चौहान वंश का इतिहास (शाकम्भरी, अजमेर, रणथम्भौर, जालौर)
1. विषय-सीमा और परीक्षा उपयोगिता
1.1 अध्याय का परिचय
- यह अध्याय चौहान (चाहमान) राजवंश के इतिहास को प्रस्तुत करता है, जो प्राचीन और मध्यकालीन राजस्थान के सबसे प्रतापी और पराक्रमी राजवंशों में से एक था।
- प्रमुख ऐतिहासिक विषयों में चौहानों की उत्पत्ति के सिद्धांत (अग्निकुल, सूर्यवंश, चंद्रवंश, वत्स गोत्रीय ब्राह्मण और विदेशी मत), लगभग 551 ई. में वासुदेव द्वारा शाकम्भरी (सांभर) की स्थापना, गूवक प्रथम, चंदनराज, सिंहराज और विग्रहराज द्वितीय के अधीन प्रारंभिक सुदृढ़ीकरण, 1113 ई. में अजयराज द्वारा अजयमेरु (अजमेर) की स्थापना व स्थानांतरण, अर्णोराज द्वारा आनासागर झील और वराह मंदिर का निर्माण, विग्रहराज चतुर्थ वीसलदेव के अधीन चौहान साम्राज्य का स्वर्ण युग, तराइन के युद्धों (1191 और 1192 ई.) में पृथ्वीराज तृतीय राय पिथौरा का युगांतरकारी शासन और प्रतिरोध, तथा रणथम्भौर (हम्मीर देव और 1301 का साका), जालौर (कान्हड़देव, वीरमदेव और 1311 का साका), सिरोही (देवड़ा चौहान) और हाड़ौती (बूंदी व कोटा के हाड़ा चौहान) की शाखाएँ शामिल हैं।
- RPSC (RAS, स्कूल व्याख्याता, द्वितीय श्रेणी), RSSB (CET, पटवार, VDO, पुलिस), REET तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में स्थापना कालक्रम, प्रमुख अभिलेखों (बिजौलिया, हर्षनाथ, दिल्ली-टोपरा, मेनाल), साहित्यिक कृतियों (पृथ्वीराज रासो, पृथ्वीराज विजय, हम्मीर महाकाव्य, कान्हड़दे प्रबंध, ललित विग्रहराज, हरकेलि), स्थापत्य स्थलों (तारागढ़, आनासागर, सरस्वती कंठाभरण / ढाई दिन का झोपड़ा, बीसलपुर), मुद्राओं (रानी सोमल्लदेवी अंकित अजयप्रिय द्रम्म), सैन्य अभियानों और दिल्ली सल्तनत के विरुद्ध ऐतिहासिक प्रतिरोध से जुड़े प्रश्न नियमित रूप से पूछे जाते हैं।
2. मूल अवधारणाएँ
2.1 क्षेत्र, वंश और राजकीय शब्दावली
- सपादलक्ष (सवा लाख): चौहानों के मूल राज्य का प्राचीन भौगोलिक नाम, जिसका विस्तार सांभर, अजमेर, नागौर तथा जयपुर व सीकर के कुछ भागों में था; ऐतिहासिक रूप से सवा लाख गाँवों के समूह के कारण सपादलक्ष कहलाया।
- शाकम्भरी: आधुनिक सांभर; चाहमानों की प्राचीनतम राजधानी जहाँ सांभर झील के किनारे कुलदेवी शाकम्भरी माता का पावन मंदिर स्थित है।
- अजयमेरु (अजमेर): 1113 ई. में अजयराज द्वारा गढ़ बीठली पहाड़ी पर स्थापित सामरिक पर्वतीय राजधानी, जिसे बाद में तारागढ़ दुर्ग कहा गया।
- चाहमान शब्द की व्युत्पत्ति: प्राचीन चारण और संस्कृत परंपरा के अनुसार चार अक्षरों का अर्थ: चा (चाप/धनुष), ह (हरि/ईश्वर भक्ति), म (मान/स्वाभिमान), और न (नीति/राजनीतिक कौशल)।
- अग्निकुल मत: चंदबरदाई के पृथ्वीराज रासो में वर्णित और मुहणौत नैणसी व सूर्यमल्ल मी मिश्रण द्वारा समर्थित मत; जिसके अनुसार आबू पर्वत पर महर्षि वशिष्ठ के यज्ञकुंड से धर्म की रक्षा हेतु प्रतिहार, परमार और चालुक्य के साथ चौथे वीर के रूप में चौहान उत्पन्न हुए।
- कुलदेवी और कुलदेवता: शाकम्भरी माता (सांभर) और आशापुरा माता (नाडोल/जालौर) कुलदेवी के रूप में पूज्य हैं; सीकर के हर्ष पर्वत पर स्थित भगवान शिव का हर्षनाथ मंदिर कुलदेवता के रूप में प्रतिष्ठित है; जीण माता (हर्ष की बहन) रेवासा (सीकर) में आराध्य हैं।
- राय पिथौरा और दल-पंगुल: पृथ्वीराज तृतीय की उपाधियाँ; राय पिथौरा दिल्ली में उनके दुर्ग (किला राय पिथौरा) से संबंधित है, जबकि दल-पंगुल का अर्थ "विश्व विजेता / सेनाओं का स्वामी" है।
- हम्मीर हठ: शरणागत की रक्षा और राजपूत आन-बान की रक्षा के लिए अपनी प्रतिज्ञा पर अडिग रहने का अमर प्रतीक; रणथम्भौर के हम्मीर देव ने मंगोल विद्रोही मुहम्मद शाह को शरण देकर अपना संपूर्ण राज्य बलिदान कर दिया।
3. उत्पत्ति, स्रोत और भूगोल
3.1 चौहानों की उत्पत्ति के प्रमुख सिद्धांत
- अग्निकुल का सिद्धांत: चंदबरदाई द्वारा पृथ्वीराज रासो में प्रतिपादित; मुहणौत नैणसी और महाकवि सूर्यमल्ल मी मिश्रण (वंश भास्कर) द्वारा समर्थित; आबू पर्वत पर वशिष्ठ के यज्ञकुंड से उत्पत्ति मानता है।
- सूर्यवंशी मत: जयानक कृत पृथ्वीराज विजय, नयनचंद्र सूरि कृत हम्मीर महाकाव्य, राजशेखर कृत प्रबंध कोष, चंद्रशेखर कृत सुर्जन चरित तथा बेदला शिलालेख द्वारा समर्थित; आधुनिक इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने भी चौहानों को सूर्यवंशी माना है।
- चंद्रवंशी मत: आबू के अचलेश्वर शिलालेख और हांसी शिलालेख में चौहानों को चंद्रवंशी बताया गया है।
- वत्स गोत्रीय ब्राह्मण मत: बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) में प्रारंभिक चौहान सामंतराज को "वत्स गोत्रे विप्र:" (वत्स गोत्र का ब्राह्मण) कहा गया है; पुराविद् डॉ. डी.आर. भंडारकर और डॉ. दशरथ शर्मा (अर्ली चौहान डायनेस्टीज) ने इस मत का प्रबल समर्थन किया है।
