मित शाही स्मारक, जिसे 'मारवाड़ का ताजमहल' कहा जाता है.

महाराजा सरदार सिंह द्वारा अपने पिता महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय की स्मृति में निर्मित; पारदर्शी सफेद मकराना संगमरमर से बना जो धूप में चमकता है; जोधपुर के राठौड़ शासकों का शाही श्मशान व स्मारक परिसर।

उम्मेद भवन

1929 से 1943 के मध्य महाराजा उम्मेद सिंह द्वारा निर्मित विश्व का सबसे विशाल आर्ट-डेको महल.

अकाल राहत कार्य के तहत छीतर पहाड़ी पर सुनहरे छीतर पत्थर से बिना गारे के निर्मित ('छीतर पैलेस'); ब्रिटिश वास्तुकार हेनरी वॉन लैंचेस्टर द्वारा डिजाइन; 347 कमरों, 105 फीट ऊँचे गुंबद और विंटेज घड़ियों के शाही संग्रहालय वाला भव्य महल।

दुर्ग एवं महल

  • मेहरानगढ़ दुर्ग: चिड़ियाटूंका पहाड़ी पर 1459 ई. का विशाल दुर्ग; जय पोल, फतेह पोल, चामुंडा मंदिर।
  • उम्मेद भवन पैलेस (छीतर पैलेस): 347 कमरों वाला विश्व का विशालतम आर्ट-डेको निजी प्रासाद।
  • मंडोर दुर्ग व उद्यान: मारवाड़ की प्राचीन राजधानी; राठौड़ राजाओं के विशाल देवल (छतरियाँ), 16 वीर योद्धाओं की 'दालान' (हॉल ऑफ हीरोज) और 33 करोड़ देवी-देवताओं का मंदिर।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • चामुंडा माता मंदिर (मेहरानगढ़): राठौड़ों की कुलदेवी; 2008 की दुखद भगदड़ की जाँच जस्टिस जसराज चोपड़ा आयोग ने की थी।
  • महामंदिर: 1812 ई. में महाराजा मानसिंह द्वारा नाथ गुरु आयस देवनाथ हेतु निर्मित 84 नक्काशीदार खंभों वाला विशाल मंदिर।
  • आई माता का मंदिर (बिलाड़ा): सीरवी समाज की कुलदेवी का बडेर; मंदिर की अखंड ज्योति से निरंतर केसर टपकने की चमत्कारी मान्यता।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • कायलाना झील: 1872 ई. में प्रताप सिंह द्वारा निर्मित सुरम्य झील; जोधपुर शहर की मुख्य पेयजल झील।
  • बालसमंद झील: 1159 ई. में बालक राव परिहार द्वारा निर्मित झील व समर पैलेस।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • माचिया जैविक उद्यान: कायलाना झील के समीप स्थित वन्यजीव प्राणी उद्यान।
  • राव जोधा डेजर्ट रॉक पार्क: मेहरानगढ़ की तलहटी में 70 हेक्टेयर में मरुस्थलीय चट्टानी वनस्पति का संरक्षण पार्क।
  • खेजड़ली स्मारक: 1730 ई. में खेजड़ी वृक्षों की रक्षा के लिए अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में 363 बिश्नोइयों के अमर बलिदान का पवित्र स्थल।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • मेहरानगढ़ संग्रहालय: शाही पालकियों (महाडोल), हाथियों के हौदों, हथियारों और लघु चित्रों का विश्वस्तरीय संग्रहालय।
  • सालावास की दरियाँ (जीआई टैग): प्रजापत बुनकरों द्वारा सूती और ऊनी धागों से हाथ से बुनी गई कलात्मक दरियाँ।
  • जोधपुरी मोजड़ी (जीआई टैग): हाथ से बनी प्रसिद्ध कसीदाकारी युक्त चमड़े की जूतियाँ।

मेले एवं उत्सव

  • मारवाड़ महोत्सव: आश्विन पूर्णिमा पर मांड गायकी और लोक नृत्यों का प्रसिद्ध उत्सव।
  • खेजड़ली मेला: भाद्रपद शुक्ल दशमी; विश्व का एकमात्र वृक्ष मेला जो पर्यावरण शहीदों की स्मृति में भरता है।
  • धींगा गवर मेला: जोधपुर का अनूठा उत्सव जहाँ रात में महिलाएँ सज-धजकर बेंत लेकर निकलती हैं ('बेंतमार गणगौर')।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: जोधपुर की मावा कचौरी, तीखा मिर्ची बड़ा, प्याज कचौरी, मखनिया लस्सी, और गट्टे की सब्जी।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: बादली (जस्ता की पानी की बोतलें जिन पर कपड़ा लपेटा जाता है ताकि पानी ठंडा रहे), जोधपुरी जूती (जीआई टैग), बंधेज, और नक्काशीदार लकड़ी के हस्तशिल्प।
  • कृषि एवं फसलें: मथानिया की लाल मिर्च (तीखी और चटकीली लाल मिर्च), जीरा, और ग्वार।
  • प्रमुख खनिज संपदा: जोधपुरी बादामी/लाल छीतर पत्थर (इमारती बलुआ पत्थर), रायोलाइट (मालाणी आग्नेय चट्टानें), और बॉल क्ले।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

खीचन (कुरजाँ पक्षी गाँव) और फलौदी अब नवगठित फलौदी जिले में हैं, जोधपुर में नहीं। जसवंत थड़ा 1899 में सरदार सिंह ने अपने पिता जसवंत सिंह द्वितीय की याद में बनवाया था। बादला जस्ता (जिंक) की बोतल है जो केवल जोधपुर में बनती है।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
मेहरानगढ़ दुर्ग गिरि दुर्ग 1459 ई., राव जोधा मयूरध्वजगढ़, 400 फीट पहाड़ी, फूल महल, किलकिला तोप, किपलिंग का कथन
जसवंत थड़ा शाही स्मारक 1899 ई., सरदार सिंह मारवाड़ का ताजमहल, जसवंत सिंह द्वितीय की स्मृति में सफेद संगमरमर स्मारक
उम्मेद भवन पैलेस आर्ट-डेको महल 1929-1943 ई., उम्मेद सिंह विश्व का विशालतम निजी महल, छीतर पत्थर, 347 कमरे, विंटेज घड़ियों का संग्रहालय
मंडोर उद्यान प्राचीन राजधानी प्राचीन परिहार / राठौड़ राठौड़ छतरियाँ, 16 वीरों की दालान, 33 करोड़ देवी-देवताओं का मंदिर
महामंदिर नाथ पीठ 1812 ई., मानसिंह 84 नक्काशीदार खंभे, आयस देवनाथ की पीठ, नाथ संप्रदाय का मुख्य केंद्र
खेजड़ली स्मारक पर्यावरण तीर्थ 1730 ई., अमृता देवी खेजड़ी हेतु 363 बिश्नोइयों का बलिदान, विश्व का एकमात्र वृक्ष मेला

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26. करौली

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

1348 ई. में अर्जुनपाल द्वारा स्थापित यदुवंशी यादव राजवंश की रियासत, 'कल्याणपुरी' और डांग क्षेत्र की धार्मिक राजधानी। प्रमुख नगर: करौली, हिंडौन सिटी, सपोटरा, मंडरायल, टोडाभीम।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

कैला देवी

त्रिकूट पर्वत पर स्थित विख्यात शक्ति तीर्थ जहाँ लांगुरिया गीत गाए जाते हैं.

कालीसिल नदी के तट पर त्रिकूट पर्वत पर स्थित; भगवान कृष्ण की बहन योगमाया का स्वरूप; श्रद्धालु कनक-दंडवत करते हुए आते हैं; मीणा व अन्य भक्तों द्वारा गाए जाने वाले लांगुरिया गीत व नृत्य प्रसिद्ध हैं; चैत्र नवरात्र में विशाल लक्खी मेला।

श्री महावीरजी

राजस्थान में 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी का सर्वोच्च अतिशय क्षेत्र दिगंबर जैन तीर्थ.

गंभीर नदी तट पर चंदनपुर गाँव में स्थित; मिट्टी के टीले से कृपा चमार नामक चर्मकार की गाय द्वारा दूध बहाने के स्थान से खुदाई में प्रकट प्राचीन लाल पाषाण प्रतिमा; चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को भव्य रथयात्रा (जिसका रथ खींचने का प्रथम अधिकार चर्मकार समाज को है)।

तिमनगढ़

मसलपुर पहाड़ी पर यदुवंशी राजा तिमनपाल द्वारा 11वीं सदी में निर्मित प्राचीन गिरि दुर्ग.

1100 ईस्वी में तिमनपाल द्वारा निर्मित; सागर तालाब और विशाल परकोटों से सुरक्षित; 1196 ई. में मुहम्मद गोरी द्वारा जीता गया; भूमिगत खजानों और प्राचीन मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध।

दुर्ग एवं महल

  • करौली राजमहल (भंवर विलास पैलेस): 14वीं सदी में अर्जुनपाल द्वारा स्थापित; लाल बलुआ पत्थर की जालीदार नक्काशी, शीशमहल और रंगमहल।
  • तिमनगढ़ दुर्ग: 1100 ई. में तिमनपाल द्वारा निर्मित प्राचीन पहाड़ी किला।
  • मंडरायल दुर्ग व ऊँटगीर दुर्ग: चंबल नदी पार करने वाले मार्गों की रक्षा करने वाले ऐतिहासिक दुर्ग।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • कैला देवी मंदिर: त्रिकूट पर्वत पर शक्ति पीठ; मंदिर प्रांगण में बोहरा भगत की छतरी स्थित है।
  • श्री महावीरजी (चंदनपुर): दिगंबर जैन संप्रदाय का प्रधान अतिशय क्षेत्र।
  • मदन मोहन जी मंदिर: राजा गोपाल सिंह द्वारा स्थापित; वृंदावन से लाई गई भगवान कृष्ण की प्रतिमा, गौड़ीय संप्रदाय का मुख्य केंद्र।
  • मेहंदीपुर बालाजी सीमा: टोडाभीम सीमा से जुड़ा प्रसिद्ध हनुमान धाम।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • कालीसिल नदी व बाँध: डांग के बीहड़ों के बीच कैला देवी मंदिर के पास बहने वाली सुंदर नदी।
  • पांचना बाँध (गुड़ला): मिट्टी से बना राजस्थान का सबसे बड़ा बाँध (भद्रावती, बरखेड़ा, अटा, माची और भैंसावर 5 नदियों के संगम पर)।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • कैला देवी वन्यजीव अभयारण्य: रणथंभौर का उत्तरी बफर क्षेत्र (674 वर्ग किमी); तेंदुए, भेड़ियों और भालुओं का प्राकृतिक आवास।
  • धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व: 2023 में अधिसूचित राजस्थान का 5वां बाघ अभयारण्य।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • करौली की लाख की चूड़ियाँ: काँच और मोतियों से जड़ित पारंपरिक लाख की चूड़ियों का प्रसिद्ध हस्तशिल्प।
  • लाल बलुआ पत्थर के खंभे: मंदिरों और महलों के लिए तराशे जाने वाले कलात्मक पाषाण स्तंभ।

मेले एवं उत्सव

  • कैला देवी लक्खी मेला: चैत्र शुक्ल अष्टमी; 20 लाख से अधिक भक्तों का जमावड़ा, लांगुरिया गीतों की गूंज।
  • श्री महावीरजी मेला: चैत्र शुक्ल त्रयोदशी से वैशाख कृष्ण द्वितीया तक; विशाल जिनेन्द्र रथयात्रा।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: करौली का प्रसिद्ध खीर मोहन (छेना और चाशनी से निर्मित स्वादिष्ट मिठाई) और मंडरायल के पेड़े।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: लाख की चूड़ियाँ (लाह शिल्प), लाल बलुआ पत्थर की जालियाँ, और काष्ठ खिलौने।
  • कृषि एवं फसलें: बाजरा, गेहूँ, और सरसों।
  • प्रमुख खनिज संपदा: लाल व गुलाबी बलुआ पत्थर (सपोटरा व मंडरायल की प्रसिद्ध खदानें) और सिलिका सैंड।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

लांगुरिया गीत और नृत्य केवल करौली के कैला देवी मंदिर में गाए जाते हैं। श्री महावीरजी करौली जिले में गंभीर नदी के तट पर हैं। पांचना बाँध मिट्टी से बना राजस्थान का सबसे बड़ा बाँध है।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
कैला देवी शक्ति तीर्थ त्रिकूट पर्वत, कालीसिल तट योगमाया मंदिर, लांगुरिया गीत व नृत्य, चैत्र नवरात्र लक्खी मेला
श्री महावीरजी जैन तीर्थ चंदनपुर, गंभीर नदी तट दिगंबर अतिशय क्षेत्र, लाल पाषाण प्रतिमा, चर्मकार द्वारा रथ खींचना
तिमनगढ़ दुर्ग गिरि दुर्ग 1100 ई., राजा तिमनपाल मसलपुर पहाड़ी, 1196 में गोरी द्वारा विजित, प्राचीन मूर्तियाँ
मदन मोहन जी कृष्ण मंदिर राजा गोपाल सिंह गौड़ीय संप्रदाय की प्रधान पीठ, वृंदावन से लाई गई कृष्ण प्रतिमा
पांचना बाँध मिट्टी का बाँध गुड़ला गाँव राजस्थान में मिट्टी से बना सबसे बड़ा बाँध (5 नदियों का संगम)
करौली राजमहल राजप्रासाद 14वीं सदी, अर्जुनपाल भंवर विलास, लाल बलुआ पत्थर की नक्काशी, रंगमहल भित्तिचित्र

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27. खैरथल-तिजारा

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

अलवर से नवगठित औद्योगिक व सांस्कृतिक जिला, हरियाणा/एनसीआर सीमा पर स्थित; विनिर्माण उद्योग, हस्तनिर्मित कागज और जैन तीर्थ का प्रमुख केंद्र। प्रमुख नगर: खैरथल, तिजारा, भिवाड़ी, किशनगढ़ बास, मुंडावर, कोटकासिम।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

तिजारा जैन मंदिर

8वें तीर्थंकर चंद्रप्रभ भगवान को समर्पित भूमि से प्रकट विख्यात अतिशय क्षेत्र दिगंबर जैन मंदिर.

तिजारा कस्बे में स्थित; 16 अगस्त 1956 को टीले की खुदाई के दौरान भगवान चंद्रप्रभ की सफेद पाषाण की चमत्कारी प्रतिमा भूमि से प्रकट हुई; भव्य संगमरमर मंदिर; इस 41-जिला व्यवस्था में खैरथल-तिजारा के अंतर्गत पढ़ा जाता है।

तिजारा दुर्ग

अलवर के राजा बलवंत सिंह द्वारा 19वीं सदी में निर्मित पहाड़ी दुर्ग-महल.

तिजारा नगर के ऊपर ऊँची पहाड़ी पर स्थित; राजपूत व अफगान स्थापत्य का सुंदर मिश्रण; रानी महल और मर्दाना महल दर्शनीय; अब भव्य हेरिटेज स्थल में पुनर्निर्मित।

बाबा मोहन राम मंदिर

मिलकपुर-भिवाड़ी में 'काली खोली' नाम से विख्यात भगवान कृष्ण के स्वरूप बाबा मोहन राम का गुफा मंदिर.

भिवाड़ी के पास पहाड़ी गुफा में स्थित; 'काली खोली' नाम से प्रसिद्ध जहाँ अखंड ज्योति जलती है; चैत्र और आश्विन नवरात्र में विशाल मेला; मेवात क्षेत्र के प्रमुख लोक आराध्य।

दुर्ग एवं महल

  • तिजारा दुर्ग-महल: राजा बलवंत सिंह द्वारा निर्मित 19वीं सदी का पहाड़ी महल।
  • किशनगढ़ बास का किला: मेवात गलियारे की सुरक्षा करने वाला ऐतिहासिक दुर्ग।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • तिजारा अतिशय क्षेत्र: 1956 में भूमि से प्रकट 8वें तीर्थंकर चंद्रप्रभ भगवान का दिगंबर जैन मंदिर।
  • बाबा मोहन राम (काली खोली): भिवाड़ी के पास मिलकपुर में पहाड़ी गुफा में स्थित चमत्कारी तीर्थ।
  • मेवात धार्मिक परंपराएँ: कबीर पंथी और लोक संत परंपराओं का संगम।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • भिवाड़ी-तिजारा पहाड़ियाँ: हरियाणा सीमा से सटी उत्तरी अरावली की पर्वत शृंखलाएँ।
  • खैरथल हरित क्षेत्र: नलकूपों से सिंचित उपजाऊ कृषि मैदान।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • अरावली वन्य गलियारा: सरिस्का से दक्षिणी हरियाणा तक फैला तेंदुओं और नीलगायों का प्राकृतिक मार्ग।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • हस्तनिर्मित कागज उद्योग: क्षेत्र का पारंपरिक पेपरमेकिंग कुटीर उद्योग।
  • भिवाड़ी औद्योगिक हब: राजस्थान का सबसे बड़ा औद्योगिक विनिर्माण केंद्र (ऑटोमोबाइल, फार्मा व इलेक्ट्रॉनिक्स)।

मेले एवं उत्सव

  • तिजारा जैन मेला: श्रावण शुक्ल दशमी और फाल्गुन माह में आयोजित होने वाला मेला।
  • बाबा मोहन राम मेला: चैत्र और आश्विन नवरात्र में काली खोली (मिलकपुर) में विशाल लक्खी मेला।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: तिजारा का प्रसिद्ध कलाकंद, मेवाती बाजरा खिचड़ी घी के साथ, और रेवड़ी।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: हस्तनिर्मित कागज, सूती ब्लॉक प्रिंटिंग, और धातु ऑटोमोबाइल पार्ट्स।
  • कृषि एवं फसलें: सरसों (खैरथल राजस्थान की प्रमुख सरसों मंडियों में से एक है), बाजरा, और गेहूँ।
  • प्रमुख खनिज संपदा: स्लेट पत्थर, सिलिका सैंड, और कंक्रीट इमारती पत्थर।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

तिजारा जैन मंदिर और भिवाड़ी औद्योगिक क्षेत्र अब नवगठित खैरथल-तिजारा जिले में आते हैं (पहले ये अलवर जिले में थे)।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
तिजारा जैन मंदिर जैन तीर्थ 16 अगस्त 1956 को प्रकट अतिशय क्षेत्र, 8वें तीर्थंकर चंद्रप्रभ, सफेद पाषाण प्रतिमा
तिजारा दुर्ग-महल गिरि दुर्ग 19वीं सदी, बलवंत सिंह पहाड़ी पर स्थित, राजपूत-अफगान स्थापत्य, हेरिटेज होटल
बाबा मोहन राम लोक तीर्थ मिलकपुर / भिवाड़ी काली खोली गुफा मंदिर, अखंड ज्योति, नवरात्र में लक्खी मेला
खैरथल मंडी व्यापारिक केंद्र सरसों व्यापार एनसीआर क्षेत्र की सबसे बड़ी सरसों व तिलहन कृषि उपज मंडी
भिवाड़ी औद्योगिक हब औद्योगिक नगर आधुनिक उद्योग राजस्थान का प्रमुख विनिर्माण, ऑटोमोबाइल व निर्यात हब

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28. कोटा

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

राजस्थान की औद्योगिक व 'शिक्षा नगरी' (कोचिंग कैपिटल), बारहमासी चंबल नदी के तट पर स्थित हाड़ा राजपूतों की ऐतिहासिक रियासत। प्रमुख नगर: कोटा, रामगंज मंडी, सांगोद, दीगोद, कैथून, मंडाना।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

कोटा गढ़ पैलेस

चंबल नदी के किनारे स्थित भव्य राजमहल परिसर, जिसमें प्रसिद्ध राव माधोसिंह संग्रहालय स्थित है.

