जैसलमेर राज्य का इतिहास (थार मरुस्थल का भाटी राजवंश)
1. विषय-सीमा और परीक्षा उपयोगिता
1.1 अध्याय का परिचय
- यह अध्याय जैसलमेर राज्य के इतिहास को प्रस्तुत करता है, जिस पर थार मरुस्थल के हृदय-स्थल में चंद्रवंशी (यादव) राजपूतों के प्रतापी भाटी वंश ने शासन किया।
- प्रमुख ऐतिहासिक विषयों में भगवान श्रीकृष्ण से वंश-परंपरा, राजा भट्टी द्वारा भटनेर दुर्ग की स्थापना, तनोट और लौद्रवा से जैसलमेर तक प्रारंभिक राजधानियों का स्थानांतरण, 1156 ई. में राव जैसल द्वारा त्रिकूट पहाड़ी पर जैसलमेर नगर व सोनारगढ़ दुर्ग की स्थापना, जैसलमेर के प्रसिद्ध ढाई साके (जिसमें 1550 ई. में राव लूणकरण के समय हुआ अर्ध-साका शामिल है), 1570 ई. के नागौर दरबार में राव हरराज द्वारा मुगलों से संधि, जिनभद्र सूरि ग्रंथ भंडार (ताड़पत्र पांडुलिपि संग्रह) की सांस्कृतिक धरोहर, महारावल मूलराज द्वितीय के समय 1818 की ब्रिटिश सहायक संधि, दीवान सालिम सिंह मेहता का दमनकारी शासन जिसके कारण पालीवाल ब्राह्मणों ने कुलधरा सहित 84 गाँव रातों-रात खाली किए, अमर बलिदानी सागरमल गोपा का स्वतंत्रता संघर्ष एवं शहादत, तथा 1949 में वृहत् राजस्थान में राज्य का ऐतिहासिक विलय शामिल हैं।
- RPSC (RAS, स्कूल व्याख्याता, द्वितीय श्रेणी), RSSB (CET, पटवार, VDO, पुलिस), REET तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में स्थापना कालक्रम, ढाई साके, सोनारगढ़ दुर्ग, प्रसिद्ध हवेलियों (पटवों, सालिम सिंह, नाथमल), कुलधरा गाँव, तनोट माता, 1818 की ब्रिटिश संधि, सागरमल गोपा की पुस्तकों और राजस्थान के एकीकरण से जुड़े प्रश्न निरंतर पूछे जाते हैं।
2. मूल अवधारणाएँ
2.1 क्षेत्र, वंश और राजकीय शब्दावली
- यादव / चंद्रवंशी परंपरा: भाटी शासक स्वयं को भगवान श्रीकृष्ण और उनके प्रद्युम्न के वंशज मानते हैं; इसीलिए उन्हें गर्व से "छत्राला यादवपति" (राजछत्र धारण करने वाले यादवों के अधिपति) कहा जाता है।
- उत्तर भड़ किवाड़ भाटी: भाटी शासकों का ऐतिहासिक गौरवपूर्ण विरुद; सदियों तक भारत के उत्तरी और उत्तर-पश्चिमी सीमांत पर गजनी, घोर, मुल्तान और मध्य एशिया के विदेशी आक्रांताओं का सबसे पहला और भीषण प्रतिरोध करने के कारण इन्हें "उत्तर दिशा का रक्षा-कपाट" (किवाड़) कहा गया।
- कुलदेवी एवं आराध्य देव: स्वांगिया माता (हिंगलाज / आवड़ माता का स्वरूप) भाटी राजवंश की कुलदेवी हैं; इनका प्रतीक मुड़ा हुआ भाला (स्वांग) और सुगन चिड़ी (शगुन चिड़िया) है; दुर्ग में प्रतिष्ठित लक्ष्मीनाथ जी को राज्य का वास्तविक अधिपति माना जाता था और महारावल स्वयं को उनका दीवान मानकर शासन करते थे।
- त्रिकूट पर्वत: थार मरुस्थल में स्थित त्रिकोणीय पहाड़ी, जिस पर महर्षि ईशाल (इंसाण ऋषि) के परामर्श और श्रीकृष्ण की प्राचीन भविष्यवाणी के आधार पर राव जैसल ने दुर्ग की नींव रखी।
- सोनारगढ़ (स्वर्ण दुर्ग): पीले बलुआ पत्थरों (ज्यूरेसिक चूना पत्थर) से बिना चूने और गारे के निर्मित भव्य दुर्ग; सूर्य की किरणों के साथ इसका रंग सोने के समान चमकता है, इसलिए इसे "सोनार किला" या "गोल्डन फोर्ट" कहा जाता है।
- ढाई साके (अढ़ाई साके): जैसलमेर का अद्वितीय ऐतिहासिक गौरव; यहाँ दो पूर्ण साके (सल्तनत काल में अलाउद्दीन खिलजी और फिरोज शाह तुगलक के समय) तथा एक प्रसिद्ध अर्ध-साका (1550 ई.) हुआ, जिसमें जौहर की अग्नि प्रज्वलित करने का समय न मिलने पर रानियों को तलवारों से वीरगति दी गई लेकिन युद्ध में भाटी वीरों की विजय हुई।
3. उत्पत्ति, स्रोत और भूगोल
3.1 उत्पत्ति के सिद्धांत और प्रारंभिक प्रवासन मार्ग
- यादव वंश परंपरा: चारण और पौराणिक साक्ष्यों के अनुसार महाभारत युद्ध और द्वारका के समुद्र में विलीन होने के पश्चात यादवों की शाखा उत्तर-पश्चिम की ओर पंजाब, मुल्तान और गजनी क्षेत्रों में फैली।
- राजा भट्टी और भटनेर दुर्ग की स्थापना: लगभग 285/295 ई. में राजा भूपत के पुत्र राजा भट्टी ने घग्घर नदी के किनारे (आधुनिक हनुमानगढ़) शासन स्थापित किया और सुदृढ़ भटनेर दुर्ग का निर्माण करवाया; इन्हीं के नाम पर यह वंश "भाटी" कहलाया।