- विदेशी / शक-सिथियन मत: कर्नल जेम्स टॉड और विलियम क्रुक द्वारा प्रतिपादित; सूर्य पूजा, अग्नि साधना और अस्त्र-शस्त्र पूजा की समानताओं के आधार पर मध्य एशियाई शकों/हूणों से उत्पत्ति मानता है; डॉ. वी.ए. स्मिथ द्वारा समर्थित।
3.2 शिलालेख, साहित्य और पुरातात्विक स्रोत
- बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.): भीलवाड़ा में सोमेश्वर के शासनकाल में उत्कीर्ण; गुणभद्र द्वारा रचित और केशव द्वारा उत्कीर्ण; वासुदेव से वंशावली, सांभर झील निर्माण, चौहानों को वत्स गोत्रीय विप्र बताना, तथा प्राचीन नगरों के नाम (जाबालिपुर = जालौर, शाकम्भरी = सांभर, नागद्रह = नागदा, मांडव्यपुर = मंडोर, श्रीमाल = भीनमाल) प्रस्तुत करता है।
- हर्षनाथ शिलालेख (973 ई.): विग्रहराज द्वितीय के समय सीकर के हर्षनाथ मंदिर से प्राप्त; गूवक प्रथम को गुर्जर-प्रतिहार नागभट द्वितीय का सम्मानित सामंत बताता है तथा सिंहराज व विग्रहराज द्वितीय तक की वंशावली देता है।
- दिल्ली-टोपरा स्तंभ अभिलेख: विग्रहराज चतुर्थ वीसलदेव द्वारा अशोक के स्तंभ पर उत्कीर्ण करवाया गया; दिल्ली विजय और हिमालय तक म्लेच्छों को खदेड़ने का गौरवपूर्ण विवरण देता है।
- पृथ्वीराज रासो: दरबारी कवि चंदबरदाई द्वारा पिंगल में रचित महाकाव्य; उनके पुत्र जल्हण द्वारा पूर्ण किया गया; अग्निकुल मत, सैन्य विजय, संयोगिता स्वयंवर और तराइन युद्ध का विशद वर्णन करता है।
- पृथ्वीराज विजय: कश्मीरी विद्वान जयानक द्वारा संस्कृत में रचित प्रामाणिक ऐतिहासिक काव्य; अजमेर के चौहानों, प्रशासनिक अधिकारियों और नगर-वैभव का प्रामाणिक विवरण देता है।
- हम्मीर महाकाव्य: जैन विद्वान नयनचंद्र सूरि द्वारा रचित; रणथम्भौर शाखा के इतिहास, हम्मीर के 16 युद्धों और 1301 के साके का अद्वितीय दस्तावेज।
- कान्हड़दे प्रबंध: दरबारी कवि पद्मनाभ (1455 ई.) द्वारा पुरानी राजस्थानी में रचित अमर ग्रंथ; 1311 ई. में अलाउद्दीन खिलजी के विरुद्ध कान्हड़देव और वीरमदेव के शौर्य का प्रामाणिक ऐतिहासिक विवरण।
3.3 भौगोलिक विस्तार और प्रमुख शाखाएँ
- शाकम्भरी-अजमेर शाखा: 551 ई. से 1192 ई. तक सपादलक्ष (सांभर और अजमेर) पर शासन करने वाला मूल साम्राज्यिक वंश।
- नाडोल शाखा: 960 ई. में लक्ष्मण (लाखन) द्वारा स्थापित (शाकम्भरी के वाक्पतिराज प्रथम के पुत्र); गोडवाड़ (पाली) क्षेत्र में व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा का केंद्र।
- जालौर (सोनगरा) शाखा: 1181/1182 ई. में कीर्तिपाल (कीतू) द्वारा स्थापित (नाडोल शाखा से); स्वर्णगिरि दुर्ग पर स्थित; कान्हड़देव के समय अमर हुई।
- रणथम्भौर शाखा: 1194 ई. में गोविंदराज (पृथ्वीराज तृतीय के पुत्र) द्वारा स्थापित; तराइन के पश्चात अरावली-विंध्याचल के बीहड़ों में चौहान सत्ता का नया केंद्र।
- सिरोही (देवड़ा) शाखा: 1311 ई. में लुंभा द्वारा स्थापित; परमारों से चंद्रावती और आबू जीता; 1405 में शिवभान ने पुराना सिरोही तथा 1425 में सहसमल ने नवीन सिरोही नगर बसाया।
- हाड़ौती (हाड़ा) शाखा: 1241 ई. में देवा हाड़ा द्वारा बूंदी के मीणा सरदार जैता को हराकर स्थापित; बाद में 1631 ई. में शाहजहाँ के फरमान से कोटा को माधो सिंह हाड़ा के अधीन स्वतंत्र राज्य बनाया गया।
4. शासक और राजनीतिक घटनाक्रम
4.1 शाकम्भरी काल: वासुदेव से पृथ्वीराज प्रथम (लगभग 551–1105 ई.)
- वासुदेव (लगभग 551 ई.): चाहमान वंश के आदि पुरुष व संस्थापक; शाकम्भरी (सांभर) को राजधानी बनाया; बिजौलिया शिलालेख के अनुसार प्राकृतिक सांभर झील का निर्माण करवाया; शाकम्भरी माता के मंदिर की स्थापना की।
- गूवक प्रथम: 9वीं शताब्दी के आरंभ में गुर्जर-प्रतिहार सम्राट नागभट द्वितीय के प्रतापी सामंत; सीकर के हर्ष पर्वत पर कुलदेवता हर्षनाथ महादेव के भव्य मंदिर का निर्माण करवाया; प्रतिहार राजसभा में विशिष्ट सम्मान पाया।
- गूवक द्वितीय एवं चंदनराज: चंदनराज की रानी रुद्राणी (आत्मप्रभा) हठयोग में निपुण थीं; वे प्रतिदिन पुष्कर झील में महादेव के सम्मुख 1000 दीपक प्रज्वलित कर शिव-आराधना करती थीं।
- सिंहराज: वाक्पतिराज के पुत्र; गुर्जर-प्रतिहारों की अधीनता को पूर्णतः समाप्त कर महाराजाधिराज की उपाधि धारण करने वाले प्रथम चौहान शासक बने; तोमरों और प्रतिहारों को पराजित किया; 973 ई. के हर्ष अभिलेख में प्रशंसित।
- विग्रहराज द्वितीय: गुजरात के चालुक्य नरेश मूलराज प्रथम को पराजित कर कंथकोट दुर्ग में शरण लेने पर विवश किया; नर्मदा तट पर भृगुकच्छ (भड़ौच) तक सैन्य अभियान कर वहाँ आशापुरा माता का मंदिर बनवाया; 973 ई. का हर्षनाथ शिलालेख इन्हीं के काल का है।
- पृथ्वीराज प्रथम (लगभग 1105 ई.): परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर की उपाधि धारण की; पुष्कर में ब्राह्मणों को लूटने आए 700 चालुक्यों का वध कर धर्म की रक्षा की; तीर्थ यात्रियों हेतु अन्नसत्र स्थापित किए।
4.2 अजमेर राज्य: अजयराज, अर्णोराज और जगद्देव (1105–1153 ई.)