1625 ईस्वी में कोटा के प्रथम स्वतंत्र हाड़ा शासक राव माधोसिंह द्वारा निर्माण प्रारंभ; चंबल नदी तट पर स्थित सुदृढ़ दुर्ग; राव माधोसिंह संग्रहालय में हाड़ौती शैली के शिकार के चित्र, दुर्लभ अस्त्र-शस्त्र, चांदी के सिंहासन और 17वीं सदी के भित्तिचित्र संरक्षित हैं।

जगमंदिर, कोटा

1743-1745 ईस्वी में किशोर सागर झील के मध्य लाल बलुआ पत्थर से निर्मित सुंदर जलमहल.

1346 ई. में निर्मित किशोर सागर झील के मध्य महाराव दुर्जनसाल की रानी ब्रज कंवर द्वारा निर्मित जलमहल; झील के शांत जल में तैरता हुआ सुंदर महल; उदयपुर की पिछोला झील वाले जगमंदिर से पूरी तरह भिन्न।

सेवन वंडर्स पार्क

किशोर सागर झील के तट पर विश्व के सात अजूबों की हूबहू प्रतिकृतियों वाला प्रसिद्ध पर्यटन पार्क.

इसमें ताजमहल, एफिल टॉवर, पीसा की झुकी मीनार, मिस्र के पिरामिड, स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी, कोलोसियम और क्राइस्ट द रिडीमर की सुंदर प्रतिकृतियाँ हैं; रात्रि में रोशनी से जगमगाता आधुनिक पर्यटन स्थल।

दुर्ग एवं महल

  • कोटा गढ़ पैलेस (सिटी पैलेस): 1625 ई. में राव माधोसिंह द्वारा चंबल नदी किनारे निर्मित; राजमहल, गुलाब महल, बड़ा दरवाजा।
  • अभेड़ा महल: 18वीं सदी में चंबल के पास झील किनारे निर्मित सुंदर महल व उद्यान, जहाँ कमल की झील दर्शनीय है।
  • कंसुआ गढ़ अवशेष: प्राचीन कंसुआ मंदिर के समीप ऐतिहासिक अवशेष।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • मथुराधीश मंदिर (पाटन पोल): वल्लभ संप्रदाय की प्रथम पीठ, हाड़ौती में पुष्टिमार्गीय वैष्णव संप्रदाय का सर्वोच्च तीर्थ।
  • कंसुआ शिव मंदिर (कर्णेश्वर): 8वीं सदी का प्राचीन मंदिर जहाँ चतुर्मुखी शिवलिंग और 738 ई. का मौर्य राजा धवल का अंतिम शिलालेख मिला है।
  • गोदावरी धाम: चंबल नदी के तट पर स्थित प्रसिद्ध हनुमान मंदिर।
  • गुरुद्वारा अगमगढ़ साहिब: चंबल किनारे स्थित प्रसिद्ध ऐतिहासिक गुरुद्वारा।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • चंबल रिवरफ्रंट: चंबल नदी के दोनों किनारों पर 22 घाटों, विश्व की सबसे बड़ी घंटी और संगमरमर प्रतिमाओं से सुसज्जित विश्वस्तरीय रिवरफ्रंट।
  • किशोर सागर झील: 14वीं सदी की झील जिसके मध्य जगमंदिर जलमहल और संगीतमय फव्वारे हैं।
  • कोटा बैराज: चंबल घाटी परियोजना का मुख्य सिंचाई बैराज; मानसून में गेट खुलने पर विहंगम जल दृश्य।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व: 2013 में राजस्थान का तीसरा बाघ अभयारण्य अधिसूचित (759 वर्ग किमी); दर्रा अभयारण्य, चंबल घाटी और जवाहर सागर को मिलाकर निर्मित।
  • राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य: घड़ियाल, मगरमच्छ और गंगा डॉल्फिन का संरक्षित नदीय क्षेत्र।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • कोटा डोरिया बुनाई (कैथून): शुद्ध सूती और रेशमी धागों से चौकोर 'खट' (कैट) डिजाइन में बुनी जाने वाली विश्वप्रसिद्ध साड़ियाँ (जीआई टैग); मैसूर से आए बुनकरों की परंपरा।
  • राव माधोसिंह संग्रहालय: गढ़ पैलेस में स्थित हाड़ौती शिकार शैली के चित्रों, हथियारों व सिक्कों का अनूठा संग्रह।
  • क्षार बाग की छतरियाँ: कोटा के हाड़ा शासकों की कलात्मक शाही छतरियाँ।

मेले एवं उत्सव

  • राष्ट्रीय दशहरा मेला कोटा: 1579 ई. में राव माधोसिंह के काल से प्रारंभ; 80 फीट ऊँचे रावण, कुंभकर्ण व मेघनाद के पुतले दहन वाला एक माह लंबा मेला।
  • नहाण उत्सव (सांगोद): होली के अवसर पर सांगोद में 200 वर्षों से आयोजित होने वाला पारंपरिक लोक उत्सव।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: कोटा की प्रसिद्ध हींग की कचौड़ी (तीखी और सुगंधित कचौड़ी), मावा बर्फी, और दाल-बाटी-चूरमा।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: कोटा डोरिया साड़ियाँ (जीआई टैग; कैथून गाँव में बुनी जाने वाली मसूरिया साड़ियाँ) और कोटा स्टोन पॉलिशिंग।
  • कृषि एवं फसलें: सोयाबीन (कोटा राजस्थान का सोयाबीन हब है), धनिया (रामगंज मंडी एशिया की सबसे बड़ी धनिया मंडी है), और गेहूँ।
  • प्रमुख खनिज संपदा: कोटा स्टोन (सुलभ और टिकाऊ चूना पत्थर - सुकेत, रामगंजमंडी व चेचट की खदानें) और ग्लास सैंड।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

कोटा का जगमंदिर किशोर सागर झील में स्थित है (दुर्जनसाल की रानी द्वारा निर्मित), जबकि उदयपुर का जगमंदिर पिछोला झील में है। कोटा डोरिया का मुख्य उत्पादन केंद्र कोटा का कैथून गाँव है।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
कोटा गढ़ पैलेस नदीय दुर्ग 1625 ई., राव माधोसिंह चंबल नदी तट, राव माधोसिंह संग्रहालय, हाड़ौती शिकार चित्रकला
जगमंदिर कोटा जलमहल 1743-1745 ई., ब्रज कंवर किशोर सागर झील के मध्य लाल पत्थर का जलमहल, उदयपुर से भिन्न
सेवन वंडर्स पार्क थीम पार्क आधुनिक, किशोर सागर विश्व के 7 अजूबों की प्रतिकृतियाँ, रात्रि में रोशनी से जगमगाता पार्क
मुकुंदरा हिल्स बाघ अभयारण्य 2013 अधिसूचित (तीसरा रिजर्व) 759 वर्ग किमी, दर्रा अभयारण्य, चंबल घाटी, समृद्ध वन्यजीव
मथुराधीश मंदिर वैष्णव पीठ पाटन पोल, 17वीं सदी हाड़ौती में वल्लभ पुष्टिमार्ग संप्रदाय की प्रथम प्रधान पीठ
चंबल रिवरफ्रंट हेरिटेज रिवरफ्रंट आधुनिक विश्वस्तरीय 22 कलात्मक घाट, विश्व की सबसे बड़ी घंटी, चंबल नदी का सौंदर्य

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29. कोटपूतली-बहरोड़

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

जयपुर और अलवर से पुनर्गठित दिल्ली-जयपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित नवगठित सीमावर्ती जिला। बैराठ के प्रागैतिहासिक बौद्ध अवशेषों और मध्यकालीन राजपूत दुर्गों के लिए प्रसिद्ध। प्रमुख केंद्र: कोटपूतली, बहरोड़, नीमराना, विराटनगर, बानसूर, पावटा।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

नीमराना दुर्ग

1464 ईस्वी में पृथ्वीराज चौहान तृतीय के वंशजों द्वारा स्थापित 14-स्तरीय ऐतिहासिक गिरि दुर्ग महल.

राजा राजदेव द्वारा अरावली पर्वत की ढलानों पर निर्मित; वर्तमान में भारत के प्रमुख हेरिटेज होटलों में से एक, जो अपने बहुस्तरीय प्रांगणों और प्राचीरों के लिए प्रसिद्ध है।

बैराठ (विराटनगर)

मौर्यकालीन गोलाकार बौद्ध चैत्य और अशोक का भाब्रू शिलालेख देने वाली मत्स्य जनपद की प्राचीन राजधानी.

दयाराम साहनी द्वारा बीजक की पहाड़ी पर उत्खनित; महाभारत कालीन पांडवों का अज्ञातवास स्थल; कैप्टन बर्ट ने 1837 ई. में यहाँ से सम्राट अशोक का प्रसिद्ध भाब्रू शिलालेख खोजा था।

नीमराना की बावड़ी

18वीं शताब्दी में ठाकुर टोडरमल द्वारा निर्मित विशाल 9-मंजिला गहरा भूमिगत जल स्थापत्य.

1740 से 1748 ई. के मध्य मरुस्थलीय यात्रियों की सुविधा के लिए निर्मित मेहराबदार गलियारों और कलात्मक झरोखों वाली विशाल बहुमंजिला जल संरचना।

दुर्ग एवं महल

  • नीमराना फोर्ट पैलेस: 1464 ई. में राजा राजदेव द्वारा अरावली की पहाड़ियों पर निर्मित; 14 मंजिला स्थापत्य का उत्कृष्ट उदाहरण।
  • विराटनगर / भीम डूंगरी परकोटा: महाभारत कालीन राजा विराट के प्राचीन प्रहरी स्थल और मंडप।
  • कोटपूतली गढ़: दिल्ली और आमेर के व्यापारिक मार्ग की सुरक्षा के लिए निर्मित ऐतिहासिक प्रशासनिक दुर्ग।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • राधा कृष्णजी मंदिर (विराटनगर): मानसिंह प्रथम के काल में निर्मित 16वीं सदी का ऐतिहासिक मंदिर।
  • मनसा माता मंदिर: बानसूर की पहाड़ी पर स्थित प्रसिद्ध शक्तिपीठ।
  • बुड्ढा पुष्कर (बैराठ): प्राचीन पुरातात्त्विक टीलों के पास स्थित पवित्र जलाशय व तीर्थ।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • बीजक की पहाड़ी: प्राकृतिक गुफाओं और प्राचीन शैलचित्रों वाली प्रसिद्ध पुरातात्त्विक पहाड़ी।
  • भीमलत व साबी नदी बेसिन: मानसूनी जलधारा और प्राकृतिक चट्टानी घाटियों वाला रमणीक क्षेत्र।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • अरावली वन्यजीव गलियारा: सरिस्का को दक्षिणी हरियाणा से जोड़ने वाली वन पट्टियाँ, जहाँ पैंथर, सियार व जंगली खरगोश पाए जाते हैं।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • गोलाकार बौद्ध स्तूप (चैत्य): तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व (मौर्य काल) का भारत का सबसे प्राचीन ज्ञात गोल ईंटों का मंदिर व बौद्ध मठ।
  • अकबरी छतरी (विराटनगर): सम्राट अकबर की अजमेर यात्राओं के दौरान निर्मित ऐतिहासिक मुगल मंडप।
  • मुगल द्वार व सराय: ऐतिहासिक व्यापारिक मार्ग पर स्थित प्राचीन मुसाफिरखाने।

मेले एवं उत्सव

  • विराटनगर मेला: चैत्र शुक्ल में आयोजित होने वाला पारंपरिक लोक सांस्कृतिक व कुश्ती मेला।
  • बाणगंगा मेला: प्राचीन नदी के तटवर्ती क्षेत्र में आयोजित होने वाला वार्षिक पशु व धार्मिक मेला।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: बहरोड़ का प्रसिद्ध मावा (खोया), गर्म मीठी रबड़ी और मावा पेड़े।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: पारंपरिक मिट्टी के बिना पके बर्तन (टेराकोटा), चमड़े की मोजड़ियाँ और पत्थर की जाली नक्काशी।
  • कृषि एवं फसलें: सरसों (प्रमुख तिलहन फसल), बाजरा, गेहूँ और जौ।
  • प्रमुख खनिज संपदा: सीमेंट ग्रेड चूना पत्थर (अल्ट्राटेक सहित बड़े सीमेंट संयंत्रों का आधार), कैल्साइट और संगमरमर।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

बैराठ (विराटनगर) ऐतिहासिक रूप से जयपुर जिले में और नीमराना दुर्ग अलवर जिले में पढ़ा जाता था; वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था में दोनों कोटपूतली-बहरोड़ जिले में स्थित हैं।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
नीमराना दुर्ग गिरि दुर्ग महल 1464 ई., राजा राजदेव 14 मंजिला स्थापत्य, भारत का प्रमुख हेरिटेज होटल
बैराठ स्तूप बौद्ध चैत्य तीसरी सदी ई.पू., सम्राट अशोक भारत का सबसे प्राचीन गोलाकार ईंट मंदिर, भाब्रू शिलालेख
नीमराना की बावड़ी बहुमंजिला बावड़ी 1740-1748 ई., टोडरमल 9 मंजिला गहरी विशाल भूमिगत जल स्थापत्य रचना
अकबरी छतरी मुगल मंडप 16वीं सदी, सम्राट अकबर अकबर के अजमेर प्रवास के दौरान निर्मित कलात्मक छतरी

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30. नागौर

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

सपादलक्ष चौहानों की प्राचीन राजधानी अहिछत्रपुर, मारवाड़ के केंद्र में स्थित। वीर अमर सिंह राठौड़ के पराक्रम, संत परंपराओं और श्रेष्ठ पशुधन के लिए प्रसिद्ध। प्रमुख केंद्र: नागौर, मेड़ता, जायल, लाडनूँ, खींवसर, मूंडवा।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

अहिछत्रगढ़ दुर्ग (नागौर किला)

1154 ईस्वी में सोमेश्वर के सामंत कदम राव द्वारा स्थापित तथा यूनेस्को एशिया-पैसिफिक हेरिटेज पुरस्कार से सम्मानित दुर्ग.

उन्नत मुगल फव्वारा व जल-शीतलन प्रणाली, अमर सिंह राठौड़ की छतरी, शीशमहल व बादल महल से युक्त; 1570 ई. के अकबर के ऐतिहासिक नागौर दरबार का साक्षी।

तारकीन की दरगाह

संन्यासियों के सुल्तान (सुल्तान-उत-तारकीन) ख्वाजा हमीदुद्दीन नागौरी की पवित्र सूफी दरगाह.

राजस्थान में अजमेर शरीफ के बाद दूसरा सबसे बड़ा सूफी तीर्थ; सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक द्वारा 1333 ई. में निर्मित भव्य बुलंद दरवाजे से सुसज्जित।

दधिमती माता मंदिर

गोठ-मांगलोद में स्थित 608 ईस्वी के अभिलेख वाला 7वीं शताब्दी का प्राचीन गुर्जर-प्रतिहार कालीन शक्तिपीठ.

दाधीच ब्राह्मणों की कुलदेवी; महिषासुरमर्दिनी व रामायण दृश्यों की उत्कृष्ट पाषाण नक्काशी; विशाल जिप्सम खनन क्षेत्र के समीप स्थित।

दुर्ग एवं महल

  • अहिछत्रगढ़ दुर्ग: 1154 ई. में निर्मित; 28 फव्वारों वाली उन्नत जल स्थापत्य कला और दोहरी प्राचीर वाला किला।
  • खींवसर दुर्ग: 1523 ई. में राव जोधा के पुत्र राव करमसी द्वारा निर्मित; प्रसिद्ध मरुस्थलीय हेरिटेज दुर्ग।
  • मेड़ता का मालकोट दुर्ग: 1534 ई. में राव मालदेव द्वारा पूर्वी सीमा की सुरक्षा हेतु निर्मित सामरिक किला।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • मीराबाई मंदिर (चारभुजा मंदिर, मेड़ता): 16वीं सदी का पावन मंदिर जहाँ भक्त कवयित्री मीराबाई ने गिरधर गोपाल की भक्ति की।
  • झोरड़ा: बाबा हरिरामदासजी का जन्म व समाधि स्थल, जो सर्पदंश निवारक लोकतीर्थ के रूप में विख्यात है।
  • बड़ा बालाजी (खाटू): प्रसिद्ध हनुमान मंदिर।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • जायल का पठार: मध्य पुरापाषाण काल के एश्यूलियन कुल्हाड़ियों व औजारों के लिए विख्यात क्षेत्र।
  • खारी नदी व मरुस्थलीय गर्त: अंतःप्रवाही नमकीन झीलें व प्राकृतिक जल भराव क्षेत्र।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • रोटू संरक्षण रिजर्व: भारतीय चिंकारा और काले हिरणों के लिए अधिसूचित सुरक्षित प्राकृतिक क्षेत्र।
  • गोगेलाव संरक्षण रिजर्व: मरुस्थलीय वन्यजीवों और मोरों का समुदाय-संरक्षित प्राकृतिक आवास।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • अमर सिंह राठौड़ की छतरी: 16 खंभों वाली पीले पत्थर की कलात्मक छतरी, जो आगरा किले में वीरता दिखाने वाले राठौड़ योद्धा की स्मृति है।
  • लाडनूँ जैन विश्व भारती: जैन दर्शन, अहिंसा शोध और प्राकृत पाण्डुलिपियों का अंतरराष्ट्रीय केंद्र।

मेले एवं उत्सव

  • रामदेव पशु मेला (नागौर): माघ शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा; नागोरी बैलों के व्यापार के लिए भारत का दूसरा सबसे बड़ा पशु मेला।
  • बलदेव राम मिर्धा पशु मेला (मेड़ता): चैत्र शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक आयोजित।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: नागौरी पान मैथी (कस्तूरी मैथी की सुगंधित सूखी पत्तियाँ), बाजरे का खीचड़ा और गट्टे की सब्जी।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: लोहे के हस्तनिर्मित कृषि औजार, लकड़ी के कलात्मक खिलौने और सूती दरियाँ।
  • कृषि एवं फसलें: नागौरी मैथी (पान मैथी), जीरा, इसबगोल, मूँग और मोठ।
  • प्रमुख खनिज संपदा: टंगस्टन (डेगाना - भारत की ऐतिहासिक वोल्फ्रामाइट खदान), जिप्सम (भादवासी व गोठ-मांगलोद) और केमिकल ग्रेड चूना पत्थर (गोटन)।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

परबतसर का वीर तेजाजी पशु मेला और मकराना की संगमरमर खदानें पहले नागौर में पढ़ी जाती थीं; पुनर्गठन के बाद दोनों डीडवाना-कुचामन जिले में हैं। डेगाना की टंगस्टन खदान नागौर में ही स्थित है।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
अहिछत्रगढ़ दुर्ग प्राचीन गिरि/भूमि दुर्ग 1154 ई., कदम राव यूनेस्को पुरस्कार, 28 मुगल फव्वारे, बादल महल व शीशमहल
तारकीन दरगाह सूफी दरगाह 13वीं सदी, हमीदुद्दीन 1333 ई. में तुगलक द्वारा निर्मित बुलंद दरवाजा, संन्यासियों के सुल्तान
दधिमती माता गुर्जर-प्रतिहार मंदिर 608 ई. अभिलेख गोठ-मांगलोद, दाधीच कुलदेवी, रामायण कालीन नक्काशी
मीराबाई मंदिर वैष्णव मंदिर 16वीं सदी, राव दूदा मेड़ता सिटी, भक्त कवयित्री मीराबाई की पावन आराधना स्थली

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31. पाली

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

बांडी नदी के तट पर अरावली के पश्चिमी ढलानों पर बसा गोडवाड़ क्षेत्र का प्रमुख जिला। उत्कृष्ट जैन संगमरमर स्थापत्य, कपड़ा छपाई और प्राकृतिक मेंहदी की खेती के लिए प्रसिद्ध। प्रमुख केंद्र: पाली, सोजत, सुमेरपुर, बाली, सादड़ी, देसूरी, जैतारण।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

रणकपुर जैन मंदिर

1439 ईस्वी में 1,444 अद्वितीय नक्काशीदार खंभों पर निर्मित 15वीं शताब्दी का भव्य चौमुखा संगमरमर जैन मंदिर.

