1. उत्पत्ति एवं संवैधानिक स्थिति

आरपीएससी लोक सेवाओं की भर्ती और संबंधित परामर्श की संवैधानिक संस्था है। भाग XIV के अनुच्छेद 315–323 लोक सेवा आयोगों से संबंधित हैं। इसका मुख्यालय अजमेर में है। राजस्थान लोक सेवा आयोग अध्यादेश 16 अगस्त 1949 को प्रख्यापित, 20 अगस्त 1949 को प्रकाशित और नियुक्ति अधिसूचना के साथ 22 दिसंबर 1949 को प्रभावी हुआ। प्रश्न में प्रख्यापन, प्रकाशन अथवा कार्यारंभ पूछे जाने पर इन तिथियों में अंतर करें।

अनुच्छेद 315 संघ और राज्य लोक सेवा आयोगों का प्रावधान करता है। संबंधित विधानमंडलों के संकल्प के बाद संसद संयुक्त राज्य लोक सेवा आयोग स्थापित कर सकती है। कोई राज्य अकेले अपने आयोग को संयुक्त आयोग में परिवर्तित नहीं कर सकता। आरपीएससी, राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड और संघ लोक सेवा आयोग अलग भर्ती संस्थाएँ हैं जिनके कार्यक्षेत्र अलग हैं।

2. नियुक्ति, संरचना एवं कार्यकाल

अनुच्छेद 316 के अनुसार राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल करता है। यथासंभव लगभग आधे सदस्यों ने संघ या राज्य सरकार के अधीन कम-से-कम दस वर्ष पद धारण किया हो। इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक सदस्य सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी होना चाहिए। संविधान सभी राज्य आयोगों के लिए एक समान सदस्य संख्या नहीं तय करता; अनुच्छेद 318 के अंतर्गत राज्यपाल सदस्य संख्या और सेवा शर्तों का विनियमन करता है।

राज्य आयोग के सदस्य का कार्यकाल छह वर्ष अथवा 62 वर्ष की आयु, जो पहले हो, तक है। संघ और संयुक्त राज्य आयोग में आयु सीमा 65 वर्ष है। राज्य आयोग के सदस्य का त्यागपत्र राज्यपाल को संबोधित होता है। कार्यकाल समाप्त होने पर उसी पद पर पुनर्नियुक्ति नहीं हो सकती। अध्यक्ष पद रिक्त होने या अध्यक्ष के कर्तव्य निभाने में असमर्थ होने पर कार्यवाहक अध्यक्ष की व्यवस्था की जा सकती है।

3. हटाना एवं स्वतंत्रता की सुरक्षा

अनुच्छेद 317 राज्य आयोग के लिए भी हटाने की शक्ति राष्ट्रपति को देता है। कदाचार के मामले में राष्ट्रपति विषय सर्वोच्च न्यायालय को भेजता है और निर्धारित जाँच प्रतिवेदन के अनुसार कार्य करता है। संदर्भ लंबित रहने के दौरान संवैधानिक प्रक्रिया के भीतर राज्यपाल राज्य आयोग के अध्यक्ष या सदस्य को निलंबित कर सकता है। निलंबन और पद से हटाना अलग शक्तियाँ हैं।

न्यायनिर्णीत दिवालियापन, पद के कर्तव्यों से बाहर सवेतन रोजगार तथा मानसिक या शारीरिक दुर्बलता से अयोग्यता के संवैधानिक आधारों पर भी राष्ट्रपति हटा सकता है। इसलिए नियुक्ति करने वाला राज्यपाल स्वतः हटाने वाला प्राधिकारी नहीं है।

अनुच्छेद 322 आयोग के वेतन और पेंशन सहित व्यय को राज्य की संचित निधि पर भारित करता है। भारित व्यय पर चर्चा हो सकती है, लेकिन उसे विधानमंडल के मतदान के लिए प्रस्तुत नहीं किया जाता। नियुक्ति के बाद सदस्य की सेवा शर्तों में उसके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जा सकता। ये सुरक्षा निष्पक्ष भर्ती में सहायक हैं; न्यायिक समीक्षा और सार्वजनिक प्रतिवेदन जवाबदेही बनाए रखते हैं।

4. कार्य एवं अनुच्छेदवार पुनरावृत्ति

अनुच्छेद याद रखने योग्य विषय
315 आयोगों की स्थापना
316 नियुक्ति और कार्यकाल
317 हटाना और निलंबन
318 सदस्य तथा कर्मचारी संबंधी विनियम
319 पदोपरांत रोजगार पर प्रतिबंध
320 परीक्षाएँ और परामर्श कार्य
321 कानून द्वारा कार्यों का विस्तार
322 भारित व्यय
323 वार्षिक प्रतिवेदन

अनुच्छेद 320 नियुक्ति परीक्षाओं, भर्ती विधियों, नियुक्ति एवं पदोन्नति के सिद्धांतों, सेवाओं के बीच स्थानांतरण की उपयुक्तता और निर्धारित अनुशासनिक मामलों से संबंधित है। संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत परामर्श के अपवाद हो सकते हैं। आयोग सलाह और अनुशंसा देता है; सरकार या सक्षम नियुक्ति प्राधिकारी नियुक्ति आदेश जारी करता है। चयन अपने-आप नियुक्ति का निरपेक्ष अधिकार नहीं बनाता।

अनुच्छेद 321 कानून द्वारा स्थानीय प्राधिकारियों, सांविधिक निकायों अथवा सार्वजनिक संस्थाओं की सेवाओं तक कार्यों का विस्तार करने देता है। वार्षिक प्रतिवेदन राज्यपाल को जाता है; वह अस्वीकृत सलाह के मामलों और कारणों वाला ज्ञापन सहित इसे विधानमंडल के समक्ष रखता है।

5. पदोपरांत प्रतिबंध एवं परीक्षा विश्लेषण

अनुच्छेद 319 के अनुसार राज्य आयोग का अध्यक्ष संघ लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष/सदस्य या किसी अन्य राज्य आयोग का अध्यक्ष बन सकता है; अन्य सरकारी रोजगार वर्जित है। राज्य आयोग का सदस्य संघ आयोग का अध्यक्ष/सदस्य अथवा उसी या अन्य राज्य आयोग का अध्यक्ष बन सकता है, संवैधानिक प्रतिबंधों के अधीन। इन अपवादों को ठीक पढ़ें: ‘सेवानिवृत्ति के बाद कोई भी पद नहीं ले सकता’ गलत है।

कठिन कथन: ‘राज्यपाल नियुक्ति करता है, इसलिए आरपीएससी सदस्य को वही हटाता है।’ गलत। ‘आयोग के व्यय पर हर वर्ष मतदान आवश्यक है।’ गलत। ‘संविधान सदस्य संख्या तय करता है।’ गलत। ‘हर चयनित अभ्यर्थी की सरकारी नियुक्ति स्वयं आयोग करता है।’ गलत।

मुख्य परीक्षा दृष्टिकोण: योग्यता, समान अवसर और संस्थागत स्वतंत्रता को जोड़ें; परीक्षा सुरक्षा, विलंब, पारदर्शी मूल्यांकन और कारणयुक्त शिकायत निवारण का परीक्षण करें। सुरक्षित प्रश्नपत्र प्रक्रिया, निश्चित परीक्षा कैलेंडर, प्रकाशित मानदंड, जाँच योग्य तकनीक और समयबद्ध विधिसम्मत भर्ती सुधार के उपाय हैं। स्वतंत्रता के साथ निष्पक्षता और जवाबदेही आवश्यक हैं।


यह जानकारी कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) द्वारा तैयार की गई है।