बीकानेर राज्य का इतिहास

1. विषय-सीमा और परीक्षा उपयोगिता

1.1 अध्याय का परिचय

  • यह अध्याय बीकानेर राज्य के इतिहास को प्रस्तुत करता है, जो ऐतिहासिक जांगलदेश क्षेत्र में स्थापित राठौड़ राजवंश की प्रमुख उत्तरी शाखा है।
  • प्रमुख ऐतिहासिक विषयों में राव बीका द्वारा 1488 ई. में बीकानेर की स्थापना, राव लूणकरण और राव जैतसिंह के समय क्षेत्रीय सुदृढ़ीकरण, कल्याणमल और राजा रायसिंह के अधीन मुगल संबंध, करण सिंह और अनूप सिंह के अधीन सैन्य व सांस्कृतिक उपलब्धियाँ, गज सिंह के समय गजशाही मुद्रा, सूरत सिंह के समय 1818 की ब्रिटिश सहायक संधि, सरदार सिंह के समय 1857 की क्रांति में राज्य की सीमा से बाहर सेना का नेतृत्व, महाराजा गंगा सिंह के अधीन आधुनिक विकास व गंग नहर, तथा महाराजा सादुल सिंह के समय भारत संघ में एकीकरण शामिल हैं।
  • RPSC (RAS, स्कूल व्याख्याता, द्वितीय श्रेणी), RSSB (CET, पटवार, VDO, पुलिस), REET तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में स्थापना तिथियों, प्रमुख शासकों एवं उपाधियों (कलिकाल का कर्ण, राजपूताने का कर्ण, जांगलधर बादशाह, माही मरातिब), जूनागढ़ दुर्ग, साहित्यिक धरोहरों (अनूप संस्कृत पुस्तकालय, वेलि क्रिसन रुकमणी री), उस्ता कला, 1857 में राज्य से बाहर सैन्य अभियान, गंग नहर (1927) और एकीकरण से संबंधित प्रश्न नियमित रूप से पूछे जाते हैं।

2. मूल अवधारणाएँ

2.1 क्षेत्र, वंश और राजधानी

  • जांगलदेश: राजस्थान के उत्तरी शुष्क भूभाग का प्राचीन भौगोलिक नाम, जिसमें आधुनिक बीकानेर, चूरू और नागौर के कुछ भाग शामिल थे; ऐतिहासिक रूप से कंटीली वनस्पतियों और जल की कमी के लिए जाना जाता था।
  • राठौड़ वंश: बीकानेर का शासक घराना राठौड़ वंश की शाखा है, जो जोधपुर के संस्थापक राव जोधा के छठे पुत्र राव बीका द्वारा स्थापित हुई; बीकानेर ने जोधपुर के अधीनस्थ क्षेत्र के रूप में नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र संप्रभु राज्य के रूप में कार्य किया।
  • स्थापना तिथि (1488 ई.): राव बीका ने अक्षय तृतीया (वैशाख शुक्ल तृतीया), 1488 ई. (विक्रम संवत 1545) को बीकानेर नगर की नींव रखी; बीकानेर में अक्षय तृतीया पर पतंग उड़ाने की अनूठी परंपरा आज भी जारी है।
  • बीकानेर शब्द की व्युत्पत्ति: राव बीका और गोदारा जाट सरदार नरा (जिन्होंने भूमि-समझौते में सहयोग दिया) के नामों को जोड़कर "बीका + नेर" (बीका का नगर) बना।
  • कोडमदेसर से बीकानेर: कोडमदेसर प्रारंभिक सैनिक केंद्र था जहाँ बीका ने भैरव की मूर्ति स्थापित की; 1488 में नगर स्थापना के बाद प्रशासनिक मुख्यालय बीकानेर स्थानांतरित हुआ।
  • जूनागढ़ दुर्ग: राजा रायसिंह द्वारा 1589 से 1594 ई. के बीच प्रधानमंत्री कर्मचंद की देखरेख में निर्मित भव्य पाषाण दुर्ग, जिसे जमीन का जेवर कहा जाता है; यह राव बीका के प्रारंभिक मिट्टी के दुर्ग (बीकाजी की टेकरी) से अलग है।
  • आराध्य लोकदेवी: देशनोक की करणी माता ने राव बीका को राज्य स्थापना में आध्यात्मिक संबल और आशीर्वाद प्रदान किया; देशनोक मंदिर राजवंश की प्रमुख आस्था का केंद्र है।

3. उत्पत्ति, स्रोत और भूगोल

3.1 वंशावली और राव बीका का प्रस्थान

  • राठौड़ परंपरागत रूप से अपनी वंशावली भगवान राम के पुत्र कुश से जोड़ते हुए सूर्यवंशी मानते हैं; अभिलेखीय और भाषिक दृष्टि से इनका संबंध राष्ट्रकूटों से जोड़ा जाता है।
  • वंशावली का विकास राव सीहा (13वीं सदी, पाली) से राव आस्थान, राव धूहड़, राव चूंडा (जिन्होंने मंडोर जीता), राव रणमल, से होते हुए राव जोधा (1459 में जोधपुर के संस्थापक) तक पहुँचता है।
  • 1465 ई. (भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशी, वि.सं. 1522) में राव जोधा के दरबार में काका कांधल और बीका के आपस में कानाफूसी करने पर जोधा द्वारा परिहास किए जाने पर बीका ने उत्तर में नया राज्य स्थापित करने का दृढ़ संकल्प लिया।
  • अपने काका राव कांधल, भाई बीदा और 500 विश्वस्त सैनिकों के साथ बीका ने जांगलदेश में प्रवेश किया, गोदारा जाटों से संधि की तथा करणी माता के आशीर्वाद से मोहिल, भाटी और चायल सरदारों को पराजित किया।