महाराणा कुंभा के काल में पोरवाल श्रेष्ठी धरनक शाह द्वारा निर्मित व वास्तुकार देपा (देपाका) द्वारा रूपायित; प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित; 'स्तंभों का वन' उपनाम।

जवाई बाँध एवं लेपर्ड रिजर्व

1946 से 1957 ईस्वी के मध्य निर्मित पश्चिमी राजस्थान का सबसे बड़ा जलाशय, 'मारवाड़ का अमृत सरोवर'.

जोधपुर महाराजा उम्मेदसिंह द्वारा जवाई नदी पर निर्मित; ग्रेनाइट की पहाड़ियों में रबारी पशुपालकों और भारतीय तेंदुओं के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के लिए विश्वप्रसिद्ध।

ओम बन्ना मंदिर (बुलेट बाबा)

राष्ट्रीय राजमार्ग 62 पर स्थित 350 सीसी रॉयल एनफील्ड मोटरसाइकिल की पूजा वाला अनूठा आधुनिक लोकतीर्थ.

ओम सिंह राठौड़ की स्मृति में स्थापित; राजमार्ग पर सुरक्षित यात्रा और दुर्घटना निवारण के लिए श्रद्धालु यहाँ शीश नवाते हैं।

दुर्ग एवं महल

  • सोजत दुर्ग: राव रणमल द्वारा नानी मगरी पहाड़ी पर निर्मित और राव जोधा द्वारा सुदृढ़ किया गया किला।
  • आउवा का किला: ठाकुर कुशाल सिंह चंपावत का गढ़; 1857 की क्रांति में मारवाड़ का मुख्य केंद्र जहाँ क्रांतिकारियों ने पॉलिटिकल एजेंट मॉक मेसन का सिर धड़ से अलग किया था।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • परशुराम महादेव (सादड़ी): अरावली की प्राकृतिक गुफा में स्थित शिव मंदिर, जिसे 'राजस्थान का अमरनाथ' कहा जाता है।
  • मूंछाला महावीर (घाणेराव): भगवान महावीर की मूंछों वाली दुर्लभ प्रतिमा से युक्त 10वीं सदी का जैन तीर्थ।
  • नाडोल जैन तीर्थ: 960 ई. में लक्ष्मण चौहान द्वारा स्थापित नाडोल शाखा का ऐतिहासिक केंद्र।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • जवाई बाँध ग्रेनाइट परिदृश्य: तेंदुओं की प्राकृतिक गुफाएँ बनाने वाली गुलाबी व धूसर ग्रेनाइट की विशाल चट्टानें।
  • टॉडगढ़-रावली अभयारण्य (पाली क्षेत्र): अरावली पर्वतमाला में धोक व सालर के घने वनों वाली प्राकृतिक घाटी।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • जवाई बाँध लेपर्ड कंजर्वेशन रिजर्व प्रथम व द्वितीय: मानव बस्तियों के निकट विश्व में तेंदुओं के सर्वाधिक घनत्व वाला क्षेत्र।
  • बेरा वेटलैंड: प्रवासी जलपक्षियों और मगरमच्छों की शरणस्थली।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • बांगर राजकीय संग्रहालय (पाली): नाडोल की दुर्लभ मूर्तियाँ और आउवा की 10 सिर व 54 भुजाओं वाली क्रांतिकारी कुलदेवी सुगाली माता की प्रतिमा सुरक्षित।
  • नारलाई हेरिटेज ग्राम: प्राचीन बावड़ियाँ, पहाड़ी पर हाथी की पाषाण प्रतिमा और भित्तिचित्र युक्त हवेलियाँ।

मेले एवं उत्सव

  • परशुराम महादेव मेला: श्रावण शुक्ल सप्तमी व अष्टमी; गुफा तीर्थ तक पहुँचने वाली भव्य पर्वतीय यात्रा।
  • बरकाणा जैन मेला: कार्तिक पूर्णिमा को आयोजित होने वाला वार्षिक उत्सव।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: पाली का मशहूर गुलाब हलवा (मावे का भूरा दानेदार हलवा), तीखा मिर्ची बड़ा और सेव खमनी।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: सोजत की मेंहदी (जीआई टैग; विश्व की सर्वश्रेष्ठ प्राकृतिक मेंहदी का उत्पादक), बंधेज वस्त्र और गोडवाड़ी मोजड़ियाँ।
  • कृषि एवं फसलें: मेंहदी (सोजत भारत की मेंहदी राजधानी है), सरसों, गेहूँ और कपास।
  • प्रमुख खनिज संपदा: वोलास्टोनाइट (खेड़ा-उपरला बेल्ट), कैल्साइट, एस्बेस्टस, मैग्नेसाइट और ग्रेनाइट।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

बदनोर दुर्ग ब्यावर जिले में है, पाली में नहीं। आउवा (पाली) की 10 सिर व 54 हाथ वाली सुगाली माता की प्रतिमा पाली के बांगर संग्रहालय में सुरक्षित है। रणकपुर मंदिर का निर्माण धरनक शाह ने कराया था, जबकि कुंभलगढ़ राजसमंद में है।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
रणकपुर मंदिर जैन चौमुखा मंदिर 1439 ई., धरनक शाह / देपा 1,444 अद्वितीय खंभे, स्तंभों का वन, प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ
जवाई बाँध विशाल बाँध व अभयारण्य 1946-1957 ई., उम्मेदसिंह मारवाड़ का अमृत सरोवर, रबारी पशुपालकों व तेंदुओं का सह-अस्तित्व
ओम बन्ना मंदिर आधुनिक लोकतीर्थ एनएच-62, चोटिला के पास सड़क सुरक्षा और 350 सीसी बुलेट की पूजा के लिए प्रसिद्ध
परशुराम महादेव गुफा शिव मंदिर प्राचीन, सादड़ी पर्वत अरावली की प्राकृतिक गुफा में स्थित, राजस्थान का अमरनाथ

↑ विषयसूची

32. फलौदी

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

जोधपुर से अलग होकर बना मरुस्थलीय जिला, जिसे 'नमक नगरी' कहा जाता है तथा यह भारत के सर्वाधिक गर्म स्थलों में से एक है। मरुस्थलीय व्यापार, लाल-पीले बलुआ पत्थर की वास्तुकला और पक्षी प्रवास का केंद्र। प्रमुख केंद्र: फलौदी, बाप, लोहावट, आऊ, बापिणी, घंटियाली।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

खींचन

प्रत्येक शीतकाल में 20,000 से अधिक प्रवासी कुरजां (डेमोइसेल क्रेन) की मेजबानी करने वाला विश्वविख्यात पक्षी अभयारण्य.

मंगोलिया, साइबेरिया और मध्य एशिया से हजारों किमी उड़कर आते हैं; स्थानीय जैन व विश्नोई ग्रामीणों द्वारा चुग्गा घर में प्रतिदिन दाना खिलाने की अनुकरणीय परंपरा।

कोलू पाबूजी (कोलू मंड)

ऊँटों और गोवंश के रक्षक मारवाड़ के प्रमुख लोकदेवता पाबूजी राठौड़ की पावन जन्मस्थली व मुख्य तीर्थ.

चैत्र अमावस्या को वार्षिक मेले का आयोजन; रावणहत्था वाद्ययंत्र के साथ गाई जाने वाली पाबूजी की फड़ का उद्गम स्थल; पाबूजी पैनोरमा व स्मारक।

बाप बोल्डर बेड

थार मरुस्थल में प्राचीन हिमयुग के हिमनदीय साक्ष्य प्रस्तुत करने वाला विश्वप्रसिद्ध पर्मो-कार्बोनिफेरस भूवैज्ञानिक स्थल.

बाप कस्बे के पास स्थित भूवैज्ञानिक धरोहर जहाँ 28 करोड़ वर्ष पूर्व गोंडवाना हिमनदों द्वारा जमा किए गए चिकने व धारियों वाले पाषाण बोल्डर मिलते हैं।

दुर्ग एवं महल

  • फलौदी दुर्ग: 1488 ई. में हम्मीर सिंह चौहान द्वारा निर्मित व राव सूजा द्वारा सुदृढ़; मुल्तान-बीकानेर कारवां मार्ग पर स्थित सामरिक मरुस्थलीय किला।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • लटियाल माता मंदिर (फलौदी): खेजड़ी के वृक्ष के नीचे विराजित प्रसिद्ध शक्तिपीठ, पुष्करणा ब्राह्मणों की कुलदेवी।
  • बापिणी धाम (मेहाजी मांगलिया): राजस्थान के पंच पीरों में शामिल मेहाजी मांगलिया का पवित्र समाधि स्थल।
  • बाबा रामदेव मंदिर (बाप): रामदेवरा जाने वाले पदयात्रियों का प्रमुख धार्मिक पड़ाव।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • फलौदी साल्ट रन: विशाल लवणीय गर्त जहाँ क्यारियों में खारे पानी से उच्च गुणवत्ता वाले नमक का उत्पादन होता है।
  • बाप रन व लोरड़ियां झील: शीतकाल में जलभराव से युक्त मरुस्थलीय गर्त जो पक्षियों को आकर्षित करते हैं।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • खींचन पक्षी अभयारण्य: कुरजां पक्षियों के लिए विश्वप्रसिद्ध समुदाय-संरक्षित चुग्गा घर।
  • मरुस्थलीय चिंकारा वास: विश्नोई गाँवों के आसपास स्वच्छंद विचरण करते भारतीय मृग।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • फलौदी की नक्काशीदार हवेलियाँ: लालचंद डाढ़ा की हवेली व मोतीलाल अमरचंद कोचर की हवेली, जो पत्थर की महीन जाली व झरोखों के लिए प्रसिद्ध हैं।

मेले एवं उत्सव

  • कोलू पाबूजी मेला: चैत्र अमावस्या; पाबूजी की वीरता व गोसेवा की स्मृति में लगने वाला विशाल लोक मेला।
  • लटियाल माता नवरात्र मेला: चैत्र व आश्विन नवरात्र में आयोजित होने वाला धार्मिक उत्सव।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: फलौदी का तीखा मिर्ची बड़ा, प्याज की कचौड़ी और बाजरे की राब।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: ऊँट के चमड़े से निर्मित पात्र, पीले बलुआ पत्थर की जाली नक्काशी और ऊनी दरियाँ।
  • कृषि एवं फसलें: अनार के उन्नत बगीचे, जीरा, इसबगोल और मोठ।
  • प्रमुख खनिज संपदा: सेंधा/साधारण नमक (फलौदी व बाप के नमक रन से भारी उत्पादन), जिप्सम और बॉल क्ले।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

खींचन (कुरजां की शरणस्थली) और कोलू पाबूजी (पाबूजी की जन्मस्थली) पहले जोधपुर जिले के अंतर्गत पढ़े जाते थे; वर्तमान में दोनों आधिकारिक तौर पर फलौदी जिले में स्थित हैं।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
खींचन अभयारण्य प्रवासी पक्षी स्थल प्रतिवर्ष शीतकाल, चुग्गा घर 20,000 से अधिक कुरजां पक्षियों का गाँव में सामुदायिक संरक्षण
कोलू पाबूजी धाम लोकतीर्थ चैत्र अमावस्या मेला लोकदेवता पाबूजी राठौड़ की जन्मस्थली, फड़ वाचन की परंपरा
बाप बोल्डर बेड भूवैज्ञानिक धरोहर पर्मो-कार्बोनिफेरस काल थार मरुस्थल में 28 करोड़ वर्ष पुराने हिमनदीय प्रमाण
फलौदी दुर्ग मरुस्थलीय दुर्ग 1488 ई., हम्मीर सिंह मुल्तान-बीकानेर व्यापारिक मार्ग पर स्थित सामरिक किला

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33. प्रतापगढ़

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित दक्षिणी जिला, जिसे माही नदी के तटवर्ती क्षेत्र होने के कारण ऐतिहासिक रूप से 'कांठल' कहा जाता है। 1699 ई. में महारावत प्रताप सिंह द्वारा स्थापित। प्रमुख केंद्र: प्रतापगढ़, अरनोद, धरियावद, छोटी सादड़ी, पीपलखूंट।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

थेवा कला

रंगीन बेल्जियम कांच पर 23 कैरेट शुद्ध सोने की अत्यंत सूक्ष्म नक्काशी करने वाली 18वीं सदी की विश्वप्रसिद्ध हस्तकला.

महारावत प्रताप सिंह के काल में 1707 ई. में नाथूजी सोनी द्वारा आविष्कृत; जीआई टैग से सुरक्षित; प्रतापगढ़ के राजसोनी परिवार द्वारा गुप्त रखी गई अद्वितीय कला जिसे कई पद्मश्री प्राप्त हैं।

सीता माता अभयारण्य

423 वर्ग किमी में फैला जैवविविधता संपन्न अभयारण्य, जो उड़न गिलहरी का एकमात्र प्रमुख प्राकृतिक आवास है.

1979 में अरावली, विंध्याचल और मालवा पठार के संगम पर स्थापित; चौसिंगा (एंटीलोप), पैंथर और दुर्लभ जड़ी-बूटियों का घर; जाखम व करमोई नदियों का उद्गम; महर्षि वाल्मीकि आश्रम की पौराणिक भूमि।

जाखम बाँध

अनूपपुरा में जाखम नदी पर 81 मीटर की ऊँचाई के साथ बना राजस्थान का सबसे ऊँचा चिनाई बाँध.

जनजातीय उप-योजना के तहत 1986 में पूर्ण; दक्षिणी राजस्थान के जनजातीय अंचल को सिंचाई व पेयजल उपलब्ध कराने वाला जीवनदाता बाँध; सागवान वनों से घिरा।

दुर्ग एवं महल

  • प्रतापगढ़ गढ़ परिसर: 1699 ई. में महारावत प्रताप सिंह द्वारा निर्मित; पारंपरिक राजपूत प्रांगणों व सभा कक्षों से युक्त।
  • देवगढ़ किला: देवगढ़ तहसील में स्थित प्राचीन बुर्जों वाला पहाड़ी किला।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • गौतमेश्वर महादेव (अरनोद): 'आदिवासियों का हरिद्वार' कहलाने वाला तीर्थ; मंदाकिनी कुंड में स्नान करने पर 'पाप मुक्ति प्रमाण पत्र' जारी करने की अनूठी परंपरा।
  • दीपेश्वर महादेव: प्रतापगढ़ शहर में झील के मध्य स्थित प्राचीन टापू शिवालय।
  • भंवर माता (छोटी सादड़ी): प्राकृतिक जलप्रपात और देवी भवानी का प्रसिद्ध शक्तिपीठ।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • जाखम नदी घाटी: सागवान के सघन वनों के मध्य जाखम नदी द्वारा निर्मित प्राकृतिक चट्टानी गॉर्ज।
  • करमोई जलप्रपात: सीता माता अभयारण्य के भीतर घने जंगलों में बहने वाला सदानीरा झरना।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • सीता माता अभयारण्य: महुआ के पेड़ों पर रहने वाली उड़न गिलहरी (पिटौरिस्टा) और चार सींग वाले चौसिंगा (बेडल) के लिए संरक्षित।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • कांठल की शाही छतरियाँ: प्रतापगढ़ के महारावतों की संगमरमर और बलुआ पत्थर की कलात्मक छतरियाँ।
  • भील-मीणा जनजातीय धरोहर: पारंपरिक तीर-कमान निर्माण, पिथोरा भित्ति अंकन और लोकगीत।

मेले एवं उत्सव

  • गौतमेश्वर मेला (अरनोद): वैशाख पूर्णिमा; आदिवासियों का विशाल पावन स्नान व पारंपरिक सामाजिक समागम।
  • सीता माता मेला: ज्येष्ठ अमावस्या; घने वन अभयारण्य में आयोजित होने वाला विशाल धार्मिक मेला।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: कांठल का मक्के का ढोकला, मालवी दाल-बाटी और आँवला मुरब्बा।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: थेवा कला (जीआई टैग; रंगीन कांच पर सोने की मीनाकारी का विश्व प्रसिद्ध शिल्प), बाँस के तीर-कमान और मनकों के हार।
  • कृषि एवं फसलें: अफीम (पोस्त - प्रतापगढ़ राजस्थान का प्रमुख वैधानिक अफीम उत्पादक जिला है), सोयाबीन, मक्का और लहसुन।
  • प्रमुख खनिज संपदा: चूना पत्थर, गेरू (लाल मिट्टी), सोपस्टोन और रॉक फॉस्फेट।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

अरनोद (प्रतापगढ़) का गौतमेश्वर महादेव 'पाप मुक्ति प्रमाण पत्र' देता है और आदिवासियों का हरिद्वार कहलाता है; जबकि पोसालिया के निकट का गौतमेश्वर सिरोही जिले में है। थेवा कला केवल प्रतापगढ़ के राजसोनी घराने से संबंधित है।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
थेवा कला स्वर्ण-कांच आभूषण कला 1707 ई., नाथूजी सोनी जीआई टैग, रंगीन बेल्जियम कांच पर 23 कैरेट सोने की बारीक नक्काशी
सीता माता अभयारण्य वन्यजीव अभयारण्य 1979 में स्थापित उड़न गिलहरी व चौसिंगा का प्राकृतिक घर, जाखम नदी का उद्गम
जाखम बाँध चिनाई बाँध 1986 में पूर्ण, 81 मी. ऊँचा राजस्थान का सबसे ऊँचा बाँध, जनजातीय क्षेत्र का जीवनदाता
गौतमेश्वर अरनोद शैव तीर्थ मंदाकिनी कुंड आदिवासियों का हरिद्वार, पाप मुक्ति प्रमाण पत्र हेतु विख्यात

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34. राजसमंद

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

1991 में गठित ऐतिहासिक जिला, जिसका नामकरण महाराणा राजसिंह द्वारा निर्मित भव्य राजसमंद झील के नाम पर हुआ। कुंभलगढ़ के शौर्य, नाथद्वारा की पुष्टिमार्गीय भक्ति और देश के सबसे बड़े सफेद संगमरमर उद्योग के लिए विख्यात। प्रमुख केंद्र: राजसमंद (कांकरोली), नाथद्वारा, कुंभलगढ़, आमेड, देवगढ़, रेलमगरा, भीम।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

कुंभलगढ़ दुर्ग

1448-1458 ईस्वी में महाराणा कुंभा द्वारा निर्मित यूनेस्को विश्व धरोहर गिरि दुर्ग, जिसकी 36 किमी लंबी सुरक्षा दीवार है.

