Chapter 10: राजस्थान की रियासतें एवं ब्रिटिश संधियाँ
(राजस्थान की रियासतें, 1817–1818 की अधीनस्थ संधियाँ एवं ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था)
Exam Relevance: RPSC (RAS Pre व Mains, स्कूल व्याख्याता, द्वितीय श्रेणी, कॉलेज सहायक आचार्य) / RSSB (CET स्नातक व 12वीं स्तर, पटवार, VDO, राजस्थान पुलिस) / REET Mains
1. अध्याय परिचय एवं परीक्षा उपयोगिता#
- विषय की महत्ता: यह अध्याय मध्यकालीन स्वतंत्र रजवाड़ों से आधुनिक ब्रिटिश आधिपत्य के संक्रमण काल का आधार है। 1817–1818 ई. की अधीनस्थ पार्थक्य की संधियाँ (Subordinate Alliance Treaties) राजस्थान के आधुनिक इतिहास की सबसे निर्णायक घटना हैं।
- प्रश्न भार: RPSC एवं RSSB की प्रतियोगी परीक्षाओं में इस अध्याय से प्रतिवर्ष 3 से 5 प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं।
- प्रमुख परीक्षा बिंदु:
- मराठों (चौथ व सरदेशमुखी) तथा पिंडारियों (अमीर खां) के अत्याचार — संधियों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि।
- लॉर्ड वेलेजली की सहायक संधि (1803 ई. — भरतपुर व अलवर) बनाम लॉर्ड हेस्टिंग्स की अधीनस्थ पार्थक्य नीति (1817–1818 ई.)।
- ब्रिटिश वार्ताकार चार्ल्स मेटकॉफ (दिल्ली के रेजिडेंट) की केंद्रीय भूमिका।
- संधियों का पूर्ण कालानुक्रम: प्रथम संधि करौली (9 नवंबर 1817) से लेकर अंतिम संधि सिरोही (11 सितंबर 1823) तक।
- विशिष्ट संधि शर्तें: कोटा की पूरक संधि व जालिम सिंह झाला का वंशानुगत अधिकार, सिरोही की संधि में विलंब के कारण, करौली व जैसलमेर की खिराज मुक्ति।
- ब्रिटिश प्रशासनिक संरचना: 1832 ई. में अजमेर में राजपूताना रेजिडेंसी/AGG पद का गठन (प्रथम AGG अब्राहम लॉकेट) तथा 1845 ई. में माउंट आबू ग्रीष्मकालीन मुख्यालय।
- ब्रिटिश सैन्य बटालियनें: मेरवाड़ा बटालियन (1822), शेखावाटी ब्रिगेड (1835), जोधपुर लीजन (1835), कोटा कंटिंजेंट (1838), मेवाड़ भील कोर (1841)।
- संधियों के आर्थिक व सामंती दुष्परिणाम (खिराज, सांभर नमक समझौता, अफीम व्यापार नियंत्रण, सामंत-शासक संतुलन का ध्वंस) और 1857 की क्रांति की पृष्ठभूमि।
- स्वतंत्रता के समय राजस्थान की 19 रियासतें, 3 ठिकाने (लावा, कुशलगढ़, नीमराना) तथा 1 केंद्र शासित प्रदेश (अजमेर-मेरवाड़ा)।
2. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं मूल अवधारणाएँ#
- संधियों की आवश्यकता क्यों पड़ी?
