अध्याय 9: बोलियों की माला — राजस्थानी भाषा: उत्पत्ति, विकास, बोलियाँ एवं लिपि

Chapter 9: Garland of Dialects — Rajasthani Language: Origin, Development, Dialects and Script

परीक्षा प्रासंगिकता: RPSC / RSSB / REET / Assistant Professor / College Lecturer / Board Exams


SECTION 2: परीक्षा दृष्टि से महत्वपूर्ण (Core Idea)

राजस्थानी भाषा भारत की अत्यंत समृद्ध, प्राचीन एवं साहित्यिक लोकभाषाओं में से एक है। इसकी उत्पत्ति मुख्य रूप से शौरसेनी अपभ्रंश (गुर्जर अपभ्रंश / नागर अपभ्रंश) से मानी जाती है। भाषावैज्ञानिक दृष्टि से डॉ. जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने सर्वप्रथम 1912 ई. में अपनी पुस्तक 'लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया' में यहाँ की भाषा के लिए 'राजस्थानी' शब्द का प्रयोग किया तथा इसे 5 प्रमुख उप-शाखाओं में वर्गीकृत किया।

राजस्थानी की चार प्रमुख आधारभूत बोलियाँ हैं — मारवाड़ी (पश्चिमी राजस्थान), ढूंढाड़ी (पूर्वी राजस्थान), मेवाड़ी (दक्षिणी-मध्य राजस्थान) तथा हाड़ौती (दक्षिण-पूर्वी राजस्थान)। इसके अतिरिक्त मेवाती, वागड़ी (भीली), मालवी, अहीरवाटी (राठी), गोडवाड़ी, शेखावाटी, थली तथा देवड़ावाटी प्रमुख क्षेत्रीय व सीमावर्ती बोलियाँ हैं। राजस्थानी साहित्य की दो मुख्य शैलियाँ हैं: डिंगल (चारण शैली - पश्चिमी राजस्थानी) तथा पिंगल (भाट शैली - ब्रज मिश्रित पूर्वी राजस्थानी)। इसकी पारंपरिक व्यावसायिक लिपि 'महाजनी' या 'मुड़िया' (मुरिया) रही है (जिसके आविष्कारक टोडरमल माने जाते हैं), जबकि साहित्यिक अभिव्यक्ति हेतु देवनागरी लिपि का प्रयोग होता है। 21 फरवरी को 'अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस' तथा राजस्थान में 'राजस्थानी भाषा दिवस' के रूप में मनाया जाता है।

मुख्य कीवर्ड: गुर्जर अपभ्रंश, जॉर्ज ग्रियर्सन (लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया), एल.पी. टेस्सिटोरी, डिंगल व पिंगल, मारवाड़ी, ढूंढाड़ी, हाड़ौती, वागड़ी, अहीरवाटी, मुड़िया/महाजनी लिपि

इस अध्याय से औसतन 3–5 प्रश्न आते हैं।


SECTION 3: DISTRICT-WISE CONTRIBUTION (ज़िला-वार योगदान)