- अजयराज द्वितीय (लगभग 1105–1132 ई.): पृथ्वीराज प्रथम के पुत्र; 1113 ई. में अजयमेरु (अजमेर) नगर की स्थापना की और गढ़ बीठली पहाड़ी पर अजेय अजयमेरु दुर्ग (तारागढ़) बनवाया; राजधानी सांभर से अजमेर स्थानांतरित की।
- मालवा के सेनापति सुल्हाना को बंदी बनाया तथा तुर्क आक्रमणों को विफल किया।
- अजयप्रिय द्रम्म नामक चाँदी और तांबे के सिक्के चलाए, जिन पर उनकी पटरानी सोमल्लदेवी (सोमलदेवी) का नाम अंकित था; राजपूत इतिहास में रानी का नाम सिक्कों पर अंकित होना एक दुर्लभ उदाहरण है।
- धार्मिक रूप से सहिष्णु: शिव मंदिर बनवाए तथा जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ के मंदिर पर स्वर्ण कलश चढ़ाया।
- अर्णोराज (आनाजी, लगभग 1133–1155 ई.): अजयराज के पुत्र; अजमेर पर आक्रमण करने वाली तुर्क सेना को करारी शिकस्त दी; तुर्कों के रक्त से अपवित्र हुई भूमि को शुद्ध करने हेतु चंद्रा नदी के जल को रोककर प्रसिद्ध आनासागर झील का निर्माण करवाया।
- पुष्कर में भगवान विष्णु के वराह मंदिर का निर्माण करवाया; गुजरात के चालुक्य जयसिंह सिद्धराज और कुमारपाल से संघर्ष किया; सिद्धराज की पुत्री कांचनदेवी से विवाह किया।
- विद्वानों के संरक्षक; इनके दरबार में प्रकांड विद्वान देवबोध और धर्मघोष उपस्थित थे।
- जगद्देव (लगभग 1155 ई.): अर्णोराज के ज्येष्ठ पुत्र; राजलोभ में पिता अर्णोराज की हत्या कर दी, जिससे वे चौहान वंश के प्रथम पितृहंता कहलाए; इनके अनुज विग्रहराज चतुर्थ ने इन्हें शीघ्र अपदस्थ कर सत्ता संभाली।
4.3 स्वर्ण युग: विग्रहराज चतुर्थ "वीसलदेव" (लगभग 1153–1163 ई.)
- विग्रहराज चतुर्थ (वीसलदेव, लगभग 1153–1163 ई.): अर्णोराज के पुत्र; इनका शासनकाल अजमेर के चौहान साम्राज्य का स्वर्ण युग माना जाता है।
- साम्राज्य विस्तार: तोमर शासकों से दिल्ली (ढिल्लिका) छीनी और उन्हें अधीन किया; मालवा के परमारों को दबाया, हांसी जीता और पंजाब से तुर्कों को खदेड़ा; दिल्ली-टोपरा स्तंभ अभिलेख में घोषणा करवाई कि उन्होंने आर्यावर्त को म्लेच्छों से मुक्त कर दिया।
- साहित्यिक योगदान एवं उपाधियाँ: स्वयं उच्च कोटि के विद्वान थे और कविबांधव (कविराज) की उपाधि धारण की; संस्कृत में प्रसिद्ध हरकेलि नाटक की रचना की (भारवि के किरातार्जुनीय पर आधारित, शिव-अर्जुन संवाद; इसके अंश ढाई दिन के झोपड़े और ब्रिस्टल में राजा राममोहन राय के स्मारक पर उत्कीर्ण हैं)।
- दरबारी कवि सोमदेव ने प्रसिद्ध संस्कृत नाटक ललित विग्रहराज की रचना की, जिसमें वीसलदेव और इंद्रपुरी की राजकुमारी देसलदेवी की प्रेमकथा का वर्णन है।
- जयानक ने पृथ्वीराज विजय में लिखा कि विग्रहराज के देहांत के पश्चात कविबांधव की उपाधि वास्तव में अनाथ हो गई।
- स्थापत्य निर्माण: 1153 ई. में अजमेर में सरस्वती कंठाभरण नामक भव्य संस्कृत महाविद्यालय और मंदिर का निर्माण करवाया, जिसे 1199 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक ने तुड़वाकर ढाई दिन का झोपड़ा मस्जिद में परिवर्तित कर दिया; टोंक में बीसलपुर नगर बसाया, बीसलसर झील बनवाई और गोकर्णेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण करवाया।
4.4 मध्यवर्ती शासक और सोमेश्वर (1163–1177 ई.)
- विग्रहराज चतुर्थ के बाद उनके अल्पवयस्क पुत्र अपरगांगेय गद्दी पर बैठे, जिन्हें जगद्देव के पुत्र पृथ्वीराज द्वितीय (1167–1169 ई.) ने अपदस्थ कर दिया; पृथ्वीराज द्वितीय ने हांसी का दुर्ग सुदृढ़ किया और मुस्लिम आक्रमणों को रोका; वे निःसंतान दिवंगत हुए।
- दरबारी मंत्रियों ने अर्णोराज के तीसरे पुत्र सोमेश्वर (1169–1177 ई.) को गुजरात के चालुक्य दरबार से आमंत्रित कर अजमेर की गद्दी सौंपी।
- सोमेश्वर का विवाह त्रिपुरी (चेदि) के कलचुरी राजा अचलराज की राजकुमारी कर्पूरी देवी से हुआ; जिनसे पृथ्वीराज तृतीय और हरिराजा का जन्म हुआ।
- अजमेर में वैद्यनाथ और त्रिपुरुष के भव्य मंदिर बनवाए; वृषभ और अश्वारोही शैली के सिक्के चलाए; इन्हीं के काल में 1170 ई. का प्रसिद्ध बिजौलिया शिलालेख उत्कीर्ण हुआ; 1177 ई. में गुजरात के चालुक्य भीम द्वितीय से युद्ध में वीरगति पाई।
4.5 पृथ्वीराज तृतीय "राय पिथौरा": 1177–1192 ई.
- पृथ्वीराज तृतीय (1177–1192 ई.): सोमेश्वर और कर्पूरी देवी के ज्येष्ठ पुत्र; 1166 ई. में अणहिलवाड़ (पाटण), गुजरात में जन्म; मात्र 11 वर्ष की अल्पायु में 1177 ई. में अजमेर की गद्दी पर बैठे।
- संरक्षिका एवं मंत्री: माता राजमाता कर्पूरी देवी ने कुशल संरक्षिका के रूप में शासन संभाला; प्रधानमंत्री कदंबवास (कैमास) और सेनापति भुवनमल्ल ने आंतरिक प्रशासन को सुदृढ़ किया।
- 1178 ई. में सत्ता स्वयं संभाली; गुड़गांव (गुड़ापुर) के विद्रोही चचेरे भाई नागार्जुन का दमन किया; 1182 ई. में अलवर-भरतपुर के उपद्रवी भादानकों की शक्ति को पूर्णतः कुचल दिया।
- महोबा का युद्ध (तुमूल का युद्ध, 1182 ई.): चंदेल राजा परमार्दिदेव को पराजित किया; इस युद्ध में चंदेलों के अमर वीर सेनानी आल्हा और ऊदल (बनाफर बंधु) अद्वितीय वीरता दिखाते हुए वीरगति को प्राप्त हुए; पृथ्वीराज ने पंजुन राय को महोबा का प्रशासक नियुक्त किया।
- चालुक्य एवं गहड़वाल संघर्ष: गुजरात के चालुक्य भीम द्वितीय से संघर्ष के बाद जगद्देव प्रतिहार के प्रयासों से संधि हुई; कन्नौज के गहड़वाल राजा जयचंद से कटुता रही, जहाँ पृथ्वीराज ने स्वयंवर से राजकुमारी संयोगिता का हरण कर गांधर्व विवाह किया।
- तराइन का प्रथम युद्ध (1191 ई.): शहाबुद्दीन मुहम्मद गोरी ने तबरहिंद (भटिंडा) जीतकर आगे बढ़ा; पृथ्वीराज तृतीय ने विशाल राजपूत सेना के साथ तराइन (करनाल, हरियाणा) के मैदान में गोरी को करारी शिकस्त दी; दिल्ली के गोविंदराय ने गोरी को घायल किया और गोरी जान बचाकर भाग निकला।
- तराइन का द्वितीय युद्ध (1192 ई.): गोरी 1,20,000 चुनिंदा अश्वारोहियों के साथ लौटा; कूटनीतिक धोखे से संधि वार्ता में उलझाकर भोर के समय राजपूत सेना पर अचानक हमला किया; पृथ्वीराज तृतीय पराजित हुए, सरस्वती (सिरसा) के निकट बंदी बनाए गए और मृत्युदंड दिया गया; यह पराजय भारत में दिल्ली सल्तनत की स्थापना का युगांतरकारी मोड़ सिद्ध हुई।
- साहित्यिक संरक्षण: कला और साहित्य के महान संरक्षक; कला एवं साहित्य विभाग की स्थापना की जिसके अध्यक्ष पद्मनाभ थे; राजसभा में चंदबरदाई (पृथ्वीराज रासो), जयानक (पृथ्वीराज विजय), विद्यापति गौड़, वागीश्वर जनार्दन, और विश्वरूप जैसे प्रकांड विद्वान सुशोभित थे।
- हरिराज (1192–1194 ई.): पृथ्वीराज तृतीय के छोटे भाई; अजमेर पर अधिकार कर कुतुबुद्दीन ऐबक के विरुद्ध भीषण प्रतिरोध किया; अंततः तारागढ़ में घिर जाने पर पूरे परिवार सहित आत्मदाह कर लिया, जिससे अजमेर के चौहानों का अंत हुआ।
4.6 रणथम्भौर शाखा: हम्मीर देव (1282–1301 ई.)