- मुगलों के पतन के बाद 18वीं शताब्दी में राजस्थान मराठों (सिंधिया और होल्कर) तथा पिंडारी लुटेरों की लूटमार का केंद्र बन गया था।
- मराठों ने चौथ और सरदेशमुखी के नाम पर रियासतों के खजाने खाली कर दिए। उत्तराधिकार युद्धों (जयपुर, मारवाड़, मेवाड़) में मनमाना हस्तक्षेप कर भारी हर्जाने वसूले।
- 1810 ई. में अमीर खां पिंडारी के दबाव में मेवाड़ की राजकुमारी कृष्णा कुमारी को विष देने की हृदयविदारक घटना ने राजपूत राज्यों की लाचारी उजागर कर दी।
- सामंतों के विद्रोह और रिक्त राजकोष से त्रस्त राजाओं को अपनी गद्दी व वंश की सुरक्षा के लिए किसी सर्वोच्च शक्ति के संरक्षण की आवश्यकता थी।
- ब्रिटिश नीतियों का विकास:
- घेरे की नीति / रिंग फेंस नीति (वारेन हेस्टिंग्स): अपने राज्य की सीमाओं के चारों ओर बफर राज्य बनाना।
- सहायक संधि प्रणाली (लॉर्ड वेलेजली, 1798–1805 ई.): देशी राज्यों से सुरक्षा के बदले सैन्य खर्च लेना। 1803 ई. में भरतपुर और अलवर ने संधियाँ कीं, किंतु बाद में कॉर्नवालिस व जॉर्ज बार्लो ने अहस्तक्षेप नीति अपनाकर राजपूताना को मराठों के रहमोकरम पर छोड़ दिया।
- अधीनस्थ पार्थक्य की नीति (लॉर्ड हेस्टिंग्स / मार्क्विस ऑफ हेस्टिंग्स, 1813–1823 ई.): हेस्टिंग्स ने पिंडारियों के दमन और तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध (1817–1818) के दौरान राजपूताना के सभी राज्यों को ब्रिटिश छत्रछाया में लाने का दृढ़ निर्णय लिया।
- अधीनस्थ पार्थक्य (Subordinate Isolation) का अर्थ: प्रत्येक रियासत को ब्रिटिश सत्ता के पूर्णतः अधीनस्थ करना, किंतु अन्य सभी पड़ोसी राज्यों से उसके राजनीतिक संबंधों को पूर्णतः काट देना (अलग-थलग कर देना)। देशी नरेशों की विदेश नीति समाप्त हो गई और वे केवल आंतरिक प्रशासन के सीमित मुखिया रह गए।
3. संधियों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: मराठा, पिंडारी व वेलेजली#
3.1 मराठा लूटमार व हुरड़ा सम्मेलन#
- **राजस्थान में मराठों का प्रथम प्रवेश:** 1711 ई. में मेवाड़ में तथा 1734 ई. में बूंदी के उत्तराधिकार संघर्ष (बुद्ध सिंह बनाम दलेल सिंह) में मराठा सेना का हस्तक्षेप।
- **हुरड़ा सम्मेलन (17 जुलाई 1734 ई.):** भीलवाड़ा के हुरड़ा नामक स्थान पर सवाई जयसिंह (जयपुर) की पहल पर मेवाड़ के महाराणा जगत सिंह द्वितीय की अध्यक्षता में सम्मेलन हुआ। वर्षा ऋतु के बाद रामपुरा में एकत्र होकर मराठों का मुकाबला करने का अहदनामा बना, किंतु आपसी अविश्वास व स्वार्थ के कारण असफल रहा।
- **पेशवा बाजीराव प्रथम की राजस्थान यात्रा (1736 ई.):** मेवाड़ व जयपुर पर भारी वार्षिक चौथ निर्धारित की गई।
- **मराठों की सैन्य विजयें:** महादजी सिंधिया के फ्रांसीसी सेनापति डी-बोइन ने **पाटन का युद्ध (जून 1790)** और **मेड़ता का युद्ध (सितंबर 1790)** में राजपूत सेनाओं को परास्त किया। 1800 ई. में **मालपुरा के युद्ध** में सवाई प्रताप सिंह (जयपुर) को दौलतराव सिंधिया ने हराया।