जिला / अंचल प्रमुख बोली / उपबोली प्रमुख विशेषता एवं प्रभाव प्रमुख साहित्यिक केंद्र / कवि
जोधपुर, बाड़मेर, जैसलमेर, नागौर, बीकानेर मारवाड़ी, थली, बीकानेरी राजस्थानी का मानक व प्रधान साहित्यिक रूप (डिंगल); सर्वाधिक क्षेत्रफल में बोली जाने वाली बोली जोधपुर, बीकानेर (बांकीदास, पृथ्वीराज राठौड़)
उदयपुर, चित्तौड़गढ़, राजसमंद, भीलवाड़ा मेवाड़ी, धावड़ी महाराणा कुंभा के नाटकों की भाषा; प्राचीनतम साहित्यिक साक्ष्य; संयुक्त ध्वनियों की बहुलता मेवाड़ (महाराणा कुंभा, दयालदास)
जयपुर, दौसा, टोंक, अजमेर ढूंढाड़ी, तोरावाटी, राजावाटी, नागरचोल, चौरासी 'छै/छो/छा' सहायक क्रिया का प्रयोग; संत दादू दयाल व उनके शिष्यों की वाणियों की प्रधान बोली जयपुर (संत दादू दयाल, सुंदरदास)
कोटा, बूंदी, झालावाड़, बारां हाड़ौती ढूंढाड़ी की उपबोली; महाकवि सूर्यमल्ल मी मिश्रण की कालजयी कृतियों (वंश भास्कर, वीर सतसई) की भाषा बूंदी, कोटा (सूर्यमल्ल मी मिश्रण)
अलवर (बहरोड़/मुंडावर), कोटपूतली-बहरोड़, खैरथल-तिजारा अहीरवाटी (राठी / हीरवाटी) बांगरू (हरियाणवी) व मेवाती का संगम; राव हम्मीर रासो व संत अलीबख्श के ख्याल बहरोड़, कोटपूतली (अलीबख्श, जोधराज)
अलवर, भरतपुर, डीग (मेवात क्षेत्र) मेवाती, बयाना, कठेर मेव बहुल क्षेत्र; पश्चिमी हिंदी व ब्रजभाषा का गहरा प्रभाव; लालदासी व चरणदासी संप्रदाय का साहित्य अलवर, डीग (संत लालदास, चरणदास, सहजोबाई, दयाबाई)
डूंगरपुर, बांसवाड़ा (वागड़ अंचल) वागड़ी (भीली बोली) 'च' का 'स' और 'स' का 'ह' उच्चारण; गुजराती का गहरा प्रभाव; ग्रियर्सन ने इसे 'भीली बोली' कहा बेणेश्वर, डूंगरपुर (संत मावजी के 'चोपड़े')
जालोर, सिरोही (गोडवाड़ अंचल) गोडवाड़ी, देवड़ावाटी मारवाड़ी की प्रमुख उपबोली; कवि कल्लोल कृत बीसलदेव रासो की बोली जालोर, आहोर, सिरोही
सीकर, झुंझुनूं, चूरू (शेखावाटी अंचल) शेखावाटी, तोरावाटी (कांतली बेसिन) मारवाड़ी की उपबोली; 'स' और 'ह' का विशिष्ट स्थानीय उच्चारण सीकर, नवलगढ़, झुंझुनूं
झालावाड़, प्रतापगढ़ सीमावर्ती मालवी, रागड़ी, सोंधवाड़ी मध्य प्रदेश के मालवा की सीमा; कर्णप्रिय बोली; रागड़ी (मारवाड़ी + मालवी का मिश्रण - राजपूतों में प्रचलित) झालावाड़, झालरापाटन

SECTION 4: मूल तथ्य (Origin, Classification & Script)

