भरतपुर, धौलपुर, करौली, टोंक व झुंझुनूँ रियासत तथा परमार वंश का इतिहास
1. अध्याय और परीक्षा उपयोगिता
1.1 क्षेत्रीय विस्तार एवं पाठ्यक्रम में भार
- यह अध्याय राजस्थान की पूर्वी एवं मध्यवर्ती रियासतों तथा प्राचीन परमार राजवंश का विस्तृत और प्रामाणिक परीक्षा-उपयोगी अध्ययन प्रस्तुत करता है।
- इसके अंतर्गत निम्नलिखित प्रमुख विषय आते हैं:
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- भरतपुर की सिनसिनवार जाट रियासत (बदन सिंह, महाराजा सूरजमल, जवाहर सिंह, रणजीत सिंह, लोहागढ़ दुर्ग और डीग के जलमहल)।
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- धौलपुर की बमरोलिया जाट रियासत (राणा किरत सिंह, 1806 ई. का ब्रिटिश समझौता, निहाल टावर और 1857 की क्रांति)।
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- करौली की जादौन यादव रियासत (अर्जुन पाल द्वारा 1348 ई. में स्थापना, 9 नवंबर 1817 को राजस्थान की प्रथम ब्रिटिश सहायक संधि, मदन मोहन जी मंदिर और 1857 में कोटा उद्धार)।
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- टोंक रियासत (राजस्थान की एकमात्र मुस्लिम रियासत, 1817 ई. में नवाब मुहम्मद अमीर खां पिंडारी द्वारा स्थापना, सुनहरी कोठी और अरबी-फारसी शोध संस्थान)।
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- झुंझुनूँ व शेखावाटी (महाराव शेखा, शार्दूल सिंह, शेखावाटी के पाँचपाना ठिकाने, खेतड़ी के राजा अजीत सिंह व स्वामी विवेकानंद, और विश्वविख्यात भित्ति चित्र हवेलियाँ)।
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- परमार राजवंश (आबू पर्वत पर अग्निकुल उत्पत्ति, मालवा शाखा के राजा भोज व मुंज, आबू शाखा के वीर धारावर्ष, तथा किराडू व वागड़ शाखाएँ)।
- परीक्षा उपयोगिता: RPSC (RAS, स्कूल व्याख्याता, 2nd ग्रेड) तथा RSSB (CET, पटवार, VDO, पुलिस, कनिष्ठ लेखाकार) में प्रतिवर्ष 3 से 5 प्रश्न अवश्य पूछे जाते हैं।
1.2 RPSC एवं RSSB हेतु प्रमुख परीक्षा बिंदु
- परीक्षा में बार-बार पूछे जाने वाले प्रमुख बिंदु:
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- महाराजा सूरजमल: "जाट जाति का प्लेटो" व "जाटों का अफ़लातून"; 1733 ई. में लोहागढ़ दुर्ग की नींव; डीग के जलमहल; पानीपत के तीसरे युद्ध (1761 ई.) में रणनीतिक सलाह; आगरा दुर्ग विजय।
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- लोहागढ़ में ब्रिटिश प्रतिरोध: 1805 ई. में महाराजा रणजीत सिंह के समय जसवंत राव होल्कर को शरण देने पर लॉर्ड लेक ने 5 बार आक्रमण किया किंतु लोहागढ़ अजेय रहा।
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- 1817 की प्रथम सहायक संधि: 9 नवंबर 1817 को करौली के महाराजा हरबक्ष पाल ने राजस्थान में सर्वप्रथम सहायक संधि की।
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- 1857 की क्रांति में भूमिका: करौली के महाराजा मदन पाल ने कोटा के महाराव रामसिंह द्वितीय को विद्रोहियों से मुक्त कराने 2000 सैनिक भेजे (तोपों की सलामी 15 से बढ़ाकर 17 की गई); धौलपुर में क्रांतिकारियों ने दो माह तक शासन संभाला; टोंक में मीर आलम खां ने विद्रोहियों का नेतृत्व किया।
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- धार के राजा भोज: "कविराज"; सरस्वती कंठाभरण, समरांगण सूत्रधार व युक्ति कल्पतरु सहित 84 ग्रंथों के रचयिता; भोजशाला के निर्माता।
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- आबू के धारावर्ष परमार: एक ही बाण से तीन भैंसों को बींधने वाले महायोद्धा; 1178 ई. में कायद्रां/कसाह्रद के युद्ध में मुहम्मद गोरी को पराजित किया।
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- खेतड़ी ठिकाना: 1893 ई. में खेतड़ी नरेश राजा अजीत सिंह ने नरेंद्रनाथ दत्त को "विवेकानंद" नाम दिया और शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन की यात्रा प्रायोजित की।
2. परीक्षा दृष्टि से महत्वपूर्ण केंद्रीय विचार
2.1 क्षेत्रीय रियासतों का भू-राजनीतिक स्वरूप
- इस अध्याय में वर्णित रियासतें विविध सामाजिक-जातीय और राजनीतिक परंपराओं का प्रतिनिधित्व करती हैं जिन्होंने दिल्ली, आगरा, मराठों और अंग्रेजों के मध्य शक्ति संतुलन बनाए रखा:
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- भरतपुर और धौलपुर के जाटों ने दिल्ली और आगरा के मुगलों के ठीक पड़ोस में किसान-सैनिक शक्ति का संगठित राज्य स्थापित किया तथा मिट्टी के अजेय दुर्गों की युद्धकला में महारत पाई।