3.2 ऐतिहासिक अभिलेख और साहित्य

  • रायसिंह प्रशस्ति (1594 ई.): जूनागढ़ दुर्ग के सूरज पोल पर उत्कीर्ण पाषाण अभिलेख; जैन मुनि जयता द्वारा संस्कृत में रचित; राव बीका से राजा रायसिंह तक की वंशावली तथा दुर्ग निर्माण का प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत करती है।
  • राव जैतसी रो छंद: दरबारी कवि बीठू सूजा द्वारा डिंगल में रचित ऐतिहासिक काव्य; 1534 ई. में बीकानेर में हुमायूँ के भाई कामरान पर राव जैतसिंह की शानदार विजय का प्रत्यक्ष विवरण देता है, तथा राव लूणकरण को कलिकाल का कर्ण बताता है।
  • कर्मचंद वंशोत्कीर्तनकं काव्यम्: जैन विद्वान जयसोम द्वारा 1593 ई. में रचित संस्कृत महाकाव्य; राजा रायसिंह के प्रधानमंत्री कर्मचंद बच्छावत के प्रशासनिक कार्यों, दानशीलता और राजनीतिक प्रभाव का वर्णन करता है।
  • वेलि क्रिसन रुकमणी री: राजा रायसिंह के छोटे भाई पृथ्वीराज राठौड़ द्वारा डिंगल भाषा में रचित अमर ग्रंथ; कवि दुरसा आढ़ा ने इसे पाँचवाँ वेद और उन्नीसवाँ पुराण कहा; इटली के विद्वान डॉ. एल.पी. तेस्सीतोरी ने पृथ्वीराज को डिंगल का हेरोस उपाधि दी।
  • दयालदास री ख्यात: दयालदास सिंधायच द्वारा रचित दो खंडों का विशाल ऐतिहासिक ग्रंथ; राव बीका से लेकर महाराजा सरदार सिंह तक बीकानेर और जोधपुर के राठौड़ों का प्रामाणिक इतिहास प्रस्तुत करता है।
  • डॉ. एल.पी. तेस्सीतोरी का शोध: बंगाल की एशियाटिक सोसाइटी द्वारा नियुक्त इतालवी विद्वान (1914–1919); बीकानेर राज्य में चारण-साहित्य, शिलालेखों और पुरातात्विक स्थलों का गहन सर्वेक्षण किया; बीकानेर में ही उनका देहावसान हुआ जहाँ उनकी छतरी स्थित है।

3.3 भूगोल, मरुस्थलीय मार्ग और संसाधन

  • बीकानेर राज्य थार मरुस्थल के विशाल उत्तरी भाग में फैला हुआ था, जिसकी सीमाएँ उत्तर और उत्तर-पश्चिम में पंजाब व बहावलपुर, पश्चिम में जैसलमेर, दक्षिण में मारवाड़ (जोधपुर), तथा पूर्व में शेखावाटी और हिसार से मिलती थीं।
  • यहाँ का धरातल मुख्य रूप से बालूका स्तूपों (धोरों), लवणीय झीलों (जैसे लूणकरणसर व छापर) और मौसमी घास के मैदानों से युक्त था।
  • जल-सुरक्षा पूरी तरह वर्षा जल संरक्षण (कुंड, टांका), गहरे कुओं और छिछली बेरी पर निर्भर थी।
  • दिल्ली, हरियाणा और आगरा को मुल्तान, बहावलपुर और सिंधु घाटी के बंदरगाहों से जोड़ने वाले प्राचीन व्यापारिक कारवां-मार्गों पर स्थित होने के कारण ऊन, घोड़े, ऊँट और लवण के व्यापार का प्रमुख केंद्र था।

4. शासक और राजनीतिक घटनाक्रम

4.1 राव बीका: 1465–1504 ई.

  • राव बीका (1465–1504 ई.): बीकानेर राज्य के संस्थापक; राव जोधा के छठे पुत्र; 1465 ई. में काका राव कांधल और भाई बीदा के साथ मारवाड़ से प्रस्थान किया।
  • 1472 ई. में कोडमदेसर में दुर्ग बनाया; करणी माता के आशीर्वाद से 1488 ई. की अक्षय तृतीया को बीकानेर नगर की विधिवत स्थापना की।
  • 1485–1488 ई. में बीकाजी की टेकरी (बीकानेर का प्रारंभिक मिट्टी का दुर्ग) बनवाया; पूगल के भाटियों, जोहियों और जाट सरदारों को नियंत्रित कर राज्य सुदृढ़ किया।
  • 1489 ई. में राव जोधा द्वारा वचनबद्ध कुलदेवता के पूज्य छत्र, ढाल, दलसिंगार घोड़ा, हर-रस सिंहासन और कुल-चिह्न प्राप्त करने हेतु जोधपुर पर चढ़ाई की तथा भाई राव सूजा से सम्मानजनक समझौता किया।
  • उनके बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र राव नरा (1504–1505 ई.) ने अल्पकाल शासन किया, जिनका शीघ्र देहांत हो गया।

4.2 राव लूणकरण: 1505–1526 ई.

  • राव लूणकरण (1505–1526 ई.): राव बीका के द्वितीय पुत्र; आक्रामक सैन्य विजेता जिन्होंने डीडवाना, फतेहपुर और नागौर के शासकों को पराजित किया।
  • बीकानेर में प्रसिद्ध खारी लूणकरणसर झील का निर्माण करवाया, जिससे नमक उत्पादन और व्यापार को बढ़ावा मिला।
  • अतुलनीय दानशीलता और उदारता के लिए प्रसिद्ध; कवि बीठू सूजा ने राव जैतसी रो छंद में तथा जयसोम ने कर्मचंद वंशोत्कीर्तनकं काव्यम् में उन्हें कलिकाल का कर्ण कहकर सम्मानित किया।
  • 1526 ई. में नारनौल पर आक्रमण किया और ढोसी के युद्ध में नवाब अबीमीरा की संयुक्त सेना से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।

4.3 राव जैतसिंह: 1526–1542 ई.