  • उत्पत्ति के विभिन्न भाषावैज्ञानिक मत:
    • गुर्जर अपभ्रंश मत (सर्वाधिक मान्य): डॉ. के. एम. मुंशी, मोतीलाल मेनारिया।
    • शौरसेनी अपभ्रंश मत: महावीर प्रसाद द्विवेदी, डॉ. नगेंद्र।
    • नागर अपभ्रंश मत: जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन, पुरुषोत्तम लाल मेनारिया।
    • शौरसेनी के गुर्जरी रूप से: डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी।
  • कालक्रम व विकास चरण:
    • प्रथम चरण (11वीं से 13वीं सदी): गुर्जरी अपभ्रंश काल (प्रारंभिक राजस्थानी)।
    • द्वितीय चरण (13वीं से 16वीं सदी): प्राचीन राजस्थानी काल (डिंगल साहित्य का प्रादुर्भाव)।
    • तृतीय चरण (16वीं से 18वीं सदी): मध्यकालीन राजस्थानी काल (स्वर्णकाल - चारण, जैन व संत साहित्य का चरम)।
    • चतुर्थ चरण (19वीं सदी से अद्यतन): आधुनिक राजस्थानी काल (गद्य व आधुनिक विधाओं का विकास)।
  • डिंगल बनाम पिंगल (साहित्यिक शैलियाँ):
    • डिंगल: पश्चिमी राजस्थानी (मारवाड़ी) का साहित्यिक रूप; चारण कवियों द्वारा प्रयुक्त; वीर रस प्रधान; जैसे - वेली क्रिसन रुकमणी री, ढोला मारू रा दूहा।
    • पिंगल: पूर्वी राजस्थानी (ढूंढाड़ी/ब्रज) का साहित्यिक रूप; भाट कवियों द्वारा प्रयुक्त; शृंगार व नीति प्रधान; जैसे - पृथ्वीराज रासो (चंदबरदाई), हम्मीर रासो (जोधराज)।
  • लिपि (Script):
    • मुड़िया / महाजनी / बाणियावाटी लिपि: अक्षरों के मोड़ने (मुड़े होने) के कारण 'मुड़िया' कहलाई। अकबर के नवरत्नों में शामिल राजा टोडरमल को इसका आविष्कारक माना जाता है। यह बही-खातों और वाणिज्यिक लेन-देन की प्रधान लिपि रही।
    • देवनागरी लिपि: वर्तमान में राजस्थानी साहित्य, पठन-पाठन और मुद्रण हेतु देवनागरी लिपि ही प्रयुक्त होती है।
  • संवैधानिक स्थिति:
    • राजस्थानी भाषा को भारतीय संविधान की 8वीं अनुसूची में सम्मिलित करने हेतु 25 अगस्त 2003 को राजस्थान विधानसभा द्वारा सर्वसम्मति से संकल्प पारित कर केंद्र सरकार को भेजा गया था (प्रक्रियाधीन)।

SECTION 5: प्रमुख भाषा-विद्वान एवं उनके ग्रंथ (TABLE)

विद्वान काल / राष्ट्र प्रमुख ग्रंथ / योगदान परीक्षा दृष्टि से महत्व
डॉ. जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन 1912 ई. (आयरलैंड) Linguistic Survey of India (Vol. IX, Part II) सर्वप्रथम 'राजस्थानी' नामकरण; राजस्थानी को 5 उप-शाखाओं में बाँटा
डॉ. लुइगी पियो टेस्सिटोरी 1887–1919 (इटली/बीकानेर) चारण साहित्य का सर्वेक्षण, डिस्क्रिप्टिव कैटलॉग ऑफ बार्डिक एंड हिस्टोरिकल क्रॉनिकल्स राजस्थानी को दो भागों (पश्चिमी व पूर्वी) में बाँटा; बीकानेर में समाधि स्थल
पद्मश्री सीताराम लालस 1908–1986 (जोधपुर) राजस्थानी सबद कोस (2 लाख से अधिक शब्द, 4 खंड) 'राजस्थानी जुबां की मशाल' कहे गए; राजस्थानी का इनसाइक्लोपीडिया
डॉ. मोतीलाल मेनारिया उदयपुर राजस्थानी भाषा और साहित्य, डिंगल साहित्य गुर्जर अपभ्रंश से उत्पत्ति का सशक्त प्रतिपादन
कविराज श्यामलदास 1836–1893 (भीलवाड़ा/मेवाड़) वीर विनोद मेवाड़ का प्रामाणिक इतिहास व भाषा संदर्भ
उद्योतन सूरि 778 ई. (जालोर) कुवलयमाला (प्राकृत ग्रंथ) 18 देशी भाषाओं में 'मरुभाषा' का प्रथम ऐतिहासिक उल्लेख
अबुल फजल 16वीं सदी (अकबर कालीन) आइने अकबरी भारत की प्रांतीय भाषाओं में 'मारवाड़ी' का उल्लेख
कुशलाभ 16वीं सदी पिंगल शिरोमणि ग्रंथ 'मारवाड़ी' शब्द का भाषा के रूप में प्रारंभिक साहित्यिक प्रयोग

SECTION 6: प्रमुख बोलियों का वर्गीकरण एवं उनकी उपबोलियाँ (TABLE)

