अध्याय 17: धोरों की धुन — राजस्थान के लोक सुर, नृत्य और रंगमंच
SECTION 1: अध्याय 17: धोरों की धुन — राजस्थान के लोक सुर, नृत्य और रंगमंच
परीक्षा: RPSC / RSSB / REET / Board Exam
SECTION 2: परीक्षा दृष्टि से महत्वपूर्ण
परीक्षा में वाद्य-वर्ग, कलाकार, समुदाय, स्थान और नाट्य-रूप का मिलान पूछा जाता है। ध्वनि कैसे बनती है, यह वाद्य की श्रेणी तय करता है। लोकनृत्य के क्षेत्र को उसका एकमात्र प्रदर्शन-स्थल न समझें। भवाई नृत्य और गुजराती भवाई नाट्य अलग हैं।
कीवर्ड: तत-सुषिर-अवनद्ध-घन, समुदाय, लोकनाट्य प्रश्नों की संख्या परीक्षा और वर्ष के अनुसार बदलती है; 3–5 प्रश्न का निश्चित औसत सत्यापित नहीं है।
SECTION 3: ज़िला-वार योगदान
| जिला / क्षेत्र | योगदान | व्यक्ति / समुदाय | वर्ष / काल | स्थान |
|---|---|---|---|---|
| जयपुर | तमाशा, सांस्कृतिक मंच | भट्ट परिवार; JKK | 1993 JKK उद्घाटन | जयपुर |
| जोधपुर | लोकसंगीत शोध | कोमल कोठारी, विजयदान देथा | 1960 रूपायन | बोरूंदा |
| जैसलमेर / बाड़मेर | मांगणियार, कमायचा | वंशानुगत लोक कलाकार | जीवित परंपरा | थार |
| उदयपुर | गवरी, कठपुतली संरक्षण | भील; देवीलाल सामर | 1952 लोक कला मंडल | उदयपुर |
| बांसवाड़ा / डूंगरपुर / प्रतापगढ़ | दक्षिणी जनजातीय कला | भील समुदाय | जीवित परंपरा | वागड़ व आसपास |
| बीकानेर | मांड, रम्मत, अग्निनृत्य | अल्लाह जिलाई बाई; जसनाथी | 2010 से पूर्व की परंपराएँ | कतरियासर |
| अजमेर | चरी | गुर्जर महिलाएँ | जीवित परंपरा | किशनगढ़ |
| पाली | तेरहताली | कामड़ समुदाय | जीवित परंपरा | पादरला |
| कोटा / बूंदी / बारां | चकरी | कंजर महिलाएँ | जीवित परंपरा | हाड़ौती |
| सीकर / झुंझुनूं | गींदड़, कच्छी घोड़ी | शेखावाटी कलाकार | जीवित परंपरा | शेखावाटी |
| भरतपुर / अलवर | ब्रज संगीत, नौटंकी के संपर्क | स्थानीय कलाकार | जीवित परंपरा | ब्रज पट्टी |
| सिरोही | वालर | गरासिया | जीवित परंपरा | गरासिया क्षेत्र |
SECTION 4: मूल तथ्य एवं विषय-वार अध्ययन
लोकगीत और गायन
अल्लाह जिलाई बाई — अल्लाह जिलाई बाई मांड गायन की प्रमुख कलाकार थीं। उनका संबंध बीकानेर से है।
मांड — केसरिया बालम मांड शैली में लोकप्रिय है। गीत का स्वागत और विरह भाव याद रखें।
पानी भरने वाली स्त्रियाँ — पणिहारी गीत पानी और स्त्रियों के दैनिक जीवन से जुड़े हैं। मरुस्थलीय परिवेश इनके अर्थ को समझाता है।
ऊँट का सजावटी गले का आभूषण — गोरबंद ऊँट की सजावट से जुड़ा शब्द है। गीत पश्चिमी राजस्थान की पशुपालक संस्कृति को दर्शाता है।
कुरजां पक्षी — कुरजां पक्षी विरह और संदेश के भाव से जुड़ा है। इसे किसी वाद्य का नाम न समझें।
समुदाय और कथागायन
जैसलमेर–बाड़मेर — मांगणियार पश्चिमी राजस्थान के लोक कलाकार हैं। उनका प्रदर्शन आज इस क्षेत्र से बाहर भी होता है।