- तनोट काल: मध्य एशियाई आक्रमणों के दबाव में भाटी शासक थार मरुस्थल की ओर बढ़े; 8वीं शताब्दी में राव केहर और राव तनु ने मरुभूमि में तनोट को अपनी राजधानी बनाया और वहाँ तनोट माता के मंदिर की प्रतिष्ठा की।
- लौद्रवा काल: 10वीं शताब्दी में राव देवराज (देवराज भाटी) ने परमारों से समृद्ध नगर लौद्रवा (वर्तमान जैसलमेर से 15 किमी दूर) छीन लिया; देवराज ने सर्वप्रथम "रावल" की उपाधि धारण की और लौद्रवा को भाटियों की नई राजधानी बनाया।
- जैसलमेर स्थानांतरण (1156 ई.): लौद्रवा समतल मैदान में स्थित होने के कारण विदेशी और तुर्क आक्रमणकारियों के हमलों से सुरक्षित नहीं था; अतः सामरिक सुरक्षा की दृष्टि से 1156 ई. में राव जैसल ने राजधानी को त्रिकूट पर्वत पर स्थानांतरित कर जैसलमेर की नींव रखी।
3.2 शिलालेख, पांडुलिपियाँ और साहित्यिक स्रोत
- जिनभद्र सूरि ग्रंथ भंडार: जैसलमेर दुर्ग में संभवनाथ जैन मंदिर के तलघर (भूमिगत ज्ञान भंडार) में स्थित; 15वीं शताब्दी में जैन आचार्य जिनभद्र सूरि द्वारा स्थापित; यह संपूर्ण एशिया में ताड़पत्र और हस्तलिखित प्राचीन पांडुलिपियों का सबसे दुर्लभ और समृद्ध संग्रह है, जिसमें संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश के अमर ग्रंथ सुरक्षित हैं।
- लौद्रवा एवं तनोट के शिलालेख: 8वीं से 12वीं सदी के गोवर्धन स्तंभ और देवलियाँ, जो प्रारंभिक भाटी शासकों, सती रानियों और सीमांत युद्धों का प्रामाणिक ऐतिहासिक विवरण देती हैं।
- कुलधरा के अभिलेख: 17वीं-18वीं सदी के पालीवाल ब्राह्मणों के थंभी और देवल पाषाण अभिलेख, जो उनकी समृद्ध कृषि प्रणाली, खड़ीन जल-प्रबंधन और 1825 ई. में सामूहिक पलायन से पूर्व के सामाजिक जीवन को प्रमाणित करते हैं।
- मुहणौत नैणसी री ख्यात: नैणसी ने भाटी वंश की विशद वंशावली, मुल्तान-सिंध के सीमांत संघर्षों और मरुस्थलीय ठिकानों का अत्यंत सजीव वर्णन किया है।
- कर्नल जेम्स टॉड की 'एनल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान': टॉड ने जैसलमेर के इतिहास, यादवों के प्रवासन, अलाउद्दीन के आक्रमण, लूणकरण के अर्ध-साके और दीवान सालिम सिंह की निरंकुशता का विस्तृत वृत्तांत दिया है।
- सागरमल गोपा की ऐतिहासिक कृतियाँ: 20वीं सदी के अमर बलिदानी सागरमल गोपा की प्रसिद्ध पुस्तकें—'जैसलमेर का गुंडाराज', 'रघुनाथ सिंह का मुकदमा', और 'आजादी के दीवाने'—जिन्होंने सामंती अत्याचारों को उजागर कर जन-आंदोलन का बिगुल फूंका।
3.3 भूगोल, व्यापारिक मार्ग और मरुस्थलीय पारिस्थितिकी
- जैसलमेर थार मरुस्थल के सबसे शुष्क पश्चिमी भाग में फैला हुआ था, जिसकी सीमाएँ पश्चिम और उत्तर-पश्चिम में बहावलपुर, खैरपुर और सिंध (वर्तमान पाकिस्तान), उत्तर-पूर्व में बीकानेर, पूर्व और दक्षिण-पूर्व में मारवाड़ (जोधपुर) तथा दक्षिण में कच्छ के रण से मिलती थीं।
- यहाँ का धरातल विशाल गतिशील बालूका स्तूपों (धोरों/धरियनों), पथरीले मरुस्थल (रेग) और पीले ज्यूरेसिक चूना पत्थरों की पहाड़ियों से युक्त है।
- सामरिक व्यापारिक चौराहा: जैसलमेर दिल्ली, आगरा और मालवा को मुल्तान, सिंध के बंदरगाहों, कराची, अफगानिस्तान और फारस (ईरान) से जोड़ने वाले प्राचीन ऊँट कारवां-मार्गों के केंद्र पर स्थित था; सिल्क, मसाले, अफीम, नील और ऊन के व्यापारिक काफिलों से वसूले जाने वाले पारगमन कर (दाण) ने राज्य और ओसवाल-पटवा व्यापारियों को अत्यंत समृद्ध बनाया।
- पारंपरिक जल संरक्षण प्रणाली: मरुभूमि में जीवन-रक्षा पारंपरिक जल-प्रबंधन पर आधारित थी: खड़ीन कृषि प्रणाली (15वीं सदी में पालीवाल ब्राह्मणों द्वारा विकसित ढलानी जल-संचयन तकनीक), बेरी (गहरे संकरे कुएँ), टांका (घरेलू वर्षा जल कुंड), और गड़ीसर (घड़सीसर) झील जैसे जीवनदायी जलाशय।
4. शासक और राजनीतिक घटनाक्रम
4.1 प्रारंभिक भाटी युग: भट्टी, भूपत, देवराज और विजयराज
- राजा भट्टी (तीसरी सदी का उत्तरार्ध): भाटी राजवंश के मूल पुरुष जिनके नाम पर यह वंश "भाटी" कहलाया; इन्होंने घग्घर नदी के किनारे ऐतिहासिक भटनेर दुर्ग की नींव रखी।