- रणथम्भौर शाखा की स्थापना: 1194 ई. में गोविंदराज (पृथ्वीराज तृतीय के पुत्र) द्वारा स्थापित; इसके बाद वल्हण, प्रह्लाद, वीरनारायण (इल्तुतमिश द्वारा धोखे से दिल्ली बुलाकर विष दिया गया), और वाग्भट ने शासन किया।
- जैत्रसिंह (1253–1282 ई.): 32 वर्षों तक शासन किया; 1282 ई. में अपने सुयोग्य तीसरे पुत्र हम्मीर देव को गद्दी सौंपी; हम्मीर ने पिता के 32 वर्षों के शासन की स्मृति में रणथम्भौर दुर्ग में लाल पत्थर की 32 खंभों की छतरी बनवाई, जहाँ बैठकर वे न्याय करते थे।
- हम्मीर देव (1282–1301 ई.): अपने अप्रतिम शौर्य और शरणागत की रक्षा के लिए प्रसिद्ध (हम्मीर हठ); दिग्विजय नीति अपनाकर आबू, खंडेला, मालवा और धार के परमारों को पराजित किया; अपने जीवन में लड़े 17 युद्धों में से 16 में विजयी रहे।
- जलालुद्दीन खिलजी का असफल घेरा (1290–1292 ई.): सुल्तान जलालुद्दीन ने रणथम्भौर की कुंजी झाईं दुर्ग पर अधिकार किया किंतु मुख्य दुर्ग को जीतने में पूर्णतः विफल रहा; हताश होकर सुल्तान ने यह कहते हुए घेरा उठाया कि मैं ऐसे दस दुर्गों को भी मुसलमान के एक बाल के बराबर नहीं समझता।
- अलाउद्दीन खिलजी से संघर्ष: 1299 ई. में गुजरात लूट के माल के बंटवारे पर विद्रोही हुए मंगोल सेनापति मीर मुहम्मद शाह और केहबरू को हम्मीर ने अपने यहाँ शरण दी; अलाउद्दीन की मांग के बावजूद शरणागत धर्म का पालन करते हुए उन्हें सौंपने से साफ इनकार कर दिया।
- अलाउद्दीन ने उलुग खां और नुसरत खां को भेजा; नुसरत खां दुर्ग की प्राचीर से चलाए गए पत्थर से मारा गया; इसके बाद अलाउद्दीन ने स्वयं आकर विशाल सेना सहित घेरा डाला।
- विश्वासघात और 1301 का साका: हम्मीर के दो सेनापति रणमल और रतिपाल दुर्ग के लालच में खिलजी से जा मिले, जिससे दुर्ग में खाद्य सामग्री का भीषण अकाल पड़ गया और जल स्रोत अपवित्र कर दिए गए।
- राजस्थान का प्रथम साका (11 जुलाई 1301 ई.): हम्मीर देव ने केसरिया बाना पहनकर भीषण युद्ध किया और वीरगति पाई; रानी रंगदेवी और पुत्री पद्मला ने पद्मला तालाब में जल-जौहर किया; अमीर खुसरो ने लिखा कि आज कुफ्र का गढ़ इस्लाम का घर हो गया।
- साहित्यिक स्रोत: नयनचंद्र सूरि कृत हम्मीर महाकाव्य, जोधराज/सारंगधर कृत हम्मीर रासो, चंद्रशेखर कृत हम्मीर हठ, और भांडव व्यास कृत हम्मीरायण।
4.7 जालौर शाखा: कान्हड़देव और वीरमदेव (1305–1311 ई.)
- जालौर शाखा की स्थापना: 1181/1182 ई. में कीर्तिपाल (कीतू) द्वारा स्थापित (नाडोल के अल्हण के पुत्र); इतिहासकार मुहणौत नैणसी ने इन्हें "कीतू एक महान राजपूत" कहा; स्वर्णगिरि दुर्ग को अपनी राजधानी बनाया।
- इनके बाद समरसिंह, उदयसिंह (जिन्होंने नाडोल व मंडोर जीतकर इल्तुतमिश को चुनौती दी), चाचिगदेव और सामंतसिंह शासक बने।
- कान्हड़देव (1305–1311 ई.): जालौर के सर्वाधिक प्रतापी सोनगरा चौहान शासक; 1299 ई. में अलाउद्दीन की गुजरात जा रही सेना को अपने राज्य से मार्ग देने से साफ इनकार किया; लौटती खिलजी सेना पर आक्रमण कर सोमनाथ शिवलिंग के टुकड़ों को मुक्त करवाया।
- वीरमदेव और फिरोजा प्रसंग: कान्हड़देव के तेजस्वी पुत्र वीरमदेव दिल्ली दरबार में उपस्थित थे; अलाउद्दीन की पुत्री राजकुमारी फिरोजा वीरमदेव पर मोहित हो गई और विवाह का प्रस्ताव रखा; वीरमदेव ने कुलमर्यादा के विरुद्ध विवाह अस्वीकार कर दिया और दिल्ली से जालौर लौट आए; फिरोजा की धाय गुल-बहश्त ने आक्रमण किया।
- सिवाना का घेरा (1308 ई.): सिवाना दुर्ग जालौर की रक्षा की कुंजी और संकटकालीन शरणस्थली था; कान्हड़देव के भतीजे शीतलदेव (सांतल देव) और सोमेश्वर ने अदम्य साहस से रक्षा की; देशद्रोही भायला पंवार ने गुप्त मार्ग बताकर भांडेलाव तालाब में गो-रक्त मिलवा दिया; शीतलदेव लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए, वीरांगनाओं ने जौहर किया; अलाउद्दीन ने सिवाना जीतकर उसका नाम खैराबाद रखा और कमालुद्दीन गुर्ग को दुर्ग रक्षक बनाया।
- जालौर का घेरा और 1311 का साका: कमालुद्दीन गुर्ग के नेतृत्व में विशाल खिलजी सेना ने जालौर दुर्ग को घेरा; देशद्रोही बीका दहिया ने दुर्ग की कच्ची दीवार का भेद बता दिया (उसकी देशभक्त पत्नी हीरा देई ने देशद्रोह के कारण पति का वध कर दिया); तुर्क सेना दुर्ग में प्रविष्ट हो गई।
- जालौर का साका (1311 ई.): कान्हड़देव वीरतापूर्वक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए; वीरमदेव ने कुलदेवी आशापुरा माता के मंदिर के सामने अपनी कटार घोंपकर प्राणोत्सर्ग कर दिया; रानी जेतलदे के नेतृत्व में वीरांगनाओं ने जौहर किया; अलाउद्दीन ने जालौर जीतकर उसका नाम जलालाबाद रखा और तोपखाना मस्जिद बनवाई।
- पद्मनाभ द्वारा रचित कान्हड़दे प्रबंध और वीरमदेव सोनगरा री वात इस ऐतिहासिक घटना के सर्वोत्कृष्ट स्रोत हैं।
4.8 नाडोल, सिरोही और हाड़ौती की शाखाएँ