प्रधान वास्तुकार मंडन द्वारा रूपायित; चीन की दीवार के बाद विश्व की दूसरी सबसे लंबी दीवार (36 किमी); महाराणा प्रताप की जन्मस्थली; अंतःदुर्ग कटारगढ़ ('मेवाड़ की आँख'), बादल महल व 360 मंदिर स्थित।

श्रीनाथजी मंदिर (नाथद्वारा)

1672 ईस्वी में महाराणा राजसिंह द्वारा प्रतिष्ठित पुष्टिमार्गीय वल्लभ संप्रदाय का सर्वोच्च विश्वप्रसिद्ध तीर्थ.

गोवर्धन मथुरा से औरंगजेब के भय से लाई गई 7 वर्षीय बालकृष्ण की श्यामवर्ण प्रतिमा; पिछवाई चित्रकला, हवेली संगीत और छप्पन भोग/अन्नकूट उत्सव की विश्वप्रसिद्ध पीठ।

राजसमंद झील

1662 से 1676 ईस्वी के मध्य महाराणा राजसिंह द्वारा गोमती नदी पर अकाल राहत हेतु निर्मित ऐतिहासिक झील.

नौ सीढ़ियों वाली संगमरमर की 'नौचौकी पाल' के लिए विख्यात; रणछोड़ भट्ट तैलंग द्वारा 25 काले पाषाण पट्टों पर संस्कृत में उत्कीर्ण 'राजप्रशस्ति' विश्व का सबसे बड़ा शिलालेख है।

दुर्ग एवं महल

  • कुंभलगढ़ दुर्ग: 2013 में यूनेस्को विश्व धरोहर घोषित; 36 किमी लंबी दीवार वाला मेवाड़ का अपराजेय सुरक्षा दुर्ग।
  • कटारगढ़: कुंभलगढ़ का अंतःदुर्ग जहाँ महाराणा कुंभा का निवास था; इसे 'मेवाड़ की आँख' कहा जाता है।
  • सरदारगढ़ दुर्ग: 18वीं सदी में सरदार सिंह द्वारा निर्मित विशाल ठिकाना दुर्ग।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • श्रीनाथजी (नाथद्वारा): बनास नदी तट पर स्थित पुष्टिमार्ग की प्रधान पीठ।
  • द्वारकाधीश मंदिर (कांकरोली): राजसमंद झील की पाल पर स्थित वल्लभ संप्रदाय की तृतीय पीठ।
  • चारभुजा जी (गढ़बोर): देसूरी नाल के मुहाने पर 1444 ई. में स्थापित भगवान विष्णु/कृष्ण का प्रसिद्ध तीर्थ।
  • रक्त तलाई (हल्दीघाटी): 18 जून 1576 को हुए ऐतिहासिक युद्ध की पावन भूमि व चेतक स्मारक।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • हल्दीघाटी दर्रा: खमनोर व बलीचा के मध्य हल्दी जैसी पीली मिट्टी वाला ऐतिहासिक संकरा पर्वतीय दर्रा।
  • राजसमंद झील व गोमती बाँध: सफेद संगमरमर की नौचौकी पाल और कलात्मक तोरण द्वारों से सुशोभित झील।
  • कुंभलगढ़ वन्य क्षेत्र: अरावली की सघन पर्वत शृंखलाएँ।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • कुंभलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य: 610 वर्ग किमी में विस्तृत; भारतीय भेडियों की प्रमुख प्राकृतिक प्रजनन स्थली; पैंथर व रीछ का आवास।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • मोलेला टेराकोटा (जीआई टैग): बनास नदी तट पर कुम्हार कलाकारों द्वारा गढ़ी जाने वाली लोकदेवताओं (देवनारायण, धर्मराज) की विश्वप्रसिद्ध मृणमूर्तियाँ।
  • नाथद्वारा पिछवाई चित्रकला (जीआई टैग): भगवान श्रीनाथजी के पीछे कपड़े पर बनाई जाने वाली सूक्ष्म धार्मिक चित्रकला।
  • राजप्रशस्ति महाकाव्य: नौचौकी पाल पर 25 काले पाषाण फलकों पर उत्कीर्ण संस्कृत का सबसे बड़ा अभिलेख।

मेले एवं उत्सव

  • अन्नकूट मेला (नाथद्वारा): कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा; भील समुदाय द्वारा प्रसाद लूटने ('चावलों की लूट') की ऐतिहासिक परंपरा।
  • जलझूलनी ग्यारस (चारभुजा मेला): भाद्रपद शुक्ल एकादशी; भगवान की भव्य रेवाड़ी (विमान) यात्रा।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: नाथद्वारा की प्रसिद्ध ठंडाई, पुदीना छाछ/रबड़ी और कांकरोली के पेड़े।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: मोलेला टेराकोटा (जीआई टैग), नाथद्वारा की पिछवाई कला (जीआई टैग) और चाँदी की मीनाकारी।
  • कृषि एवं फसलें: चेती/दमिश्क गुलाब (खमनोर में व्यावसायिक खेती, गुलाब जल व गुलकंद), मक्का और गेहूँ।
  • प्रमुख खनिज संपदा: सफेद संगमरमर (राजनगर-केलवा बेल्ट एशिया का सबसे बड़ा मार्बल प्रोसेसिंग हब), पन्ना (कालागुमान की हरी अग्नि पेटी) और ग्रेनाइट।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

कुंभलगढ़ दुर्ग राजसमंद जिले में स्थित है, उदयपुर में नहीं। राजप्रशस्ति के रचयिता रणछोड़ भट्ट तैलंग थे (25 काले पाषाण पट्ट)। चेती (दमिश्क) गुलाब की खेती राजसमंद के खमनोर में होती है, जबकि पुष्कर (अजमेर) भी गुलाब के लिए प्रसिद्ध है।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
कुंभलगढ़ दुर्ग यूनेस्को विश्व धरोहर दुर्ग 1448-1458 ई., राणा कुंभा 36 किमी लंबी दीवार, वास्तुकार मंडन, कटारगढ़ अंतःदुर्ग
श्रीनाथजी मंदिर पुष्टिमार्ग तीर्थ 1672 ई., राजसिंह नाथद्वारा, बालकृष्ण प्रतिमा, पिछवाई चित्रकला, हवेली संगीत
राजसमंद झील अकाल राहत झील 1662-1676 ई., राजसिंह नौचौकी पाल, 25 काले पाषाणों पर उत्कीर्ण संस्कृत राजप्रशस्ति
मोलेला गाँव टेराकोटा शिल्प केंद्र पारंपरिक कुम्हार कलाकार जीआई टैग प्राप्त देवनारायणजी की मिट्टी की धार्मिक मूर्तियाँ/फलक

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35. सलूंबर

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

उदयपुर से पुनर्गठित नवसृजित जिला, जो मेवाड़ के प्रथम श्रेणी ठिकाने सलूंबर के चूंडावतों (रावत चूंडा के वंशज) की ऐतिहासिक भूमि है। विशाल जयसमंद झील और हाड़ी रानी के अमर बलिदान के लिए विख्यात। प्रमुख केंद्र: सलूंबर, सराड़ा, सेमारी, लसाड़िया, चावंड सीमा।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

जयसमंद / ढेबर झील

1685 से 1691 ईस्वी में महाराणा जयसिंह द्वारा गोमती नदी पर निर्मित भारत की सबसे बड़ी ऐतिहासिक कृत्रिम मीठे पानी की झील.

लगभग 87 वर्ग किमी में फैली झील जिसमें 7 प्राकृतिक द्वीप हैं (सबसे बड़ा 'बाबा का मगरा/भाखड़ा', सबसे छोटी 'प्यारी'); 6 कलात्मक संगमरमर की छतरियाँ और रूठी रानी का महल (हवामहल) स्थित।

सलूंबर दुर्ग

हाड़ी रानी के सर्वोच्च बलिदान से अमर हुआ मेवाड़ के प्रथम श्रेणी ठिकानेदार चूंडावतों का ऐतिहासिक दुर्ग.

रावत रतन सिंह चूंडावत की गद्दी; जहाँ रानी सहल कंवर (हाड़ी रानी) ने नवविवाहित पति को मोहमुक्त करने हेतु अपना शीश काटकर 'सेनाणी' के रूप में भेंट कर दिया था।

ईडाणा माता मंदिर

स्वतः प्रस्फुटित होने वाले 'अग्नि स्नान' के लिए प्रसिद्ध चमत्कारी प्राचीन शक्तिपीठ.

खुले प्रांगण में विराजित देवी की प्रतिमा के आसपास स्वतः भीषण अग्नि धधक उठती है, जिससे भक्तों द्वारा चढ़ाई गई चुनरियाँ व आभूषण भस्म हो जाते हैं किंतु पाषाण प्रतिमा सुरक्षित रहती है।

दुर्ग एवं महल

  • सलूंबर दुर्ग महल: नगर की झील के किनारे स्थित ऊँची प्राचीरों वाला मध्यकालीन किला, रावत सरदारों की ऐतिहासिक गद्दी।
  • रूठी रानी का महल (हवामहल): जयसमंद झील के दक्षिणी कटक पर महाराणा जयसिंह द्वारा अपनी रानी कोमलदे हेतु निर्मित पहाड़ी महल।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • ईडाणा माता मंदिर: स्वतः अग्नि स्नान और लकवा निवारण आस्था हेतु प्रसिद्ध तीर्थ।
  • शीतला माता मंदिर: सलूंबर नगर का प्राचीन शक्तिपीठ।
  • गुप्तेश्वर महादेव: प्राकृतिक चट्टानी गुफा शिवालय।
  • सराड़ा के प्राचीन जैन मंदिर: 11वीं सदी के कलात्मक संगमरमर जिनालय।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • जयसमंद झील विस्तार: गोमती, रूपारेल व भागर नदियों के जल से पोषित भारत का विशाल मीठे पानी का जलाशय।
  • लसाड़िया का पठार: जयसमंद के पूर्व में स्थित अत्यधिक कटा-फटा व बीहड़ पथरीला पठारी भूभाग।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • जयसमंद वन्यजीव अभयारण्य: 1957 में स्थापित; 52 वर्ग किमी में विस्तृत झील तटीय अभयारण्य; पैंथर, जलपक्षियों व मगरमच्छों का वास।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • हाड़ी रानी स्मारक व बावड़ी: अमर क्षत्राणी रानी सहल कंवर की स्मृति में निर्मित स्मारक।
  • चूंडावत शस्त्रागार व धरोहर: मेवाड़ की हरावल (अग्रिम पंक्ति) का नेतृत्व करने वाले वीर सरदारों के ऐतिहासिक अवशेष।

मेले एवं उत्सव

  • ईडाणा माता नवरात्र मेला: चैत्र व आश्विन नवरात्र में भारी जनसैलाब।
  • जयसमंद झील महोत्सव: नौकायन व आदिवासी सांस्कृतिक लोकनृत्य का वार्षिक आयोजन।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: सलूंबर की मक्का राब, जयसमंद झील की भुनी हुई ताजा मछली और पारंपरिक दाल-बाटी।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: बाँस की टोकरियाँ व जनजातीय तीर-कमान, पाषाण तराशी और सूती खेस/चादरें।
  • कृषि एवं फसलें: मक्का (प्रमुख खरीफ खाद्यान्न), सोयाबीन, गेहूँ और चना।
  • प्रमुख खनिज संपदा: सोपस्टोन (सेलखड़ी), डोलोमाइट, क्वार्ट्ज और हरा संगमरमर।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

जयसमंद झील (ढेबर झील) पहले उदयपुर जिले में पढ़ी जाती थी; वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था में यह पूर्णतः सलूंबर जिले में स्थित है। इसका सबसे बड़ा द्वीप 'बाबा का मगरा' और सबसे छोटा 'प्यारी' है।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
जयसमंद झील कृत्रिम मीठे पानी की झील 1685-1691 ई., जयसिंह क्षेत्रफल 87 वर्ग किमी, 7 द्वीप (बाबा का मगरा व प्यारी), रूठी रानी महल
सलूंबर दुर्ग ठिकाना दुर्ग ऐतिहासिक चूंडावत गद्दी रावत रतन सिंह की पीठ, हाड़ी रानी के अमर 'शीश दान' से जुड़ा स्थल
ईडाणा माता शक्तिपीठ प्राचीन, बंबोरा के पास मूर्ति के स्वतः प्रज्वलित होने वाले चमत्कारी 'अग्नि स्नान' हेतु प्रसिद्ध
जयसमंद अभयारण्य झील अभयारण्य 1957 अधिसूचित गोमती जलाशय किनारे जलपक्षी, मगरमच्छ और पैंथर का आवास

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36. सवाई माधोपुर

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

जयपुर महाराजा सवाई माधोसिंह प्रथम द्वारा 19 जनवरी 1763 को स्थापित पूर्वी जिला। अरावली और विंध्याचल पर्वतमालाओं के संगम पर स्थित राजस्थान की 'बाघ राजधानी'। प्रमुख केंद्र: सवाई माधोपुर, खंडार, बामनवास, चौथ का बरवाड़ा, बौंली।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

रणथंभौर दुर्ग

944 ईस्वी में थंभोर पहाड़ी पर स्थापित यूनेस्को विश्व धरोहर वन-गिरि दुर्ग, जिसे अबुल फजल ने 'बख्तरबंद' कहा.

चौहान शासक रणथनभन देव द्वारा निर्मित; 1301 ई. में अलाउद्दीन खिलजी के विरुद्ध हम्मीर देव चौहान के नेतृत्व में पहला साका व रानी रंगदेवी का जल जौहर; 32 खंभों की छतरी व सुपारी महल स्थित।

त्रिनेत्र गणेश मंदिर

रणथंभौर दुर्ग के शीर्ष पर स्थित 13वीं सदी का प्रसिद्ध मंदिर जहाँ भगवान गणेश की तीन नेत्रों वाली दुर्लभ प्रतिमा स्थापित है.

देशभर से भक्तों द्वारा डाक द्वारा प्रथम वैवाहिक निमंत्रण पत्र पाने वाले भारत के प्रधान देव; भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को विशाल लक्खी मेला।

रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान

1,334 वर्ग किमी में फैला विश्वप्रसिद्ध प्रोजेक्ट टाइगर रिजर्व, जो दिन में रॉयल बंगाल टाइगर के दीदार के लिए प्रसिद्ध है.