  • राव जैतसिंह (1526–1542 ई.): राव लूणकरण के पुत्र; 1527 ई. में बाबर के विरुद्ध खानवा के युद्ध में राणा सांगा के सहायतार्थ अपने पुत्र कल्याणमल के नेतृत्व में सेना भेजी।
  • 1534 ई. में हुमायूँ के भाई कामरान ने भटनेर जीतकर बीकानेर पर आक्रमण किया; राव जैतसिंह ने कामरान को करारी शिकस्त देकर बीकानेर से खदेड़ दिया, जिसका सजीव वर्णन बीठू सूजा के राव जैतसी रो छंद में मिलता है।
  • 1541–1542 ई. में मारवाड़ के राव मालदेव ने बीकानेर पर आक्रमण किया; फलोदी के निकट पाहीबा/साहीबा के युद्ध में राव जैतसिंह लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए; उनके पुत्र कल्याणमल ने सिरसा जाकर शरण ली।

4.4 राव कल्याणमल: 1542–1571 ई.

  • राव कल्याणमल (1542–1571 ई.): राव जैतसिंह के उत्तराधिकारी; अफगान सुल्तान शेरशाह सूरी से संधि की और 1544 ई. के गिरि-सुमेल युद्ध में मालदेव के विरुद्ध भाग लिया, जिसके बाद बीकानेर पर पुनः अधिकार प्राप्त किया।
  • 1570 ई. में अकबर के ऐतिहासिक नागौर दरबार में अपने पुत्रों रायसिंह और पृथ्वीराज के साथ उपस्थित हुए; मुगलों की अधीनता स्वीकार करने वाले बीकानेर के प्रथम राठौड़ शासक बने।
  • अकबर के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित किए; उनके छोटे पुत्र पृथ्वीराज राठौड़ अकबर के दरबारी कवि और प्रमुख सहयोगी बने।

4.5 राजा रायसिंह: 1571–1612 ई.

  • राजा रायसिंह (1571–1612 ई.): कल्याणमल के ज्येष्ठ पुत्र; आमेर के मानसिंह प्रथम के साथ अकबर के दो सबसे विश्वासपात्र राजपूत स्तंभों में गिने जाते थे; 4,000 (जहाँगीर द्वारा 5,000) का उच्च मनसब प्राप्त किया; राजा की उपाधि मिली।
  • गुजरात (मिर्जा विद्रोहियों का दमन) और बुरहानपुर (खानदेश) के मुगल सूबेदार रहे; चंद्रसेन के प्रतिरोध के दौरान 1572–1574 ई. तक जोधपुर दुर्ग का शाही प्रबंध संभाला।
  • अथाह दानशीलता और न्यायप्रियता के कारण आधुनिक इतिहासकार मुंशी देवी प्रसाद ने उन्हें राजपूताने का कर्ण की उपाधि दी।
  • 1589 से 1594 ई. के बीच अपने योग्य प्रधानमंत्री कर्मचंद बच्छावत की देखरेख में भव्य जूनागढ़ दुर्ग का निर्माण करवाया।
  • सूरज पोल पर जैन मुनि जयता द्वारा रचित रायसिंह प्रशस्ति (1594 ई.) उत्कीर्ण करवाई; स्वयं रायसिंह महोत्सव और ज्योतिष रत्नमाला ग्रंथों की रचना की।
  • इनके छोटे भाई पृथ्वीराज राठौड़ ने मुगल दरबार में रहते हुए वेलि क्रिसन रुकमणी री और गंगा लहरी की रचना की; दरबारी जयसोम ने कर्मचंद वंशोत्कीर्तनकं काव्यम् रचा।

4.6 दलपत सिंह, सूर सिंह और करण सिंह

  • दलपत सिंह (1612–1613 ई.): रायसिंह के ज्येष्ठ पुत्र; शासक बने किंतु जहाँगीर के विरुद्ध विद्रोह कर दिया; बंदी बनाए गए और अजमेर में मृत्युदंड दिया गया।
  • सूर सिंह (1613–1631 ई.): दलपत सिंह के भाई; जहाँगीर ने गद्दी सौंपी; दक्कन अभियानों में सेवा दी और खड़की दुर्ग जीता; 1631 ई. में दक्कन में देहांत हुआ।
  • महाराजा करण सिंह (1631–1669 ई.): सूर सिंह के पुत्र; शाहजहाँ और औरंगजेब के अधीन दौलताबाद और अटक अभियानों में सेवाएं दीं।
  • 1644 ई. में नागौर के राव अमर सिंह राठौड़ के साथ प्रसिद्ध मतीरे की राड़ लड़ी, जो बीकानेर के सीलवी गाँव और नागौर के जाखणियां गाँव की सीमा पर मतीरे की बेल को लेकर हुआ ऐतिहासिक विवाद था।
  • सिंधु नदी पार अटक अभियान के समय जब मुगलों द्वारा राजपूत धर्म भ्रष्ट करने की आशंका हुई, तो करण सिंह ने नावों को तुड़वाकर/डुबाकर राजपूत अस्मिता की रक्षा की; सभी राजपूत शासकों ने उन्हें जांगलधर बादशाह की उपाधि से सम्मानित किया।
  • साहित्य के संरक्षक; साहित्य कल्पद्रुम ग्रंथ संकलित करवाया; दरबारी विद्वान गंगाधर मैथिल ने करण भूषण तथा मुद्गल भट्ट ने काव्य डाकिनी की रचना की।

4.7 महाराजा अनूप सिंह: 1669–1698 ई.