3.2 पिंडारियों का आतंक एवं कृष्णा कुमारी विवाद#
- **अमीर खां पिंडारी:** यशवंतराव होल्कर का सहयोगी और पिंडारी दलों का मुख्य नायक। उसने राजस्थान की रियासतों में चौथ वसूली और लूटमार का तांडव मचाया।
- **कृष्णा कुमारी प्रसंग (1810 ई.):** मेवाड़ के महाराणा भीम सिंह की पुत्री कृष्णा कुमारी का विवाह पहले जोधपुर के महाराजा भीम सिंह से तय हुआ था। उनकी मृत्यु के बाद संबंध जयपुर के महाराजा जगत सिंह द्वितीय से तय हुआ। इस पर जोधपुर के नए महाराजा मान सिंह ने ऐतराज जताया।
- **गिंगोली का युद्ध (1807 ई.):** परबतसर के पास गिंगोली में जयपुर और जोधपुर की सेनाओं में भीषण युद्ध हुआ। अमीर खां पिंडारी ने दोनों पक्षों से धन वसूला और अंततः 21 जुलाई 1810 को महाराणा भीम सिंह को विवश कर कृष्णा कुमारी को जहर दिलवा दिया।
3.3 लॉर्ड वेलेजली की प्रारंभिक संधियाँ (1803 ई.)#
- द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध के समय लॉर्ड लेक के नेतृत्व में उत्तरी भारत में अभियान चलाया गया:
- **भरतपुर संधि (29 सितंबर 1803):** महाराजा रणजीत सिंह ने अंग्रेजों से संधि की। किंतु 1804 में मराठा सरदार यशवंतराव होल्कर को शरण देने पर लॉर्ड लेक ने लोहागढ़ पर 1805 में पाँच बार आक्रमण किया जो असफल रहा। अंततः अप्रैल 1805 में नई संधि हुई।
- **अलवर संधि (14 नवंबर 1803):** अलवर के राव राजा बख्तावर सिंह ने अंग्रेजों से पहली स्थाई रक्षात्मक संधि की।
- बाद में जॉर्ज बार्लो की अहस्तक्षेप नीति के तहत जयपुर और जोधपुर की संधियाँ रद्द कर दी गईं, जिससे राजपूत राज्य पुनः मराठों के अधीन पिसने लगे।
4. 1817–1818 ई. की संधियाँ: तिथियाँ, शासक व प्रमुख वार्ताकार#
4.1 राजस्थान की रियासतों की संधियों का प्रामाणिक मास्टर चार्ट#
| क्रम |
रियासत |
संधि की निश्चित तिथि |
तत्कालीन शासक |
ब्रिटिश प्रतिनिधि / वार्ताकार |
विशेष तथ्य / शर्तें |
| 1 |
करौली |
9 नवंबर 1817 |
महाराजा हरबक्ष पाल |
चार्ल्स मेटकॉफ |
1817 में संधि करने वाली राजस्थान की प्रथम रियासत; तत्काल समर्पण के कारण खिराज (टैक्स) से मुक्त |
| 2 |
टोंक |
15 नवंबर 1817 |
नवाब अमीर खां पिंडारी |
लॉर्ड हेस्टिंग्स / मेटकॉफ |
पिंडारी दल समाप्त करने व तोपखाना सौंपने की शर्त पर स्वतंत्र नवाब के रूप में मान्यता |
| 3 |
कोटा |
26 दिसंबर 1817 |
महाराव उम्मेद सिंह प्रथम |
चार्ल्स मेटकॉफ |
दीवान जालिम सिंह झाला ने वार्ता की; मराठों को दी जाने वाली चौथ अंग्रेजों को हस्तांतरित |
| 4 |
जोधपुर (मारवाड़) |
6 जनवरी 1818 |
महाराजा मान सिंह राठौड़ |
चार्ल्स मेटकॉफ |
युवराज छतर सिंह की ओर से हस्ताक्षर; 1,08,000 रुपये वार्षिक खिराज निर्धारित |
| 5 |
उदयपुर (मेवाड़) |
13 जनवरी 1818 |
महाराणा भीम सिंह सिसोदिया |
चार्ल्स मेटकॉफ |
आसींद के ठाकुर अजीत सिंह ने मेवाड़ की ओर से हस्ताक्षर किए; कर्नल टॉड प्रथम पॉलिटिकल एजेंट बनकर आए |
| 6 |
बूंदी |
10 फरवरी 1818 |
महाराव राजा बिशन सिंह |