1955 में अभयारण्य, 1973 में टाइगर प्रोजेक्ट और 1980 में राष्ट्रीय उद्यान घोषित; पद्म तालाब, राजबाग झील और विश्वविख्यात बाघिन 'मछली' (टी-16) की क्रीड़ास्थली।

दुर्ग एवं महल

  • रणथंभौर दुर्ग: 2013 में यूनेस्को विश्व धरोहर घोषित; हम्मीर देव चौहान की आन-बान का प्रतीक।
  • खंडार दुर्ग: रणथंभौर का पृष्ठरक्षक अजेय दुर्ग; ऐतिहासिक 'धूंधार तोप' और प्राचीन जैन शैल प्रतिमाओं के लिए प्रसिद्ध।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • चौथ माता मंदिर (चौथ का बरवाड़ा): ऊँची पहाड़ी पर स्थित चौथ माता का प्रधान शक्तिपीठ; माघ कृष्ण चतुर्थी को विशाल मेला।
  • अमलेश्वर महादेव: अरावली की गहरी घाटी में स्थित प्राकृतिक जलप्रपात व गुफा शिवालय।
  • घुश्मेश्वर महादेव (शिवाड़): भगवान शिव के द्वादश (12वें) ज्योतिर्लिंग के रूप में विख्यात पावन धाम।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • पद्म तालाब व मलिक तालाब: जोगी महल के सामने स्थित कमल के फूलों से आच्छादित प्राकृतिक वन झीलें।
  • रामेश्वरम घाट: चंबल, बनास और सीप नदियों का पवित्र त्रिवेणी संगम स्थल।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • रणथंभौर टाइगर रिजर्व: रॉयल बंगाल टाइगर, मगरमच्छ, तेंदुए और दुर्लभ कैराकल (स्याहगोश) का प्राकृतिक पर्यावास।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • 32 खंभों की छतरी: हम्मीर देव द्वारा पिता जैत्रसिंह के 32 वर्षों के शासन की स्मृति में निर्मित लाल पत्थर की भव्य छतरी।
  • जोगी महल: पद्म तालाब के किनारे स्थित ऐतिहासिक वन विश्राम गृह।
  • सुपारी महल: हिंदू मंदिर, मस्जिद और गिरजाघर की स्थापत्य शैलियों का अनूठा समन्वय।

मेले एवं उत्सव

  • त्रिनेत्र गणेश मेला: भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी; लाखों श्रद्धालु दुर्ग के प्राचीर पर दर्शन हेतु पहुँचते हैं।
  • चौथ माता मेला: माघ कृष्ण चतुर्थी पर चौथ का बरवाड़ा में आयोजित लक्खी मेला।
  • महाशिवरात्रि मेला (शिवाड़): फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी को घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग पर।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: सवाई माधोपुर के प्रसिद्ध अमरूद (गुलाबी गूदे वाले मीठे अमरूद), खस का शरबत और मलाई घेवर।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: खस का इत्र (जंगली खस की जड़ों से खींचा जाने वाला प्राकृतिक इत्र), लकड़ी के तराशे गए बाघ व मिट्टी के खिलौने।
  • कृषि एवं फसलें: अमरूद (सवाई माधोपुर राजस्थान का अमरूद जिला है), सरसों, गेहूँ और बाजरा।
  • प्रमुख खनिज संपदा: सीसा-जस्ता (चौथ का बरवाड़ा की प्राचीन खदानें), सिलिका सैंड, मिट्टी और चूना पत्थर।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

शिवाड़ के घुश्मेश्वर महादेव (12वें ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजित) सवाई माधोपुर जिले में स्थित हैं। अबुल फजल ने रणथंभौर के लिए कहा था—'अन्य सब दुर्ग नंगे हैं, परंतु यह दुर्ग बख्तरबंद है'।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
रणथंभौर दुर्ग यूनेस्को विश्व धरोहर दुर्ग 944 ई., रणथनभन देव बख्तरबंद दुर्ग, 1301 ई. का साका व जौहर, 32 खंभों की छतरी
त्रिनेत्र गणेश शैल शिखर मंदिर 13वीं सदी, दुर्ग शीर्ष तीन नेत्रों वाले गणेश, डाक से पहला निमंत्रण, भाद्रपद मेला
रणथंभौर नेशनल पार्क टाइगर रिजर्व 1980 (उद्यान घोषित) दिन में बाघ दर्शन, मछली बाघिन, पद्म तालाब, जोगी महल
चौथ का बरवाड़ा शक्ति तीर्थ पहाड़ी पर स्थित चौथ माता मंदिर, आदिवासियों की कुलदेवी, माघ चतुर्थी मेला

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37. सीकर

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

1687 ई. में राव दौलत सिंह द्वारा स्थापित शेखावाटी का सबसे बड़ा ठिकाना। उत्तरी राजस्थान की 'शिक्षा नगरी', वीर सैनिकों की भूमि और भित्तिचित्र युक्त हवेलियों का केंद्र। प्रमुख केंद्र: सीकर, लक्ष्मणगढ़, फतेहपुर, खंडेला, दांतारामगढ़, रींगस, श्रीमाधोपुर।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

खाटू श्यामजी

शीश के दानी व कलयुग के अवतारी के रूप में पूजित बर्बरीक को समर्पित विश्वविख्यात तीर्थ.

महाभारत युद्ध से पूर्व भीम के पौत्र बर्बरीक ने श्रीकृष्ण को शीश दान दिया था; 1720 ई. में दीवान अभयसिंह द्वारा पुनर्निर्मित; श्याम कुंड, निशान यात्रा और फाल्गुन लक्खी मेला।

जीण माता मंदिर

अरावली की काजल शिखर घाटी में स्थित 8वीं शताब्दी का प्राचीन गुर्जर-प्रतिहार कालीन शक्तिपीठ.

हर्षनाथ की बहन जीण भवानी का मंदिर; जब औरंगजेब की सेना ने आक्रमण किया तो भौंरों (मधुमक्खियों) ने रक्षा की, जिसके बाद मुगलों द्वारा अखंड ज्योति हेतु तेल भेजा जाता था; नवरात्र मेला।

हर्षनाथ मंदिर

975 मीटर ऊँचे हर्ष पर्वत पर 973 ईस्वी में निर्मित प्राचीन 10वीं शताब्दी का महादेवालय.

विग्रहराज द्वितीय के काल में शैव आचार्य भावरक्त अल्लट द्वारा निर्मित; शाकंभरी के प्रारंभिक चौहानों की वंशावली बताने वाला प्रसिद्ध 973 ई. का हर्ष अभिलेख यहीं से प्राप्त हुआ।

दुर्ग एवं महल

  • लक्ष्मणगढ़ दुर्ग: 1805 ई. में राव राजा लक्ष्मण सिंह द्वारा एक विशाल एकाश्म चट्टान पर निर्मित; जयपुर के नक्शे पर आधारित नगर रचना।
  • फतेहपुर दुर्ग: 1453 ई. में फतेह खाँ कायमखानी द्वारा निर्मित ऐतिहासिक किला।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • खाटू श्यामजी: बर्बरीक का पावन शीश मंदिर व श्याम कुंड।
  • जीण माता: रेवासा की घाटी में स्थित लोकदेवी का पीठ।
  • हर्षनाथ मंदिर: हर्ष पहाड़ी पर स्थित शिव मंदिर।
  • शाकंभरी माता (सकराई): अरावली पर्वत शृंखला में चौहानों की कुलदेवी का प्राचीन मंदिर।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • हर्ष पर्वत (975 मी.): शेखावाटी के मैदानों का विहंगम दृश्य प्रस्तुत करने वाला पवन ऊर्जा संयंत्रों से युक्त शिखर।
  • रेवासा नमक झील: प्राचीन लवणीय झील जहाँ पारंपरिक नमक तैयार होता है।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • हर्ष संरक्षित क्षेत्र: जरख, भेड़िया, मरुस्थलीय लोमड़ी और नीलगाय का प्राकृतिक आवास।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • फतेहपुर व लक्ष्मणगढ़ के भित्तिचित्र: सिंघानिया, गोयनका और नादिन ले प्रिंस हवेलियों में उकेरे गए विश्वप्रसिद्ध भित्तिचित्र।
  • चार चौक की हवेली (लक्ष्मणगढ़): चार विशाल आंगनों वाली भव्य शेखावाटी हवेली।
  • फतेहपुर की बावड़ियाँ: कलात्मक मेहराबों से सुसज्जित प्राचीन जल संरचनाएँ।

मेले एवं उत्सव

  • खाटू श्यामजी फाल्गुन लक्खी मेला: फाल्गुन शुक्ल दशमी से द्वादशी; लाखों पदयात्री हाथों में निशान ध्वज लेकर पहुँचते हैं।
  • जीण माता मेला: चैत्र व आश्विन नवरात्र में आयोजित विशाल मेला।
  • हर्षनाथ मेला: महाशिवरात्रि के अवसर पर पर्वत शिखर पर।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: सीकर की प्रसिद्ध प्याज की कचौड़ी, बाजरे की रोटी संग ताजा मक्खन व गुड़, और मावा पेड़ा।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: खंडेला का गोटा-किनारी व पट्टा शिल्प (लप्पा, लप्पी, किरण, बांकड़ी), बंधेज/चूंदड़ी और शेखावाटी का नक्काशीदार लकड़ी का फर्नीचर।
  • कृषि एवं फसलें: प्याज (सीकर राजस्थान का 'प्याज का कटोरा' है), सरसों, बाजरा और मैथी।
  • प्रमुख खनिज संपदा: पायराइट (सलादीपुरा - गंधक का तेजाब बनाने हेतु पायराइट्स का विशाल भंडार), कैल्साइट, चूना पत्थर और ताँबा (बालेश्वर)।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

हर्षनाथ मंदिर सीकर के हर्ष पर्वत पर है, जबकि हर्षत माता का मंदिर आभानेरी (दौसा जिले) में है। सीकर का सलादीपुरा पायराइट खनिज भंडार के लिए प्रसिद्ध है।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
खाटू श्यामजी बर्बरीक तीर्थ 1720 ई. जीर्णोद्धार शीश के दानी, श्याम कुंड, फाल्गुन का विश्वप्रसिद्ध लक्खी मेला
जीण माता मंदिर शक्तिपीठ 8वीं सदी, काजल शिखर हर्षनाथ की बहन, भौंरों का चमत्कार, मुगलों की अखंड ज्योति
हर्षनाथ मंदिर पर्वतीय शिवालय 973 ई., भावरक्त अल्लट हर्ष पर्वत शिखर (975 मी.), 973 ई. का ऐतिहासिक चौहान शिलालेख
लक्ष्मणगढ़ दुर्ग एकाश्म पहाड़ी दुर्ग 1805 ई., लक्ष्मण सिंह विशाल चट्टान पर निर्मित, जयपुर की तर्ज पर नगर की ग्रिड योजना

↑ विषयसूची

38. सिरोही

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

1425 ई. में राव सहसमल देवड़ा द्वारा सारणवा पहाड़ी की तलहटी में स्थापित दक्षिण-पश्चिमी रियासत, जिसे 'देवनगरी' कहा जाता है। राजस्थान के सर्वोच्च पर्वत शिखर, पर्वतीय पारिस्थितिकी और धारदार सिरोही तलवारों के लिए प्रसिद्ध। प्रमुख केंद्र: सिरोही, माउंट आबू, आबूरोड, पिंडवाड़ा, शिवगंज, रेवदर।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

माउंट आबू एवं गुरु शिखर

1,722 मीटर ऊँचे अरावली के सर्वोच्च शिखर 'गुरु शिखर' से युक्त राजस्थान का एकमात्र पर्वतीय हिल स्टेशन.

प्राचीन 'अर्बुदांचल'; शिखर पर भगवान दत्तात्रेय का तपोस्थल मंदिर; देवताओं के नाखूनों से खुदी मानी जाने वाली पवित्र नक्की झील, टॉड रॉक व सनसेट पॉइंट स्थित।

देलवाड़ा जैन मंदिर

पारदर्शी जालीदार संगमरमर नक्काशी के लिए विश्वविख्यात 11वीं से 13वीं शताब्दी का श्वेत संगमरमर जैन मंदिर समूह.

पाँच मंदिरों का समूह: विमल वसही (1031 ई., विमल शाह द्वारा आदिनाथ को समर्पित), लूण वसही (1230 ई., वास्तुपाल-तेजपाल द्वारा नेमिनाथ को), पित्तलहर (भीमा शाह), पार्श्वनाथ व महावीर स्वामी मंदिर।

अचलगढ़ दुर्ग एवं अचलेश्वर महादेव

1452 ईस्वी में महाराणा कुंभा द्वारा पुनर्निर्मित गिरि दुर्ग जहाँ भगवान शिव के पैर के अँगूठे की पूजा होती है.

प्राचीन परमार दुर्ग पर निर्मित; अचलेश्वर महादेव में शिवलिंग के स्थान पर शिवजी के दाहिने पैर के अँगूठे की पूजा होती है; पंचधातु नंदी व मंदाकिनी कुंड स्थित।

दुर्ग एवं महल

  • अचलगढ़ दुर्ग: 1452 ई. में महाराणा कुंभा द्वारा आबू पर्वत पर सीमा सुरक्षा हेतु पुनर्निर्मित किला।
  • सिरोही राजमहल: देवड़ा चौहानों का पहाड़ी पर स्थित कलात्मक महल।
  • बसंतगढ़ दुर्ग: पिंडवाड़ा के पास स्थित प्राचीन किला जहाँ से 625 ई. (682 वि.सं.) का 'राजस्थानादित्य' शब्द युक्त शिलालेख मिला था।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • देलवाड़ा जैन मंदिर: संगमरमर की सूक्ष्म पच्चीकारी का विश्वप्रसिद्ध तीर्थ।
  • अर्बुदा माता (अधर देवी): 365 सीढ़ियाँ चढ़कर प्राकृतिक गुफा में स्थित शक्तिपीठ।
  • वर्मण का सूर्य मंदिर (ब्रह्म-स्वामिन): 8वीं सदी का प्राचीन सूर्य मंदिर।
  • सारणेश्वर महादेव: देवड़ा शासकों व रबारी समुदाय के आराध्य शिव का परकोटेदार मंदिर।
  • मीरपुर जैन मंदिर: 9वीं सदी का राजस्थान का सबसे प्राचीन संगमरमर मंदिर।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • नक्की झील: 1,200 मीटर की ऊँचाई पर स्थित प्राकृतिक-पौराणिक झील; टॉड रॉक और नन रॉक की चट्टानें।
  • ट्रेवर्स टैंक: मगरमच्छों के प्रजनन और पक्षी दर्शन हेतु प्रसिद्ध पहाड़ी जलाशय।
  • गौमुख आश्रम: महर्षि वशिष्ठ का आश्रम जहाँ पौराणिक मान्यतानुसार अग्निकुंड से राजपूत वंशों की उत्पत्ति हुई।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • माउंट आबू वन्यजीव अभयारण्य: 1960 में अधिसूचित; दुर्लभ ग्रीन मुनिया (पक्षी), भालू और पैंथर का आवास; 'डिक्लिप्टेरा आबुआंसिस' जैसी स्थानीय वनस्पति।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • सिरोही की तलवारें: अपने अद्वितीय संतुलन और अत्यंत धारदार इस्पात के लिए विख्यात पारंपरिक तलवारें।
  • चंद्रावती पुरातात्त्विक स्थल: बनास (पश्चिमी बनास) नदी तट पर परमारों की प्राचीन राजधानी के उत्खनित अवशेष।

मेले एवं उत्सव

  • माउंट आबू ग्रीष्म महोत्सव: बुद्ध पूर्णिमा (मई/जून) पर नक्की झील पर नौका दौड़ व सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ।
  • माउंट आबू शीतकालीन महोत्सव: प्रतिवर्ष दिसंबर में आयोजित पारंपरिक उत्सव।
  • सारणेश्वर महादेव मेला: भाद्रपद शुक्ल एकादशी को आयोजित।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: माउंट आबू की मलाईदार रबड़ी, ताजे गुलाब का गुलकंद और गराडू चाट।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: सिरोही की हस्तनिर्मित फौलादी तलवारें, लकड़ी की नक्काशीदार छड़ियां और बाँस शिल्प।
  • कृषि एवं फसलें: सौंफ (उन्नत उत्पादन), जीरा, अरंडी और सरसों।
  • प्रमुख खनिज संपदा: वोलास्टोनाइट (बेलका पहाड़ व खीला से भारत के कुल उत्पादन का 90% से अधिक), कैल्साइट और ग्रेनाइट।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

गुरु शिखर की वास्तविक भौगोलिक ऊँचाई 1,722 मीटर है (शिखर पर बने दत्तात्रेय मंदिर सहित 1,727 मीटर)। सिरोही के बसंतगढ़ शिलालेख (625 ई.) में सबसे पहले 'राजस्थानादित्य' शब्द का उल्लेख मिलता है।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
माउंट आबू हिल स्टेशन व गुरु शिखर 1,722 मी. शिखर अरावली का सर्वोच्च शिखर, नक्की झील, टॉड रॉक व अर्बुदांचल
देलवाड़ा मंदिर संगमरमर जैन मंदिर 1031 व 1230 ई. विमल वसही व लूण वसही, संगमरमर पर अत्यंत सूक्ष्म पच्चीकारी
अचलगढ़ दुर्ग पर्वतीय दुर्ग 1452 ई., राणा कुंभा कुंभा द्वारा पुनर्निर्मित; अचलेश्वर शिव अँगूठा पीठ व मंदाकिनी कुंड
बसंतगढ़ पुरातात्त्विक स्थल 625 ई. का अभिलेख पिंडवाड़ा, प्राचीन शिलालेख में 'राजस्थानादित्य' शब्द का प्रथम उल्लेख

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39. श्रीगंगानगर

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

राजस्थान का सबसे उत्तरी जिला, जिसे 'राजस्थान का अन्न का कटोरा' और 'धान्यागार' कहा जाता है। महाराजा गंगासिंह द्वारा 26 अक्टूबर 1927 को बसाया गया योजनाबद्ध शहर, जो गंग नहर और इंदिरा गांधी नहर के जाल से हरा-भरा है। प्रमुख केंद्र: श्रीगंगानगर, सूरतगढ़, रायसिंहनगर, पदमपुर, करणपुर, सादुलशहर, अनूपगढ़ क्षेत्र।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

अनूपगढ़ दुर्ग

1678 ईस्वी में बीकानेर महाराजा अनूप सिंह द्वारा घग्घर नदी के किनारे निर्मित ऐतिहासिक सीमावर्ती किला.

पश्चिमी सीमा की सुरक्षा हेतु बीकानेर राज्य द्वारा स्थापित सुदृढ़ दुर्ग; वर्तमान में उत्तरी नहरी क्षेत्र के प्रशासनिक दायरे में शामिल।

गंग नहर

बीकानेर महाराजा गंगासिंह द्वारा निर्मित 129 किमी लंबी ऐतिहासिक नहर, जिसका उद्घाटन 1927 ईस्वी में लॉर्ड इरविन ने किया.

मरुभूमि को लहलहाते खेतों में बदलने वाले 'आधुनिक भागीरथ' गंगासिंह की देन; फिरोजपुर (पंजाब) में हुसैनीवाला हेडवर्क्स से सतलुज नदी का पानी राजस्थान लाती है।

गुरुद्वारा बुड्ढा जोहड़

1740 ईस्वी में भाई सुक्खा सिंह व मेहताब सिंह के शौर्य को समर्पित डाबला गाँव में स्थित ऐतिहासिक सिख तीर्थ.