- राव देवराज (10वीं सदी): परमारों से लौद्रवा छीनकर भाटी राज्य को सुदृढ़ किया; देवराज ने सर्वप्रथम "रावल" की पदवी धारण की और स्वतंत्र भाटी साम्राज्य की नींव रखी।
- रावल विजयराज प्रथम: गजनी और मुल्तान के तुर्क आक्रमणों को विफल किया; सीमांत रक्षा के कारण इन्हें "उत्तर भड़ किवाड़ भाटी" का गौरवपूर्ण विरुद प्राप्त हुआ।
- लौद्रवा की सांस्कृतिक समृद्धि: लौद्रवा भाटी काल में व्यापार और जैन धर्म का विख्यात केंद्र बना; यहाँ का चिंतामणि पार्श्वनाथ जैन मंदिर, कल्पवृक्ष और प्रतिदिन दूध पीने आने वाले नाग की लोक-मान्यता आज भी प्रसिद्ध है; किंतु समतल होने के कारण इसकी सुरक्षा कठिन थी।
4.2 राव जैसल (1156–1168 ई.): जैसलमेर और सोनारगढ़ की स्थापना
- जैसलमेर नगर की स्थापना (1156 ई.): अपने भतीजे भोजदेव के स्थान पर सत्ता प्राप्त करने के पश्चात राव जैसल ने मुल्तान के मुस्लिम शासक और गुजरात के चालुक्यों की सहायता से अधिकार किया; लौद्रवा की असुरक्षा को देखते हुए उन्होंने 12 जुलाई 1156 ई. (श्रावण शुक्ल द्वादशी, वि.सं. 1213) को त्रिकूट पर्वत पर जैसलमेर नगर की स्थापना की।
- ऋषि ईशाल की भविष्यवाणी: जनश्रुति के अनुसार द्वापर युग में श्रीकृष्ण और अर्जुन यहाँ आए थे; श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से पाषाण भेदकर जैसलू कुआँ प्रकट किया और भविष्यवाणी की थी कि भविष्य में यदुवंशी जैसल यहाँ अभेद्य दुर्ग बनाएगा।
- सोनारगढ़ दुर्ग का निर्माण: राव जैसल ने त्रिकूट पहाड़ी पर पीले पत्थरों से विशाल दुर्ग की नींव रखी; दुर्ग का निर्माण कार्य उनके पुत्र और उत्तराधिकारी रावल शालिवाहन द्वितीय ने पूर्ण करवाया।
4.3 जैसलमेर के प्रसिद्ध ढाई साके (अढ़ाई साके)
- जैसलमेर का प्रथम साका (लगभग 1294–1312 ई. / रावल मूलराज प्रथम व जैत्रसिंह):
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- भाटी वीरों द्वारा सिंध मार्ग से जा रहे अलाउद्दीन खिलजी के शाही खजाने और घोड़ों के काफिले को लूट लेने के कारण खिलजी ने जैसलमेर पर भीषण आक्रमण किया।
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- कई वर्षों के कठोर घेरे के बाद जब रसद सामग्री समाप्त हो गई, तब वीरांगनाओं ने अग्नि में जौहर किया तथा रावल मूलराज प्रथम और उनके भाई कुंवर रतन सिंह ने केसरिया बाना पहनकर शत्रु सेना का संहार करते हुए वीरगति पाई।
- जैसलमेर का द्वितीय साका (लगभग 1370–1371 ई. / रावल दूदा):
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- दिल्ली के सुल्तान फिरोज शाह तुगलक के समय भाटी वीरों द्वारा शाही क्षेत्रों में छापों के प्रतिशोध में तुगलक सेना ने जैसलमेर को घेरा।
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- रावल दूदा और उनके भाई तिलक सिंह ने अद्भुत वीरता का प्रदर्शन किया; दुर्ग में क्षत्राणियों ने जौहर किया और दूदा युद्धभूमि में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
- जैसलमेर का ऐतिहासिक अर्ध-साका (1550 ई. / रावल लूणकरण):
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- 1550 ई. (वि.सं. 1607) में कंधार के निष्कासित अफगान सरदार अमीर अली ने कपटपूर्वक शरण ली और अपनी बेगमों को रानियों से मिलाने के बहाने पालकियों (डोलों) में हथियारबंद अफगान सैनिक दुर्ग में घुसा दिए।
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- विश्वासघात का आभास होते ही जौहर की अग्नि प्रज्वलित करने का समय न देख रावल लूणकरण ने अपनी ही तलवारों से रानियों और राजकुमारियों को वीरगति प्रदान की।
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- इसके बाद भाटी वीरों ने भूखे सिंहों की भाँति अफगानों पर टूटकर अमीर अली सहित सभी शत्रुओं को मौत के घाट उतार दिया; युद्ध में भाटियों की पूर्ण विजय हुई, अतः जौहर तो हुआ किंतु पुरुषों की पराजय (केसरिया अंत) नहीं हुई—इसीलिए यह इतिहास में "अर्ध-साका" कहलाया।