- नाडोल शाखा (960 ई.): शाकम्भरी के वाक्पतिराज प्रथम के पुत्र लक्ष्मण (लाखन) द्वारा स्थापित; पाली के गोडवाड़ क्षेत्र में नाडोल को राजधानी बनाया; मेदों का दमन किया; आशापुरा माता का मंदिर बनवाया; इसी शाखा से जालौर के संस्थापक कीर्तिपाल निकले।
- सिरोही शाखा (देवड़ा चौहान): 1311 ई. में राव लुंभा द्वारा स्थापित; परमारों से चंद्रावती और आबू जीता; 1405 ई. में राव शिवभान ने पुराना सिरोही बसाया; 1425 ई. में राव सहसमल ने नवीन सिरोही नगर की स्थापना की; राव सुरताण ने 1583 ई. के दत्ताणी के युद्ध में अकबर की शाही सेना को पराजित किया; 1823 ई. में राव शिवसिंह के समय सिरोही अंग्रेजों से सहायक संधि करने वाली राजस्थान की अंतिम रियासत बनी।
- हाड़ौती शाखा (बूंदी और कोटा के हाड़ा चौहान): नाडोल चौहानों की शाखा; 1241 ई. में राव देवा हाड़ा ने मीणा सरदार जैता को हराकर बूंदी राज्य की नींव रखी; राव सुरजन हाड़ा ने 1569 ई. में भगवंत दास और मानसिंह की मध्यस्थता से अकबर की अधीनता स्वीकार की; 1631 ई. में मुगल बादशाह शाहजहाँ ने माधो सिंह हाड़ा की वीरता से प्रसन्न होकर बूंदी से अलग कर कोटा को स्वतंत्र राज्य का दर्जा दिया।
5. प्रशासन, राजस्व और सुरक्षा
5.1 केंद्रीय प्रशासन और मंत्रिपरिषद्
- चौहान प्रशासनिक व्यवस्था वैदिक राजतंत्र और राजपूत सामंती व्यवस्था का उत्कृष्ट समन्वय थी।
- राजा राज्य का सर्वोच्च कार्यपालक, न्यायाधीश और सेनापति होता था; वह परमभट्टारक, महाराजाधिराज, परमेश्वर जैसी गरिमामयी उपाधियाँ धारण करता था।
- महामात्य (प्रधानमंत्री): नागरिक व राजस्व प्रशासन का सर्वोच्च अधिकारी; जैसे पृथ्वीराज तृतीय के समय कदंबवास (कैमास) तथा सोमेश्वर के समय स्कंद।
- सेनापति: सैन्य संगठन, भर्ती और युद्ध संचालन का सर्वोच्च अधिकारी (जैसे पृथ्वीराज तृतीय के समय भुवनमल्ल)।
- संधिविग्रहिक: युद्ध, शांति और विदेशी कूटनीति का प्रभारी मंत्री; पड़ोसी राज्यों के साथ संधियों और दूतों का प्रबंधन करता था।
- दंडनायक और कोतवाल: कानून व्यवस्था, आंतरिक सुरक्षा, दुर्ग रक्षा और दंड व्यवस्था का अधिकारी।
- अक्षपटलिक: राजकीय अभिलेखागार, राजस्व बही-खातों और ताम्रपत्रों का मुख्य संरक्षक।
- पुरोहित: धार्मिक अनुष्ठानों, राजसूय/अश्वमेध यज्ञों और देवस्थानों के अनुदान का प्रभारी।
- कला एवं साहित्य विभाग: पृथ्वीराज तृतीय द्वारा विद्वानों, कवियों और शास्त्रार्थों को संरक्षण देने हेतु स्थापित अनूठा विभाग, जिसके अध्यक्ष पद्मनाभ थे।
5.2 प्रांतीय व्यवस्था, सामंती ढाँचा और राजस्व प्रणाली
- प्रांतीय प्रशासन: साम्राज्य प्रशासनिक सुविधा हेतु सुव्यवस्थित इकाइयों में विभाजित था:
-
- भुक्ति / मंडल: विशाल प्रांत, जिनका शासन राजकुमारों (राष्ट्रीय) या उच्च सामंतों द्वारा संभाला जाता था।
-
- विषय: जिले के समान प्रशासनिक इकाई, जिसका प्रमुख विषयपति होता था जो कर वसूली और न्याय देखता था।
-
- ग्राम: प्रशासन की सबसे छोटी इकाई, जिसका प्रबंध ग्रामिक अथवा वंशानुगत मुखिया (पटेल/भोजक) करता था।
- सामंती व्यवस्था: राजा अपने कुलीन सरदारों के माध्यम से शासन करता था जिन्हें सामंत, मांडलिक, राणक और ठाकुर कहा जाता था; ये जागीरें संभालते थे, सेना रखते थे और संकट के समय राजा को सैन्य टुकड़ी भेजते थे।
- राजस्व और कर:
-
- भाग: कृषि उपज का नियमित सरकारी हिस्सा, जो सामान्यतः उपज का छठा भाग (1/6) होता था।
-
- भोग: फल, फूल, लकड़ी, दूध आदि के रूप में राजा को दी जाने वाली दैनिक/मौसमी भेंट।
-
- कर: व्यापारियों, शिल्पियों और व्यवसायियों पर लगाया जाने वाला नियमित वाणिज्यिक कर।
-
- दान (शुल्क): व्यापारिक कारवां पर लगने वाला चुंगी कर व राहदारी, जो नगर-द्वार और नदी-घाटों पर वसूला जाता था।
-
- अग्रहार और शासन भूमि: ब्राह्मणों, विद्वानों, जैन मंदिरों और शिव मठों को दान दी गई कर-मुक्त भूमि, जो सभी राजकीय करों से मुक्त होती थी (बिजौलिया और हर्ष अभिलेखों में उल्लेख)।
5.3 दुर्ग, सैन्य संगठन और साका परंपरा
- सामरिक गिरि दुर्ग: चौहानों ने अभेद्य पर्वतीय दुर्गों का निर्माण करवाया जो महीनों लंबे घेरों को झेलने में सक्षम थे:
-
- अजयमेरु (तारागढ़): अजमेर की गढ़ बीठली पहाड़ी पर स्थित; दोहरे परकोटे, 14 विशाल बुर्जों (घूंघट, फूटी, शृंगार चंवरी) और जल-टांकों से सुसज्जित।
-
- रणथम्भौर दुर्ग: अरावली और विंध्याचल की सात पहाड़ियों से घिरा प्राकृतिक वन-दुर्ग; अबुल फजल ने इसके विषय में लिखा: "अन्य सब दुर्ग नंगे हैं, परंतु यह दुर्ग बख्तरबंद है"
-
- स्वर्णगिरि (जालौर) एवं सिवाना दुर्ग: मारवाड़ और गुजरात के प्रवेश मार्गों पर स्थित अजेय दुर्ग, जिन्हें विश्वासघात के बिना जीतना असंभव था।
- सैन्य संगठन (चतुरंगिणी सेना): अश्वसेना, गजसेना, धनुर्धर और पैदल सैनिक; तेज गति के मारवाड़ी व सिंधी अरबी घोड़ों ने सेना को अद्वितीय मारक क्षमता प्रदान की।