अमृतसर हरमंदिर साहिब को अपवित्र करने वाले दुष्ट मस्सा रंगड़ का सिर काटकर लाने वाले वीरों का विश्राम स्थल; संत बाबा फतेह सिंह द्वारा स्थापित; श्रावण अमावस्या को विशाल मेला।

दुर्ग एवं महल

  • अनूपगढ़ दुर्ग: 1678 ई. में बीकानेर महाराजा अनूप सिंह द्वारा घग्घर नदी के तट पर निर्मित।
  • हिंदूमालकोट बॉर्डर: बीकानेर के दीवान हिंदूमल के नाम पर स्थापित भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा चौकी।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • गुरुद्वारा बुड्ढा जोहड़ (रायसिंहनगर): 84 मेहराबों वाला राजस्थान का सबसे बड़ा ऐतिहासिक गुरुद्वारा।
  • लैला-मजनूँ की मजार (बिंजौर): अनूपगढ़ के पास अमर प्रेम के प्रतीक लैला-मजनूँ की पावन समाधि; प्रतिवर्ष जून में मेला।
  • डाडा पमाराम का डेरा (पदमपुर): संत डाडा पमाराम की पावन समाधि स्थल।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • घग्घर नदी (नाली क्षेत्र): प्राचीन लुप्त सरस्वती का पाट जो वर्षा ऋतु में प्रवाहित होता है।
  • नहरी नेटवर्क व किन्नू के बाग: पूरे जिले में फैले लहलहाते माल्टा व किन्नू के हरे-भरे बगीचे।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • नहरी कृषि क्षेत्र के काले हिरण व चिंकारा: विश्नोई समुदाय द्वारा खेतों के आसपास संरक्षित वन्यजीव।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • बरोर पुरातात्त्विक स्थल: घग्घर के सूखे पाट पर स्थित प्राक्-हड़प्पा व हड़प्पा कालीन स्थल जहाँ से शंख की चूड़ियाँ, मनके व मिट्टी के बर्तन मिले।
  • सूरतगढ़ सुपर थर्मल पावर स्टेशन: राजस्थान का प्रमुख तापीय विद्युत संयंत्र।

मेले एवं उत्सव

  • बुड्ढा जोहड़ मेला: श्रावण अमावस्या को पवित्र सरोवर में स्नान व गुरु ग्रंथ साहिब के पाठ का विशाल मेला।
  • लैला-मजनूँ मेला (बिंजौर): प्रतिवर्ष जून माह में आयोजित होने वाला अनूठा मेला।
  • डाडा पमाराम मेला (पदमपुर): फाल्गुन माह में आयोजित।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: ताजा किन्नू व माल्टा का रस, सरसों का साग व मक्के की रोटी, पिन्नी और घेवर।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: लकड़ी का फर्नीचर, उन्नत कृषि यंत्र निर्माण उद्योग और कपास ओटाई।
  • कृषि एवं फसलें: किन्नू (श्रीगंगानगर भारत का किन्नू हब है), गेहूँ (राजस्थान में सर्वाधिक उत्पादन), कपास (नरमा) और सरसों।
  • प्रमुख खनिज संपदा: जिप्सम (उर्वरक व प्लास्टर हेतु विशाल भंडार), मुल्तानी मिट्टी और ईंट मिट्टी।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

अनूपगढ़ दुर्ग का निर्माण 1678 ई. में महाराजा अनूप सिंह ने कराया था। यहाँ प्रयुक्त आधिकारिक 41-जिला संदर्भ में अनूपगढ़ क्षेत्र और बुड्ढा जोहड़ को उत्तरी जिला व्यवस्था के अंतर्गत शामिल रखा गया है।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
अनूपगढ़ दुर्ग सीमावर्ती दुर्ग 1678 ई., महाराजा अनूप सिंह घग्घर नदी तट पर बीकानेर सीमा की सुरक्षा हेतु निर्मित सामरिक किला
गंग नहर ऐतिहासिक सिंचाई नहर 1927 ई., गंगासिंह 129 किमी लंबी प्रथम पक्की नहर, मरुस्थल को हरा-भरा करने वाली
बुड्ढा जोहड़ ऐतिहासिक गुरुद्वारा 1954 ई., बाबा फतेह सिंह डाबला गाँव, 1740 ई. में सुक्खा सिंह व मेहताब सिंह के शौर्य का स्मारक
लैला-मजनूँ मजार समाधि स्मारक बिंजौर गाँव अमर प्रेम के प्रतीक लैला-मजनूँ की पावन मजार, जून माह का मेला

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40. टोंक

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

1817 ई. में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की संधि के तहत नवाब अमीर खाँ पिंडारी द्वारा स्थापित राजस्थान की एकमात्र मुस्लिम रियासत, जिसे 'नवाबों की नगरी' कहा जाता है। बनास नदी के उपजाऊ बेसिन में स्थित। प्रमुख केंद्र: टोंक, निवाई, देवली, मालपुरा, टोडारायसिंह, उनियारा, पीपलू।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

सुनहरी कोठी

24 कैरेट शुद्ध सोने के वर्क, पच्चीकारी और बेल्जियम रंगीन कांच से सुसज्जित 19वीं सदी का भव्य महल.

1824-1834 ई. में नवाब वजीरुद्दौला द्वारा प्रारंभ तथा 1870 ई. में नवाब इब्राहिम अली खाँ द्वारा पूर्ण; मूल नाम 'जर-निगार'; सोने की नक्काशी और मीनाकारी का बेजोड़ नमूना।

बीसलपुर बाँध

बनास नदी पर 1985 से 1999 ईस्वी के मध्य निर्मित विशाल गुरुत्व चिनाई बाँध, मध्य राजस्थान की पेयजल जीवनरेखा.

जयपुर, अजमेर, दौसा और टोंक को पेयजल आपूर्ति करने वाला सबसे बड़ा बाँध; चौहान सम्राट विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) द्वारा 12वीं सदी में निर्मित गोकर्णेश्वर महादेव मंदिर स्थित।

रेढ़ (टाटा नगर)

निवाई के पास स्थित विख्यात पुरातात्त्विक स्थल, जिसे 'प्राचीन राजस्थान का टाटा नगर' कहा जाता है.

1938-1940 ई. में के.एन. पुरी द्वारा उत्खनित; यहाँ से 3,075 आहत (पंचमार्क) चांदी के सिक्के, लौह धातु गलाने की भट्ठियाँ व विशाल लौह सामग्री प्राप्त हुई।

दुर्ग एवं महल

  • भूमगढ़ दुर्ग (अमीरगढ़ किला): बनास नदी तट पर 1817 ई. में नवाब अमीर खाँ द्वारा निर्मित सुदृढ़ किला।
  • काकोड़ का किला: मैदानी भाग की निगरानी हेतु निर्मित ऐतिहासिक राजपूत किला।
  • टोडारायसिंह परकोटा: मध्यकालीन नगर परकोटा जो ऐतिहासिक बावड़ियों की सुरक्षा करता था।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • डिग्गी कल्याणजी (मालपुरा): राजा डिग्व द्वारा स्थापित भगवान विष्णु (कल्याणजी) का प्रसिद्ध धाम; प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु जयपुर से लक्खी पदयात्रा लेकर पहुँचते हैं।
  • देवधाम जोधपुरिया (निवाई): माशी व बांडी नदी के संगम पर लोकदेवता भगवान देवनारायण जी का प्रमुख तीर्थ।
  • बीसलपुर गोकर्णेश्वर महादेव: बीसलदेव चौहान द्वारा निर्मित 12वीं सदी का प्राचीन शिवालय।
  • जामा मस्जिद टोंक: नवाब अमीर खाँ द्वारा प्रारंभ कराई गई भारत की विशाल व भव्य मस्जिदों में से एक।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • बीसलपुर जलाशय विस्तार: चारों ओर अरावली पहाड़ियों से घिरा विशाल जलाशय जहाँ प्रवासी पक्षी आते हैं।
  • बनास नदी का पाट: नदी का रेतीला पाट जो राज्य के सबसे मीठे खरबूजों और तरबूजों के लिए प्रसिद्ध है।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • बनास नदी गलियारा: जलपक्षियों, बार-हेडेड गीज (कलहंस) और बीहड़ी झाड़ियों में नीलगाय का वास।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • हाड़ी रानी की बावड़ी (टोडारायसिंह): 12वीं शताब्दी की अत्यंत आकर्षक सीढ़ीदार आयताकार बावड़ी।
  • मौलाना अबुल कलाम आजाद अरबी-फारसी शोध संस्थान (APRI): 1978 में स्थापित; 40 किग्रा वजनी कुरान और दुर्लभ ऐतिहासिक हस्तलिखित पाण्डुलिपियों का अंतरराष्ट्रीय खजाना।
  • नमदा शिल्प: भेड़ों की ऊन को दबाकर गर्म व कलात्मक नमदे/कालीन तैयार करने की सदियों पुरानी कला।

मेले एवं उत्सव

  • डिग्गी कल्याणजी मेला: श्रावण एकादशी को आयोजित होने वाला प्रसिद्ध लक्खी मेला।
  • देवनारायण मेला जोधपुरिया: भाद्रपद शुक्ल षष्ठी पर गुर्जर समाज और लोकभक्तों का भव्य समागम।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: टोंक की नवाबी बिरयानी, मीठा बनारसी पान और सोहन हलवा।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: नमदा हस्तशिल्प (भेड़ के ऊन से बने प्रसिद्ध फेल्ट कालीन - जीआई शिल्प), बीड़ी निर्माण और चमड़े की जूतियाँ।
  • कृषि एवं फसलें: बनास के खरबूजे व तरबूज (नदी के पेटे में होने वाले प्रसिद्ध रसीले फल), सरसों, ज्वार और गेहूँ।
  • प्रमुख खनिज संपदा: गारनेट (तामड़ा / रक्तमणि - राजमहल और गांवड़ी विश्वप्रसिद्ध रत्न भंडार), सिलिका सैंड, बेरिल और अभ्रक।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

डिग्गी कल्याणजी टोंक जिले (मालपुरा तहसील) में स्थित है, जयपुर में नहीं। हाड़ी रानी की बावड़ी टोडारायसिंह (टोंक) में है, जबकि हाड़ी रानी स्मारक सलूंबर में है। तामड़ा (गारनेट) टोंक के राजमहल में पाया जाता है।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
सुनहरी कोठी स्वर्ण मंडप 1824-1870 ई., वजीरुद्दौला जर-निगार, 24 कैरेट सोने की नक्काशी, बेल्जियम रंगीन कांच
बीसलपुर बाँध गुरुत्व चिनाई बाँध 1985-1999 ई., बनास नदी जयपुर-अजमेर की पेयजल जीवनरेखा, 12वीं सदी का गोकर्णेश्वर शिवालय
रेढ़ पुरातात्त्विक स्थल लौह युगीन स्थल 1938-1940 उत्खनित, के.एन. पुरी प्राचीन राजस्थान का टाटा नगर, 3,075 आहत चांदी के सिक्के, लौह भट्ठियाँ
हाड़ी रानी की बावड़ी सीढ़ीदार बावड़ी 12वीं सदी, टोडारायसिंह कलात्मक ज्यामितीय सीढ़ियों वाली भव्य आयताकार प्राचीन बावड़ी

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41. उदयपुर

जिले का परिचय एवं भौगोलिक पहचान

चित्तौड़गढ़ के पतन के बाद 1559 ई. में महाराणा उदयसिंह द्वितीय द्वारा स्थापित मेवाड़ की ऐतिहासिक राजधानी, जिसे 'झीलों की नगरी', 'पूर्व का वेनिस' और 'श्वेत नगरी' कहा जाता है। गिरवा की पहाड़ियों में स्थित। प्रमुख केंद्र: उदयपुर, मावली, वल्लभनगर, गोगुंदा, कोटड़ा, खेरवाड़ा, ऋषभदेव (धुलेव)।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं पर्यटन स्थल

सिटी पैलेस (उदयपुर)

1559 ईस्वी में महाराणा उदयसिंह द्वितीय द्वारा पिछोला झील के पूर्वी तट पर स्थापित भव्य राजप्रासाद.

400 वर्षों में निर्मित राजस्थान का सबसे बड़ा महल परिसर; फर्ग्यूसन ने इसे 'विंडसर कैसल' की संज्ञा दी; 5,000 कांच के टुकड़ों से बना मोर चौक, शीशमहल व बड़ी महल प्रमुख।

पिछोला झील एवं जगमंदिर

14वीं सदी में महाराणा लाखा के काल में बंजारे द्वारा निर्मित झील, जिसके मध्य जगमंदिर और जगनिवास (लेक पैलेस) स्थित हैं.

जगमंदिर का निर्माण कर्णसिंह व जगतसिंह प्रथम (1620-1651 ई.) ने कराया, जहाँ शाहजहाँ ने शरण ली थी; जगनिवास (लेक पैलेस) 1746 ई. में जगतसिंह द्वितीय द्वारा निर्मित विश्वप्रसिद्ध जलमहल।

सज्जनगढ़ दुर्ग (मानसून पैलेस)

1884 ईस्वी में महाराणा सज्जन सिंह द्वारा अरावली की 3,100 फीट ऊँची बाँसदरा पहाड़ी पर निर्मित पर्वतीय महल.

मानसून के बादलों को देखने व खगोलीय वेधशाला के रूप में बाँसदरा पहाड़ी पर निर्मित; नीचे प्रसिद्ध सज्जनगढ़ बायोलॉजिकल पार्क और वन्यजीव अभयारण्य स्थित।

दुर्ग एवं महल

  • सिटी पैलेस परिसर: पिछोला झील के किनारे स्थित मेवाड़ राजपूत स्थापत्य का गौरव।
  • सज्जनगढ़ मानसून पैलेस: 1884 ई. में बाँसदरा पहाड़ी पर निर्मित पर्वतीय महल।
  • गोगुंदा: 28 फरवरी 1572 को महाराणा प्रताप का प्रथम राजतिलक स्थल।

धार्मिक स्थल एवं तीर्थ

  • एकलिंगजी मंदिर (कैलाशपुरी): 734 ई. में बप्पा रावल द्वारा स्थापित मेवाड़ के कुलदेवता; मेवाड़ के महाराणा स्वयं को एकलिंगजी का 'दीवान' मानते थे।
  • जगदीश मंदिर: 1651 ई. में महाराणा जगतसिंह प्रथम द्वारा निर्मित भव्य पंचायतन विष्णु मंदिर; वास्तुकार अर्जुन व मुकुंद।
  • ऋषभदेव मंदिर (धुलेव): प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ का मंदिर, जिन्हें भील 'कालाजी' तथा अत्यधिक केसर चढ़ाने के कारण 'केसरियाजी' कहा जाता है।
  • करणी माता (मच्छला मगरा): रोपवे से जुड़ा पहाड़ी मंदिर जहाँ से झीलों का विहंगम दृश्य दिखता है।

झीलें, जल संरचनाएँ एवं प्राकृतिक स्थल

  • फतेह सागर झील: 1687 ई. में जयसिंह द्वारा निर्मित व फतेहसिंह द्वारा पुनर्निर्मित; नेहरू पार्क व सौर वेधशाला द्वीप स्थित।
  • उदय सागर झील: 1559-1565 ई. में महाराणा उदयसिंह द्वारा बेड़च नदी पर निर्मित।
  • बड़ी झील (जयान सागर): 1680 ई. में महाराणा राजसिंह द्वारा अकाल राहत हेतु निर्मित शांत झील।

वन्यजीव एवं अभयारण्य

  • सज्जनगढ़ बायोलॉजिकल पार्क: बाँसदरा पहाड़ी की तलहटी में स्थित आधुनिक जैविक उद्यान।
  • फुलवारी की नाल अभयारण्य: 1983 में अधिसूचित; सोम, वाकल व सेई नदियों का उद्गम स्थल; सघन औषधीय वनों से आच्छादित।

धरोहर, कला एवं पुरातात्त्विक स्थल

  • आहड़ पुरातात्त्विक स्थल व महासतियां: 4,000 वर्ष प्राचीन ताम्रपाषाण कालीन सभ्यता (ताम्रवती नगरी); मेवाड़ के महाराणाओं की भव्य शाही छतरियाँ (महासतियां)।
  • बागोर की हवेली: 18वीं सदी में प्रधानमंत्री अमरचंद बड़वा द्वारा गणगौर घाट पर निर्मित; विश्व की सबसे बड़ी पगड़ी और 'धरोहर' लोकनृत्य का केंद्र।
  • भारतीय लोक कला मंडल: 1952 में देवीलाल सामर द्वारा स्थापित कठपुतली व लोककला शोध संस्थान।
  • सहेलियों की बाड़ी: 18वीं सदी में महाराणा संग्राम सिंह द्वितीय द्वारा निर्मित प्राकृतिक गुरुत्वीय फव्वारों वाला बगीचा।

मेले एवं उत्सव

  • मेवाड़ महोत्सव: चैत्र माह में गणगौर के अवसर पर आयोजित; पिछोला झील में शाही नौका सवारी।
  • हरियाली अमावस्या मेला: श्रावण अमावस्या को फतेहसागर झील किनारे लगने वाला ऐतिहासिक मेला।
  • शिल्पग्राम उत्सव: प्रतिवर्ष दिसंबर में आयोजित होने वाला राष्ट्रीय हस्तशिल्प व लोककला उत्सव।

जिले की विशिष्ट पहचान: खान-पान, शिल्प, खेती एवं खनिज

  • प्रसिद्ध खान-पान: मेवाड़ी दाल-बाटी-चूरमा, बेसन गट्टे की सब्जी, हरी मिर्च के टिपोरे और मावा मालपुआ।
  • कला, शिल्प व धातु कार्य: काठ की कठपुतलियाँ (जीआई शिल्प), पिछवाई पेंटिंग, संगमरमर पच्चीकारी और चाँदी की मीनाकारी।
  • कृषि एवं फसलें: मक्का (मेवाड़ का मुख्य खाद्यान्न), गेहूँ, चना, अदरक और हल्दी।
  • प्रमुख खनिज संपदा: रॉक फॉस्फेट (झामरकोटड़ा - भारत की सबसे बड़ी व समृद्ध खदान), सीसा-जस्ता-चाँदी (जावर माइंस - विश्व का सबसे प्राचीन जस्ता प्रगलन केंद्र) और हरा संगमरमर (ऋषभदेव)।

सामान्य भ्रम एवं परीक्षा सावधानियाँ

जयसमंद झील (ढेबर झील) पहले उदयपुर में पढ़ी जाती थी, किंतु वर्तमान में यह सलूंबर जिले का हिस्सा है। आहड़ सभ्यता उदयपुर में बेड़च नदी पर स्थित है। जावर विश्व का सबसे प्राचीन जस्ता प्रगलन केंद्र है।

त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

स्मारक / स्थल श्रेणी निर्माता एवं काल प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषता
सिटी पैलेस उदयपुर शाही जल प्रासाद 1559 ई., उदयसिंह द्वितीय राजस्थान का सबसे बड़ा महल, 5,000 कांच के टुकड़ों का मोर चौक
पिछोला झील ऐतिहासिक मीठी झील 14वीं सदी, बंजारा जगमंदिर (शाहजहाँ की शरण 1623) व जगनिवास (लेक पैलेस 1746)
सज्जनगढ़ महल मानसून पैलेस 1884 ई., सज्जन सिंह बाँसदरा पहाड़ी (3,100 फीट), विहंगम दृश्य, सज्जनगढ़ अभयारण्य
एकलिंगजी मंदिर मेवाड़ कुलदेवता 734 ई., बप्पा रावल कैलाशपुरी, मेवाड़ महाराणा स्वयं को एकलिंगनाथ का दीवान मानते थे
जगदीश मंदिर पंचायतन विष्णु मंदिर 1651 ई., जगतसिंह प्रथम वास्तुकार अर्जुन-मुकुंद, 79 फीट ऊँचा शिखर, विशाल गरुड़ प्रतिमा
आहड़ पुरास्थल ताम्रपाषाण सभ्यता 2000 ई.पू., आहड़ नदी ताम्रवती नगरी, ताँबा प्रगलन भट्ठियाँ, महासतियां (शाही छतरियाँ)

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42. विश्व धरोहर: सूचीकरण और घटक

विषय परिचय एवं मुख्य संकल्पनाएँ

यूनेस्को विश्व धरोहर अभिसमय के अंतर्गत राजस्थान का अंतरराष्ट्रीय पटल पर विशिष्ट स्थान है। यहाँ की धरोहरों को प्राकृतिक, सांस्कृतिक और अमूर्त सांस्कृतिक श्रेणियों में विभाजित किया गया है। प्रतियोगी परीक्षाओं हेतु सूचीकरण का कालक्रम, घटक और असंबद्ध प्रसिद्ध किलों के मध्य अंतर समझना अनिवार्य है।

प्रमुख विश्लेषणात्मक बिंदु

राजस्थान के पहाड़ी दुर्ग

2013 में सूचीबद्ध छह दुर्गों की संयुक्त सांस्कृतिक संपत्ति.