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- इन तीन घटनाओं के कारण जैसलमेर दुर्ग को "ढाई साके के लिए प्रसिद्ध दुर्ग" कहा जाता है।
4.4 मुगल संबंध: नागौर दरबार, वैवाहिक संबंध और मनसबदारी
- रावल लूणकरण (1530–1550 ई.) एवं रूठी रानी: रावल लूणकरण की सुपुत्री उमादे का विवाह मारवाड़ के राव मालदेव के साथ हुआ था; विवाह की प्रथम रात्रि को दासी भारमली प्रकरण के कारण वे मालदेव से रूठ गईं और आजीवन अजमेर के तारागढ़ दुर्ग में एकाकी जीवन बिताया; इतिहास में वे "रूठी रानी" के नाम से अमर हुईं; 1562 में मालदेव की मृत्यु पर उनकी पगड़ी के साथ सती हुईं।
- रावल हरराज (1561–1577 ई.) एवं नागौर दरबार (1570 ई.): नवंबर 1570 ई. में अकबर के ऐतिहासिक नागौर दरबार में रावल हरराज ने व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर मुगलों की अधीनता स्वीकार की तथा अपनी पुत्री नाथी बाई का विवाह अकबर से किया; हरराज प्रकांड विद्वान थे जिन्होंने डिंगल/पिंगल का प्रसिद्ध ग्रंथ 'पिंगल शिरोमणि' रचा।
- रावल भीमसिंह (1578–1624 ई.): अकबर और जहाँगीर के विश्वसनीय मनसबदार; जहाँगीर ने भीमसिंह की पुत्री मनभावती बाई से विवाह किया था।
- रावल कल्याणमल (1624–1634 ई.): जहाँगीर और शाहजहाँ के काल में मुगल सेवा में रहे।
- रावल सबलसिंह (1651–1661 ई.): शाहजहाँ के सैन्य सहयोग से गद्दी प्राप्त की; इन्हें सिंध और पंजाब के कई परगने जागीर में मिले; मुगलों के नाम से सिक्के ढलवाने वाले प्रथम भाटी शासक बने।
4.5 सुदृढ़ीकरण, मुद्रा व्यवस्था और 18वीं सदी
- रावल अमरसिंह (1661–1702 ई.): 1688 ई. में प्रसिद्ध अमर सागर झील और महल-उद्यानों का निर्माण करवाया; राज्य में कानून, राजस्व, मापतौल और दंड व्यवस्था को सुव्यवस्थित करने हेतु 'अमरशाही कोड' (कानून संहिता) लागू की।
- रावल जसवंत सिंह व बुध सिंह (1702–1722 ई.): औरंगजेब की मृत्यु के बाद उत्तर-मुगल काल की अराजकता में सीमाओं की रक्षा की।
- रावल अखैसिंह (1722–1762 ई.): चार दशकों तक शासन किया; अखैगढ़ दुर्ग बसाया और जैसलमेर नगर के चारों ओर सुरक्षा परकोटे का निर्माण करवाया; 1756 ई. में जैसलमेर की प्रसिद्ध "अखैशाही मुद्रा" (अखैशाही रुपया) प्रारंभ की, जो एकीकरण तक राज्य की मान्य मुद्रा रही।
4.6 ब्रिटिश संधि, सालिम सिंह की निरंकुशता और आधुनिक काल
- महारावल मूलराज द्वितीय (1762–1819 ई.):
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- इनका संपूर्ण शासनकाल प्रधानमंत्री सालिम सिंह मेहता (स्वरूप सिंह मेहता के पुत्र) की निरंकुश क्रूरता और तानाशाही के साए में बीता।
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- सालिम सिंह का अत्याचार और कुलधरा का पलायन: सालिम सिंह ने ओसवाल महाजनों और समृद्ध पालीवाल ब्राह्मणों पर अमानवीय कर लगाए, राजनीतिक विरोधियों की हत्याएँ करवाईं तथा पालीवाल मुखिया की रूपवती पुत्री पर कुदृष्टि डाली; अपने स्वाभिमान और धर्म की रक्षा हेतु 1825 ई. में पालीवाल ब्राह्मणों के 84 गाँवों (जिसमें कुलधरा प्रमुख था) ने एक ही रात में अपने पैतृक घर-बार त्याग दिए और जाते-जाते शाप दिया कि कुलधरा कभी दोबारा नहीं बसेगा।
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- ब्रिटिश सहायक संधि (12 दिसंबर 1818): 12 दिसंबर 1818 को मूलराज द्वितीय ने दिल्ली में चार्ल्स मेटकाफ के माध्यम से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से सहायक संधि की; सिरोही (1823) से पूर्व संधि करने वाली यह राजस्थान की अंतिम रियासतों में से थी।
- महारावल गजसिंह (1819–1846 ई.): गजसागर झील बनवाई; 1824 ई. में सालिम सिंह की विष देकर हत्या कर दी गई जिससे उसके आतंक का अंत हुआ।
- महारावल रणजीत सिंह (1846–1864 ई.) एवं 1857 की क्रांति: 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में रणजीत सिंह ने अंग्रेजों का पूर्ण साथ दिया और सीमांत क्षेत्रों में विद्रोही गतिविधियों को दबाया।