- घेराबंदी एवं अस्त्र-शस्त्र: दुर्ग प्राचीरों से पत्थर और अग्नि-गोले फेंकने वाले यंत्र जैसे मगरबी, मंजनीक और अरादा का प्रयोग किया जाता था।
- साका परंपरा: जब दुर्ग में रसद समाप्त हो जाती और विजय असंभव हो जाती, तब राजपूत दोहरे बलिदान की अमर परंपरा निभाते थे:
-
- जौहर: वीरांगनाएँ रानी के नेतृत्व में पवित्र अग्नि अथवा जल में कूदकर अपने सतीत्व और स्वाभिमान की रक्षा करती थीं।
-
- केसरिया: पुरुष योद्धा केसरिया बाना पहनकर, शीश पर तुलसी दल धारण कर दुर्ग के द्वार खोल देते थे और शत्रु का संहार करते हुए वीरगति प्राप्त करते थे।
6. संस्कृति, स्थापत्य और साहित्य
6.1 स्थापत्य कला और प्रमुख ऐतिहासिक स्मारक
- तारागढ़ दुर्ग (अजमेर): 1113 ई. में अजयराज द्वारा निर्मित; मूल नाम गढ़ बीठली; मेवाड़ के राजकुमार पृथ्वीराज सिसोदिया (उड़ना पृथ्वीराज) ने अपनी वीरांगना पत्नी ताराबाई के नाम पर इसका नाम तारागढ़ रखा; ब्रिटिश बिशप हेबर ने इसे "पूर्व का जिब्राल्टर" कहा।
- आनासागर झील (अजमेर): 1135 से 1150 ई. के मध्य अर्णोराज (आनाजी) द्वारा चंद्रा नदी को रोककर निर्मित; जहांगीर ने इसके किनारे दौलत बाग (आधुनिक सुभाष उद्यान) बनवाया और शाहजहाँ ने 1637 ई. में पाँच संगमरमरी बारादरी का निर्माण करवाया।
- वराह मंदिर (पुष्कर): 12वीं सदी में अर्णोराज द्वारा निर्मित भगवान विष्णु का प्रसिद्ध मंदिर; जहांगीर ने इस मंदिर की मूर्ति को पुष्कर झील में फिकवाकर तुड़वाया था; बाद में इसका जीर्णोद्धार हुआ।
- सरस्वती कंठाभरण (ढाई दिन का झोपड़ा, अजमेर): 1153 ई. में विग्रहराज चतुर्थ द्वारा निर्मित संस्कृत पाठशाला व सरस्वती मंदिर; 1199 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक ने इसे तोड़कर मस्जिद का रूप दिया (वास्तुकार अबू बक्र); इसमें 16 नक्काशीदार पाषाण स्तंभ हैं; विग्रहराज कृत हरकेलि नाटक के अंश उत्कीर्ण हैं; यहाँ सूफी संत पंजाब शाह का ढाई दिन का उर्स लगता है जिससे यह ढाई दिन का झोपड़ा कहलाया।
- बीसलपुर मंदिर (टोंक): बनास नदी तट पर विग्रहराज चतुर्थ द्वारा निर्मित; यहाँ गोकर्णेश्वर महादेव का ऐतिहासिक मंदिर स्थित है।
- हर्षनाथ मंदिर (सीकर): गूवक प्रथम द्वारा नींव रखी गई तथा अल्लट द्वारा जीर्णोद्धार; महामेरू शैली का प्रसिद्ध शिव मंदिर जो अद्भुत शिल्पकला युक्त है।
- 32 खंभों की छतरी (रणथम्भौर): हम्मीर देव द्वारा अपने पिता जैत्रसिंह के 32 वर्षों के शासन की स्मृति में रणथम्भौर दुर्ग में निर्मित 50 फीट ऊँची लाल पत्थर की भव्य छतरी; इसके मध्य में शिवलिंग स्थापित है जहाँ हम्मीर न्याय करते थे।
6.2 साहित्यिक धरोहर और दरबारी विद्वान
- हरकेलि नाटक: स्वयं राजा विग्रहराज चतुर्थ वीसलदेव द्वारा संस्कृत में रचित उच्च कोटि का नाटक; भारवि के किरातार्जुनीय पर आधारित (शिव-अर्जुन युद्ध व संवाद); इसके पाषाण अंश ढाई दिन के झोपड़े और ब्रिस्टल में राजा राममोहन राय के स्मारक पर सुरक्षित हैं; जर्मन विद्वान कीलहॉर्न ने इसकी तुलना भवभूति और कालिदास की कृतियों से की।
- ललित विग्रहराज: दरबारी कवि सोमदेव द्वारा संस्कृत में रचित नाटक; विग्रहराज चतुर्थ की तुर्कों पर विजय और इंद्रपुरी की राजकुमारी देसलदेवी के प्रणय का सुंदर वर्णन।
- पृथ्वीराज रासो: पृथ्वीराज तृतीय के अभिन्न सखा व दरबारी कवि चंदबरदाई द्वारा पिंगल में रचित महाकाव्य; उनके पुत्र जल्हण द्वारा पूर्ण किया गया (पुस्तक जल्हण हथ दै, चलि गज्जन नृपकाज); 69 समय (सर्ग) में रचित; संयोगिता स्वयंवर, तराइन युद्ध और शब्दभेदी बाण का अमर वर्णन।
- पृथ्वीराज विजय: कश्मीरी विद्वान जयानक द्वारा पृथ्वीराज के जीवनकाल में संस्कृत में रचित सर्वाधिक प्रामाणिक ऐतिहासिक काव्य; अजमेर के भूगोल, मंत्रियों और वंशावली का सटीक दस्तावेज।
- हम्मीर महाकाव्य: जैन मुनि नयनचंद्र सूरि द्वारा रचित संस्कृत महाकाव्य; रणथम्भौर के इतिहास और हम्मीर के 16 युद्धों व साके का प्रामाणिक विवरण।
- हम्मीर रासो: जोधराज (एवं 14वीं सदी में सारंगधर) द्वारा रचित काव्य; हम्मीर के शौर्य का वर्णन।
- हम्मीर हठ: चंद्रशेखर द्वारा रचित अमर काव्य; हम्मीर की शरणागत वत्सलता और हठ का वर्णन।
- कान्हड़दे प्रबंध एवं वीरमदेव सोनगरा री वात: 1455 ई. में कवि पद्मनाभ द्वारा रचित डिंगल/पुरानी राजस्थानी का सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य; जालौर व सिवाना के साके का सजीव चित्रण।
- मुद्राएँ: अजयराज द्वारा चलाई गई अजयप्रिय द्रम्म जिस पर पटरानी सोमल्लदेवी का नाम अंकित था; सोमेश्वर और पृथ्वीराज तृतीय द्वारा चलाए गए वृषभ एवं अश्वारोही शैली के सिक्के जिन पर असावरी श्री सामंत देव अंकित था।
6.3 धार्मिक जीवन, संप्रदाय और सामाजिक सौहार्द
- धार्मिक समन्वय: चौहान शासक मुख्य रूप से शैव मतावलंबी थे; कुलदेवता हर्षनाथ महादेव की उपासना करते थे और सपादलक्ष में अनेक भव्य शिव मंदिर बनवाए।