  • महाराजा अनूप सिंह (1669–1698 ई.): करण सिंह के पुत्र; औरंगजेब के शासनकाल में असाधारण सैन्य नायक और विद्यानुरागी शासक।
  • औरंगजेब के दक्कन अभियानों, विशेषकर गोलकुंडा और बीजापुर (1686–1687 ई.) के घेरों में निर्णायक भूमिका निभाई; औरंगजेब ने प्रसन्न होकर उन्हें सर्वोच्च शाही सैन्य सम्मान माही मरातिब तथा महाराजा की उपाधि प्रदान की।
  • दक्षिण भारत के युद्धों के दौरान नष्ट होने से बचाकर हजारों अमूल्य संस्कृत पांडुलिपियों और अष्टधातु मूर्तियों को बीकानेर लाए और जूनागढ़ में प्रसिद्ध अनूप संस्कृत पुस्तकालय की स्थापना की, जो एशिया का प्रमुख पांडुलिपि केंद्र है।
  • स्वयं अनूपोद्धार, अनूप विवेक और श्राद्धप्रयोग ग्रंथों की रचना की; दरबारी संगीतज्ञ भावभट्ट ने अनूप संगीत विलास, अनूप संगीत रत्नाकर और अनूपांकुश जैसे संगीत ग्रंथों की रचना की।
  • ऊँट की खाल पर स्वर्ण मीनाकारी वाली प्रसिद्ध उस्ता कला तथा बीकानेर चित्रशैली को चरम विकास पर पहुँचाया और प्रसिद्ध चित्रकारों को संरक्षण दिया।

4.8 सुजान सिंह से गज सिंह: 1700–1787 ई.

  • सुजान सिंह (1700–1735 ई.) एवं जोरावर सिंह (1735–1746 ई.): जोधपुर के महाराजा अभय सिंह और बख्त सिंह के आक्रामक अभियानों का डटकर मुकाबला किया; 1739 ई. में जयपुर के सवाई जयसिंह के सहयोग से बीकानेर दुर्ग के घेरे को विफल किया।
  • महाराजा गज सिंह (1746–1787 ई.): आंतरिक प्रशासन को सुदृढ़ किया; 1761 ई. में मुगल बादशाह आलमगीर द्वितीय से शाही फरमान प्राप्त कर स्वतंत्र टकसाल स्थापित की और प्रसिद्ध गजशाही चाँदी के सिक्के (मोर और छत्र चिह्न युक्त) चलाए।
  • मुगल बादशाह अहमद शाह ने उन्हें श्री राज राजेश्वर की उपाधि दी; बीकानेर नगर के चारों ओर सुदृढ़ परकोटा बनवाया; जूनागढ़ में गज मंदिर का निर्माण करवाया।
  • अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध में मराठों के बढ़ते आक्रमणों और चौथ की मांगों का कूटनीतिक कुशलता से सामना किया।

4.9 सूरत सिंह, रतन सिंह और सरदार सिंह: 1787–1872 ई.

  • महाराजा सूरत सिंह (1787–1828 ई.): 1805 ई. में जाबिता खां भाटी से मंगलवार के दिन भटनेर दुर्ग जीता; मंगलवार हनुमान जी का दिन होने के कारण भटनेर का नाम बदलकर हनुमानगढ़ रखा।
  • विद्रोही सामंतों, जॉर्ज थॉमस और अमीर खां पिंडारी की लूट से सुरक्षा हेतु 9 मार्च 1818 को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से सहायक संधि की (चार्ल्स मेटकाफ द्वारा वार्ता), जिससे बीकानेर ब्रिटिश संरक्षण में आ गया।
  • महाराजा रतन सिंह (1828–1851 ई.): सामाजिक सुधारों के पक्षधर; 1836 ई. में गया तीर्थ यात्रा के अवसर पर अपने सभी सामंतों को कन्या-वध न करने की पवित्र शपथ दिलवाई; दयालदास सिंधायच को संरक्षण दिया।
  • महाराजा सरदार सिंह (1851–1872 ई.): 1857 की क्रांति के समय पूरे राजस्थान के एकमात्र ऐसे शासक थे जो अपनी सेना लेकर राज्य की सीमा से बाहर (पंजाब/हरियाणा के बाडलू, हांसी, सिरसा) अंग्रेजों की सहायतार्थ स्वयं गए।
  • ब्रिटिश सरकार ने उनकी इस सेवा से प्रसन्न होकर उन्हें सिरसा जिले के टिब्बी परगने के 41 गाँव उपहार स्वरूप प्रदान किए और नजराना कर माफ किया।

4.10 महाराजा डूंगर सिंह: 1872–1887 ई.