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- करौली ने प्राचीन चंद्रवंशी जादौन-यादव परंपरा को जीवित रखा और मेवाड़, ढूँढाड़ तथा ग्वालियर के मध्य एक सांस्कृतिक सेतु का कार्य किया।
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- टोंक का उदय मध्य भारत के पिंडारी सैन्य संगठन से हुआ, जिसे अंग्रेजों ने 1817 ई. में एक अफगान-रुहेला मुस्लिम रियासत के रूप में मान्यता दी।
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- शेखावाटी अर्ध-स्वायत्त ठिकानों (पाँचपाना) का एक विशिष्ट परिसंघ था, जहाँ मारवाड़ी-ओसवाल व्यापारियों के सहयोग से विश्वप्रसिद्ध हवेलियों और भित्ति चित्रों का विकास हुआ।
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- परमार वंश प्राचीन अग्निकुल क्षत्रिय परंपरा का प्रतीक था, जिसकी सांस्कृतिक, साहित्यिक और स्थापत्य उपलब्धियाँ मालवा से लेकर आबू, किराडू और वागड़ तक फैली थीं।
2.2 प्रमुख ऐतिहासिक उपाधियाँ एवं पहचान
- परीक्षा हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण उपाधियाँ:
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- बदन सिंह: 1722 ई. में जयपुर के सवाई जयसिंह द्वितीय द्वारा "ब्रजराज" की उपाधि, नगाड़ा व निशान प्रदान किए गए।
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- महाराजा सूरजमल: दूरदर्शिता, राजनीतिक सूझबूझ और अप्रतिम वीरता के कारण "जाट जाति का प्लेटो" तथा "जाटों का अफ़लातून" कहलाए।
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- लोहागढ़ दुर्ग: मिट्टी की दोहरी प्राचीर के कारण तोपों के गोलों को निष्प्रभावी करने वाला राजस्थान का "अजेय दुर्ग"।
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- नवाब अमीर खां पिंडारी: 1817 ई. में ब्रिटिश संधि द्वारा टोंक के प्रथम स्वतंत्र नवाब घोषित।
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- राजा भोज: "कविराज"; 84 विधाओं के प्रकांड विद्वान और धार के विद्यानुरागी नरेश।
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- धारावर्ष परमार: आबू और चंद्रावती के अजेय सेनानायक, जिन्होंने विदेशी आक्रांताओं के छक्के छुड़ाए।
3. भरतपुर व धौलपुर रियासत (जाट राजवंश)
3.1 भरतपुर रियासत: उत्पत्ति एवं प्रारंभिक जाट नेता
- मुगल सम्राट औरंगजेब की कठोर धार्मिक नीतियों और भारी भू-राजस्व के विरुद्ध ब्रज क्षेत्र के जाट किसानों ने संगठित विद्रोह का बिगुल फूंका।
- प्रारंभिक नायक:
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- गोकुला जाट (1669 ई.): तिलपत के जमींदार; किसानों को संगठित किया; तिलपत के युद्ध में मुगल फौजदार अब्दुन्नबी को मारा; अंततः बंदी बनाकर दिल्ली में शहीद किए गए।
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- राजाराम जाट (1686–1688 ई.): सिनसिनी के सरदार; छापामार युद्ध में निपुण; 1688 ई. में सिकंदरा स्थित अकबर के मकबरे को लूटा और उसकी अस्थियाँ निकालकर जला दीं; बिदर बख्त और आमेर के बिशन सिंह से लड़ते हुए वीरगति पाई।
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- चूड़ामन जाट (1695–1721 ई.): राजाराम के भतीजे; थून में सुदृढ़ कच्चा किला बनाया; मुगलों से लंबा संघर्ष किया; 1721 ई. में पारिवारिक कलह के कारण विष खाकर प्राण त्यागे।
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- बदन सिंह (1722–1755 ई.): चूड़ामन के भतीजे; भरतपुर राज्य के वास्तविक संस्थापक। जयपुर के सवाई जयसिंह द्वितीय ने इन्हें "ब्रजराज" की उपाधि, डीग की जागीर, नगाड़ा और निशान देकर जाटों का विधिवत राजा स्वीकार किया। बदन सिंह ने डीग, कुम्हेर, भरतपुर और वैर में दुर्ग बनवाए।
3.2 महाराजा सूरजमल: जाट शक्ति का चरमोत्कर्ष
- महाराजा सूरजमल (1755–1763 ई.), बदन सिंह के दत्तक पुत्र एवं उत्तराधिकारी, ने भरतपुर को 18वीं शताब्दी के उत्तर भारत की एक प्रमुख शक्ति बना दिया।
- प्रमुख उपलब्धियाँ:
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- लोहागढ़ दुर्ग (1733 ई.): खेमकरण सोगरिया से भरतपुर छीनकर लोहागढ़ दुर्ग का निर्माण करवाया, जिसके चारों ओर गहरी सुजान गंगा नहर बनाई गई।
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- डीग के भव्य जलमहल: डीग में गोपाल भवन, सूरज भवन और सुंदर फव्वारों वाले बाग-बगीचे बनवाए, जो स्थापत्य कला के उत्कृष्ट नमूने हैं।