लंगा — लंगा परंपरा में सिंधी सारंगी महत्वपूर्ण है। वाद्य-समुदाय संबंध को अनन्य अधिकार न समझें।
भोपा–भोपी — भोपा-भोपी चित्रित फड़ के साथ कथा गाते हैं। यह चित्र, संगीत और अनुष्ठान का संयुक्त रूप है।
रावणहत्था — रावणहत्था भोपा गायन में महत्वपूर्ण है। इसे फूँक से नहीं, धनुष से बजाया जाता है।
करणी माता — चारण चरजाएँ करणी माता की स्तुतियाँ हैं। आधिकारिक RPSC प्रश्न भी यह संबंध पूछता है।
तंत्री वाद्य
धनुष से — कमायचा तंत्री वाद्य है। मांगणियार परंपरा में इसका महत्वपूर्ण स्थान है।
तत / तंत्री — रावणहत्था के तारों को धनुष से कंपन दिया जाता है। वितत इसकी धनुष-वाली उपश्रेणी है।
कंपित तार — सारंगी तंत्री वाद्य है। ध्वनि स्रोत के आधार पर वर्गीकरण करें।
एक मुख्य तार — एकतारा एक मुख्य तार वाला लोक वाद्य है। भक्ति गायन में इसकी संगति मिलती है।
विश्वमोहन भट्ट — विश्वमोहन भट्ट मोहन वीणा के लिए प्रसिद्ध हैं। शास्त्रीय और लोक परंपरा का भेद बनाए रखें।
सुषिर, अवनद्ध और घन
सुषिर — अलगोजा युगल बाँसुरी जैसा फूँक वाद्य है। हवा का कंपन ध्वनि उत्पन्न करता है।
सुषिर — पूँगी फूँक से बजती है। कालबेलिया प्रस्तुतियों में इसका महत्व है।
अवनद्ध — ढोलक में तनी झिल्ली को बजाया जाता है। इसलिए यह अवनद्ध वाद्य है।
घन — खड़ताल के ठोस भाग टकराकर ध्वनि देते हैं। इसमें तार या तनी झिल्ली आवश्यक नहीं है।
घन — मोरचंग की धातु-जिह्वा कंपन करती है। मुँह अनुनाद देता है, पर इसे बाँसुरी जैसा सुषिर न मानें।
लोकनृत्य: क्षेत्र
शेखावाटी — गींदड़ शेखावाटी से जुड़ा नृत्य है। इसे मारवाड़ की गैर से न मिलाएँ।
किशनगढ़, अजमेर — चरी में सिर पर कलश संतुलित किया जाता है। किशनगढ़ इसका प्रमुख सांस्कृतिक केंद्र है।
हाड़ौती — चकरी तेज घूमने वाली प्रस्तुति है। कोटा-बूंदी-बारां की हाड़ौती पट्टी याद रखें।
कृत्रिम घोड़े की पोशाक — कच्छी घोड़ी शेखावाटी की प्रसिद्ध प्रस्तुति है। कलाकार कृत्रिम घोड़े की संरचना धारण करते हैं।
महिलाएँ — घूमर महिलाओं का वृत्ताकार लोकनृत्य है। विवाह और उत्सव इसके सामान्य अवसर हैं।
अनुष्ठान और समुदाय
कामड़ — कामड़ महिलाएँ बैठकर मंजीरों के साथ प्रस्तुति देती हैं। रामदेवजी की भक्ति इसका प्रमुख संदर्भ है।
मंजीरे — शरीर पर लगाए मंजीरे ताल देते हैं। नाम तेरह ताल-संपर्कों की परंपरा से जुड़ा है।
जसनाथी — जसनाथी अग्निनृत्य बीकानेर क्षेत्र से जुड़ा है। कतरियासर परीक्षा का महत्वपूर्ण स्थान है।
अनुष्ठानिक नृत्य-नाट्य — गवरी भील समुदाय का अनुष्ठानिक नाट्य है। इसमें पात्र, कथा और नृत्य साथ आते हैं।
गरासिया — वालर गरासिया परंपरा से जुड़ा है। लूर का गरासिया संबंध भी आधिकारिक परीक्षा में पूछा गया है।
कालबेलिया और भवाई
2010 — कालबेलिया गीत-नृत्य 2010 में अंकित हुए। 2013 राजस्थान के पहाड़ी दुर्गों की सूची से जुड़ा अलग वर्ष है।
मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची — यह जीवित गीत-नृत्य की मान्यता है। इसे किसी भवन का विश्व विरासत दर्जा न समझें।
सर्प की लहराती गति — कालबेलिया प्रस्तुति में लहराती और घूमती गति प्रमुख है। UNESCO वर्णन समुदाय के ऐतिहासिक सपेरा जीवन का संदर्भ देता है।
2016 — 2016 की सरकारी अधिसूचना में गुलाबी सपेरा का नाम है। उनका प्रसिद्ध मंचीय नाम गुलाबो भी है।
कलशों का संतुलन — भवाई में सिर पर कलश संतुलन प्रसिद्ध है। गुजराती भवाई लोकनाट्य इससे अलग परंपरा है।
लोकनाट्य
बीकानेर — रम्मत बीकानेर की लोकनाट्य परंपरा में प्रमुख है। सामुदायिक खुले मंच इसकी पहचान हैं।
लोकनाट्य — ख्याल में अभिनय, गायन और संवाद मिलते हैं। कुचामणी एक क्षेत्रीय शैली है।
संगीतप्रधान रंगमंच और भट्ट परिवार — जयपुरी तमाशा एक संगीतप्रधान नाट्य परंपरा है। इसे लोकनृत्य कालबेलिया से न मिलाएँ।
सूत्र-संचालित पुतलियों से — राजस्थानी कठपुतली में सूत्र-पुतलियाँ प्रमुख हैं। गायन और संवाद कथा को आगे बढ़ाते हैं।
नौटंकी — ब्रज सांस्कृतिक क्षेत्र में नौटंकी के संपर्क मिलते हैं। इसे पूरे राजस्थान की एकमात्र नाट्य विधा न मानें।
संरक्षण और संस्थाएँ
जोधपुर — अकादमी जोधपुर में है। स्थापना 16 दिसंबर 1957 हुई।
देवीलाल सामर — देवीलाल सामर ने 1952 में उदयपुर में संस्थान स्थापित किया। उनका जन्म वर्ष 1911 है।
कोमल कोठारी और विजयदान देथा — रूपायन 1960 में बोरूंदा में स्थापित हुआ। इसका संबंध लोक-स्मृति और शोध से है।
1957, फिर 1959 — स्थापना दिसंबर 1957 में हुई। औपचारिक उद्घाटन 19 जनवरी 1959 हुआ।
कलाकारों की भागीदारी से दस्तावेजीकरण और प्रशिक्षण — जीवित परंपरा कलाकारों के साथ आगे बढ़ती है। रिकॉर्डिंग के साथ प्रदर्शन और ज्ञान-संचरण भी आवश्यक हैं।
मिलान, कारण और कालक्रम
नगाड़ा–अवनद्ध — नगाड़े में तनी झिल्ली बजती है। ध्वनि-स्रोत से उसका अवनद्ध वर्ग तय होता है।
दोनों सही; कारण कथन समझाता है — खड़ताल ठोस आघात वाद्य है। कारण उसके घन वर्गीकरण को समझाता है।
लोक कला मंडल–राज्य संगीत नाटक अकादमी–रूपायन–कालबेलिया अंकन — क्रम 1952, 1957, 1960 और 2010 है। स्थापना और विरासत-अंकन अलग घटनाएँ हैं।
चकरी–केवल शेखावाटी — चकरी का प्रमुख संबंध हाड़ौती से है। केवल प्रदर्शन-स्थल से परंपरागत क्षेत्र न बदलें।
गवरी नाट्य और गवरी देवी गायिका अलग हैं — समान नाम से कला-रूप और व्यक्ति न मिलाएँ। प्रश्न में नाट्य, गायिका या नृत्य का संदर्भ पढ़ें।
SECTION 5: प्रमुख व्यक्ति एवं वर्ष
| व्यक्ति | जन्म वर्ष | कार्य | प्रमुख योगदान | योगदान वर्ष |
|---|---|---|---|---|
| देवीलाल सामर | 1911 | लोककला संरक्षण | भारतीय लोक कला मंडल | 1952 |
| कोमल कोठारी | 1929 | लोकसंगीत शोध | रूपायन सह-संस्थापक | 1960 |