मुख्य बोली भौगोलिक क्षेत्र सहायक उपबोलियाँ प्रमुख विशेषताएँ एवं पहचान
मारवाड़ी जोधपुर, नागौर, बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर, पाली थली, बीकानेरी, शेखावाटी, गोडवाड़ी, देवड़ावाटी, माहेश्वरी क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ी; विशुद्ध डिंगल साहित्य; 'स' का 'ह' उच्चारण
ढूंढाड़ी जयपुर, दौसा, टोंक, उत्तर-पूर्वी अजमेर तोरावाटी, राजावाटी, काठेड़ी, चौरासी, नागरचोल, किशनगढ़ी जनसंख्या की दृष्टि से सबसे बड़ी; 'छै' क्रिया का प्रयोग; संत दादू का साहित्य
मेवाड़ी उदयपुर, चित्तौड़गढ़, राजसमंद, भीलवाड़ा धावड़ी (उदयपुर में भीलों की विकृत मेवाड़ी) मारवाड़ी की प्रमुख उपशाखा; 'क' ध्वनि का अधिक प्रयोग; महाराणा कुंभा की कृतियाँ
हाड़ौती कोटा, बूंदी, बारां, झालावाड़ झालावाड़ी, हाड़ौती-नागरचोल ढूंढाड़ी की उपबोली; वर्तनी की दृष्टि से सर्वाधिक कठिन; सूर्यमल्ल मी मिश्रण की भाषा
मेवाती अलवर, भरतपुर, डीग (मेवात क्षेत्र) राठी, नहCategory, कठेर पश्चिमी हिंदी व ब्रजभाषा का प्रभाव; संत चरणदास, दयाबाई, सहजोबाई की रचनाएँ
वागड़ी डूंगरपुर, बांसवाड़ा (वागड़) भीली, खटोली जॉर्ज ग्रियर्सन ने इसे 'भीली बोली' कहा; गुजराती का प्रबल प्रभाव; संत मावजी के चोपड़े
अहीरवाटी (राठी) बहरोड़, मुंडावर, कोटपूतली, खैरथल (राठ क्षेत्र) हीरवाटी यादव/अहीर जाति का क्षेत्र; हरियाणवी व मेवाती का मिश्रण; जोधराज कृत हम्मीर रासो
गोडवाड़ी जालोर (आहोर), सिरोही, पश्चिमी पाली बालवी मारवाड़ी की उपबोली; कवि कल्लोल कृत बीसलदेव रासो इसी में रचित

SECTION 7: महत्वपूर्ण कालक्रम एवं ऐतिहासिक मील के पत्थर (Timeline)

वर्ष / सदी महत्वपूर्ण घटना / ग्रंथ ऐतिहासिक एवं भाषावैज्ञानिक महत्व
778 ई. (8वीं सदी) उद्योतन सूरि कृत कुवलयमाला 18 देशी भाषाओं में 'मरुभाषा' (मरुवाणी) का सर्वप्रथम उल्लेख
11वीं-12वीं सदी गुर्जरी अपभ्रंश से राजस्थानी का अलगाव राजस्थानी भाषा का स्वतंत्र रूप में उदय प्रारंभ
1596 ई. (16वीं सदी) अबुल फजल कृत आइने अकबरी भारत की प्रमुख भाषाओं की सूची में 'मारवाड़ी' का विधिवत उल्लेख
16वीं सदी कवि कुशलाभ कृत पिंगल शिरोमणि साहित्यिक संदर्भ में 'मारवाड़ी' शब्द का प्रथम प्रयोग
1912 ई. जॉर्ज ग्रियर्सन कृत Linguistic Survey of India प्रांतीय भाषा के लिए वैज्ञानिक रूप से पहली बार 'राजस्थानी' नामकरण
1914–1919 ई. डॉ. एल.पी. टेस्सिटोरी का भाषा सर्वेक्षण चारण व ऐतिहासिक साहित्यों का वर्गीकरण (पश्चिमी व पूर्वी राजस्थानी)
1960–1970 के दशक पद्मश्री सीताराम लालस द्वारा राजस्थानी सबद कोस 4 खंडों में 2 लाख से अधिक शब्दों का विशालतम राजस्थानी शब्दकोश प्रकाशित
21 फरवरी अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस राजस्थान में 'मातृभाषा दिवस' व राजस्थानी भाषा दिवस के रूप में संकल्प दिवस
25 अगस्त 2003 राजस्थान विधानसभा का सर्वसम्मत संकल्प संविधान की आठवीं अनुसूची में राजस्थानी को मान्यता देने हेतु ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित

SECTION 8: परीक्षा में पूछे गए प्रश्न (PYQs)

Q1. [RPSC 2018] सर्वप्रथम 'राजस्थानी' शब्द का भाषावैज्ञानिक प्रयोग किसने किया था?

