अध्याय 12: रंगों की दुनिया - राजस्थान की चित्रकला
राजस्थान की चित्रकला
परीक्षा प्रासंगिकता: RPSC / RSSB / REET / Board Exam
SECTION 2: मूल विचार
राजस्थानी चित्रकला में जैन पांडुलिपि परंपरा, स्थानीय दरबारी व लोक कलाएँ और मुगल प्रभाव मिलते हैं। लघुचित्र, भित्ति चित्र और वस्त्र-चित्र अलग माध्यम हैं। परीक्षा में प्रचलित चार क्षेत्रीय समूह मेवाड़, मारवाड़, ढूँढाड़ और हाड़ौती हैं; यह उपयोगी वर्गीकरण है, हर शैली की अपरिवर्तनीय सीमा नहीं। आनंद कुमारस्वामी ने 1916 में “राजपूत चित्रकला” शब्द का प्रयोग किया। इसे आज के चार क्षेत्रीय समूहों की स्थापना का दावा न समझें।
| समूह | प्रमुख केंद्र |
|---|---|
| मेवाड़ | उदयपुर, चावंड, नाथद्वारा, देवगढ़; क्षेत्र की शाहपुरा फड़ परंपरा |
| मारवाड़ | जोधपुर, बीकानेर, किशनगढ़, जैसलमेर, नागौर, अजमेर |
| ढूँढाड़ | आमेर-जयपुर, शेखावाटी, अलवर, उनियारा |
| हाड़ौती | बूंदी, कोटा, झालावाड़ |
SECTION 3: जिला और कला केंद्र
| जिला/केंद्र | शैली | प्रमुख कलाकार | विशेषता |
|---|---|---|---|
| उदयपुर | मेवाड़ | साहिबदीन, मनोहर | सचित्र रामायण, रागमाला, भक्ति और दरबारी विषय |
| राजसमंद: नाथद्वारा | नाथद्वारा | घासीराम, नारायण, चतुर्भुज | श्रीनाथजी की सेवा हेतु पिछवाई; उत्सव और ऋतुएँ |
| राजसमंद: देवगढ़ | मेवाड़ ठिकाना शैली | बगता, चोखा, कँवला, बैजनाथ | मेवाड़, मारवाड़ व जयपुर का समन्वय; मोती महल, अजारा की ओवरी |
| भीलवाड़ा: शाहपुरा | फड़ लोकचित्र परंपरा | जोशी परिवार, श्रीलाल जोशी | पाबूजी व देवनारायण की गाथाओं के चित्रित पट |
| जोधपुर | मारवाड़ | शिवदास, अमरदास, किशनदास भाटी, वीरजी | ढोला-मारू, दरबार, नाथ परंपरा; नाथ-विषयक चित्र मानसिंह के काल में विशेष महत्वपूर्ण |
| बीकानेर | बीकानेर | अलीरज़ा, रुकनुद्दीन, इब्राहीम, नाथू | मुगल व दक्कनी संपर्क; कलाकारों और तिथियों का अभिलेखन |
| अजमेर: किशनगढ़ | किशनगढ़ | निहालचंद | बणी-ठणी, राधा-कृष्ण, तीखे नयन और विस्तृत परिदृश्य |
| जैसलमेर | जैसलमेर | स्थानीय चित्रकार | मूमल; स्थानीय लोकगाथाएँ और जैन पांडुलिपि भंडार |
| जयपुर | आमेर-जयपुर | साहिबराम, मुहम्मद शाह | व्यक्ति-चित्र, दरबार, धार्मिक विषय |
| अलवर | अलवर | गुलाम अली, बलदेव, मूलचंद | मुगल, फारसी व जयपुर संपर्क; गुलिस्ताँ, हाथी-दाँत पर चित्र |
| बूंदी | बूंदी | तुलची राम; प्रारंभिक चुनार रागमाला के शेख हसन, शेख अली, शेख हातिम | प्रकृति, पशु-पक्षी, रागमाला, बारहमासा, चित्रशाला |
| कोटा | कोटा | डालू; दरबारी चित्रकार | शिकार, वन्यजीव, परिदृश्य; महिलाओं के शिकार दृश्य भी |
SECTION 4: उत्पत्ति, विषय और पहचान
- जैसलमेर के जैन भंडार प्रारंभिक सचित्र ताड़पत्र परंपरा के महत्वपूर्ण केंद्र हैं। ओघनिर्युक्ति और दसवैकालिक टीका 1060 ई. से जुड़े हैं; इन्हें आधुनिक दरबारी स्कूलों से अलग संदर्भ में समझें।