घटक चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, रणथंभौर, गागरोन, आमेर और जैसलमेर हैं। संयुक्त संपत्ति में कई घटक होते हैं, पर सूचीबद्ध संपत्ति एक होती है; इन्हें छह असंबद्ध UNESCO संपत्तियाँ न गिनें।

केवलादेव का विश्व धरोहर सूचीकरण

1985 में सूचीबद्ध प्राकृतिक संपत्ति.

केवलादेव भरतपुर में है और आर्द्रभूमि पक्षियों से पहचाना जाता है। इसकी प्राकृतिक श्रेणी की तुलना दुर्गों, जयपुर वेधशाला और ऐतिहासिक जयपुर नगर की सांस्कृतिक श्रेणी से करें।

जयपुर नगर का सूचीकरण

2019 में सूचीबद्ध ऐतिहासिक नगर.

जयपुर नगर का सूचीकरण जंतर मंतर के 2010 के सूचीकरण से अलग है। संभावित सूची का प्रस्ताव अंतिम सूचीकरण नहीं है; प्रसिद्ध स्मारक या सूचीबद्ध नगर का हर भवन अलग विश्व धरोहर संपत्ति नहीं बनता।

तुलनात्मक पुनरावृत्ति सारणी

इकाई / स्थल श्रेणी क्षेत्र / निर्माता विश्लेषणात्मक महत्त्व
केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान प्राकृतिक धरोहर 1985 भरतपुर, कृत्रिम आर्द्रभूमि पारितंत्र, प्रवासी पक्षियों की वैश्विक शरणस्थली
जंतर मंतर जयपुर सांस्कृतिक धरोहर 2010 सवाई जयसिंह द्वितीय द्वारा निर्मित वेधशाला, विश्व की सबसे बड़ी पाषाण धूपघड़ी
कालबेलिया लोकनृत्य व गीत अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर 2010 सपेरा समुदाय द्वारा प्रस्तुत सर्पिलाकार मोहक लोकनृत्य, यूनेस्को प्रतिनिधि सूची
राजस्थान के छह पहाड़ी दुर्ग संयुक्त सांस्कृतिक धरोहर 2013 चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, रणथंभौर, गागरोन, आमेर और जैसलमेर दुर्ग
जयपुर का परकोटा शहर सांस्कृतिक शहरी परिदृश्य 2019 ग्रिड-पैटर्न नगर नियोजन, वैदिक वास्तु सिद्धांत, जीवंत व्यापारिक संस्कृति

परीक्षा उपयोगी मुख्य निष्कर्ष

पुनरावृत्ति क्रम: केवलादेव—1985; जंतर मंतर—2010; पहाड़ी दुर्ग—2013; जयपुर नगर—2019। मेहरानगढ़, जूनागढ़ और लोहागढ़ छह दुर्गों वाले समूह के घटक नहीं हैं।

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43. दुर्ग, महल और संरक्षक

विषय परिचय एवं मुख्य संकल्पनाएँ

राजस्थान का दुर्ग स्थापत्य सामरिक सुरक्षा और राजप्रासाद विलास का अद्वितीय संगम है। शुक्रनीति और कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार दुर्गों को गिरि, जल (औदक), धान्वन और वन दुर्गों में वर्गीकृत किया गया है। राजपूत शासकों ने अभेद्य प्राचीरों के भीतर जल संरक्षण, शस्त्रागार, टकसाल और कलात्मक महलों का निर्माण करवाया।

प्रमुख विश्लेषणात्मक बिंदु

राव जोधा–मेहरानगढ़

जोधपुर के लिए सही संस्थापक–दुर्ग संबंध.

राव जोधा ने 1459 ई. में चिड़ियाटूँक पहाड़ी पर मेहरानगढ़ की नींव रखी। इसे राव मालदेव (जिन्होंने बाद में परकोटा सुदृढ़ किया) या बीकानेर के संस्थापक राव बीकाजी से भ्रमित न करें।

राणा कुंभा–कुंभलगढ़

मेवाड़ के शासक जो एक प्रमुख सुरक्षा दुर्ग से जुड़े हैं.

महाराणा कुंभा ने वास्तुकार मंडन की देखरेख में कुंभलगढ़ (1448-1458 ई.) बनवाया। श्यामलदास के 'वीर विनोद' के अनुसार कुंभा ने मेवाड़ के 84 में से 32 दुर्गों का निर्माण करवाया था।

गागरोन–जलदुर्ग

नदियों के संगम पर स्थित होने से स्पष्ट दुर्ग प्रकार.

झालावाड़ का गागरोन दुर्ग आहू और कालीसिंध के संगम पर बिना नींव के सीधी चट्टान पर खड़ा राजस्थान का सर्वश्रेष्ठ जलदुर्ग (औदक दुर्ग) है; चित्तौड़ जैसे गिरि दुर्ग या जैसलमेर जैसे धान्वन दुर्ग से भिन्न।

तुलनात्मक पुनरावृत्ति सारणी

इकाई / स्थल श्रेणी क्षेत्र / निर्माता विश्लेषणात्मक महत्त्व
चित्तौड़गढ़ दुर्ग गिरि व सिरमौर दुर्ग 7वीं सदी, चित्रांगद मौर्य सबसे बड़ा आवासीय दुर्ग, 7 पोल, विजय स्तंभ, 3 ऐतिहासिक साके (1303, 1535, 1568)
मेहरानगढ़ दुर्ग गिरि दुर्ग (मयूरध्वजगढ़) 1459 ई., राव जोधा चिड़ियाटूँक पहाड़ी, चामुंडा माता, जसवंत थड़ा, फूलमहल, किलकिला तोप
जूनागढ़ दुर्ग धान्वन/भूमि दुर्ग 1589-1594 ई., रायसिंह कर्मचंद वास्तुकार, 'दीवारों के कान होते हैं', अनूप महल में सुनहरी कलम का काम
गागरोन दुर्ग जलदुर्ग (औदक दुर्ग) 12वीं सदी, बीजलदेव डोड आहू-कालीसिंध संगम, बिना नींव की चट्टान, अचलदास खींची री वचनिका
तारागढ़ दुर्ग (बूंदी) गिरि दुर्ग (तारे जैसा आकार) 1354 ई., राव बरसिंह गर्भ गुंजन तोप, चित्रशाला, सुखमहल; अजमेर के तारागढ़ से भिन्न

परीक्षा उपयोगी मुख्य निष्कर्ष

तुलना करें: हवा महल—प्रतापसिंह; जंतर मंतर—जयसिंह द्वितीय; उम्मेद भवन—उम्मेदसिंह; लालगढ़—गंगासिंह; सज्जनगढ़—सज्जनसिंह।

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44. धार्मिक स्थल और तीर्थयात्रा

विषय परिचय एवं मुख्य संकल्पनाएँ

राजस्थान का धार्मिक भूगोल समन्वयकारी और बहुआयामी है, जहाँ वल्लभ पुष्टिमार्ग, नाथ संप्रदाय, जैन तीर्थ, सूफी दरगाहें और लोकदेवता समान रूप से पूज्य हैं। यहाँ के प्रमुख तीर्थों में प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु पदयात्रा कर शीश नवाते हैं।

प्रमुख विश्लेषणात्मक बिंदु

रणकपुर–आदिनाथ

सही जैन तीर्थ–तीर्थंकर युग्म.

पाली का रणकपुर प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ (ऋषभदेव) को समर्पित है। इसे देलवाड़ा के लूण वसही (22वें तीर्थंकर नेमिनाथ) या महावीर स्वामी के मंदिरों से भ्रमित न करें।

अजमेर–चिश्ती परंपरा

मोइनुद्दीन चिश्ती से जुड़ा सूफी तीर्थ.

ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने 1192 ई. में पृथ्वीराज चौहान तृतीय के काल में अजमेर में चिश्ती परंपरा की नींव रखी। नागौर के सुहरावर्दी संत हमीदुद्दीन नागौरी से इनका अंतर स्पष्ट रखें।

आसोतरा–ब्रह्मा

बालोतरा का उदाहरण जो केवल-एक-ब्रह्मा-मंदिर के दावे का खंडन करता है.

पुष्कर के अतिरिक्त आसोतरा (बालोतरा जिला, संत खेतारामजी द्वारा स्थापित) और छींच (बाँसवाड़ा जिला) में भी भव्य ब्रह्मा मंदिर हैं, जो 'एकमात्र मंदिर' के दावे का खंडन करते हैं।

तुलनात्मक पुनरावृत्ति सारणी

इकाई / स्थल श्रेणी क्षेत्र / निर्माता विश्लेषणात्मक महत्त्व
श्रीनाथजी (नाथद्वारा) वैष्णव पुष्टिमार्ग प्रधान पीठ राजसमंद 7 वर्षीय बालकृष्ण स्वरूप, हवेली संगीत, छप्पन भोग व पिछवाई कला
एकलिंगजी मंदिर शैव पाशुपत पीठ उदयपुर 734 ई. में बप्पा रावल द्वारा स्थापित; मेवाड़ महाराणाओं के अधिपति कुलदेवता
रामदेवरा (रूणेचा) लोकदेवता बाबा रामदेवजी जैसलमेर तंवरवंशी कृष्ण अवतार, सांप्रदायिक सद्भाव के प्रतीक, तेरहताली नृत्य
देलवाड़ा मंदिर श्वेत संगमरमर जैन तीर्थ सिरोही (माउंट आबू) विमल वसही (1031 ई.) व लूण वसही (1230 ई.), अनुपम संगमरमर नक्काशी
करणी माता मंदिर शक्तिपीठ (चूहों वाली देवी) बीकानेर (देशनोक) सफेद काबा (चूहे) दर्शन शुभ, गंगासिंह द्वारा प्रदत्त चाँदी के किवाड़

परीक्षा उपयोगी मुख्य निष्कर्ष

लोकदेवता मिलान: गोगामेड़ी—गोगाजी; रामदेवरा—रामदेव; कोलू—पाबूजी। देवी स्थल मिलान: कैला देवी—करौली; जीण माता—सीकर; त्रिपुरा सुंदरी—बाँसवाड़ा।

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45. झीलें, बावड़ियाँ और जलाशय

विषय परिचय एवं मुख्य संकल्पनाएँ

राजस्थान का पारंपरिक जल स्थापत्य मरुभूमि में जीवन और सौंदर्य का उत्कृष्ट प्रमाण है। भूजल संरक्षण हेतु निर्मित गहरी बहुमंजिला बावड़ियों (झालरा व कुएँ) से लेकर राजाओं द्वारा नदियों पर बाँध बनाकर निर्मित विशाल कृत्रिम झीलों ने वास्तुकला और पर्यटन को नई ऊँचाइयाँ दीं।

प्रमुख विश्लेषणात्मक बिंदु

चाँद बावड़ी–आभानेरी

दौसा में सीढ़ीदार जल-संरचना.

आभानेरी (दौसा) की चाँद बावड़ी 8वीं-9वीं सदी में राजा चंद्र (निकुंभ राजपूत) द्वारा निर्मित; 13 मंजिलों में 3,500 ज्यामितीय सीढ़ियाँ; हर्षत माता मंदिर के सामने स्थित।

बीसलपुर–बनास

सही जलाशय–नदी संबंध.

बीसलपुर बाँध टोंक जिले में बनास नदी पर बना है; जयपुर, अजमेर, दौसा और टोंक को पेयजल देता है; चंबल के बाँधों (जैसे राणा प्रताप सागर) से इसका अंतर स्पष्ट रखें।

जयसमंद–जयसिंह

दक्षिणी राजस्थान की झील–शासक संबंध.

जयसमंद झील (ढेबर) का निर्माण महाराणा जयसिंह ने 1685-1691 ई. में गोमती नदी पर कराया था; वर्तमान में यह आधिकारिक तौर पर सलूंबर जिले में स्थित है।

तुलनात्मक पुनरावृत्ति सारणी

इकाई / स्थल श्रेणी क्षेत्र / निर्माता विश्लेषणात्मक महत्त्व
चाँद बावड़ी (आभानेरी) सीढ़ीदार बावड़ी 8वीं-9वीं सदी, राजा चंद्र दौसा, 13 मंजिलें, 3,500 ज्यामितीय सीढ़ियाँ, विश्व की सबसे गहरी कलात्मक बावड़ी
रानीजी की बावड़ी शाही बावड़ी 1699 ई., रानी नाथावती बूंदी ('बावड़ियों का शहर'), कलात्मक तोरण द्वार व गजराजों की पाषाण नक्काशी
जयसमंद झील (ढेबर) कृत्रिम मीठे पानी की झील 1685-1691 ई., जयसिंह सलूंबर, 87 वर्ग किमी, 7 द्वीप (बाबा का मगरा व प्यारी), रूठी रानी महल
राजसमंद झील अकाल राहत झील 1662-1676 ई., राजसिंह राजसमंद, नौचौकी पाल, 25 काले पाषाण पट्टों पर उत्कीर्ण संस्कृत राजप्रशस्ति
पचपदरा नमक झील खारे पानी की झील (98% NaCl) प्राचीन, खारवाल जाति बालोतरा, मोरली झाड़ी की टहनियों से नमक स्फटिक बनाना; मीठे जलाशयों से भिन्न

परीक्षा उपयोगी मुख्य निष्कर्ष

झील–महल जोड़े: पिछोला—जगमंदिर/जगनिवास; किशोर सागर—कोटा जगमंदिर; मानसागर—जलमहल। डीडवाना खारी झील है, इन मीठे पानी वाले उदाहरणों से अलग।

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46. वन्यजीव, आर्द्रभूमि और मरुस्थल

विषय परिचय एवं मुख्य संकल्पनाएँ

राजस्थान में मरुस्थलीय टीलों से लेकर चंबल की बीहड़ घाटियों और भरतपुर की नमभूमियों तक विस्मयकारी पारिस्थितिक विविधता पाई जाती है। राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य, टाइगर रिजर्व और रामसर वेटलैंड्स के वैधानिक स्वरूप और उनकी विशिष्ट प्रजातियों का अध्ययन अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

प्रमुख विश्लेषणात्मक बिंदु

खींचन–कुरजां

समुदाय से जुड़ा शीतकालीन पक्षी स्थल.

फलौदी जिले का खींचन गाँव मंगोलिया व साइबेरिया से आने वाली 20,000 से अधिक कुरजां (डेमोइसेल क्रेन) की मेजबानी करता है; ग्रामीण 'चुग्गा घर' में दाना खिलाते हैं।

राष्ट्रीय मरु उद्यान–गोडावण

संकटापन्न बड़े पक्षी से जुड़ा मरुस्थलीय आवास.

राष्ट्रीय मरु उद्यान (जैसलमेर व बाड़मेर में 3,162 वर्ग किमी) राज्य पक्षी गोडावण (ग्रेट इंडियन बस्टर्ड) का प्रमुख शरणस्थल है तथा इसमें आकल वुड फॉसिल पार्क स्थित है।

चंबल–घड़ियाल

नदीय आवास और विशिष्ट घड़ियाल संबंध.

राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य राजस्थान, म.प्र. व उ.प्र. का संयुक्त नदीय गलियारा है, जो गंभीर रूप से संकटापन्न घड़ियाल और गांगेय डॉल्फिन के संरक्षण हेतु समर्पित है।

तुलनात्मक पुनरावृत्ति सारणी

इकाई / स्थल श्रेणी क्षेत्र / निर्माता विश्लेषणात्मक महत्त्व
रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान प्रोजेक्ट टाइगर रिजर्व सवाई माधोपुर 1980 में राष्ट्रीय उद्यान, 1,334 वर्ग किमी, दिन में बाघ दर्शन, पद्म तालाब, जोगी महल
केवलादेव घना राष्ट्रीय उद्यान व रामसर स्थल भरतपुर यूनेस्को प्राकृतिक धरोहर (1985), रामसर (1981), प्रवासी सारस व पक्षियों का स्वर्ग
सरिस्का टाइगर रिजर्व प्रोजेक्ट टाइगर रिजर्व अलवर दूसरा बाघ रिजर्व (1978), बाघों का सफल पुनर्स्थापन, कांकनवाड़ी दुर्ग, पांडुपोल
मुकुंदरा हिल्स प्रोजेक्ट टाइगर रिजर्व कोटा व झालावाड़ तीसरा बाघ रिजर्व (2013), दर्रा अभयारण्य, चंबल की प्राकृतिक घाटी, शैलचित्र
रामगढ़ विषधारी प्रोजेक्ट टाइगर रिजर्व बूंदी चौथा बाघ रिजर्व (2022), रणथंभौर और मुकुंदरा के मध्य बाघ विचरण गलियारा

परीक्षा उपयोगी मुख्य निष्कर्ष

राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य, बाघ अभयारण्य, रामसर दर्जा और UNESCO दर्जे में अंतर रखें। भौगोलिक क्षेत्र समान हो सकता है, लेकिन इनका अर्थ समान नहीं है।

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47. हवेलियाँ, चित्रकला और संग्रहालय

विषय परिचय एवं मुख्य संकल्पनाएँ

राजस्थान की चित्रकला, हवेलियाँ और हस्तशिल्प यहाँ के समृद्ध सांस्कृतिक इतिहास को प्रदर्शित करते हैं। राजस्थानी चित्रकला की विभिन्न शैलियों (मेवाड़, मारवाड़, किशनगढ़, हाड़ौती, ढूँढाड़) और भौगोलिक उपदर्शन (जीआई टैग) प्राप्त दस्तकारियों का अध्ययन परीक्षा में सर्वाधिक प्रासंगिक है।

प्रमुख विश्लेषणात्मक बिंदु

शेखावाटी–भित्तिचित्र हवेलियाँ

अनेक नगरों में फैली व्यापारिक भित्तिचित्र परंपरा.