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- कुम्हेर का घेरा (1754 ई.): मल्हारराव होल्कर ने कुम्हेर दुर्ग को घेरा; इस संघर्ष में मल्हारराव के पुत्र व अहिल्याबाई के पति खांडेराव होल्कर कुम्हेर दुर्ग से दागे गए तोप के गोले से मारे गए; सवाई माधोसिंह प्रथम की मध्यस्थता से संधि हुई।
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- पानीपत में सलाह (1761 ई.): तीसरे पानीपत युद्ध से पूर्व मराठा सेनापति सदाशिवराव भाऊ को सलाह दी कि स्त्रियों व भारी तोपों को ग्वालियर/भरतपुर में छोड़कर छापामार युद्ध लड़ें; भाऊ ने यह सलाह ठुकरा दी।
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- मानवीय सहायता: पानीपत में मराठों की पराजय के बाद सूरजमल और महारानी किशोरी ने 50,000 से अधिक घायल व भूखे मराठों को भरतपुर में शरण दी, भोजन व वस्त्र देकर सुरक्षित दक्षिण भेजा।
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- आगरा दुर्ग पर अधिकार (1761 ई.): मुगलों के प्रतिष्ठित आगरा दुर्ग पर अधिकार कर भारी शाही खजाना और तोपें प्राप्त कीं।
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- वीरगति: 25 दिसंबर 1763 को दिल्ली के पास शाहदरा में हिंडन नदी के तट पर रुहेला सरदार नजीबुद्दौला के साथ अचानक हुए संघर्ष में वीरगति प्राप्त की।
3.3 महाराजा जवाहर सिंह एवं महाराजा रणजीत सिंह
- महाराजा जवाहर सिंह (1763–1768 ई.):
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- पिता सूरजमल की शहादत का प्रतिशोध लेने हेतु 1765 ई. में दिल्ली पर चढ़ाई की और लाल किले पर अधिकार कर लिया।
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- लाल किले से ऐतिहासिक "अष्टधातु के किवाड़" (जो 1303 ई. में अलाउद्दीन खिलजी चित्तौड़गढ़ से ले गया था) उखाड़ लाए और उन्हें लोहागढ़ के उत्तरी द्वार पर लगवाया।
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- दिल्ली विजय के उपलक्ष्य में लोहागढ़ में "जवाहर बुर्ज" का निर्माण करवाया, जहाँ बाद के भरतपुर शासकों का राजतिलक होता था।
- महाराजा रणजीत सिंह (1771–1805 ई.):
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- सितंबर 1803 में अंग्रेजों से संधि की।
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- 1804 ई. में जब पराजित मराठा वीर जसवंत राव होल्कर शरण माँगने आए, तो रणजीत सिंह ने शरणार्थी धर्म का पालन करते हुए उन्हें लोहागढ़ में शरण दी।
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- ब्रिटिश सेनापति लॉर्ड लेक ने जनवरी से अप्रैल 1805 के मध्य लोहागढ़ दुर्ग पर 5 भीषण आक्रमण किए, किंतु मिट्टी की प्राचीरों को भेदने में पूरी तरह विफल रहा; 3000 से अधिक ब्रिटिश सैनिक मारे गए और लॉर्ड लेक को घेरा उठाना पड़ा। इसी से लोहागढ़ "अजेय दुर्ग" कहलाया।
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- अप्रैल 1805 में दोनों पक्षों के मध्य सम्मानजनक संधि संपन्न हुई।
3.4 धौलपुर रियासत: स्थापना एवं ऐतिहासिक विकास
- धौलपुर में बमरोलिया गोत्र के जाट शासकों का शासन था, जो पूर्व में मध्य भारत में गोहद (ग्वालियर के निकट) के शासक थे और "राणा" की पदवी धारण करते थे।
- प्रमुख ऐतिहासिक बिंदु:
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- गोहद-धौलपुर विनिमय (1805–1806 ई.): गोहद के राणा छत्र सिंह और सिंधिया के मध्य लंबे संघर्ष के बाद ब्रिटिश-सिंधिया समझौता हुआ; 1806 ई. में राणा किरत सिंह ने गोहद सिंधिया को सौंप दिया और बदले में अंग्रेजों से धौलपुर, बाड़ी व राजाखेड़ा के परगने प्राप्त किए। इस प्रकार 1806 ई. में स्वतंत्र धौलपुर रियासत की स्थापना हुई।
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- 1857 की क्रांति: राणा भगवंत सिंह (भगवान सिंह) के समय ग्वालियर व इंदौर के क्रांतिकारियों (देवा और रामचंद्र) ने धौलपुर पर अधिकार कर लिया; राजा को महल में नजरबंद रखा गया; अंततः पटियाला के महाराजा द्वारा भेजी गई सेना ने दिसंबर 1857 में धौलपुर को विद्रोहियों से मुक्त करवाया।
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- निहाल टावर (घंटाघर): महाराजा निहाल सिंह (1873–1901 ई.) द्वारा निर्मित 7 मंजिला विशाल घंटाघर, जो राजस्थान का सबसे बड़ा घंटाघर है (1910 में पूर्ण)।
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- एकीकरण: अंतिम शासक महाराणा उदयभान सिंह ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए; 18 मार्च 1948 को धौलपुर मत्स्य संघ में शामिल हुआ तथा उदयभान सिंह को मत्स्य संघ का राजप्रमुख बनाया गया।
4. करौली व टोंक रियासत (यादव व मुस्लिम रियासत)