  • महाराजा डूंगर सिंह (1872–1887 ई.): बीकानेर में आधुनिक प्रशासनिक सुधारों के अग्रदूत माने जाते हैं।
  • द्वितीय आंग्ल-अफगान युद्ध (1878–1880 ई.) में अंग्रेजों की सहायता हेतु 800 ऊँटों की रसद सेना भेजी।
  • न्यायिक व्यवस्था का पुनर्गठन कर नियमित अदालतों और दीवानी अदालतों की स्थापना की; आधुनिक पुलिस व्यवस्था लागू की; राज्य का पहला आधुनिक अस्पताल और अंग्रेजी स्कूल खोला।
  • 1886 ई. में राजमहल में बिजली लगवाई, जिससे बीकानेर बिजली उपयोग करने वाली भारत की पहली रियासतों में शामिल हुआ।
  • इनके शासनकाल में 1877 ई. में विश्वप्रसिद्ध बीकानेरी भुजिया का आविष्कार और व्यवसायिक उत्पादन शुरू हुआ, जिसे आज जीआई (GI) टैग प्राप्त है।

4.11 महाराजा गंगा सिंह: 1887–1943 ई. (आधुनिक बीकानेर के निर्माता)

  • महाराजा गंगा सिंह (1887–1943 ई.): अपने दूरदर्शी विकास कार्यों और सुधारों के कारण आधुनिक बीकानेर के निर्माता और आधुनिक भारत के भागीरथ कहे जाते हैं।
  • गंग नहर (1927 ई.): फिरोजपुर में सतलज नदी से पानी लाकर ऐतिहासिक गंग नहर का निर्माण करवाया; मुख्य अभियंता रायबहादुर कंवर सेन थे; 26 अक्टूबर 1927 को वायसराय लॉर्ड इरविन द्वारा उद्घाटन किया गया; मरुभूमि को उपजाऊ बनाकर श्रीगंगानगर नगर बसाया।
  • गंगा रिसाला (ऊँट सेना): प्रसिद्ध ऊँट सैन्य टुकड़ी बनाई; चीन के बॉक्सर विद्रोह (1900 ई., कैसर-ए-हिंद स्वर्ण पदक), सोमालीलैंड अभियान (1902–1904) तथा प्रथम विश्व युद्ध में मिस्र (स्वेज नहर) व फ्रांस के मोर्चे पर व्यक्तिगत नेतृत्व किया।
  • राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय कूटनीति: प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति पर वर्साय की संधि (1919) पर हस्ताक्षर करने वाले एकमात्र भारतीय शासक; इंपीरियल वॉर कैबिनेट के सदस्य; 1924 में राष्ट्र संघ में भारत का प्रतिनिधित्व; लंदन में गोलमेज सम्मेलनों (1930–1931) में भाग लिया; नरेंद्र मंडल (चेंबर ऑफ प्रिंसेस) के प्रथम चांसलर (1921–1926) रहे।
  • 1913 में बीकानेर प्रजा प्रतिनिधि सभा (धारा सभा) की स्थापना कर लोकतांत्रिक संस्थाओं की शुरुआत की; 1910 में चीफ कोर्ट और 1922 में हाईकोर्ट की स्थापना की।
  • पिता लालसिंह की स्मृति में सर स्विंटन जैकब द्वारा डिजाइन किया गया भव्य लालगढ़ पैलेस, गंगा गोल्डन जुबली म्यूजियम (1937), पीबीएम अस्पताल तथा व्यापक बीकानेर स्टेट रेलवे लाइन का निर्माण कराया।
  • बीकानेर षड्यंत्र केस (1932): गोलमेज सम्मेलन के समय बीकानेर प्रशासन की कमियों को उजागर करने वाला पैम्फलेट बीकानेर दिग्दर्शन बंटने पर स्वामी गोपाल दास, चंदनमल बहड़, बद्रीप्रसाद आदि देशभक्तों पर मुकदमा चलाया गया।

4.12 महाराजा सादुल सिंह और वृहत् राजस्थान में एकीकरण

  • महाराजा सादुल सिंह (1943–1949 ई.): 1943 में गंगा सिंह के बाद शासक बने; भारतीय स्वतंत्रता के समय अत्यंत देशभक्तिपूर्ण और निर्णायक भूमिका निभाई।
  • 7 अगस्त 1947 को भारत संघ के विलय-पत्र (इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन) पर हस्ताक्षर करने वाले भारत की सभी रियासतों के पहले शासक बने, जिससे देसी राज्यों के अलगाववादी मंसूबों पर पानी फिर गया।
  • 30 मार्च 1949 को बीकानेर वृहत् राजस्थान में शामिल हुआ (जयपुर, जोधपुर और जैसलमेर के साथ), जिसकी स्मृति में प्रतिवर्ष राजस्थान दिवस मनाया जाता है।
  • जन-आंदोलन एवं किसान आंदोलन: इनके काल में जन-जागृति तीव्र हुई; बीकानेर प्रजामंडल (4 अक्टूबर 1936 को कलकत्ता में मघाराम वैद्य और रघुवर दयाल गोयल द्वारा स्थापित); जागीरदारों के अत्याचारों के विरुद्ध दूधवा खारा किसान आंदोलन (हनुमान सिंह आर्य और मघाराम वैद्य के नेतृत्व में) तथा कांगड़ किसान आंदोलन (1946) घटित हुए।

5. प्रशासन, अर्थव्यवस्था और संस्कृति

5.1 प्रशासन, पद और भू-व्यवस्था

  • केंद्रीय प्रशासन: महाराजा सर्वोच्च सत्ताधीश होते थे, जिनकी सहायता दीवान (मुसाहिब) नागरिक व वित्तीय मामलों में, बख्शी सैन्य निरीक्षण व वेतन में, शिकदार व खानसामा भंडारों व कारखानों में, तथा पुरोहित धार्मिक कार्यों में करते थे।
  • प्रशासनिक विभाजन: राज्य को परगनों (जैसे बीकानेर, रेणी, सूरतगढ़, हनुमानगढ़, अनूपगढ़, सुजानगढ़, लूणकरणसर) में विभाजित किया गया था, जिनका प्रशासनिक प्रमुख हाकिम होता था।
  • भूमि-व्यवस्था: भूमि मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बँटी थी—खालसा (प्रत्यक्ष राजकीय नियंत्रण वाली भूमि), जागीर (राठौड़ सरदारों—बीकावत, कांधलोत, बीदावत आदि को सैन्य सेवा और छठूंद-रेख कर के बदले दी गई भूमि), तथा सासन/भोम (ब्राह्मणों, चारणों और मंदिरों को दी गई कर-मुक्त भूमि)।
  • आधुनिक संस्थागत परिवर्तन: गंगा सिंह के समय संवैधानिक कार्यपालिका परिषद, स्वतंत्र उच्च न्यायालय (1922) और निर्वाचित धारा सभा (1913) की स्थापना हुई।