- वैष्णव और शाक्त साधना: पुष्कर में वराह मंदिर बनवाकर विष्णु भक्ति को प्रश्रय दिया; कुलदेवी शाकम्भरी माता, आशापुरा माता और जीण माता के प्रति अगाध आस्था रखी।
- जैन धर्म को उदार संरक्षण: जैन विद्वानों और श्रेष्ठी वर्ग को अभूतपूर्व सम्मान प्रदान किया:
-
- अजयराज ने अजमेर के पार्श्वनाथ मंदिर को स्वर्ण कलश भेंट किया।
-
- अर्णोराज ने जैन आचार्य धर्मघोष सूरि का सम्मान किया और मंदिर हेतु भूमि अनुदान दिए।
-
- विग्रहराज चतुर्थ ने आचार्य धर्मघोष सूरि के उपदेश पर एकादशी के दिन संपूर्ण राज्य में पशुवध पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था।
-
- सोमेश्वर ने बिजौलिया के पार्श्वनाथ मंदिर को रेवणा गाँव दान में दिया था।
-
- पृथ्वीराज तृतीय ने अजमेर में दिगंबर विद्वान पद्मप्रभ और श्वेतांबर विद्वान जिनपति सूरि के मध्य ऐतिहासिक शास्त्रार्थ का आयोजन करवाया।
- सामाजिक व्यवस्था: समाज वर्ण व्यवस्था पर आधारित था जिसमें राजपूत सैन्य व शासन का नेतृत्व करते थे, ब्राह्मण मंत्रणा व धर्म का संचालन करते थे, तथा वैश्य (महाजन) व्यापार व राजकोष संभालते थे; क्षत्राणियों ने स्वाभिमान और आन-बान के लिए हँसते-हँसते जौहर की ज्वाला में कूदने का अद्वितीय आदर्श प्रस्तुत किया।
7. कालक्रम और युगांतरकारी घटनाएँ
तिथियाँ ईस्वी हैं; प्रारंभिक अनुमानित तिथियाँ परंपरा के अनुसार भिन्न हो सकती हैं। यह परीक्षा पुनरावृत्ति हेतु चयनित कालक्रम है।
| तिथि | घटना |
|---|---|
| लगभग 551 ई. | वासुदेव द्वारा शाकम्भरी (सांभर) में चौहान वंश की स्थापना |
| 9वीं सदी का प्रारंभ | गूवक प्रथम द्वारा नागभट द्वितीय के सामंत रूप में हर्षनाथ मंदिर निर्माण |
| 9वीं सदी का उत्तरार्ध | चंदनराज का शासन; रानी रुद्राणी (आत्मप्रभा) द्वारा पुष्कर में 1000 दीपदान |
| लगभग 950–970 ई. | सिंहराज द्वारा प्रतिहारों की अधीनता त्यागकर महाराजाधिराज उपाधि धारण |
| 960 ई. | वाक्पतिराज प्रथम के पुत्र लक्ष्मण द्वारा नाडोल चौहान शाखा की स्थापना |
| 973 ई. | विग्रहराज द्वितीय के समय सीकर में हर्षनाथ शिलालेख उत्कीर्ण |
| लगभग 1105 ई. | पृथ्वीराज प्रथम द्वारा पुष्कर में 700 चालुक्य लुटेरों का संहार |
| 1113 ई. | अजयराज द्वारा अजयमेरु (अजमेर) नगर व तारागढ़ की स्थापना; अजयप्रिय द्रम्म सिक्के |
| लगभग 1135–1150 ई. | अर्णोराज (आनाजी) द्वारा आनासागर झील और पुष्कर में वराह मंदिर का निर्माण |
| लगभग 1153–1163 ई. | विग्रहराज चतुर्थ वीसलदेव का स्वर्ण युग; हरकेलि नाटक; सरस्वती कंठाभरण निर्माण |
| 1170 ई. | सोमेश्वर के काल में बिजौलिया शिलालेख उत्कीर्ण; वत्स गोत्रीय विप्र का उल्लेख |
| 1177 ई. | पृथ्वीराज तृतीय मात्र 11 वर्ष की आयु में कर्पूरी देवी के संरक्षण में शासक बने |
| 1181/1182 ई. | कीर्तिपाल (कीतू) द्वारा जालौर के सोनगरा चौहान वंश की स्थापना |
| 1182 ई. | महोबा का युद्ध (तुमूल युद्ध); पृथ्वीराज द्वारा चंदेल पराजित; आल्हा-ऊदल वीरगति |
| 1191 ई. | तराइन का प्रथम युद्ध; पृथ्वीराज तृतीय द्वारा मुहम्मद गोरी की करारी पराजय |
| 1192 ई. | तराइन का द्वितीय युद्ध; गोरी द्वारा पृथ्वीराज तृतीय की पराजय; अजमेर राज्य का पतन |
| 1194 ई. | गोविंदराज (पृथ्वीराज तृतीय के पुत्र) द्वारा रणथम्भौर में चौहान शाखा की स्थापना |
| 1241 ई. | राव देवा हाड़ा द्वारा मीणाओं से बूंदी जीतकर हाड़ा चौहान वंश की स्थापना |
| 1282–1301 ई. | रणथम्भौर में हम्मीर देव का शासन; 32 खंभों की छतरी का निर्माण |
| 1290–1292 ई. | जलालुद्दीन खिलजी का रणथम्भौर पर असफल आक्रमण; निराश होकर घेरा उठाया |
| 1301 ई. (11 जुलाई) | रणथम्भौर में राजस्थान का प्रथम साका; हम्मीर वीरगति; रंगदेवी का जौहर |
| 1305–1311 ई. | जालौर में कान्हड़देव और वीरमदेव का शासन; अलाउद्दीन खिलजी के विरुद्ध संघर्ष |
| 1308 ई. | सिवाना का साका; शीतलदेव वीरगति; अलाउद्दीन द्वारा सिवाना का नाम खैराबाद |
| 1311 ई. | जालौर का साका; कान्हड़देव वीरगति; अलाउद्दीन द्वारा जालौर का नाम जलालाबाद |
| 1311 ई. | राव लुंभा द्वारा सिरोही (चंद्रावती/आबू) में देवड़ा चौहान वंश की स्थापना |
| 1425 ई. | राव सहसमल द्वारा सरणवा पहाड़ियों पर नवीन सिरोही नगर की स्थापना |
| 1455 ई. | कवि पद्मनाभ द्वारा कान्हड़दे प्रबंध की रचना; जालौर युद्ध का ऐतिहासिक वर्णन |
| 1569 ई. | बूंदी के राव सुरजन हाड़ा द्वारा रणथम्भौर सौंपकर अकबर से संधि |
| 1631 ई. | शाहजहाँ द्वारा बूंदी से अलग कर कोटा को माधो सिंह हाड़ा के अधीन स्वतंत्र राज्य बनाना |
| 1823 ई. | राव शिवसिंह के समय सिरोही अंग्रेजों से सहायक संधि करने वाला राजस्थान का अंतिम राज्य |
8. परीक्षा अभ्यास और पूर्व प्रश्नों की स्थिति
8.1 अभ्यास संरचना और सत्यापन