4.1 करौली रियासत: जादौन यादव वंश की परंपरा
- करौली पर चंद्रवंशी जादौन (यादव) राजपूतों का शासन था, जो भगवान श्रीकृष्ण के वंशज माने जाते हैं।
- प्रमुख ऐतिहासिक बिंदु:
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- प्रारंभिक केंद्र: राजा विजयपाल ने 1040 ई. में बयाना को राजधानी बनाया और विजय मंदिरगढ़ दुर्ग बनवाया। 1100 ई. में तिमनपाल ने मासलपुर के निकट विशाल तिमनगढ़ दुर्ग बनवाया।
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- करौली की स्थापना (1348 ई.): अर्जुन पाल (अर्जुन देव) ने 1348 ई. में भद्रावती नदी के किनारे कल्याणपुरी नगर की नींव रखी, जो आगे चलकर करौली कहलाया।
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- महाराजा गोपाल सिंह (1724–1757 ई.): करौली में प्रसिद्ध मदन मोहन जी मंदिर का निर्माण करवाया तथा नगर के चारों ओर 6 दरवाजों वाला परकोटा बनवाया।
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- राजस्थान की प्रथम ब्रिटिश संधि (9 नवंबर 1817): महाराजा हरबक्ष पाल ने 9 नवंबर 1817 को चार्ल्स मेटकॉफ के साथ अधीनस्थ पार्थक्य की संधि की। करौली 1817–1818 की संधियों पर हस्ताक्षर करने वाली राजस्थान की प्रथम रियासत बनी।
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- 1857 में महाराजा मदन पाल का योगदान: जब कोटा के क्रांतिकारियों (जयदयाल व मेहराब खां) ने महाराव रामसिंह द्वितीय को नजरबंद कर लिया, तब करौली के मदन पाल ने 2000 सैनिक भेजकर कोटा महाराव को मुक्त करवाया और शांति स्थापित की। अंग्रेजों ने प्रसन्न होकर मदन पाल की तोपों की सलामी 15 से बढ़ाकर 17 कर दी।
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- कैला देवी तीर्थ: करौली में त्रिकूट पर्वत पर कुलदेवी कैला देवी का लक्खी मेला भरता है, जहाँ प्रसिद्ध लांगुरिया गीत गाए जाते हैं।
4.2 टोंक रियासत: राजस्थान की एकमात्र मुस्लिम रियासत
- टोंक राजस्थान की एकमात्र मुस्लिम रियासत थी, जिसकी स्थापना मराठा-पिंडारी काल के अंत में हुई।
- प्रमुख ऐतिहासिक बिंदु:
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- नवाब अमीर खां द्वारा स्थापना (1817 ई.): मुहम्मद अमीर खां, यशवंतराव होल्कर के सहयोगी व पिंडारी सेनानायक थे; 15 नवंबर 1817 को गवर्नर-जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स ने पिंडारी दल समाप्त करने की शर्त पर उन्हें टोंक का स्वतंत्र नवाब स्वीकार किया।
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- 1857 की क्रांति: नवाब वजीर-उद-दौला ने अंग्रेजों का साथ दिया, किंतु उनके मामा मीर आलम खां और रियासती सेना ने विद्रोह कर दिया तथा तात्या टोपे का साथ देकर नवाब को किले में घेर लिया।
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- सुनहरी कोठी (शीश महल): नवाब वजीर-उद-दौला द्वारा शुरू और इब्राहिम अली खां द्वारा पूर्ण करवाई गई यह कोठी सोने की नक्काशी, मीनाकारी और कांच के बेजोड़ काम के लिए विख्यात है।
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- अरबी-फारसी शोध संस्थान (APRI): 1978 ई. में टोंक में स्थापित यह संस्थान एशिया में अरबी-फारसी पांडुलिपियों का बड़ा केंद्र है, जहाँ 17वीं सदी की विशाल हस्तलिखित कुरान व मुगल फरमान सुरक्षित हैं।
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- ऊँट की कुर्बानी: टोंक के मुबारक महल में ईद-उल-जुहा पर ऊँट की कुर्बानी की अनूठी राजकीय परंपरा रही थी।
5. झुंझुनूँ रियासत व शेखावाटी (शेखावत राजवंश)
5.1 महाराव शेखा एवं शेखावाटी की स्थापना
- शेखावत राजवंश आमेर (जयपुर) के कछवाहा वंश की एक अत्यंत शक्तिशाली उप-शाखा है।
- प्रमुख बिंदु:
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- महाराव शेखा (1433–1488 ई.): 1433 ई. में अमरसर के मोकल सिंह के घर सूफी संत शेख बुरहान के आशीर्वाद से जन्म हुआ। 1471 ई. में आमेर के शासक चंद्रसेन को कर देने से मना कर स्वतंत्र शेखावाटी राज्य की स्थापना की तथा अमरसर को राजधानी बनाया। 1488 ई. में सिंघाणा के युद्ध में वीरगति पाई; इनकी छतरी रालावता में स्थित है।
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- झुंझुनूँ की पृष्ठभूमि: 14वीं सदी में झुंझा (झुंझार) नेहरा जाट द्वारा बसाया गया; बाद में यह कायमखानी मुस्लिम नवाबों के अधिकार में चला गया।
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- शार्दूल सिंह शेखावत (1730 ई.): 1730 ई. में शार्दूल सिंह ने अंतिम कायमखानी नवाब रुहेला खां की मृत्यु के पश्चात झुंझुनूँ पर अधिकार कर शेखावत शासन की नींव रखी।