5.2 अर्थव्यवस्था, मुद्रा और गंग नहर

  • व्यापार और संपदा: बीकानेर ऊन उत्पादन, ऊँट पालन, चमड़ा उद्योग और लूणकरणसर में नमक उत्पादन का प्रमुख केंद्र था; दिल्ली, सिंध और मुल्तान को जोड़ने वाले मरुस्थलीय व्यापार मार्गों पर स्थित था।
  • मुद्रा (गजशाही सिक्का): 1761 ई. में महाराजा गज सिंह ने मुगल स्वीकृति से स्वतंत्र टकसाल स्थापित कर गजशाही चाँदी के रुपये (मोरपंख, छत्र और त्रिशूल के चिह्न युक्त) तथा ताँबे के ढींगला सिक्के चलाए।
  • गंग नहर की इंजीनियरिंग उपलब्धि: मुख्य अभियंता कंवर सेन के नेतृत्व में निर्मित गंग नहर (1927 ई.) फिरोजपुर हेडवर्क्स से सतलज नदी के जल को 135 किमी लंबी कंक्रीट-लाइन्ड नहर द्वारा लाई; इसने 12 लाख एकड़ मरुभूमि को सिंचित कर अकाल का अंत किया और राजस्थान का अन्नागार कहे जाने वाले श्रीगंगानगर को जन्म दिया।

5.3 कला, साहित्य और स्थापत्य

  • बीकानेर चित्रशैली: मुगल, दक्कनी और राजस्थानी शैलियों का उत्कृष्ट समन्वय; कोमल रंगों, बारीक रेखांकन, मेघ-मंडलों और शिकार दृश्यों के लिए प्रसिद्ध; प्रमुख चित्रकारों में अली रजा, रुकनुद्दीन और हामिद शामिल हैं।
  • उस्ता कला (मुनव्वती): ऊँट की खाल पर सोने की नक्काशी और मीनाकारी का विश्वप्रसिद्ध हस्तशिल्प (कुप्पियां, दर्पण, संदूक); महाराजा अनूप सिंह द्वारा प्रोत्साहित; पद्मश्री हिसामुद्दीन उस्ता ने इसे विश्व पटल पर ख्याति दिलाई।
  • मथेरण कला: स्थानीय जैन कलाकारों (मथेरणों) द्वारा भित्ति चित्रों, लघु चित्रों और पौराणिक कथाओं का पारंपरिक चित्रण।
  • जूनागढ़ दुर्ग: राजा रायसिंह द्वारा 1589–1594 ई. में निर्मित; प्रमुख महलों में अनूप महल (स्वर्ण-जड़ित राज्याभिषेक कक्ष), करण महल (दीवान-ए-आम), बादल महल (मेघ-भित्ति चित्र) और सूरज पोल पर रायसिंह प्रशस्ति शामिल हैं।
  • लालगढ़ पैलेस: महाराजा गंगा सिंह द्वारा पिता लालसिंह की स्मृति में सर सैमुअल स्विंटन जैकब द्वारा डिजाइन किया गया लाल बलुआ पत्थर का इंडो-सारसेनिक महल।
  • प्रमुख धार्मिक स्थल और मेले:
    • करणी माता मंदिर, देशनोक: कुलदेवी का प्रसिद्ध मंदिर; हजारों पूज्य चूहों (काबा) के लिए प्रसिद्ध; वर्ष में दो बार नवरात्र मेला।
    • कोलायत मेला: सांख्य दर्शन के प्रणेता महर्षि कपिल मुनि की तपोभूमि; पवित्र सरोवर में कार्तिक पूर्णिमा को विशाल स्नान और दीपदान का आयोजन।
    • भांडाशाह जैन मंदिर: 15वीं सदी का सुमतिनाथ मंदिर; जिसकी नींव के गारे में हजारों किलो शुद्ध देसी घी मिलाने की ऐतिहासिक मान्यता है।
    • मुकाम (नोखा): बिश्नोई समाज का सर्वोच्च तीर्थ स्थल जहाँ गुरु जांभोजी ने समाधि ली थी।

6. अन्य शक्तियों से संबंध

6.1 मुगल, मराठा और ब्रिटिश

  • मुगल साम्राज्य: सशस्त्र प्रतिरोध (1534 में कामरान पर राव जैतसिंह की विजय) से शुरू होकर 1570 के नागौर दरबार में कल्याणमल द्वारा संधि तक पहुँचा; राजा रायसिंह अकबर के प्रमुख विश्वासपात्र सेनापति बने; करण सिंह ने धर्म-रक्षा की; अनूप सिंह ने दक्कन अभियानों में सेवा देकर औरंगजेब से माही मरातिब सम्मान पाया।
  • मराठा संघ: 18वीं सदी में बीकानेर को मराठों (होल्कर व सिंधिया) की चौथ मांगों और हमलों का सामना करना पड़ा, जिनका जयपुर के सहयोग से कूटनीतिक मुकाबला किया गया।
  • ब्रिटिश सत्ता: सूरत सिंह ने 1818 में सहायक संधि कर ब्रिटिश संरक्षण स्वीकारा; महाराजा सरदार सिंह ने 1857 की क्रांति में पंजाब/हरियाणा जाकर अंग्रेजों की प्रत्यक्ष सहायता की; महाराजा गंगा सिंह ने वर्साय की संधि (1919) और राष्ट्र संघ में भारत का प्रतिनिधित्व किया; महाराजा सादुल सिंह ने अगस्त 1947 में सबसे पहले भारत में विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए।