- अध्याय में 60 द्विभाषी अभ्यास प्रश्न विस्तृत व्याख्या सहित छह अलग-अलग परीक्षाओं में संकलित हैं। मूल सिद्धांत नोट्स को परीक्षा अभ्यास से अलग रखा गया है ताकि अवधारणाओं की गहन पुनरावृत्ति हो सके।
- मूल प्रारूप में दोहराए गए प्रश्न और अप्रमाणित परीक्षा-वर्ष टैग थे; संपादकीय मानकों के अनुसार सभी प्रश्नों को प्रामाणिक तथ्यों के साथ उच्च-उपयोगी अभ्यास प्रश्नों में रूपांतरित किया गया है।
- अभ्यर्थियों को स्थापना तिथियों, प्रमुख अभिलेखों (बिजौलिया, हर्षनाथ, दिल्ली-टोपरा), साहित्यिक कृतियों और उनके रचनाकारों, स्थापत्य स्मारकों (तारागढ़, आनासागर, ढाई दिन का झोपड़ा, 32 खंभों की छतरी), तराइन के युद्धों (1191 और 1192 ई.), तथा रणथम्भौर (1301 ई.) व जालौर (1311 ई.) के ऐतिहासिक साकों पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
9. त्वरित पुनरावृत्ति सारणी
| शासक / विषय | प्रमुख परीक्षा तथ्य |
|---|---|
| वासुदेव | लगभग 551 ई. में शाकम्भरी में चौहान वंश की स्थापना; सांभर झील का निर्माण |
| गूवक प्रथम | नागभट द्वितीय के सामंत; सीकर में हर्षनाथ महादेव मंदिर का निर्माण |
| रानी रुद्राणी | चंदनराज की रानी; योगिनी, पुष्कर में प्रतिदिन 1000 दीपदान |
| सिंहराज | महाराजाधिराज की उपाधि धारण करने वाले प्रथम चौहान शासक |
| विग्रहराज द्वितीय | मूलराज चालुक्य को हराया; भड़ौच में आशापुरा माता का मंदिर बनवाया |
| अजयराज द्वितीय | अजमेर (1113 ई.) व तारागढ़ की स्थापना; सोमल्लदेवी अंकित अजयप्रिय द्रम्म |
| अर्णोराज (आनाजी) | आनासागर झील और पुष्कर में वराह मंदिर का निर्माण; तुर्कों की पराजय |
| विग्रहराज चतुर्थ वीसलदेव | स्वर्ण युग; हरकेलि नाटक रचयिता; सरस्वती कंठाभरण व बीसलपुर |
| सोमेश्वर | वृषभ व अश्वारोही सिक्के चलाए; 1170 ई. का बिजौलिया शिलालेख उत्कीर्ण |
| पृथ्वीराज तृतीय राय पिथौरा | तराइन प्रथम (1191) के विजेता; तराइन द्वितीय (1192) में पराजित; चंदबरदाई के संरक्षक |
| गोविंदराज | अजमेर के पतन के बाद 1194 ई. में रणथम्भौर चौहान शाखा की स्थापना |
| हम्मीर देव | 16 युद्धों के विजेता; मुहम्मद शाह को शरण; 32 खंभों की छतरी; 1301 का साका |
| कीर्तिपाल (कीतू) | नाडोल से निकले; 1181 ई. में जालौर के सोनगरा चौहान वंश की स्थापना |
| कान्हड़देव व वीरमदेव | अलाउद्दीन खिलजी से संघर्ष; सिवाना (1308) व जालौर (1311) के साके |
| राव लुंभा | 1311 ई. में सिरोही / आबू में देवड़ा चौहान शाखा की स्थापना |
| राव देवा हाड़ा | 1241 ई. में मीणाओं से बूंदी जीतकर हाड़ा चौहान वंश की स्थापना |
10. सामान्य भ्रम और स्मरण-सूत्र
10.1 प्रमुख अंतर और स्मरण-सूत्र
- वासुदेव—सांभर झील (लगभग 551 ई.); गूवक प्रथम—हर्षनाथ मंदिर (सीकर); सिंहराज—प्रथम महाराजाधिराज।
- अजयराज द्वितीय—अजमेर (1113 ई.) व रानी सोमल्लदेवी अंकित अजयप्रिय द्रम्म; अर्णोराज—आनासागर झील व वराह मंदिर।
- विग्रहराज चतुर्थ वीसलदेव—स्वर्ण युग, हरकेलि नाटक, सरस्वती कंठाभरण (ढाई दिन का झोपड़ा), और बीसलपुर।
- पृथ्वीराज तृतीय—राय पिथौरा, दल-पंगुल, कदंबवास, तराइन के युद्ध (1191 व 1192 ई.), और चंदबरदाई।
- गोविंदराज—रणथम्भौर शाखा (1194 ई.); हम्मीर देव—16 युद्धों के विजेता, हम्मीर हठ, 32 खंभों की छतरी, प्रथम साका (1301 ई.)।
- कीर्तिपाल—जालौर शाखा (1181 ई.); कान्हड़देव व वीरमदेव—सिवाना (1308 ई.) और जालौर (1311 ई.) के साके।
- राव लुंभा—सिरोही शाखा (1311 ई.); राव देवा हाड़ा—बूंदी शाखा (1241 ई.); माधो सिंह हाड़ा—कोटा (1631 ई.)।
- प्रमुख शाखाओं और उनके संस्थापकों के लिए "सा-वा, अ-अ, ना-ल, र-गो, जा-की, सि-लु, बू-दे" स्मरण-सूत्र याद रखें:
-
- सा-वा: सांभर / शाकम्भरी — वासुदेव (लगभग 551 ई.)
-
- अ-अ: अजमेर — अजयराज (1113 ई.)
-
- ना-ल: नाडोल — लक्ष्मण (960 ई.)
-
- र-गो: रणथम्भौर — गोविंदराज (1194 ई.)
-
- जा-की: जालौर — कीर्तिपाल (1181 ई.)
-
- सि-लु: सिरोही — लुंभा (1311 ई.)
-
- बू-दे: बूंदी — देवा हाड़ा (1241 ई.)
- विग्रहराज द्वितीय (973 ई. का हर्ष अभिलेख) को विग्रहराज चतुर्थ वीसलदेव (स्वर्ण युग व हरकेलि) से; पृथ्वीराज प्रथम (पुष्कर में 700 चालुक्यों का संहार) को पृथ्वीराज द्वितीय (हांसी दुर्ग) या पृथ्वीराज तृतीय (तराइन वाले राय पिथौरा) से; अथवा खैराबाद (सिवाना का परिवर्तित नाम) को जलालाबाद (जालौर का परिवर्तित नाम) से कभी भ्रमित न करें।
11. अलग अभ्यास सेट
| परीक्षा सेट | प्रश्न |
|---|---|
| सेट 1 - उत्पत्ति और स्रोत | 5 |
| सेट 2 - शासक और योगदान | 15 |
| सेट 3 - प्रशासन, संस्कृति और संबंध | 10 |
| सेट 4 - कालक्रम | 5 |
| सेट 5 - पुनरावृत्ति अभ्यास | 5 |
| सेट 6 - मिश्रित और विश्लेषणात्मक अभ्यास | 20 |
प्रश्न, विकल्प, उत्तर और विस्तृत व्याख्याओं के लिए नीचे संबद्ध परीक्षाएँ खोलें।
यह सामग्री AI द्वारा तैयार की गई है; मानक स्रोतों से सत्यापन करें।