5.2 शेखावाटी के पाँचपाना एवं सांस्कृतिक विरासत
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- शेखावाटी के पाँचपाना:
- 1742 ई. में शार्दूल सिंह की मृत्यु के बाद उनकी संपत्ति उनके पाँच पुत्रों में विभाजित हुई, जो इतिहास में "पाँचपाना" कहलाए:
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- नवलगढ़ व मंडावा (नवल सिंह)
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- खेतड़ी व अरूका (बाघ सिंह)
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- बिसाऊ व महणसर (केशरी सिंह)
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- सूरजगढ़ (सूरजमल)
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- डूँडलोद (हनुवंत सिंह)
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- खेतड़ी नरेश अजीत सिंह एवं स्वामी विवेकानंद:
- खेतड़ी के राजा अजीत सिंह स्वामी विवेकानंद के अनन्य भक्त व संरक्षक थे। 1893 ई. में उन्होंने नरेंद्रनाथ को "स्वामी विवेकानंद" नाम दिया, साफा व भगवा वस्त्र भेंट किए तथा शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन में जाने का संपूर्ण व्यय वहन किया। विवेकानंद तीन बार खेतड़ी पधारे।
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- ओपन एयर आर्ट गैलरी:
- झुंझुनूँ, नवलगढ़, मंडावा, फतेहपुर आदि अपनी विशाल हवेलियों में पारंपरिक आलागीला (आरायश) पद्धति से बने भित्ति चित्रों के कारण विश्व में "ओपन एयर आर्ट गैलरी" के नाम से विख्यात हैं।
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- रानी सती मंदिर: झुंझुनूँ में नारायणी बाई (दादी जी) का प्रसिद्ध तीर्थ स्थित है।
6. परमार वंश (मालवा, आबू, किराडू व वागड़)
6.1 अग्निकुल उत्पत्ति एवं पाँच ऐतिहासिक शाखाएँ
- चंदबरदाई के पृथ्वीराज रासो, पद्मगुप्त के नवसाहसांकचरित और शिलालेखों के अनुसार वशिष्ठ मुनि द्वारा आबू पर्वत के अग्निकुंड से उत्पन्न चार अग्निकुल राजपूतों में परमार प्रमुख थे ("परमार" का अर्थ "शत्रु को मारने वाला")।
- परमार वंश की पाँच प्रमुख शाखाएँ:
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- मालवा शाखा (धार व उज्जैन): 9वीं सदी के आरंभ में उपेंद्र (कृष्णराज) द्वारा स्थापित मुख्य साम्राज्यिक शाखा।
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- आबू शाखा (चंद्रावती): 10वीं सदी में उत्पलराज द्वारा स्थापित; बनास नदी किनारे चंद्रावती राजधानी रही।
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- किराडू शाखा (बाड़मेर/मरु-मंडल): किरातकूप (किराडू) केंद्र; स्थापत्य कला के बेजोड़ मंदिरों के निर्माता।
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- वागड़ शाखा (अर्थूणा/बांसवाड़ा): उत्थूणक (अर्थूणा) राजधानी; डंबरसिंह द्वारा स्थापित।
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- जालोर शाखा: कांचनगिरि (जालोर दुर्ग) पर शासन; 1181 ई. में कीर्तिपाल चौहान ने इन्हें विस्थापित किया।
6.2 मालवा शाखा: वाक्पतिराज मुंज एवं राजा भोज
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- वाक्पतिराज मुंज (974–995 ई.):
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- प्रतापी राजा और कवि; "उत्पलराज", "अमोघवर्ष" व "पृथ्वीवल्लभ" उपाधियाँ धारण कीं।
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- कल्याणी के चालुक्य नरेश तैलप द्वितीय को 6 बार पराजित किया, किंतु 7वीं बार बंदी बनाकर मृत्युदंड दिया गया।
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- विद्वानों के आश्रयदाता: धनंजय (दशरूपक), पद्मगुप्त (नवसाहसांकचरित), और हलायुध (अभिधानरत्नमाला)।
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- राजा भोज (1010–1055 ई.):
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- परमार वंश का स्वर्णकाल; राजधानी उज्जैन से धार स्थानांतरित की।
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- "कविराज" की उपाधि; साहित्य, स्थापत्य, खगोल और चिकित्सा पर 84 ग्रंथों की रचना की:
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- सरस्वती कंठाभरण (काव्यशास्त्र व व्याकरण)
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- समरांगण सूत्रधार (वास्तुशास्त्र, नगर-नियोजन व यंत्रकला)
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- युक्ति कल्पतरु (राजनीति, नौका-निर्माण व रत्न-परीक्षण)