उत्तर: डॉ. जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन (1912 ई.) व्याख्या: जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने 1912 ई. में अपने ग्रंथ 'लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया' (Vol. IX, Part II) में राजस्थान के संपूर्ण भूभाग की भाषा के लिए पहली बार 'राजस्थानी' नाम का प्रयोग किया।

Q2. [RSSB 2019] संत दादू दयाल और उनके शिष्यों की वाणियों की मुख्य भाषा कौन-सी है?

उत्तर: ढूंढाड़ी व्याख्या: संत दादू दयाल, सुंदरदास, रज्जब जी आदि की रचनाएँ पूर्वी राजस्थान की प्रमुख बोली 'ढूंढाड़ी' में रचित हैं।

Q3. [REET 2020] राजस्थानी भाषा की पारंपरिक महाजनी अथवा बही-खाता लिपि को क्या कहा जाता है?

उत्तर: मुड़िया (मुरिया) लिपि व्याख्या: अक्षरों को मरोड़कर या मोड़कर घसीट रूप में लिखने के कारण इसे 'मुड़िया' कहा जाता है। अकबर के वित्त मंत्री राजा टोडरमल को इसका आविष्कारक माना जाता है।

Q4. [RPSC 2021] महाकवि सूर्यमल्ल मी मिश्रण की रचनाएँ (वंश भास्कर, वीर सतसई) मुख्य रूप से किस बोली में हैं?

उत्तर: हाड़ौती व्याख्या: बूंदी के राजकवि सूर्यमल्ल मी मिश्रण की भाषा हाड़ौती है, जो ढूंढाड़ी की एक प्रमुख व सशक्त उपबोली है।

Q5. [RSSB 2020] डॉ. जॉर्ज ग्रियर्सन ने किस बोली को 'भीली बोली' कहा था?

उत्तर: वागड़ी व्याख्या: डूंगरपुर और बांसवाड़ा (वागड़) क्षेत्र की बोली 'वागड़ी' में भील जनजाति की प्रधानता तथा गुजराती का गहरा पुट होने के कारण ग्रियर्सन ने इसे 'भीली बोली' कहा।

Q6. [RPSC 2018] 778 ई. में उद्योतन सूरि द्वारा रचित ग्रंथ कुवलयमाला में राजस्थानी भाषा को किस नाम से संबोधित किया गया था?

उत्तर: मरुभाषा व्याख्या: कुवलयमाला में उल्लिखित 18 देशी भाषाओं में राजस्थान के पश्चिमी भूभाग की भाषा को 'मरुभाषा' कहा गया है।


SECTION 9: एक पंक्ति में सारांश (Quick Revision Table)