- महारावल बैरीसाल (1864–1891 ई.) व शालिवाहन तृतीय (1891–1914 ई.): डाक, तार, आधुनिक शिक्षा और न्यायालयों की स्थापना की।
- महारावल जवाहर सिंह (1914–1949 ई.) एवं स्वतंत्रता आंदोलन:
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- निरंकुश शासक जिनके दमनकारी शासन के कारण जैसलमेर को "राजस्थान का अंडमान / कालापानी" कहा जाता था।
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- अमर शहीद सागरमल गोपा: महान देशभक्त जिन्होंने अपनी क्रांतिकारी पुस्तकों—'जैसलमेर का गुंडाराज', 'रघुनाथ सिंह का मुकदमा', और 'आजादी के दीवाने'—से राजशाही को हिला दिया; मई 1941 में बंदी बनाया गया और 3/4 अप्रैल 1946 को जैसलमेर जेल में पुलिस थानेदार गुमान सिंह द्वारा मिट्टी का तेल छिड़ककर जिंदा जला दिया गया (जांच हेतु गोपाल स्वरूप पाठक आयोग गठित हुआ)।
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- जैसलमेर प्रजामंडल: दिसंबर 1945 में मीठालाल व्यास और शिवशंकर गोप द्वारा जोधपुर में निर्वासित अवस्था में जैसलमेर प्रजामंडल की स्थापना की गई।
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- भारत में विलय: 1947 में मोहम्मद अली जिन्ना द्वारा पाकिस्तान में शामिल होने के तमाम प्रलोभनों को ठुकराकर जवाहर सिंह ने भारत संघ में विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए; 30 मार्च 1949 को जैसलमेर का वृहत् राजस्थान में औपचारिक विलय हुआ।
5. प्रशासन, संस्कृति और स्थापत्य
5.1 प्रशासनिक संरचना और राजस्व व्यवस्था
- केंद्रीय प्रशासन: सर्वोच्च सत्ता महारावल में निहित थी; प्रशासनिक कार्यों में दीवान (प्रधानमंत्री/मुसाहिब), बख्शी (सेनापति व वेतन अधिकारी), कोठारी (राजकीय अन्न भंडार व रसद प्रमुख) और हाकिम (परगना अधिकारी) सहयोग करते थे।
- सामंती व्यवस्था: सामंत मुख्य रूप से भाटी वंश के रावलोत (राजघराने की शाखाएँ) होते थे; वे जागीर के बदले सैन्य सेवा (चाकरी) और वार्षिक कर (रेख) प्रदान करते थे।
- राजस्व स्रोत: कृषि कर (भोग/बंटाई, मुख्यतः खड़ीन उपज पर), पशुधन कर, मुल्तानी मिट्टी व पीले पत्थर की खदानों से आय, तथा मरुस्थलीय व्यापारिक कारवां से वसूला जाने वाला पारगमन सीमा शुल्क (दाण/सायर) राजकोष का मुख्य आधार था।
5.2 स्थापत्य कला: सोनारगढ़ दुर्ग और विश्वप्रसिद्ध हवेलियाँ
- सोनारगढ़ दुर्ग (जैसलमेर दुर्ग):
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- 1156 ई. में राव जैसल द्वारा त्रिकूट पहाड़ी पर निर्मित; चित्तौड़गढ़ के बाद राजस्थान का दूसरा सबसे प्राचीन दुर्ग; 2013 में यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल।
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- इसमें 99 बुर्ज हैं; बिना चूने-गारे के केवल पीले पत्थरों की इंटरलॉकिंग जोड़ से बना है।
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- यह राजस्थान का एकमात्र सक्रिय "लिविंग फोर्ट" है, जहाँ दुर्ग के भीतर आबादी निवास करती है।
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- प्रमुख स्थल: सूरज पोल, गणेश पोल, हवा पोल, बादल महल, राजमहल, लक्ष्मीनाथ मंदिर तथा 12वीं-15वीं सदी के सात भव्य जैन मंदिर।
- पटवों की हवेली:
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- 1805 ई. में ओसवाल जैन व्यापारी गुमानचंद पटवा और उनके पाँच पुत्रों द्वारा निर्मित; पाँच हवेलियों का भव्य समूह।
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- पाँच मंजिला यह हवेली अपने 60 से अधिक नक्काशीदार झरोखों, बारीक जालीदार पत्थरों के कार्य और स्वर्ण-चित्रकारी के लिए विश्वप्रसिद्ध है।
- सालिम सिंह की हवेली:
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- 18वीं सदी में दीवान सालिम सिंह मेहता द्वारा निर्मित; नौ मंजिला हवेली जिसका ऊपरी भाग जहाज की आकृति का होने के कारण "जहाज महल / मोती महल" कहलाता है; मयूर की आकृति वाले नक्काशीदार कोष्ठक लगे हैं।
- नाथमल की हवेली:
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- 1885 ई. में दीवान नाथमल द्वारा निर्मित; इसके वास्तुकार दो सगे भाई हाथी और लालूं थे।
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- दोनों भाइयों ने बिना किसी नक्शे के हवेली के दाएँ और बाएँ भाग का स्वतंत्र निर्माण किया, फिर भी यह अत्यंत संतुलित और कलात्मक है; मुख्य द्वार पर पीले पत्थर के दो विशाल हाथी खड़े हैं।
- बड़ा बाग की छतरियाँ: जैसलमेर से 6 किमी दूर भाटी शासकों का शाही श्मशान स्थल; रावल जैतसिंह द्वितीय से लेकर परवर्ती शासकों की पिरामिडनुमा छतरियाँ स्थित हैं।
- गड़ीसर (घड़सीसर) झील: 1367 ई. में रावल घड़सीसिंह द्वारा निर्मित जीवनदायी जलाशय; इसके मध्य में कलात्मक छतरियाँ और मुख्य द्वार पर नर्तकी तीलों द्वारा निर्मित भव्य "तीलों की पोल" स्थित है।
5.3 लोक-संस्कृति, तीर्थ स्थल और आध्यात्मिक धरोहर
- तनोट माता मंदिर: भारत-पाक सीमा के समीप स्थित; हिंगलाज माता का अवतार पूज्य; 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध में पाकिस्तानी सेना द्वारा गिराए गए 3000 से अधिक बम मंदिर परिसर में नहीं फटे; वर्तमान में मंदिर की पूजा और प्रबंधन सीमा सुरक्षा बल (BSF) के जवानों द्वारा किया जाता है; इन्हें "थार की वैष्णो देवी" और "रुमाल वाली देवी" कहा जाता है।
- रामदेवरा (रूणेचा): पोकरण के समीप लोकदेवता बाबा रामदेव जी (तंवर वंशीय, श्रीकृष्ण अवतार) का पावन समाधि स्थल; हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक सद्भाव का महातीर्थ (मुस्लिम इन्हें रामसा पीर कहते हैं); कामड़ जाति की महिलाओं द्वारा प्रसिद्ध तेरहताली नृत्य किया जाता है।
- लंगा और मांगणियार संगीत परंपरा: भाटी शासकों और जागीरदारों द्वारा संरक्षित पारंपरिक लोक-संगीतकार जातियाँ; कमायचा, सारंगी और खड़ताल जैसे पारंपरिक वाद्यों के साथ थार के लोक-गीतों (केसरिया बालम, मूमल) को विश्व स्तर पर पहचान दिलाई।
- मरु महोत्सव (डेजर्ट फेस्टिवल): प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा को सम के धोरों में आयोजित होने वाला प्रसिद्ध सांस्कृतिक उत्सव; ऊँट दौड़, पगड़ी बांधने की प्रतियोगिता और मरुस्थलीय लोक-कला का भव्य प्रदर्शन।
6. अन्य रियासतों/शक्तियों से संबंध
6.1 दिल्ली सल्तनत, मुगलों और अंग्रेजों से संबंध
- दिल्ली सल्तनत से संघर्ष: जैसलमेर ने अलाउद्दीन खिलजी और फिरोज शाह तुगलक के भीषण आक्रमणों और घेराबंदियों का सामना किया; साकों के भारी बलिदान के बावजूद भाटियों ने अपनी स्वतंत्रता कभी नहीं छोड़ी और बार-बार सोनारगढ़ पर पुनः अधिकार किया।
- मुगल संधि और सहयोग: 1570 के नागौर दरबार में रावल हरराज द्वारा वैवाहिक संबंध स्थापित करने के बाद युद्धों का दौर थमा; भाटी शासकों को मुगलों से उच्च मनसब और सिंध-पंजाब के परगने प्राप्त हुए; भीमसिंह और कल्याणमल ने मुगल अभियानों में भाग लिया।
- ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि (1818): 12 दिसंबर 1818 को मूलराज द्वितीय ने अंग्रेजों से संधि की; अंग्रेजों ने भाटी राजवंश की आंतरिक स्वायत्तता की गारंटी दी और जैसलमेर ने ब्रिटिश प्रभुसत्ता स्वीकार की।
6.2 मारवाड़, बीकानेर और सिंध से संबंध
- मारवाड़ (राठौड़): वैवाहिक संबंधों और सीमा विवादों का मिला-जुला इतिहास; रावल लूणकरण ने पुत्री उमादे का विवाह राव मालदेव से किया; पोकरण और फलोदी के सीमांत क्षेत्रों पर दोनों राज्यों में लंबे समय तक संघर्ष रहा।
- पोकरण का प्रश्न: पोकरण मूलतः भाटियों का केंद्र था, जिसे बाद में मारवाड़ के राव मालदेव ने जीत लिया और यह चंपावत राठौड़ों का प्रमुख ठिकाना बना।
- बीकानेर से संबंध: सीमावर्ती चरागाहों को लेकर बीकानेर और जैसलमेर में निरंतर संघर्ष रहा; 1829 ई. में गजसिंह के समय दोनों सेनाओं में युद्ध छिड़ गया, जिसे मेवाड़ के महाराणा जवान सिंह की मध्यस्थता से सुलझाया गया।
- सिंध एवं अमरकोट के सोढ़ा राजपूत: सिंध के अमरकोट (उमरकोट) के सोढ़ा राजपूतों से भाटी राजघराने के घनिष्ठ वैवाहिक संबंध थे; भाटी शासक सिंध के व्यापारिक मार्गों और चरागाहों पर गहरा प्रभाव रखते थे।