शेखावाटी (झुंझुनूँ, सीकर, चुरू) 18वीं-20वीं सदी की धनी मारवाड़ी हवेलियों के बाह्य व आंतरिक भित्तिचित्रों के कारण 'ओपन एयर आर्ट गैलरी' के रूप में विश्वविख्यात है।

नाथद्वारा–पिछवाई

श्रीनाथजी से जुड़ी भक्तिपूर्ण चित्रकला.

नाथद्वारा (राजसमंद) की पिछवाई कला (जीआई टैग) मंदिर में श्रीनाथजी की प्रतिमा के पीछे लगाए जाने वाले सूती वस्त्र पर प्राकृतिक रंगों से उकेरे गए लीला दृश्य हैं।

प्रतापगढ़–थेवा

कांच पर सोने का काम जो एक जिला शिल्प से जुड़ा है.

प्रतापगढ़ की थेवा कला (जीआई टैग) रंगीन बेल्जियम कांच पर 23 कैरेट शुद्ध सोने की अत्यंत बारीक नक्काशी की कला है, जिसे 1707 ई. से केवल राजसोनी परिवार ने संरक्षित रखा है।

तुलनात्मक पुनरावृत्ति सारणी

इकाई / स्थल श्रेणी क्षेत्र / निर्माता विश्लेषणात्मक महत्त्व
बनी-ठनी (किशनगढ़ शैली) लघु चित्रकला अजमेर (किशनगढ़) राजा सावंत सिंह (नागरीदास) के काल में मोरध्वज निहालचंद द्वारा चित्रित; 'भारत की मोनालिसा'
उस्ता कला (मुनव्वत) ऊँट की खाल पर स्वर्ण मीनाकारी बीकानेर जीआई टैग, ऊँट के चमड़े पर 24 कैरेट सोने के वर्क की नक्काशी, पद्मश्री हिसामुद्दीन उस्ता
ब्लू पॉटरी चीनी मिट्टी बर्तन शिल्प जयपुर जीआई टैग, क्वार्ट्ज व कांच के मिश्रण से निर्मित नीले बर्तन; सवाई रामसिंह द्वितीय द्वारा प्रोत्साहित
फड़ चित्रकला कपड़े पर लोकगाथा अंकन शाहपुरा (भीलवाड़ा) जीआई टैग, जोशी परिवार द्वारा देवनारायणजी व पाबूजी की जीवनगाथाओं का पारंपरिक चित्रांकन
कोटा डोरिया बारीक चौकोर बुनाई वस्त्र कोटा (कैथून) जीआई टैग, शुद्ध सूती व रेशमी धागों से चौकोर 'खट' डिजाइन में बुनी जाने वाली मसूरिया साड़ियाँ

परीक्षा उपयोगी मुख्य निष्कर्ष

संग्रहालय पुनरावृत्ति: अल्बर्ट हॉल—जयपुर; राव माधोसिंह संग्रहालय—कोटा; कालीबंगा संग्रहालय—हनुमानगढ़; बिरला विज्ञान संग्रहालय—पिलानी।

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48. पुरातत्व, अभिलेख और प्रमाण

विषय परिचय एवं मुख्य संकल्पनाएँ

पुरातात्त्विक उत्खनन और पाषाण अभिलेख राजस्थान के प्राचीन इतिहास के प्रामाणिक स्रोत हैं। जायल के पुरापाषाण कालीन औजारों से लेकर कालीबंगा की हड़प्पा सभ्यता, बैराठ के बौद्ध चैत्य और भव्य संस्कृत राजप्रशस्तियों तक का अध्ययन ऐतिहासिक निरंतरता को उजागर करता है।

प्रमुख विश्लेषणात्मक बिंदु

कालीबंगा–जुता हुआ खेत

हनुमानगढ़ से प्राप्त हड़प्पा कालीन पुरातात्विक साक्ष्य.

हनुमानगढ़ में सूखी घग्घर नदी तट पर कालीबंगा से विश्व का प्राचीनतम जुता हुआ खेत (प्राक्-हड़प्पा), अग्निवेदिकाएँ, लकड़ी की नाली और बेलनाकार मुहरें प्राप्त हुईं।

कोलवी–बौद्ध गुफाएँ

झालावाड़ में चट्टानों को काटकर बनाई गई धार्मिक गुफाएँ.

झालावाड़ के कोलवी, विनायगा व हथियागौड़ में 5वीं-7वीं सदी की हीनयान बौद्ध शैलकृत गुफाएँ, स्तूप और विहार स्थित हैं, जिन्हें 'राजस्थान का अजंता' कहा जाता है।

राजप्रशस्ति–राजसमंद

झील की पाल से जुड़ा प्रमुख ऐतिहासिक अभिलेख.

राजसमंद झील की नौचौकी पाल पर 25 काले संगमरमर के फलकों पर उत्कीर्ण राजप्रशस्ति महाकाव्य, जिसे 1676 ई. में रणछोड़ भट्ट तैलंग ने संस्कृत में रचा था।

तुलनात्मक पुनरावृत्ति सारणी

इकाई / स्थल श्रेणी क्षेत्र / निर्माता विश्लेषणात्मक महत्त्व
कालीबंगा प्राक्-हड़प्पा व हड़प्पा स्थल हनुमानगढ़ (घग्घर) विश्व का प्राचीनतम जुता खेत, अग्निवेदिकाएँ, भूकंप के साक्ष्य, मातृदेवी की मूर्ति का अभाव
आहड़ (ताम्रवती नगरी) ताम्रपाषाण कालीन संस्कृति उदयपुर (बेड़च/आहड़) 2000-1500 ई.पू., ताँबा गलाने की भट्ठियाँ, काले-लाल मृद्भांड, ठप्पेदार सिक्के
बैराठ (विराटनगर) मौर्य व बौद्ध कालीन सभ्यता कोटपूतली-बहरोड़ बीजक की पहाड़ी, गोल बौद्ध मंदिर/चैत्य, अशोक का भाब्रू शिलालेख (1837 बर्ट)
गणेश्वर ताम्रयुगीन संस्कृतियों की जननी सीकर / नीम का थाना क्षेत्र काँतली नदी तट, 2800 ई.पू. के 99% शुद्ध ताँबे के बाणाग्र, मछली पकड़ने के काँटे
बड़ली का शिलालेख राजस्थान का सबसे प्राचीन अभिलेख अजमेर (भिलोत माता मंदिर) 443 ई.पू. का ब्राह्मी लिपि अभिलेख, अजमेर संग्रहालय में सुरक्षित

परीक्षा उपयोगी मुख्य निष्कर्ष

उदयपुर का आहड़ और श्रीगंगानगर का बरोर अतिरिक्त पुरातात्विक उदाहरण हैं। भानगढ़ और कुलधरा की लोककथाएँ उनके अवशेषों के प्रमाण आधारित विवरण का विकल्प नहीं हैं।

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49. मेले, स्मृति और जीवित परंपराएँ

विषय परिचय एवं मुख्य संकल्पनाएँ

राजस्थान के मेले और लोक उत्सव यहाँ की जीवंत संस्कृति, लोक संगीत, पारंपरिक नृत्य और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के केंद्र हैं। हिंदू पंचांग की तिथियों के अनुसार आयोजित होने वाले ये लक्खी मेले लोकदेवताओं की स्मृति और पशुधन के व्यापार का माध्यम हैं।

प्रमुख विश्लेषणात्मक बिंदु

पुष्कर–कार्तिक मेला

अजमेर जिले का तीर्थ और मेला संबंध.

अजमेर का पुष्कर मेला कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक भरता है; पवित्र सरोवर में महास्नान और रंग-बिरंगे ऊँट व्यापार का विश्वप्रसिद्ध सांस्कृतिक मेला।

बेणेश्वर–आदिवासी मेला

वागड़ क्षेत्र से जुड़ा त्रिवेणी संगम तीर्थ.

डूंगरपुर (नवाटापरा) का बेणेश्वर मेला सोम, माही व जाखम के त्रिवेणी संगम पर माघ पूर्णिमा को भरता है; संत मावजी महाराज द्वारा प्रतिष्ठित 'आदिवासियों का महाकुंभ'।

मानगढ़–गोविंद गुरु

आदिवासी इतिहास से जुड़ा स्मारक संबंध.

बाँसवाड़ा का मानगढ़ धाम 17 नवंबर 1913 को गोविंद गुरु के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना द्वारा शहीद किए गए 1,500 से अधिक भील आदिवासियों का पावन राष्ट्रीय स्मारक है।

तुलनात्मक पुनरावृत्ति सारणी

इकाई / स्थल श्रेणी क्षेत्र / निर्माता विश्लेषणात्मक महत्त्व
पुष्कर मेला सांस्कृतिक व ऊँट पशु मेला अजमेर कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा; 52 घाटों पर महास्नान, मूंछ व पगड़ी प्रतियोगिताएँ
बेणेश्वर मेला आदिवासियों का महाकुंभ डूंगरपुर (नवाटापरा) माघ पूर्णिमा, सोम-माही-जाखम त्रिवेणी संगम, खंडित शिवलिंग पूजा, संत मावजी
रामदेवरा मेला सांप्रदायिक सद्भाव मेला जैसलमेर (पोकरण) भाद्रपद शुक्ल द्वितीया (बाबे री बीज) से एकादशी; बाबा रामदेव समाधि, तेरहताली नृत्य
खाटू श्यामजी मेला फाल्गुन लक्खी मेला सीकर फाल्गुन शुक्ल दशमी से द्वादशी; शीश के दानी बर्बरीक, लाखों निशान पदयात्री
सीताबाड़ी मेला सहरिया जाति का कुंभ बारां (केलवाड़ा) ज्येष्ठ अमावस्या; सीता कुंड व लक्ष्मण कुंड, सहरिया समाज का सबसे बड़ा पारंपरिक मेला

परीक्षा उपयोगी मुख्य निष्कर्ष

सीताबाड़ी—बारां; गोगामेड़ी—हनुमानगढ़; रामदेवरा—जैसलमेर; कैला देवी—करौली उपयोगी मेला–स्थल जोड़े हैं। पंचांग के अनुसार तिथियाँ बदलती हैं; यहाँ स्थायी संबंधों पर बल है।

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50. पर्यटन परिपथ और मानचित्र अभ्यास

विषय परिचय एवं मुख्य संकल्पनाएँ

राजस्थान पर्यटन विकास निगम (RTDC) द्वारा विकसित पर्यटन परिपथ भौगोलिक समीपता और सांस्कृतिक संबंधों पर आधारित हैं। इन परिपथों, राष्ट्रीय राजमार्गों और सीमाओं का मानचित्र-आधारित अध्ययन प्रतियोगी परीक्षाओं के भूगोल व पर्यटन खंड हेतु अत्यंत प्रभावी है।

प्रमुख विश्लेषणात्मक बिंदु

हाड़ौती परिपथ

कोटा, बूंदी, बारां और झालावाड़ का क्षेत्रीय समूह.

हाड़ौती परिपथ दक्षिण-पूर्वी पठार पर चंबल बेसिन के चार जिलों को जोड़ता है: कोटा (चंबल रिवरफ्रंट), बूंदी (तारागढ़ व बावड़ियाँ), बारां (भंड देवरा) और झालावाड़ (गागरोन व कोलवी)।

वागड़ परिपथ

बाँसवाड़ा और डूंगरपुर की दक्षिणी सांस्कृतिक जोड़ी.

वागड़ परिपथ दक्षिणी जनजातीय अंचल को जोड़ता है: बाँसवाड़ा (सौ द्वीपों का शहर, माही बाँध, त्रिपुरा सुंदरी) और डूंगरपुर (बेणेश्वर धाम, जूना महल, देव सोमनाथ)।

मरुस्थलीय धरोहर परिपथ

पश्चिमी दुर्गों, टीलों और बस्तियों को जोड़ने वाला अध्ययन मार्ग.

मरु त्रिकोण/परिपथ पश्चिमी थार के सुनहरे रेत के टीलों और दुर्गों को जोड़ता है: जोधपुर (मेहरानगढ़), जैसलमेर (सोनार किला, सम के टीले), बीकानेर (जूनागढ़) और बाड़मेर (किराडू)।

तुलनात्मक पुनरावृत्ति सारणी

इकाई / स्थल श्रेणी क्षेत्र / निर्माता विश्लेषणात्मक महत्त्व
मरु परिपथ (डेजर्ट सर्किट) स्वर्ण मरुस्थल व ऐतिहासिक दुर्ग जोधपुर, जैसलमेर, बीकानेर, बाड़मेर मेहरानगढ़, सोनार किला, सम के रेतीले धोरे, जूनागढ़, किराडू मंदिर
मेवाड़ परिपथ झीलों का सौंदर्य व शौर्य दुर्ग उदयपुर, राजसमंद, चित्तौड़गढ़, सलूंबर सिटी पैलेस उदयपुर, कुंभलगढ़, चित्तौड़गढ़, जयसमंद झील
शेखावाटी परिपथ ओपन एयर आर्ट गैलरी सीकर, झुंझुनूँ, चुरू मंडावा, नवलगढ़ व फतेहपुर की भित्तिचित्र हवेलियाँ, खाटू श्यामजी
हाड़ौती परिपथ चंबल नदी घाटी व शैल स्थापत्य कोटा, बूंदी, बारां, झालावाड़ मुकुंदरा हिल्स, बूंदी के तारागढ़ व महल, भंड देवरा, गागरोन जलदुर्ग
बृज-मेवात परिपथ धार्मिक कृष्ण भूमि व जलमहल भरतपुर, डीग, अलवर, धौलपुर केवलादेव घना, डीग के जलमहल, सरिस्का बाघ अभयारण्य, मचकुंड

परीक्षा उपयोगी मुख्य निष्कर्ष

मानचित्र अभ्यास: पहले प्रत्येक जिला अंकित करें, फिर उसके तीन स्थल लिखें। साझा नदी या वन क्षेत्र को एक जिले में सीमित करने के बजाय तीरों से व्यापक विस्तार दिखाएँ।

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51. वर्तमान जिले और परीक्षा के सामान्य भ्रम

विषय परिचय एवं मुख्य संकल्पनाएँ

प्रतियोगी परीक्षाओं में मिलते-जुलते नामों, विभिन्न शासकों द्वारा निर्मित समनाम स्मारकों और पुनर्गठित जिलों की नवीन सीमाओं से जुड़े प्रश्न बहुतायत से पूछे जाते हैं। 41-जिला व्यवस्था के अनुसार अद्यतन तथ्यों और पुराने संदर्भाधीन अंतरों को स्पष्ट रखना सफलता की कुंजी है।

प्रमुख विश्लेषणात्मक बिंदु

खींचन–फलौदी

अद्यतन पक्षी स्थल–जिला युग्म.

खींचन (कुरजां पक्षी की विश्वप्रसिद्ध शरणस्थली) ऐतिहासिक रूप से जोधपुर में पढ़ा जाता था; जिला पुनर्गठन के बाद यह आधिकारिक तौर पर फलौदी जिले में स्थित है।

बदनोर–ब्यावर

अद्यतन दुर्ग–जिला युग्म जो पुराने भीलवाड़ा उल्लेख का स्थान लेता है.

बदनोर दुर्ग (बैराठ दुर्ग / कुशल माता मंदिर) पहले भीलवाड़ा जिले में स्थित था; वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था में यह ब्यावर जिले के अंतर्गत आता है।

डीग महल–डीग

वर्तमान जिला जो ऐतिहासिक भरतपुर संबंध से अलग है.

डीग के जलमहल और ऐतिहासिक फव्वारे पूर्व में भरतपुर जिले में पढ़े जाते थे; वर्तमान में डीग स्वयं एक स्वतंत्र जिला मुख्यालय है।

तुलनात्मक पुनरावृत्ति सारणी

इकाई / स्थल श्रेणी क्षेत्र / निर्माता विश्लेषणात्मक महत्त्व
तारागढ़ दुर्ग अजयमेरु / गढ़ बीठली (1113 ई., अजयराज) अजमेर बूंदी के तारागढ़ दुर्ग (1354 ई., राव बरसिंह) से सर्वथा भिन्न
जगमंदिर पिछोला झील में निर्मित जलमहल उदयपुर कोटा के किशोर सागर झील में स्थित जगमंदिर से भिन्न
गौतमेश्वर महादेव अरनोद (पाप मुक्ति प्रमाण पत्र) प्रतापगढ़ सिरोही जिले में पोसालिया के निकट स्थित गौतमेश्वर से भिन्न
ब्रह्मा मंदिर पवित्र 52 घाटों वाला मुख्य सरोवर अजमेर (पुष्कर) आसोतरा (बालोतरा) और छींच (बाँसवाड़ा) में भी भव्य मंदिर स्थित
जयसमंद झील भारत की सबसे बड़ी कृत्रिम झील (ढेबर) सलूंबर पुनर्गठन से पूर्व ऐतिहासिक रूप से उदयपुर जिले में शामिल

परीक्षा उपयोगी मुख्य निष्कर्ष

यह भी दोहराएँ: कुचामन/लाडनूँ—डीडवाना-कुचामन; जयसमंद/ढेबर—सलूम्बर; अनूपगढ़—श्रीगंगानगर; शाहपुरा—भीलवाड़ा; गंगापुर सिटी—सवाई माधोपुर। परीक्षा में दी प्रशासनिक तिथि को प्राथमिकता दें।

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अंतिम पुनरावृत्ति सूची

  • क्या आप सभी 41 जिलों के तीन-तीन प्रमुख ऐतिहासिक पर्यटन स्थल बता सकते हैं?
  • क्या छह यूनेस्को सूचीबद्ध पहाड़ी दुर्गों को अन्य प्रसिद्ध गैर-सूचीबद्ध दुर्गों से अलग पहचान सकते हैं?
  • क्या आप जिलों की प्रमुख खनिज पेटियों (डेगाना का टंगस्टन, सिरोही का वोलास्टोनाइट, झामरकोटड़ा का रॉक फॉस्फेट, टोंक का गारनेट) को पहचान सकते हैं?
  • क्या आप प्रसिद्ध कृषि फसलों व जीआई शिल्पों (सोजत की मेंहदी, सीकर का प्याज, कोटा का धनिया, खमनोर का चेती गुलाब) को सही जिले से सुमेलित कर सकते हैं?
  • क्या आप जलमहलों, बावड़ियों और जलाशयों को उनके सही निर्माताओं व वर्तमान जिलों से मिला सकते हैं?
  • क्या उत्तर का विकल्प रटने के बजाय गलत विकल्पों के अमान्य होने का कारण समझा सकते हैं?

यह जानकारी कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) द्वारा तैयार की गई है।