- श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि (1260-61) को आहड़ और तेजसिंह के काल से जोड़ा जाता है।
- चावंड की 1605 की रागमाला नसीरदीन/निसारदीन से संबंधित है।
- प्रमुख विषय: कृष्ण लीला, रामायण, रागमाला, रसिकप्रिया, बारहमासा, नायिका भेद, शिकार, दरबार और लोकगाथाएँ।
- रंग, वृक्ष और नयन-आकृतियाँ उपयोगी संकेत हैं, अनिवार्य नियम नहीं। मेवाड़ में लाल-पीले रंग और बूंदी-कोटा में समृद्ध प्रकृति मिलती है; एक रंग या एक वृक्ष से हर चित्र की पहचान नहीं की जा सकती।
- बादल अनेक शैलियों में मिलते हैं। बीकानेर को केवल बादल चित्रण से अलग न करें।
SECTION 5: संरक्षक और प्रमुख कृतियाँ
| शैली | संरक्षक/काल | कलाकार/कृति |
|---|---|---|
| मेवाड़ | जगतसिंह प्रथम, 1628-1652 | साहिबदीन और मनोहर; सचित्र रामायण और भक्ति विषय |
| चावंड | अमरसिंह प्रथम | नसीरदीन की रागमाला, 1605 |
| नाथद्वारा | राजसिंह; श्रीनाथजी की स्थापना 1672 | पिछवाई की परंपरा बाद में विकसित और विस्तृत हुई; स्थापना को पूरी शैली का स्वर्णकाल न मानें |
| जोधपुर | जसवंतसिंह प्रथम; बाद में मानसिंह | भाटी चित्रकार; लोकगाथाएँ, दरबार और नाथ-विषय |
| बीकानेर | करणसिंह; अनूपसिंह | अलीरज़ा करणसिंह के काल में लगभग 1650; रुकनुद्दीन अनूपसिंह के काल में |
| किशनगढ़ | सावंतसिंह, शासनकाल 1748-1757 | निहालचंद; बणी-ठणी, राधा-कृष्ण |
| जयपुर | सवाई जयसिंह द्वितीय; सवाई प्रतापसिंह, 1778-1803 | साहिबराम; व्यक्ति-चित्र, भक्ति और दरबार |
| बूंदी | छत्रसाल, भावसिंह, उम्मेदसिंह और बाद के शासक | चित्रशाला/उम्मेद महल; भित्ति चित्रांकन बाद के काल में भी जारी |
| कोटा | जगतसिंह, रामसिंह प्रथम, गुमानसिंह, उम्मेदसिंह | डालू की रागमाला: दिनांकित पृष्ठ 1766 और 1768; गुमानसिंह का काल |
SECTION 6: संस्थान, भंडार और संग्रहालय
| संस्थान | स्थान | महत्व |
|---|---|---|
| राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट्स | जयपुर | संस्थापक सवाई रामसिंह द्वितीय। संस्था के इतिहास में 1857; कुछ अन्य अभिलेखों में 1866 |
| पोथीखाना | जयपुर | राजकीय पांडुलिपि व चित्र संग्रह |
| जैन भंडार | जैसलमेर | प्राचीन ताड़पत्र व कागजी पांडुलिपियाँ |
| पुस्तक प्रकाश | जोधपुर | मारवाड़ के पांडुलिपि व चित्र संग्रह |
| सरस्वती भंडार / सिटी पैलेस | उदयपुर | मेवाड़ चित्र और पांडुलिपियाँ |
| अल्बर्ट हॉल | जयपुर | लघुचित्र और अन्य कला संग्रह |
| राव माधोसिंह संग्रहालय | गढ़ पैलेस, कोटा | कोटा शैली के लघुचित्र |
| राजकीय संग्रहालय | अलवर | गुलिस्ताँ सहित सचित्र पांडुलिपियाँ, चित्र और हाथी-दाँत की वस्तुएँ |
| राष्ट्रीय संग्रहालय | नई दिल्ली | राजस्थानी लघुचित्र संग्रह |
SECTION 7: समयरेखा
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1060 | ओघनिर्युक्ति/दसवैकालिक टीका की प्रारंभिक सचित्र जैन परंपरा |
| 1260-61 | आहड़ से संबद्ध श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि |
| 1605 | चावंड की रागमाला, नसीरदीन |