7. कालक्रम और युगांतरकारी घटनाएँ
तिथियाँ ईस्वी हैं; प्रारंभिक अनुमानित तिथियाँ परंपरा के अनुसार भिन्न हो सकती हैं। यह परीक्षा पुनरावृत्ति हेतु चयनित कालक्रम है।
| तिथि | घटना |
|---|---|
| लगभग 285/295 ई. | राजा भट्टी द्वारा भटनेर दुर्ग (हनुमानगढ़) की स्थापना |
| 8वीं शताब्दी | राव केहर व तनु द्वारा तनोट में राजधानी की स्थापना |
| 10वीं शताब्दी | राव देवराज द्वारा परमारों से लौद्रवा विजय व रावल उपाधि |
| 1156 ई. (12 जुलाई) | राव जैसल द्वारा त्रिकूट पहाड़ी पर जैसलमेर व सोनारगढ़ की स्थापना |
| लगभग 1294–1312 ई. | जैसलमेर का प्रथम साका; अलाउद्दीन का आक्रमण; मूलराज व रतन सिंह वीरगति |
| 1367 ई. | रावल घड़सीसिंह द्वारा ऐतिहासिक गड़ीसर (घड़सीसर) झील का निर्माण |
| लगभग 1370–1371 ई. | जैसलमेर का द्वितीय साका; फिरोज शाह तुगलक का घेरा; रावल दूदा वीरगति |
| 1494 ई. | रावल बैरीसी द्वारा जैसलमेर दुर्ग में लक्ष्मीनाथ मंदिर की स्थापना |
| 15वीं शताब्दी | आचार्य जिनभद्र सूरि द्वारा भूमिगत ताड़पत्र ग्रंथ भंडार की स्थापना |
| 1550 ई. (वि.सं. 1607) | रावल लूणकरण के समय अमीर अली के विरुद्ध ऐतिहासिक अर्ध-साका |
| 1562 ई. | रावल लूणकरण की पुत्री उमादे (रूठी रानी) का केलवा में सती होना |
| 1570 ई. (नवंबर) | रावल हरराज द्वारा अकबर के नागौर दरबार में उपस्थिति व संधि |
| 1578–1624 ई. | रावल भीमसिंह का शासन; जहाँगीर से वैवाहिक संबंध व मुगल सेवा |
| 1651 ई. | शाहजहाँ के सहयोग से रावल सबलसिंह का राज्यारोहण |
| 1688 ई. | रावल अमरसिंह द्वारा अमर सागर झील निर्माण व अमरशाही कोड लागू |
| 1756 ई. | रावल अखैसिंह द्वारा अखैशाही चांदी के सिक्के प्रारंभ |
| 1805 ई. | गुमानचंद पटवा द्वारा विश्वप्रसिद्ध पटवों की हवेली का निर्माण प्रारंभ |
| 1818 ई. (12 दिसंबर) | महारावल मूलराज द्वितीय द्वारा अंग्रेजों से सहायक संधि पर हस्ताक्षर |
| 1824 ई. | निरंकुश दीवान सालिम सिंह मेहता की विष दिए जाने से मृत्यु |
| 1825 ई. | पालीवाल ब्राह्मणों द्वारा कुलधरा सहित 84 गाँवों का सामूहिक त्याग |
| 1829 ई. | जैसलमेर-बीकानेर सीमा युद्ध; मेवाड़ महाराणा की मध्यस्थता से शांति |
| 1857 ई. | 1857 की क्रांति में महारावल रणजीत सिंह द्वारा अंग्रेजों की सहायता |
| 1885 ई. | हाथी और लालूं द्वारा स्थापत्य चमत्कार नाथमल की हवेली का निर्माण |
| 1941 ई. (मई) | सागरमल गोपा की गिरफ्तारी और जैसलमेर जेल में अमानवीय यातनाएँ |
| 1945 ई. (दिसंबर) | मीठालाल व्यास द्वारा जोधपुर में जैसलमेर प्रजामंडल की स्थापना |
| 1946 ई. (3/4 अप्रैल) | जैसलमेर जेल में सागरमल गोपा को जिंदा जलाकर नृशंस हत्या |
| 1947 ई. (अगस्त) | महारावल जवाहर सिंह द्वारा भारत संघ में विलय पत्र पर हस्ताक्षर |
| 1949 ई. (30 मार्च) | जैसलमेर का वृहत् राजस्थान संघ में औपचारिक ऐतिहासिक विलय |
8. परीक्षा अभ्यास और पूर्व प्रश्नों की स्थिति
8.1 अभ्यास संरचना और सत्यापन
- अध्याय में 60 द्विभाषी अभ्यास प्रश्न विस्तृत व्याख्या सहित छह अलग-अलग परीक्षाओं में संकलित हैं। मूल सिद्धांत नोट्स को परीक्षा अभ्यास से अलग रखा गया है ताकि अवधारणाओं की गहन पुनरावृत्ति हो सके।
- मूल प्रारूप में दोहराए गए प्रश्न और अप्रमाणित परीक्षा-वर्ष टैग थे; संपादकीय मानकों के अनुसार सभी प्रश्नों को प्रामाणिक तथ्यों के साथ उच्च-उपयोगी अभ्यास प्रश्नों में रूपांतरित किया गया है।
- अभ्यर्थियों को स्थापना तिथियों (1156 ई., 1818 ई., 1949 ई.), ढाई साकों के तथ्यों, स्थापत्य चमत्कारों (सोनारगढ़ के 99 बुर्ज, पटवों, सालिम सिंह, नाथमल की हवेलियाँ), पारंपरिक जल प्रणालियों (खड़ीन, गड़ीसर), धार्मिक स्थलों (तनोट माता, रामदेवरा), सागरमल गोपा की कृतियों और प्रजामंडल आंदोलन पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
9. त्वरित पुनरावृत्ति सारणी