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- आयुर्वेद सर्वस्व (आयुर्वेद चिकित्सा)
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- धार में "भोजशाला" (सरस्वती मंदिर व संस्कृत महाविद्यालय) का निर्माण करवाया, जहाँ वाग्देवी की प्रतिमा स्थापित थी।
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- भोजपुर (भोपाल के निकट) में विशाल शिवलिंग वाला "भोजेश्वर शिव मंदिर" तथा भोजपुर झील बनवाई।
- सावधानी: मालवा के परमार भोज (1010–1055 ई.) को गुर्जर-प्रतिहार मिहिर भोज (836–885 ई.) से भ्रमित न करें।
6.3 आबू शाखा: धारावर्ष परमार एवं प्रमुख सांस्कृतिक स्थल
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- आबू के धारावर्ष परमार (1163–1219 ई.):
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- यशोधवल के पुत्र; आबू के परमारों में सबसे वीर और प्रतापी शासक।
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- गुजरात के चालुक्य शासकों (कुमारपाल व भीम द्वितीय) के प्रमुख सेनापति।
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- 1178 ई. में आबू की तलहटी में कायद्रां/कसाह्रद के ऐतिहासिक युद्ध में राजपूत सेना का नेतृत्व कर मुहम्मद गोरी को बुरी तरह परास्त किया।
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- तीरंदाजी में अद्वितीय: एक ही बाण से तीन भैंसों को बींधने का अद्भुत पराक्रम दिखाया; अचलगढ़ के मंदाकिनी कुंड पर धारावर्ष की धनुर्धर प्रतिमा आज भी स्थित है।
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- प्रह्लादन देव:
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- धारावर्ष के छोटे भाई; प्रकांड संस्कृत विद्वान जिन्होंने 'पार्थ पराक्रम व्यायोग' नाटक लिखा।
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- प्रह्लादनपुर (वर्तमान पालनपुर, गुजरात) नगर की स्थापना की।
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- किराडू शाखा:
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- किराडू (बाड़मेर) का 11वीं सदी का सोमेश्वर मंदिर अपनी भव्य मूर्तिकला के कारण "राजस्थान का खजुराहो" कहलाता है।
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- वागड़ शाखा:
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- अर्थूणा (बांसवाड़ा) में 1080 ई. में निर्मित मंडलेश्वर शिव मंदिर परमार वास्तुकला का अनुपम उदाहरण है।
7. महत्वपूर्ण तिथियाँ एवं कालक्रम
7.1 प्रमुख ऐतिहासिक घटनाओं का कालक्रम
- परीक्षा पुनरावृत्ति हेतु प्रमुख घटनाओं का कालक्रम सारणी।
तिथियाँ ईस्वी हैं; प्रारंभिक अनुमानित तिथियाँ परंपरा के अनुसार भिन्न हो सकती हैं। यह परीक्षा पुनरावृत्ति हेतु चयनित कालक्रम है।
| तिथि | घटना |
|---|---|
| लगभग 825 ई. | उपेंद्र (कृष्णराज) द्वारा मालवा के परमार वंश की स्थापना |
| 974–995 ई. | वाक्पतिराज मुंज का शासन; चालुक्य तैलप द्वितीय को 6 बार पराजित किया |
| 1010–1055 ई. | धार के राजा भोज का स्वर्णकाल; 84 ग्रंथों की रचना व भोजशाला का निर्माण |
| 1040 ई. | राजा विजयपाल जादौन द्वारा बयाना की स्थापना व विजय मंदिरगढ़ दुर्ग निर्माण |
| 1080 ई. | परमार मंडनदेव द्वारा अर्थूणा (वागड़) में मंडलेश्वर शिव मंदिर का निर्माण |
| 1100 ई. | तिमनपाल जादौन द्वारा मासलपुर के निकट तिमनगढ़ दुर्ग का निर्माण |
| 1163–1219 ई. | आबू के धारावर्ष परमार का शासनकाल; कसाह्रद युद्ध में हरावल का नेतृत्व |
| 1178 ई. | कसाह्रद/कायद्रां का युद्ध: धारावर्ष व भीम द्वितीय ने मुहम्मद गोरी को परास्त किया |
| 1348 ई. | अर्जुन पाल जादौन द्वारा भद्रावती नदी तट पर कल्याणपुरी (करौली) की स्थापना |
| 1433 ई. | शेख बुरहान के आशीर्वाद से अमरसर के मोकल सिंह के घर महाराव शेखा का जन्म |
| 1471 ई. | महाराव शेखा द्वारा आमेर से स्वतंत्र होकर शेखावाटी राज्य की स्थापना |
| 1488 ई. | सिंघाणा का युद्ध: महाराव शेखा वीरगति को प्राप्त; रालावता में छतरी बनी |
| 1669 ई. | गोकुला जाट द्वारा औरंगजेब के विरुद्ध ब्रज में किसानों का प्रथम संगठित विद्रोह |
| 1688 ई. | राजाराम जाट द्वारा सिकंदरा में अकबर का मकबरा लूटा गया व अस्थियाँ जलाई गईं |
| 1722 ई. | बदन सिंह द्वारा भरतपुर राज्य की स्थापना; सवाई जयसिंह से "ब्रजराज" उपाधि प्राप्त |
| 1730 ई. | शार्दूल सिंह शेखावत द्वारा कायमखानी नवाब रुहेला खां से झुंझुनूँ पर अधिकार |
| 1733 ई. | महाराजा सूरजमल द्वारा अजेय लोहागढ़ दुर्ग का निर्माण प्रारंभ |