6.2 पड़ोसी राज्यों से संबंध

  • जोधपुर (मारवाड़): दोनों राज्यों में एक ही राठौड़ वंश होने के बावजूद राजनीतिक प्रतिस्पर्धा रही; जैसे 1489 में बीका द्वारा पूज्य चिह्न लेने हेतु चढ़ाई, 1541–42 में पाहीबा युद्ध में मालदेव द्वारा जैतसिंह को मारना, 1644 में नागौर से मतीरे की राड़, तथा 1739 में अभय सिंह द्वारा बीकानेर का घेरा।
  • जैसलमेर (भाटी): पूगल और बीकमपुर सीमा पर चरागाहों और मवेशियों को लेकर छिटपुट संघर्ष हुए, जो वैवाहिक संबंधों द्वारा शांत किए जाते रहे।
  • जयपुर (कछवाहा): मित्रतापूर्ण कूटनीतिक संबंध रहे; 1739 में सवाई जयसिंह द्वितीय ने जोधपुर पर दबाव बनाकर बीकानेर से अभय सिंह का घेरा हटवाया था।

7. महत्वपूर्ण तिथियाँ

तिथियाँ ईस्वी हैं; प्रारंभिक अनुमानित तिथियाँ परंपरा के अनुसार भिन्न हो सकती हैं। यह परीक्षा पुनरावृत्ति हेतु चयनित कालक्रम है।

तिथि घटना
1465 ई. राव बीका द्वारा जांगलदेश में राज्य स्थापना हेतु मारवाड़ से प्रस्थान
1472 ई. राव बीका द्वारा कोडमदेसर में प्रारंभिक दुर्ग की स्थापना
1488 ई. (अक्षय तृतीया) करणी माता के आशीर्वाद से राव बीका द्वारा बीकानेर नगर की स्थापना
1505–1526 ई. राव लूणकरण का शासन; लूणकरणसर झील; कलिकाल का कर्ण
1534 ई. राव जैतसिंह द्वारा बीकानेर में मुगल शहजादे कामरान की पराजय
1541–1542 ई. पाहीबा/साहीबा का युद्ध; राव जैतसिंह मालदेव के विरुद्ध वीरगति को प्राप्त
1570 ई. राव कल्याणमल द्वारा अकबर के नागौर दरबार में मुगल अधीनता स्वीकार
1571–1612 ई. राजा रायसिंह का शासन; गुजरात के सूबेदार; राजपूताने का कर्ण
1589–1594 ई. प्रधानमंत्री कर्मचंद की देखरेख में रायसिंह द्वारा जूनागढ़ दुर्ग का निर्माण
1594 ई. सूरज पोल पर रायसिंह प्रशस्ति स्थापित (जैन मुनि जयता द्वारा रचित)
1644 ई. करण सिंह और नागौर के अमर सिंह के मध्य मतीरे की राड़ का युद्ध
1631–1669 ई. करण सिंह का शासन; जांगलधर बादशाह की उपाधि; साहित्य कल्पद्रुम
1669–1698 ई. अनूप सिंह का शासन; माही मरातिब उपाधि; अनूप संस्कृत पुस्तकालय
1761 ई. महाराजा गज सिंह के समय गजशाही चाँदी के सिक्कों की ढलाई
1805 ई. सूरत सिंह द्वारा मंगलवार को भटनेर विजय; हनुमानगढ़ नामकरण
1818 ई. (9 मार्च) ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ सहायक संधि पर हस्ताक्षर
1857 ई. महाराजा सरदार सिंह द्वारा राज्य की सीमा से बाहर सेना का नेतृत्व
1872–1887 ई. डूंगर सिंह का शासन; प्रशासनिक सुधार; बीकानेरी भुजिया (1877)
1887–1943 ई. महाराजा गंगा सिंह का शासन; आधुनिक बीकानेर के निर्माता
1900 ई. चीन के बॉक्सर विद्रोह में गंगा रिसाला की तैनाती
1919 ई. गंगा सिंह द्वारा प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति पर वर्साय की संधि पर हस्ताक्षर
1921–1926 ई. नरेंद्र मंडल (चेंबर ऑफ प्रिंसेस) के प्रथम चांसलर के रूप में सेवा
1927 ई. (26 अक्टूबर) वायसराय लॉर्ड इरविन द्वारा गंग नहर का उद्घाटन (इंजीनियर कंवर सेन)
1932 ई. देशभक्तों के विरुद्ध बीकानेर षड्यंत्र केस की सुनवाई
1947 ई. (7 अगस्त) सादुल सिंह द्वारा भारत के विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले प्रथम शासक
30 मार्च 1949 बीकानेर का वृहत् राजस्थान में विलय; राजस्थान दिवस

8. परीक्षा अभ्यास और पूर्व प्रश्नों की स्थिति

8.1 अभ्यास संरचना और सत्यापन

  • इस अध्याय में 60 द्विभाषी अभ्यास प्रश्न व्याख्या सहित छह अलग परीक्षाओं में संकलित हैं। सिद्धांत नोट्स को अभ्यास प्रश्नों से पूरी तरह अलग रखा गया है।
  • मूल प्रारूप में दोहराए गए प्रश्न और अप्रमाणित परीक्षा-वर्ष टैग थे; संपादकीय मानकों के अनुसार उन्हें उच्च-स्तरीय सत्यापित अभ्यास प्रश्नों में रूपांतरित किया गया है।
  • संस्थापक कालक्रम, शासकों की उपाधियाँ (कलिकाल का कर्ण बनाम राजपूताने का कर्ण बनाम जांगलधर बादशाह बनाम माही मरातिब), जूनागढ़ दुर्ग, 1857 में पंजाब/हरियाणा में सैन्य अभियान, गंग नहर के तथ्य (1927, कंवर सेन), और 1947 में विलय पत्र पर विशेष ध्यान दें।