| शासक / विषय | प्रमुख परीक्षा तथ्य |
|---|---|
| राजा भट्टी | लगभग 285/295 ई. में भटनेर दुर्ग (हनुमानगढ़) की स्थापना; वंश के मूल पुरुष |
| राव देवराज | 10वीं सदी में परमारों से लौद्रवा विजय; सर्वप्रथम "रावल" पदवी धारण की |
| रावल विजयराज प्रथम | सीमांत तुर्क आक्रमण विफल किए; "उत्तर भड़ किवाड़ भाटी" उपाधि प्राप्त |
| राव जैसल | 1156 ई. में त्रिकूट पहाड़ी पर जैसलमेर व सोनारगढ़ दुर्ग की स्थापना की |
| रावल मूलराज प्रथम | अलाउद्दीन खिलजी के विरुद्ध जैसलमेर के प्रथम साके में वीरगति |
| रावल दूदा | सुल्तान फिरोज शाह तुगलक के विरुद्ध जैसलमेर के द्वितीय साके में वीरगति |
| रावल लूणकरण | 1550 ई. में अमीर अली के विरुद्ध अर्ध-साका; रूठी रानी उमादे के पिता |
| रावल हरराज | 1570 ई. में अकबर के नागौर दरबार में संधि; "पिंगल शिरोमणि" के रचयिता |
| रावल भीमसिंह | अकबर व जहाँगीर के मनसबदार; पुत्री का विवाह जहाँगीर से हुआ |
| रावल सबलसिंह | शाहजहाँ के सहयोग से गद्दी पाई; मुगलों के नाम से सिक्के ढलवाए |
| रावल अमरसिंह | अमर सागर झील का निर्माण (1688 ई.) व "अमरशाही कोड" संहिता लागू की |
| रावल अखैसिंह | 1756 ई. में अखैशाही चांदी के सिक्के चलाए; नगर परकोटा बनवाया |
| महारावल मूलराज द्वितीय | 1818 में अंग्रेजों से सहायक संधि की; दीवान सालिम सिंह का आतंक |
| सालिम सिंह मेहता | क्रूर दीवान; 9 मंजिला हवेली बनवाई; कुलधरा के 84 गाँवों का पलायन करवाया |
| गुमानचंद पटवा | 1805 ई. में विश्वप्रसिद्ध 5 मंजिला पटवों की हवेली का निर्माण शुरू करवाया |
| महारावल रणजीत सिंह | 1857 की क्रांति में मरुस्थलीय मार्गों की सुरक्षा कर अंग्रेजों का साथ दिया |
| सागरमल गोपा | अमर बलिदानी; "जैसलमेर का गुंडाराज" के लेखक; 1946 में जेल में जिंदा जलाए गए |
| मीठालाल व्यास | दिसंबर 1945 में जोधपुर में निर्वासित जैसलमेर प्रजामंडल की स्थापना की |
| महारावल जवाहर सिंह | भारत संघ में विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए; 1949 में वृहत् राजस्थान में विलय |
10. सामान्य भ्रम और स्मरण-सूत्र
10.1 प्रमुख अंतर और स्मरण-सूत्र
- राजा भट्टी—भटनेर दुर्ग (लगभग 285/295 ई.); राव देवराज—लौद्रवा विजय व प्रथम "रावल"; राव जैसल—जैसलमेर नगर (1156 ई.) व सोनारगढ़।
- ढाई साके: प्रथम साका—रावल मूलराज प्रथम (अलाउद्दीन खिलजी); द्वितीय साका—रावल दूदा (फिरोज शाह तुगलक); अर्ध-साका (1550 ई.)—रावल लूणकरण (कंधार के अमीर अली के विरुद्ध; बिना अग्नि जौहर, युद्ध में विजय)।
- जैसलमेर की प्रमुख हवेलियाँ: पटवों की हवेली (गुमानचंद पटवा, 5 मंजिला, 60+ झरोखे); सालिम सिंह की हवेली (9 मंजिला, जहाज महल / मोती महल); नाथमल की हवेली (हाथी और लालूं भाई, दो पाषाण हाथी)।
- सागरमल गोपा की अमर कृतियाँ: स्मरण-सूत्र "गु-मु-दी" याद रखें = जैसलमेर का गुंडाराज, रघुनाथ सिंह का मुकदमा, आजादी के दीवाने।
- जल संरक्षण शब्दावली: खड़ीन = पालीवाल ब्राह्मणों द्वारा विकसित ढलानी कृषि जल-संचयन; बेरी = संकरा रिसाव कुआँ; गड़ीसर = 1367 ई. में रावल घड़सी द्वारा निर्मित जलाशय।
- ऐतिहासिक उपाधियाँ: छत्राला यादवपति = भाटी शासकों का राजकीय विरुद; उत्तर भड़ किवाड़ भाटी = उत्तरी सीमांत की रक्षा हेतु प्राप्त गौरवशाली पदवी।
- जैसलमेर के रावल लूणकरण (1550 का अर्ध-साका, रूठी रानी उमादे के पिता) को बीकानेर के राव लूणकरण (कलिकाल का कर्ण, 1526 में ढोसी युद्ध में वीरगति) से; अथवा रावल मूलराज प्रथम (प्रथम साका) को महारावल मूलराज द्वितीय (1818 की ब्रिटिश संधि व दीवान सालिम सिंह) से कभी भ्रमित न करें।
11. अलग अभ्यास सेट
| परीक्षा सेट | प्रश्न |
|---|---|
| सेट 1 - उत्पत्ति और स्रोत | 5 |
| सेट 2 - शासक और योगदान | 15 |
| सेट 3 - प्रशासन, संस्कृति और दुर्ग | 10 |
| सेट 4 - कालक्रम और साके | 5 |
| सेट 5 - पुनरावृत्ति अभ्यास | 5 |
| सेट 6 - मिश्रित और विश्लेषणात्मक अभ्यास | 20 |
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