चार्ल्स मेटकॉफ |
होल्कर का खिराज अंग्रेजों को अंतरित; मराठों द्वारा छीने गए परगने वापस मिले |
| 7 |
बीकानेर |
9 मार्च 1818 |
महाराजा सूरत सिंह |
चार्ल्स मेटकॉफ |
बीकानेर की ओर से काशीनाथ ओझा ने हस्ताक्षर किए; अंग्रेजों ने विद्रोही सामंतों के दमन का वचन दिया |
| 8 |
किशनगढ़ |
26 मार्च 1818 |
महाराजा कल्याण सिंह |
चार्ल्स मेटकॉफ |
छोटी रियासत; आंतरिक सुरक्षा व मैत्री संधि |
| 9 |
जयपुर |
2 अप्रैल 1818 |
सवाई जगत सिंह द्वितीय |
चार्ल्स मेटकॉफ |
दीवान मोहनराम नाजर ने वार्ता की; प्रारंभ में 4 लाख व बाद में 8 लाख रुपये तक खिराज तय |
| 10 |
प्रतापगढ़ |
5 अक्टूबर 1818 |
महारावत सामंत सिंह |
जॉन मैल्कम |
होल्कर को दिया जाने वाला खिराज अंग्रेजों को देने की सहमति |
| 11 |
डूंगरपुर |
11 दिसंबर 1818 |
महारावल जसवंत सिंह द्वितीय |
जॉन मैल्कम / मेटकॉफ |
वागड़ क्षेत्र की रियासत; आंतरिक व्यवस्था व खिराज तय |
| 12 |
जैसलमेर |
12 दिस. 1818 / 2 जन. 1819 |
महारावल मूलराज द्वितीय |
चार्ल्स मेटकॉफ |
2 जनवरी 1819 को पुष्टि; रेगिस्तानी व निर्धन क्षेत्र होने के कारण खिराज से पूर्णतः मुक्त |
| 13 |
बांसवाड़ा |
25 दिसंबर 1818 |
महारावल उम्मेद सिंह |
जॉन मैल्कम / मेटकॉफ |
धार (मालवा) से संबंध समाप्त कर सीधे ब्रिटिश संरक्षण स्वीकार |
| 14 |
सिरोही |
11 सितंबर 1823 |
राव शिव सिंह देवड़ा |
कैप्टन टॉड / मेटकॉफ |
संधि करने वाली राजस्थान की अंतिम रियासत; जोधपुर के झूठे दावे की जांच के बाद स्वतंत्र संधि |
5. विशिष्ट संधि शर्तें, पूरक संधियाँ एवं विवाद#
5.1 कोटा की पूरक संधि (20 फरवरी 1818) व जालिम सिंह झाला#
- **जालिम सिंह झाला का प्रभुत्व:** कोटा के दीवान व फौजदार जालिम सिंह झाला अत्यंत कूटनीतिज्ञ थे जिन्होंने कोटा को मराठा हमलों से सुरक्षित रखा था।
- **गुप्त पूरक धारा:** 26 दिसंबर 1817 की मूल संधि के बाद 20 फरवरी 1818 को चार्ल्स मेटकॉफ और जालिम सिंह ने एक गुप्त पूरक धारा जोड़ी:
- कोटा के राजसिंहासन पर महाराव उम्मेद सिंह और उनके वंशज बैठेंगे।
- राज्य का वास्तविक प्रशासनिक व कार्यकारी अधिकार (फौजदार/दीवान पद) वंशानुगत रूप से जालिम सिंह झाला और उनके वंशजों के पास रहेगा।
- **मांगरोल का युद्ध (1 अक्टूबर 1821 ई.):** उम्मेद सिंह की मृत्यु के बाद नए महाराव किशोर सिंह द्वितीय ने अपने वैध अधिकारों की मांग की और सेना लेकर निकले। अंग्रेजों ने कर्नल टॉड के नेतृत्व में जालिम सिंह का साथ दिया। मांगरोल (बारां) के युद्ध में महाराव किशोर सिंह पराजित हुए और उन्हें नाममात्र का शासक स्वीकार करना पड़ा।
- **झालावाड़ का गठन (1838 ई.):** शासक और दीवान के वंशजों का यह विवाद सुलझाने के लिए अंग्रेजों ने 1838 ई. में कोटा से 17 परगने अलग कर जालिम सिंह के पौत्र **मदन सिंह झाला** के लिए **झालावाड़** नामक नई रियासत बनाई, जो राजस्थान की 19वीं रियासत बनी।
5.2 सिरोही की संधि में विलंब का कारण (1818–1823 ई.)#