| 1628-1652 | जगतसिंह प्रथम के काल में मेवाड़ चित्रकला |
| लगभग 1650 | करणसिंह के संरक्षण में अलीरज़ा, बीकानेर |
| 1672 | नाथद्वारा में श्रीनाथजी की स्थापना |
| 1748-1757 | सावंतसिंह का शासनकाल; संरक्षण का काल इससे व्यापक हो सकता है |
| 1766 और 1768 | डालू की कोटा रागमाला के दिनांकित पृष्ठ |
| 1778-1803 | सवाई प्रतापसिंह, जयपुर |
| 1857 / 1866 | स्कूल ऑफ आर्ट्स: संस्था का इतिहास 1857; अन्य अभिलेखों में 1866 |
| 1916 | कुमारस्वामी का राजपूत चित्रकला शब्द-प्रयोग |
| 5 मई 1973 | 20 पैसे का राधा-किशनगढ़ डाक टिकट |
SECTION 8: अभ्यास प्रश्न
Q1. किशनगढ़ के बणी-ठणी चित्र से कौन जुड़े हैं? उत्तर: निहालचंद।
Q2. मेवाड़ में जगतसिंह प्रथम के प्रमुख चित्रकार कौन थे? उत्तर: साहिबदीन और मनोहर।
Q3. बूंदी और कोटा में कौन-से विषय प्रमुख हैं? उत्तर: प्रकृति और पशु-पक्षी दोनों में; कोटा शिकार के लिए विशेष प्रसिद्ध।
Q4. बीकानेर के रुकनुद्दीन किस शासक से जुड़े हैं? उत्तर: अनूपसिंह। अलीरज़ा करणसिंह के काल से जुड़े हैं।
Q5. पिछवाई का प्रमुख केंद्र कौन-सा है? उत्तर: नाथद्वारा, राजसमंद।
SECTION 9: त्वरित पुनरावृत्ति
| युग्म | स्मरण |
|---|---|
| मेवाड़ - साहिबदीन | जगतसिंह प्रथम, सचित्र रामायण |
| बीकानेर - रुकनुद्दीन | अनूपसिंह; कलाकारों का अभिलेखन |
| किशनगढ़ - निहालचंद | बणी-ठणी; सावंतसिंह/नागरीदास |
| नाथद्वारा - पिछवाई | श्रीनाथजी के पीछे वस्त्र-पृष्ठभूमि |
| बूंदी - चित्रशाला | उम्मेद महल; प्रकृति और भक्ति विषय |
| कोटा - शिकार | वन्यजीव और परिदृश्य; डालू की रागमाला |
| देवगढ़ - राजसमंद | बगता और चोखा; प्रतापगढ़ के देवगढ़ से न मिलाएँ |
SECTION 10: भ्रम दूर करें और आधुनिक कलाकार
- चार क्षेत्रीय समूह और अलग-अलग दरबारी शैलियाँ वर्गीकरण के अलग स्तर हैं। फड़ लोक-गाथा चित्रण है; इसे दरबारी लघुचित्र की समान शाखा न समझें।
- बीकानेर: अलीरज़ा-करणसिंह; रुकनुद्दीन-अनूपसिंह। रायसिंह और अनूपसिंह के काल न मिलाएँ।
- सावंतसिंह का शासनकाल 1748-1757; 1757 में वृंदावन प्रस्थान। निहालचंद का संरक्षण और शासनकाल अलग अवधारणाएँ हैं।
- बादल, शिकार और पेड़ अनेक शैलियों में मिलते हैं; “केवल/एकमात्र” वाले दावों से सावधान रहें।
- आला-गीला: गीले चूने के पलस्तर पर चित्रण। आराइश चूने की सतह-सज्जा से संबंधित है; मोराकाशी को इसका सरल पर्याय न मानें।
- शेखावाटी के चेजारे राजमिस्त्री-चित्रकार थे; चितेरे शब्द भी चित्रकारों के लिए मिलता है।
- आधुनिक कलाकार: रामगोपाल विजयवर्गीय (पद्मश्री 1984); गोवर्धनलाल जोशी “बाबा” (भील जीवन); परमानंद चौयल (भैंसों के चित्र); जगमोहन मथोड़िया (कुत्तों के चित्र); कृपालसिंह शेखावत (जयपुर ब्लू पॉटरी का पुनरुद्धार, पद्मश्री 1974)।
- मानचित्र स्मरण: उदयपुर-मेवाड़; राजसमंद-नाथद्वारा/देवगढ़; भीलवाड़ा-शाहपुरा; अजमेर-किशनगढ़; जोधपुर-मारवाड़; बीकानेर-बीकानेर; बूंदी/कोटा-हाड़ौती।