9. त्वरित पुनरावृत्ति सारणी

शासक / विषय प्रमुख परीक्षा तथ्य
राव बीका 1488 ई. में अक्षय तृतीया को बीकानेर नगर की स्थापना; करणी माता का आशीर्वाद
राव लूणकरण लूणकरणसर झील का निर्माण; बीठू सूजा द्वारा कलिकाल का कर्ण की उपाधि
राव जैतसिंह कामरान को पराजित किया (1534); पाहीबा के युद्ध में वीरगति (1541–42)
राव कल्याणमल नागौर दरबार (1570) में मुगल अधीनता स्वीकार करने वाले प्रथम राठौड़ शासक
राजा रायसिंह जूनागढ़ दुर्ग निर्माण (1589–94); मुंशी देवी प्रसाद द्वारा राजपूताने का कर्ण
महाराजा करण सिंह मतीरे की राड़ (1644); जांगलधर बादशाह की उपाधि से सम्मानित
महाराजा अनूप सिंह औरंगजेब द्वारा माही मरातिब उपाधि; अनूप संस्कृत पुस्तकालय की स्थापना
महाराजा गज सिंह 1761 में मुगल स्वीकृति से प्रसिद्ध गजशाही चाँदी के सिक्के चलाए
महाराजा सूरत सिंह मंगलवार को भटनेर विजय (हनुमानगढ़); 1818 में ब्रिटिश सहायक संधि
महाराजा सरदार सिंह 1857 की क्रांति में राज्य से बाहर सेना का नेतृत्व करने वाले एकमात्र शासक
महाराजा गंगा सिंह आधुनिक बीकानेर के निर्माता; गंग नहर (1927); नरेंद्र मंडल के प्रथम चांसलर
महाराजा सादुल सिंह भारत के विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले प्रथम देशी शासक (1947)

10. सामान्य भ्रम और स्मरण-सूत्र

10.1 प्रमुख अंतर और स्मरण-सूत्र

  • राव बीका—बीकानेर स्थापना (अक्षय तृतीया 1488 ई.) और बीकाजी की टेकरी; राव लूणकरण—कलिकाल का कर्ण और लूणकरणसर झील।
  • राव जैतसिंह—कामरान की पराजय (1534) और पाहीबा युद्ध (1541–42); राव कल्याणमल—नागौर दरबार (1570) में प्रथम मुगल अधीनता।
  • राजा रायसिंह—जूनागढ़ दुर्ग (1589–94), राजपूताने का कर्ण और रायसिंह प्रशस्ति; पृथ्वीराज राठौड़—वेलि क्रिसन रुकमणी री और डिंगल का हेरोस।
  • महाराजा करण सिंह—मतीरे की राड़ (1644) और जांगलधर बादशाह; महाराजा अनूप सिंह—माही मरातिब और अनूप संस्कृत पुस्तकालय।
  • महाराजा गज सिंह—गजशाही चाँदी के सिक्के (1761); महाराजा सूरत सिंह—हनुमानगढ़ नामकरण (1805) और 1818 ब्रिटिश संधि।
  • महाराजा सरदार सिंह—1857 में राज्य से बाहर पंजाब/हरियाणा में सेना का नेतृत्व (टिब्बी परगने के 41 गाँव प्राप्त)।
  • महाराजा डूंगर सिंह—बीकानेरी भुजिया (1877) और प्रशासनिक सुधार; महाराजा गंगा सिंह—गंग नहर (1927), गंगा रिसाला, नरेंद्र मंडल और वर्साय संधि।
  • महाराजा सादुल सिंह—भारत के विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले प्रथम शासक (अगस्त 1947) और वृहत् राजस्थान में विलय (30 मार्च 1949)।
  • बीकानेर के प्रमुख शासकों के कालक्रम के लिए "बी-लू-जै-कल-राय-करण-अनूप-गज-सूरत-सरदार-डूंगर-गंगा-सादुल" सूत्र याद रखें।
  • प्रमुख सामान्य भ्रमों से बचें:
    • कलिकाल का कर्ण (राव लूणकरण, बीठू सूजा द्वारा प्रदत्त) को राजपूताने का कर्ण (राजा रायसिंह, मुंशी देवी प्रसाद द्वारा प्रदत्त) से भ्रमित न करें।
    • बीकानेर के गजशाही सिक्के (गज सिंह) को जोधपुर के विजयशाही सिक्के (विजय सिंह) से न मिलाएँ।
    • जूनागढ़ दुर्ग के निर्माता (राजा रायसिंह, 1589–1594 ई.) और बीकाजी की टेकरी के निर्माता (राव बीका, 1485 ई.) में स्पष्ट अंतर रखें।
    • जोधपुर के संस्थापक (राव जोधा, 1459 ई.) को उनके पुत्र बीकानेर के संस्थापक (राव बीका, 1488 ई.) से भ्रमित न करें।

11. अलग अभ्यास सेट

परीक्षा सेट प्रश्न
उत्पत्ति और स्रोत 5
शासक और योगदान 15
प्रशासन, संस्कृति और संबंध 10
कालक्रम 5
पुनरावृत्ति अभ्यास 5
मिश्रित और विश्लेषणात्मक अभ्यास 20

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