| 1742 ई. | शार्दूल सिंह का देहांत; शेखावाटी का पाँच पुत्रों में "पाँचपाना" विभाजन |
| 1754 ई. | कुम्हेर का घेरा: सूरजमल का सफल प्रतिरोध; खांडेराव होल्कर तोप के गोले से मारे गए |
| 1761 ई. | पानीपत तृतीय युद्ध: सूरजमल ने 50,000 मराठों को शरण दी; आगरा दुर्ग जीता |
| 1763 ई. (25 दिस.) | शाहदरा में नजीबुद्दौला के विरुद्ध संघर्ष में महाराजा सूरजमल वीरगति को प्राप्त |
| 1765 ई. | महाराजा जवाहर सिंह ने दिल्ली का लाल किला जीता; लोहागढ़ में अष्टधातु किवाड़ लगवाए |
| 1805 ई. (जन.-अप्रै.) | लोहागढ़ का घेरा: महाराजा रणजीत सिंह ने लॉर्ड लेक के 5 हमलों को विफल किया |
| 1806 ई. | राणा किरत सिंह ने गोहद सिंधिया को सौंपा; अंग्रेजों से धौलपुर प्राप्त कर राज्य स्थापित किया |
| 1817 ई. (9 नव.) | करौली के महाराजा हरबक्ष पाल ने राजस्थान में सर्वप्रथम ब्रिटिश सहायक संधि की |
| 1817 ई. (15 नव.) | अंग्रेजों ने मुहम्मद अमीर खां को टोंक का स्वतंत्र नवाब स्वीकार किया |
| 1857 ई. | 1857 की क्रांति: करौली के मदन पाल ने कोटा बचाया; धौलपुर पर विद्रोहियों का कब्जा |
| 1893 ई. | खेतड़ी के राजा अजीत सिंह ने स्वामी विवेकानंद को शिकागो धर्म सम्मेलन हेतु प्रायोजित किया |
8. प्रशासन, स्थापत्य, हवेलियाँ एवं संस्कृति
8.1 प्रशासनिक संरचना एवं राजस्व शब्दावली
- प्रशासनिक पद:
-
- शासक: सर्वोच्च सेनापति व न्याय प्रमुख (भरतपुर/करौली में महाराजा; धौलपुर में राणा; टोंक में नवाब; शेखावाटी में महाराव)।
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- दीवान / वजीर: राजस्व, वित्त और सामान्य प्रशासन का सर्वोच्च मंत्री।
-
- फौजदार: छावनियों, दुर्गों और आंतरिक सुरक्षा का सैन्य प्रमुख।
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- बख्शी: सैनिकों के वेतन, रसद और सैन्य भर्ती का प्रबंधक।
-
- कोतवाल: नगरों की शांति, बाजार व्यवस्था और मापतोल का अधिकारी।
- राजस्व शब्दावली:
-
- हासिल / माल: कृषि भूमि पर लिया जाने वाला मूल भू-राजस्व।
-
- राहदारी / दाण: व्यापारिक काफिलों और माल पर लिया जाने वाला पारगमन कर।
-
- ठिकाना / पाँचपाना: शेखावाटी में पैतृक जागीरें जो आंतरिक मामलों में स्वायत्त थीं।
8.2 स्थापत्य कला एवं भित्ति चित्र विरासत
- प्रमुख स्थापत्य एवं स्मारक:
-
- लोहागढ़ दुर्ग (भरतपुर): सूरजमल द्वारा निर्मित; सुजान गंगा नहर से घिरा; मिट्टी और पत्थरों की दोहरी प्राचीर जिसने 1805 में ब्रिटिश तोपों को बेअसर किया।
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- डीग के जलमहल: गोपाल भवन, सूरज भवन और फव्वारों की अनूठी जल-प्रणाली युक्त महल।
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- निहाल टावर (धौलपुर): महाराजा निहाल सिंह द्वारा निर्मित 7 मंजिला राजस्थान का सबसे बड़ा घंटाघर।
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- तिमनगढ़ दुर्ग (करौली): 1100 ई. में तिमनपाल द्वारा निर्मित सुदृढ़ दुर्ग।
-
- सुनहरी कोठी (टोंक): नवाब वजीर-उद-दौला के समय निर्मित स्वर्ण-मीनाकारी व शीशों से अलंकृत महल।
-
- शेखावाटी की हवेलियाँ: "ओपन एयर आर्ट गैलरी"। पोद्दार हवेली (नवलगढ़), पीरामल हवेली (बगड़), मोरारका हवेली (नवलगढ़) और सराफ हवेली (मंडावा); इनमें आलागीला (गीले पलस्तर) पद्धति से कृष्ण-लीला, रेलगाड़ी और अंग्रेजों के सजीव भित्ति चित्र उकेरे गए हैं।
9. एक पंक्ति में सारांश एवं तुलनात्मक सारणी
9.1 उच्च-उपयोगी तुलनात्मक सारणी
- शासकों, वंशों, राजधानियों और परीक्षा तथ्यों की त्वरित संदर्भ सारणी।
| शासक / विषय | प्रमुख परीक्षा तथ्य |
|---|---|
| बदन सिंह | 1722 ई. में भरतपुर की स्थापना; सवाई जयसिंह से "ब्रजराज" उपाधि प्राप्त |
| महाराजा सूरजमल | "जाटों का प्लेटो"; 1733 ई. में लोहागढ़ व डीग जलमहल बनवाए; आगरा जीता |
| महाराजा जवाहर सिंह | 1765 ई. में दिल्ली विजय; लाल किले से अष्टधातु किवाड़ लाकर लोहागढ़ में लगवाए |
| महाराजा रणजीत सिंह | 1805 ई. में लॉर्ड लेक के 5 हमलों को विफल किया; जसवंतराव होल्कर को शरण दी |
| राणा किरत सिंह | 1806 ई. में गोहद के बदले धौलपुर, बाड़ी व राजाखेड़ा पाकर धौलपुर राज्य बसाया |
| राणा भगवंत सिंह | 1857 की क्रांति के समय धौलपुर नरेश; पटियाला सेना ने विद्रोहियों से मुक्त करवाया |
| महाराजा निहाल सिंह | धौलपुर में 7 मंजिला विशाल निहाल टावर (घंटाघर) का निर्माण करवाया |
| अर्जुन पाल जादौन | 1348 ई. में भद्रावती नदी किनारे कल्याणपुरी (करौली) की स्थापना की |