- **जोधपुर का अनुचित दावा:** जब 1817–1818 में संधियाँ हो रही थीं, तब जोधपुर के महाराजा मान सिंह ने दावा किया कि सिरोही मारवाड़ की अधीन रियासत है, अतः उससे अलग संधि न की जाए।
- **टॉड की जांच:** कैप्टन जेम्स टॉड ने सिरोही के ऐतिहासिक दस्तावेजों की पड़ताल कर स्पष्ट किया कि सिरोही के देवड़ा चौहान कभी भी मारवाड़ के अधीन नहीं रहे और वे पूर्ण स्वतंत्र शासक हैं।
- **विलंब से संधि:** इस जांच और आंतरिक अशांति के कारण सिरोही के राव शिव सिंह ने 11 सितंबर 1823 को सबसे अंत में संधि पर हस्ताक्षर किए।
5.3 खिराज (टैक्स) से मुक्त रियासतें#
- **करौली:** बिना किसी प्रतिरोध के सर्वप्रथम संधि करने और वफादारी के कारण खिराज से मुक्त रही।
- **जैसलमेर:** दूरस्थ मरुस्थलीय भौगोलिक स्थिति, राज्य की निर्धनता और पश्चिमी सीमांत पर स्थित होने के कारण खिराज से मुक्त रखा गया।
- **अलवर:** 1803 की संधि के तहत अंग्रेजों को सैन्य सहायता देने के बदले खिराज से मुक्त थी।
- **बीकानेर:** प्रारंभ में खिराज नहीं लिया गया, किंतु अंग्रेजों द्वारा राज्य के विद्रोही सामंतों (चूरू, महाजन, भादरा) का दमन करने पर सैन्य व्यय वसूला गया।
5.4 अजमेर-मेरवाड़ा का कंपनी शासन में विलय (1818 ई.)#
- **ग्वालियर की संधि (25 जून 1818 ई.):** दौलतराव सिंधिया ने अजमेर का रणनीतिक जिला ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया।
- **महत्व:** अजमेर ब्रिटिश शासन का सीधा केंद्र बना और यहाँ से पूरे राजपूताना की रियासतों पर निगरानी रखी जाने लगी।
6. ब्रिटिश प्रशासनिक संरचना एवं सैन्य बटालियनें#
6.1 राजपूताना रेजिडेंसी एवं AGG का पद#
- **प्रारंभिक व्यवस्था (1818–1832 ई.):** राजस्थान का कार्यभार दिल्ली के ब्रिटिश रेजिडेंट (चार्ल्स मेटकॉफ, डेविड ऑक्टरलोनी) के अधीन था।
- **AGG पद की स्थापना (1832 ई.):** गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक ने 1832 में अजमेर दरबार आयोजित किया और राजपूताना के लिए अलग एजेंसी बनाई:
- **पदनाम:** Agent to the Governor-General (AGG — गवर्नर-जनरल का एजेंट)।
- **प्रथम AGG:** **मिस्टर अब्राहम लॉकेट** (1832 ई.)।
- **मुख्यालय:** 1832 में **अजमेर**।
- **ग्रीष्मकालीन मुख्यालय:** 1845 ई. में स्वास्थ्यप्रद जलवायु के कारण **माउंट आबू** को ग्रीष्मकालीन मुख्यालय बनाया गया।
- **1857 की क्रांति के समय AGG:** **जॉर्ज पैट्रिक लॉरेंस**।
6.2 प्रमुख पॉलिटिकल एजेंसियाँ एवं पॉलिटिकल एजेंट (1857 के संदर्भ में)#
| पॉलिटिकल एजेंसी |
मुख्यालय |
संबंधित रियासतें |
1857 के समय पॉलिटिकल एजेंट (PA) |
| मेवाड़ एजेंसी |
उदयपुर |
मेवाड़ (उदयपुर), डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ |
मेजर शॉवर्स (Major Showers) |
| मारवाड़ एजेंसी |
जोधपुर |
मारवाड़ (जोधपुर), जैसलमेर, सिरोही |
कैप्टन मॉक मेसन (चेलावास युद्ध में मारा गया) |
| जयपुर एजेंसी |
जयपुर |
जयपुर, किशनगढ़, अलवर |
मेजर विलियम ईडन (Major Eden) |