| विजयदान देथा | 1926 | कथाकार | रूपायन सह-संस्थापक | 1960 |
| विश्वमोहन भट्ट | 1950 | मोहन वीणा | ग्रैमी सम्मान | 1994 |
| चतुरलाल | 1925 | तबला | अंतरराष्ट्रीय प्रस्तुति | 1950 का दशक |
SECTION 6: प्रमुख स्थल एवं संस्थान
| स्थल / संस्थान | स्थिति | महत्व |
|---|---|---|
| राजस्थान संगीत नाटक अकादमी | जोधपुर | स्थापना 16 दिसंबर 1957 |
| रूपायन संस्थान | बोरूंदा, जोधपुर | 1960; देथा और कोठारी |
| भारतीय लोक कला मंडल | उदयपुर | 1952; लोककला और कठपुतली |
| जवाहर कला केंद्र | जयपुर | बहु-कला मंच; 1993 उद्घाटन |
| राजस्थान संगीत संस्थान | जयपुर | संगीत प्रशिक्षण; 1966 विशुद्ध संगीत रूप |
SECTION 7: महत्वपूर्ण तिथियाँ
| वर्ष / तिथि | घटना | महत्व |
|---|---|---|
| 1911 | देवीलाल सामर जन्म | लोककला संरक्षण |
| 1925 | चतुरलाल जन्म | उदयपुर के तबला कलाकार |
| 1926 | विजयदान देथा जन्म | कथा और लोक-स्मृति |
| 1929 | कोमल कोठारी जन्म | लोकसंगीत शोध |
| 1952 | भारतीय लोक कला मंडल | उदयपुर |
| 1957 | संगीत नाटक अकादमी स्थापना | 16 दिसंबर; जोधपुर |
| 1959 | अकादमी स्वायत्तता व उद्घाटन | 12 और 19 जनवरी अलग तिथियाँ |
| 1960 | रूपायन स्थापना | बोरूंदा |
| 1966 | संगीत संस्थान का विशुद्ध संगीत रूप | जयपुर |
| 1993 | जवाहर कला केंद्र उद्घाटन | जयपुर |
| 1994 | विश्वमोहन भट्ट ग्रैमी | A Meeting by the River |
| 2010 | कालबेलिया UNESCO अंकन | अमूर्त विरासत |
| 2016 | गुलाबी सपेरा पद्मश्री | कालबेलिया कलाकार |
SECTION 9: एक पंक्ति में सारांश और पुनरावृत्ति
व्यक्ति, स्थान और काल को एक साथ जोड़ें; समान नामों और प्रशासनिक श्रेणियों का अंतर याद रखें।
| विषय | स्मरण बिंदु |
|---|---|
| लोकगीत और गायन | अल्लाह जिलाई बाई |
| समुदाय और कथागायन | जैसलमेर–बाड़मेर |
| तंत्री वाद्य | धनुष से |
| सुषिर, अवनद्ध और घन | सुषिर |
| लोकनृत्य: क्षेत्र | शेखावाटी |
| अनुष्ठान और समुदाय | कामड़ |
| कालबेलिया और भवाई | 2010 |
| लोकनाट्य | बीकानेर |
| संरक्षण और संस्थाएँ | जोधपुर |
| मिलान, कारण और कालक्रम | नगाड़ा–अवनद्ध |
SECTION 10: ट्रिक, भ्रम और मानचित्र
ट्रिक: तार–तत; हवा–सुषिर; चमड़ा–अवनद्ध; ठोस–घन। रावणहत्था और कमायचा धनुष से बजने वाले तंत्री वाद्य हैं; वितत को तत का उपवर्ग समझें।
भ्रम: गवरी नाट्य और भवाई नृत्य अलग हैं। गींदड़–शेखावाटी; अग्निनृत्य–कतरियासर; चरी–किशनगढ़; तेरहताली–कामड़। कालबेलिया का 2010 अंकन UNESCO की अमूर्त सूची में है, स्मारकों की विश्व विरासत सूची में नहीं।
मानचित्र: थार–लंगा-मांगणियार; मेवाड़–गवरी; हाड़ौती–चकरी; शेखावाटी–गींदड़-कच्छी घोड़ी; बीकानेर–रम्मत-अग्निनृत्य। लोककलाओं के लिए मनगढ़ंत स्थापना-वर्ष न लिखें।