| महाराजा गोपाल सिंह | करौली में मदन मोहन जी मंदिर का निर्माण व 6 द्वारों वाला परकोटा बनवाया |
| महाराजा हरबक्ष पाल | 9 नवंबर 1817 को राजस्थान में सर्वप्रथम ब्रिटिश अधीनस्थ संधि संपन्न की |
| महाराजा मदन पाल | 1857 में कोटा उद्धार हेतु 2000 सैनिक भेजे; अंग्रेजों ने 17 तोपों की सलामी दी |
| नवाब अमीर खां | 1817 ई. में टोंक के प्रथम स्वतंत्र नवाब बने; पिंडारी सेनापति |
| नवाब वजीर-उद-दौला | टोंक में प्रसिद्ध सुनहरी कोठी का निर्माण शुरू करवाया; 1857 में शासक |
| महाराव शेखा | 1471 ई. में आमेर से स्वतंत्र होकर शेखावाटी राज्य बसाया; अमरसर राजधानी |
| शार्दूल सिंह शेखावत | 1730 ई. में कायमखानियों से झुंझुनूँ जीता; पुत्रों ने "पाँचपाना" स्थापित किया |
| राजा अजीत सिंह खेतड़ी | स्वामी विवेकानंद के अनन्य भक्त; 1893 ई. में शिकागो यात्रा प्रायोजित की |
| राजा भोज (धार) | परमार सम्राट; "कविराज"; 84 ग्रंथों के रचयिता; भोजशाला व भोजेश्वर मंदिर बनवाए |
| वाक्पतिराज मुंज | परमार कवि-सम्राट; तैलप द्वितीय को 6 बार हराया; दशरूपक के धनंजय के संरक्षक |
| धारावर्ष परमार | आबू के प्रतापी धनुर्धर; 1178 ई. में कायद्रां/कसाह्रद युद्ध में गोरी को हराया |
| किराडू सोमेश्वर मंदिर | परमार कालीन मरु-गुर्जर शैली का अनुपम मंदिर; "राजस्थान का खजुराहो" |
10. सामान्य भ्रम, अंतर एवं स्मरण सूत्र
10.1 परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण विभेद
- महत्वपूर्ण भ्रम निवारण:
-
- परमार भोज बनाम मिहिर भोज: परमार भोज (1010–1055 ई.) मालवा के शासक, धार राजधानी, 84 ग्रंथों के रचयिता थे; जबकि मिहिर भोज (836–885 ई.) गुर्जर-प्रतिहार सम्राट, कन्नौज राजधानी, "आदिवराह" उपाधिधारी थे।
-
- 1817 की प्रथम ब्रिटिश संधि: करौली ने सर्वप्रथम 9 नवंबर 1817 को संधि की; टोंक ने 15 नवंबर 1817 को; कोटा ने 26 दिसंबर 1817 को की।
-
- जाट राजवंश गोत्र: भरतपुर सिनसिनवार जाट गोत्र का राज्य था; धौलपुर बमरोलिया जाट गोत्र का राज्य था (मूल रूप से गोहद के शासक)।
-
- 1857 में करौली बनाम धौलपुर: करौली के मदन पाल ने कोटा महाराव को बचाने 2000 सैनिक भेजे; धौलपुर के भगवंत सिंह को विद्रोहियों ने नजरबंद किया, जिन्हें पटियाला सेना ने छुड़ाया।
-
- राव शेखा बनाम शार्दूल सिंह: राव शेखा (1433–1488 ई.) ने शेखावाटी बसाई; शार्दूल सिंह ने 1730 ई. में कायमखानियों से झुंझुनूँ जीता और इनके पाँच पुत्रों ने "पाँचपाना" बनाया।
10.2 याद रखने के सूत्र (स्मरण-सूत्र)
- स्मरण-सूत्र 1: भ-धौ-क-टों-झु
- सूत्र: "भ-धौ-क-टों-झु" = भरतपुर, धौलपुर, करौली, टोंक, झुंझुनूँ।
- पूर्वी व मध्यवर्ती रियासतों का सरल क्षेत्रीय क्रम।
- स्मरण-सूत्र 2: परमार शासक क्रम (उ-मुं-भो-धा)
- सूत्र: "उ-मुं-भो-धा" = उपेंद्र (संस्थापक) -> मुंज (कवि व योद्धा) -> भोज (धार के कविराज) -> धारावर्ष (आबू के पराक्रमी)।
- स्मरण-सूत्र 3: शेखावाटी के पाँचपाना (न-खे-बि-सू-डू)
- सूत्र: "न-खे-बि-सू-डू" = नवलगढ़, खेतड़ी, बिसाऊ, सूरजगढ़, डूँडलोद।
11. परीक्षा अभ्यास और पूर्व प्रश्नों की स्थिति
11.1 विषय संरचना एवं अभ्यास परीक्षाएँ
- इस अध्याय के अभ्यास हेतु 60 उच्च-स्तरीय द्विभाषी प्रश्नों को छह केंद्रित अभ्यास परीक्षाओं में विभाजित किया गया है:
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- सेट 1: भरतपुर उत्पत्ति, बदन सिंह व महाराजा सूरजमल (5 प्रश्न)
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- सेट 2: लोहागढ़, युद्ध व धौलपुर रियासत (15 प्रश्न)
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- सेट 3: करौली व टोंक रियासत (10 प्रश्न)
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- सेट 4: झुंझुनूँ, शेखावाटी व पाँचपाना (5 प्रश्न)
-
- सेट 5: परमार वंश की प्रमुख शाखाएँ (5 प्रश्न)
-
- सेट 6: समग्र क्षेत्रीय पुनरावृत्ति अभ्यास (20 प्रश्न)
- कुल 60 वस्तुनिष्ठ प्रश्न विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी व्याख्या सहित उपलब्ध हैं।
| परीक्षा सेट | प्रश्न |
|---|---|
| सेट 1 - भरतपुर उत्पत्ति एवं सूरजमल | 5 |
| सेट 2 - लोहागढ़, युद्ध एवं धौलपुर रियासत | 15 |
| सेट 3 - करौली एवं टोंक रियासत | 10 |
| सेट 4 - झुंझुनूँ, शेखावाटी एवं पाँचपाना | 5 |
| सेट 5 - परमार वंश की प्रमुख शाखाएँ | 5 |
| सेट 6 - समग्र क्षेत्रीय पुनरावृत्ति अभ्यास | 20 |
प्रश्न, विकल्प, उत्तर और विस्तृत व्याख्याओं के लिए नीचे संबद्ध परीक्षाएँ खोलें।
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