| हाड़ौती एजेंसी |
कोटा |
कोटा, बूंदी, झालावाड़ |
मेजर चार्ल्स बर्टन (कोटा में सिर काटा गया) |
| भरतपुर एजेंसी |
भरतपुर |
भरतपुर, धौलपुर, करौली |
कैप्टन निक्सन / मॉरिसन |
6.3 राजस्थान में गठित ब्रिटिश सैन्य टुकड़ियाँ (बटालियनें)#
- मेरवाड़ा बटालियन (1822 ई.):
- मुख्यालय: ब्यावर (अजमेर)।
- उद्देश्य: कैप्टन हेनरी हॉल के नेतृत्व में मेरवाड़ा के मेरों को शांत करने व कानून-व्यवस्था स्थापित करने हेतु।
- शेखावाटी ब्रिगेड (1835 ई.):
- मुख्यालय: झुंझुनूँ।
- उद्देश्य: मेजर हेनरी फॉस्टर के नेतृत्व में शेखावाटी के विद्रोही सामंतों व धाड़वियों का दमन। इसका पूरा खर्च जयपुर रियासत पर थोपा गया।
- जोधपुर लीजन (1835 ई.):
- मुख्यालय: एरिनपुरा (पाली)।
- उद्देश्य: महाराजा मान सिंह के साथ संधि विवादों के बाद मारवाड़ की सेना के बदले गठित। 1857 में इसी टुकड़ी ने "चलो दिल्ली, मारो फिरंगी" के नारे के साथ विद्रोह किया।
- कोटा कंटिंजेंट (1838 ई.):
- मुख्यालय: देवली (टोंक)।
- उद्देश्य: झालावाड़ के गठन के बाद कोटा की सहायक सेना के रूप में स्थापित। 1857 में विद्रोह कर आगरा कूच किया।
- मेवाड़ भील कोर (MBC) (1841 ई.):
- मुख्यालय: खेरवाड़ा (उदयपुर)।
- उद्देश्य: महाराणा सरदार सिंह के समय मेजर विलियम हंटर के अधीन दक्षिणी राजस्थान के भीलों को सेना में भर्ती कर शांत रखने हेतु गठित। 1857 की क्रांति में यह शांत रही।
7. ब्रिटिश संधियों के सामाजिक, आर्थिक व सामंती प्रभाव#
7.1 संप्रभुता का ह्रास और कठपुतली शासक#
- देशी राजाओं की स्वतंत्र विदेश नीति समाप्त हो गई। वे बिना ब्रिटिश अनुमति के न तो किसी अन्य राजा से पत्र-व्यवहार कर सकते थे और न ही युद्ध या संधि।
- आंतरिक मामलों में अहस्तक्षेप का वादा झूठा साबित हुआ। पॉलिटिकल एजेंट राजदरबारों के दैनिक मामलों, उत्तराधिकार, दीवानों की नियुक्ति और नाबालिग राजाओं की संरक्षिका परिषदों (रीजेंसी कौंसिल) में पूर्ण दखल देने लगे (उदा. जयपुर में मेजर थॉर्स्बी व मेजर लुडलो का शासन)।
7.2 परंपरागत सामंत-शासक संतुलन का विनाश#
- **भाई-बंट प्रणाली का अंत:** राजपूत शासन व्यवस्था में शासक सामंतों का अधिपति न होकर "समानों में प्रथम" होता था। राजा अपनी सैन्य सुरक्षा के लिए सामंतों की जमियत (सेना) पर निर्भर रहता था।
- **सामंतों की शक्तिहीनता:** 1818 के बाद राजाओं को ब्रिटिश सेना की सुरक्षा गारंटी मिल गई। फलस्वरूप राजाओं ने सामंतों पर निर्भर रहना बंद कर दिया, उनकी प्राचीन जागीरी सेनाएं भंग कर दीं और उन पर नकद रेख, चकरी व तलवार बंधाई का बोझ बढ़ा दिया।
- **विद्रोह की ज्वाला:** अपनी प्रतिष्ठा और जागीर छिनने से सामंत वर्ग में भयंकर असंतोष फैला, जो 1857 में आऊवा के ठाकुर कुशाल सिंह, कोठारिया के जोधसिंह तथा सलूंबर के केसरी सिंह के खुले विद्रोह के रूप में फटा।
7.3 आर्थिक शोषण: खिराज, नमक व अफीम का दोहन#