Topic Recall Point
उत्पत्ति शौरसेनी के गुर्जर अपभ्रंश से (के.एम. मुंशी, मेनारिया)
नामकरणकर्ता जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन (1912, Linguistic Survey of India)
मरुभाषा का प्रथम साक्ष्य उद्योतन सूरि कृत कुवलयमाला (778 ई., 18 देशी भाषाएँ)
डिंगल शैली पश्चिमी राजस्थानी (चारण शैली), वीर रस प्रधान, जोधपुर-बीकानेर
पिंगल शैली पूर्वी राजस्थानी (भाट शैली), ब्रज मिश्रित, जयपुर-अलवर
मुड़िया लिपि बही-खातों की लिपि, प्रवर्तक राजा टोडरमल, महाजनी लिपि
मारवाड़ी क्षेत्रफल में सबसे बड़ी, मानक बोली, डिंगल साहित्य की संवाहक
ढूंढाड़ी जनसंख्या में सबसे बड़ी, 'छै' क्रिया, संत दादू दयाल का साहित्य
हाड़ौती कोटा-बूंदी-झालावाड़, सूर्यमल्ल मी मिश्रण की रचनाएँ (वंश भास्कर)
वागड़ी डूंगरपुर-बांसवाड़ा, ग्रियर्सन द्वारा 'भीली बोली' की संज्ञा, संत मावजी के चोपड़े
अहीरवाटी (राठी) कोटपूतली-बहरोड़, मुंडावर (अलवर), जोधराज का हम्मीर रासो, अलीबख्शी ख्याल
मेवाती अलवर-भरतपुर-डीग, संत लालदास व चरणदास संप्रदाय
गोडवाड़ी जालोर-सिरोही, कवि कल्लोल का बीसलदेव रासो
राजस्थानी सबद कोस पद्मश्री सीताराम लालस (जोधपुर), 2 लाख शब्द, 4 खंड
संकल्प दिवस 25 अगस्त 2003 (विधानसभा में 8वीं अनुसूची हेतु पारित संकल्प)

SECTION 10: EXTRA EXAM NOTES

🧠 याद रखने की ट्रिक:

  • "गुर्जर से निकली राजस्थानी" → गुर्जर अपभ्रंश = राजस्थानी + गुजराती।
  • "ग्रियर्सन का 12 का चक्कर" → 1912 में ग्रियर्सन ने 5 भागों में राजस्थानी का वैज्ञानिक नामकरण किया।
  • "पश्चिमी डिंगल, पूर्वी पिंगल" → मारवाड़ = डिंगल; ढूंढाड़/ब्रज = पिंगल।
  • "दादू = ढूंढाड़ी, सूर्यमल्ल = हाड़ौती, चरणदास = मेवाती, मावजी = वागड़ी" → प्रमुख संतों/कवियों की बोलियाँ।
  • "तोरा, राजा, चौरा, नागर = ढूंढाड़ी के आँगन" → तोरावाटी, राजावाटी, चौरासी, नागरचोल सब ढूंढाड़ी की उपबोलियाँ हैं।

⚠️ अक्सर भ्रमित करने वाले तथ्य:

  • वागड़ी (डूंगरपुर-बांसवाड़ा - दक्षिणी राजस्थान) बनाम बागड़ी (गंगानगर-हनुमानगढ़ - उत्तरी राजस्थान)।
  • अहीरवाटी (राठी बोली - बहरोड़/कोटपूतली) बनाम राठी गाय की नस्ल (उत्तर-पश्चिमी राजस्थान)।
  • रागड़ी (मारवाड़ी + मालवी का कर्कश मिश्रण - मालवा सीमावर्ती राजपूतों में) बनाम रांगड़ी/अहीरवाटी।
  • मुड़िया लिपि का संबंध महाजनों के बही-खातों से है, यह स्वतंत्र भाषा नहीं बल्कि लिपि है।
  • राजस्थानी भाषा दिवस: 21 फरवरी (मातृभाषा दिवस के साथ) मनाया जाता है; 30 मार्च 'राजस्थान दिवस' है (दोनों में अंतर ध्यान रखें)।

🗺️ मानचित्र पर स्थिति:

  • उत्तर (गंगानगर/हनुमानगढ़) → बागड़ी, पंजाबी मिश्रित
  • पश्चिम (जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर) → मारवाड़ी, थली
  • मध्य-दक्षिण (उदयपुर, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा) → मेवाड़ी
  • दक्षिण (डूंगरपुर, बांसवाड़ा) → वागड़ी
  • पूर्व (जयपुर, दौसा, टोंक) → ढूंढाड़ी
  • दक्षिण-पूर्व (कोटा, बूंदी, झालावाड़, बारां) → हाड़ौती
  • उत्तर-पूर्व (अलवर, भरतपुर, डीग) → मेवाती, अहीरवाटी
  • दक्षिण-पश्चिम (जालोर, सिरोही) → गोडवाड़ी, देवड़ावाटी