- **खिराज का भारी बोझ:** संधियों के तहत निर्धारित वार्षिक खिराज चुकाने के लिए देशी राज्यों को भारी कर्ज लेना पड़ा, जिससे राजकोष दिवालिया हो गए।
- **नमक समझौते (1869–1879 ई.):** अंग्रेजों ने जयपुर और जोधपुर से संधियाँ कर सांभर झील, डीडवाना और पचपदरा के नमक उत्पादन पर एकाधिकार कर लिया। स्थानीय नमक निर्माण के कारखाने बंद करवा दिए, जिससे हजारों स्थानीय कामगार बेरोजगार हो गए।
- **अफीम व्यापार पर नियंत्रण:** मालवा व मेवाड़ की अफीम के व्यापार पर ब्रिटिश नियंत्रण स्थापित कर भारी पारगमन शुल्क (Transit Duty) लगाया गया और व्यापार को केवल बॉम्बे बंदरगाह की ओर मोड़ दिया गया।
- **किसानों पर शोषण का स्थानांतरण:** राजाओं व जागीरदारों ने ब्रिटिश देनदारियों की भरपाई के लिए जनता पर दर्जनों **लाग-बाग** (उपकर) और **बेगार** (मुफ्त श्रम) थोप दी, जिससे आगे चलकर बिजौलिया, बेगूं, बूंदी और सीकर के ऐतिहासिक किसान आंदोलन जन्मे।
8. स्वतंत्रता के समय राजस्थान की 19 रियासतों का वर्गीकरण#
8.1 राजनीतिक इकाइयों का स्वरूप (1947 ई.)#
- **19 रियासतें (Princely States):** मेवाड़, मारवाड़, जयपुर, बीकानेर, जैसलमेर, कोटा, बूंदी, झालावाड़, करौली, भरतपुर, धौलपुर, अलवर, सिरोही, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, टोंक, किशनगढ़, शाहपुरा।
- **3 ठिकाने (Chiefships):**
- **लावा:** जयपुर/टोंक के पास गैर-सलामी ठिकाना।
- **कुशलगढ़:** बांसवाड़ा क्षेत्र में।
- **नीमराना:** अलवर क्षेत्र में।
- **1 केंद्र शासित प्रदेश:** **अजमेर-मेरवाड़ा** (चीफ कमिश्नर का प्रांत, श्रेणी 'C' राज्य)।
8.2 रियासतों का वर्गीकरण एवं विशिष्ट तथ्य#
| वर्गीकरण आधार |
संबंधित रियासतें / विवरण |
| क्षेत्रफल में सबसे बड़ी |
जोधपुर (मारवाड़) — लगभग 36,000 वर्ग मील से अधिक |
| क्षेत्रफल व जनसंख्या में सबसे छोटी |
शाहपुरा — मात्र 405 वर्ग मील क्षेत्रफल; लगभग 61,000 जनसंख्या |
| जनसंख्या में सबसे बड़ी |
जयपुर |
| सबसे प्राचीन राजवंश |
मेवाड़ (उदयपुर) — गुहिल/सिसोदिया वंश (566 ई. से स्थापित) |
| सबसे नवीन रियासत |
झालावाड़ — 1838 ई. में अंग्रेजों द्वारा कोटा से अलग कर बनाई गई |
| एकमात्र मुस्लिम रियासत |
टोंक — 1817 ई. में नवाब अमीर खां पिंडारी द्वारा स्थापित |
| जाट राजवंश की रियासतें |
भरतपुर (सिनसिनवार गोत्र) एवं धौलपुर (बमरोलिया गोत्र) |
| यादव/जादौन राजवंश |
करौली — श्रीकृष्ण के चंद्रवंश की जादौन शाखा |
| तोपों की सर्वाधिक सलामी (19 तोपें) |
मेवाड़ (उदयपुर) — राजपूताना की सर्वोच्च प्रतिष्ठित रियासत |
| तोपों की सलामी से वंचित (Non-Salute) |
शाहपुरा एवं किशनगढ़ (आरंभिक दौर में) तथा तीनों ठिकाने (लावा, कुशलगढ़, नीमराना) |
9. कालक्रमानुसार संपूर्ण घटनाक्रम एवं त्वरित सारणी#
9.1 महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तिथियाँ (1798–1845 ई.)#
| वर्ष |
दिनांक |
ऐतिहासिक घटना |
परीक्षा महत्व |
| 1798 |
— |
लॉर्ड वेलेजली भारत का गवर्नर-जनरल बना |
सहायक संधि प्रणाली की शुरुआत |
| 1803 |
29 सितंबर |
भरतपुर के साथ संधि |
लॉर्ड लेक व महाराजा रणजीत सिंह के मध्य रक्षात्मक संधि |
| 1803 |
14 नवंबर |
अलवर के साथ संधि |
बख्तावर सिंह द्वारा अंग्रेजों से स्थाई संधि |
| 1805 |
जन.–अप्रै. |
लोहागढ़ का घेरा |
लॉर्ड लेक की पाँचों चढ़ाइयाँ विफल; जसवंतराव होल्कर को शरण |
| 1810 |
21 जुलाई |
राजकुमारी कृष्णा कुमारी का बलिदान |
मेवाड़ में अमीर खां के दबाव में जहर दिया गया |
| 1813 |
अक्टूबर |
लॉर्ड हेस्टिंग्स का आगमन |
राजपूताना के लिए अधीनस्थ पार्थक्य की नीति का निर्धारण |
| 1817 |
9 नवंबर |
करौली की संधि |
1817 में अधीनस्थ संधि करने वाली राजस्थान की प्रथम रियासत |
| 1817 |
15 नवंबर |
टोंक की संधि |
अमीर खां को स्वतंत्र नवाब की मान्यता |
| 1817 |
26 दिसंबर |
कोटा की संधि |
दीवान जालिम सिंह द्वारा वार्ता; मराठा चौथ अंग्रेजों को अंतरित |
| 1818 |
6 जनवरी |
जोधपुर की संधि |
महाराजा मान सिंह; 1.08 लाख रुपये वार्षिक खिराज तय |
| 1818 |
13 जनवरी |
मेवाड़ की संधि |
महाराणा भीम सिंह; कर्नल टॉड प्रथम पॉलिटिकल एजेंट नियुक्त |
| 1818 |
10 फरवरी |
बूंदी की संधि |
महाराव बिशन सिंह; परगने वापस मिले |
| 1818 |
20 फरवरी |
कोटा की पूरक संधि |
जालिम सिंह झाला के वंशजों को वंशानुगत फौजदार पद दिया गया |
| 1818 |
9 मार्च |
बीकानेर की संधि |
महाराजा सूरत सिंह; विद्रोही सामंतों के दमन में ब्रिटिश मदद |
| 1818 |
26 मार्च |
किशनगढ़ की संधि |
महाराजा कल्याण सिंह की संधि |
| 1818 |
2 अप्रैल |
जयपुर की संधि |
सवाई जगत सिंह द्वितीय; प्रगतिशील खिराज तय |
| 1818 |
25 जून |
अजमेर-मेरवाड़ा का हस्तांतरण |
दौलतराव सिंधिया ने ग्वालियर संधि द्वारा अजमेर अंग्रेजों को दिया |
| 1818 |
5 अक्टूबर |
प्रतापगढ़ की संधि |
महारावत सामंत सिंह |
| 1818 |
11 दिसंबर |
डूंगरपुर की संधि |
महारावल जसवंत सिंह द्वितीय |
| 1818 |
25 दिसंबर |
बांसवाड़ा की संधि |
महारावल उम्मेद सिंह |
| 1819 |
2 जनवरी |
जैसलमेर की संधि |
महारावल मूलराज द्वितीय; खिराज से पूर्ण मुक्त |
| 1821 |
1 अक्टूबर |
मांगरोल का युद्ध |
अंग्रेजों व जालिम सिंह ने कोटा के महाराव किशोर सिंह को हराया |
| 1822 |
— |
मेरवाड़ा बटालियन की स्थापना |
ब्यावर मुख्यालय; मेरों के नियंत्रण हेतु |
| 1823 |
11 सितंबर |
सिरोही की संधि |
अधीनस्थ संधि करने वाली राजस्थान की अंतिम रियासत |
| 1832 |
— |
अजमेर में AGG पद की स्थापना |
लॉर्ड विलियम बेंटिक द्वारा; प्रथम AGG अब्राहम लॉकेट |
| 1835 |
— |
शेखावाटी ब्रिगेड की स्थापना |
झुंझुनूँ मुख्यालय; मेजर फॉस्टर के नेतृत्व में |
| 1835 |
— |
जोधपुर लीजन की स्थापना |
एरिनपुरा मुख्यालय |
| 1838 |
— |
झालावाड़ रियासत का निर्माण |
कोटा से अलग कर मदन सिंह झाला हेतु; 19वीं रियासत |
| 1841 |
— |
मेवाड़ भील कोर (MBC) की स्थापना |
खेरवाड़ा मुख्यालय; मेजर विलियम हंटर |
| 1845 |
— |
AGG का ग्रीष्मकालीन कार्यालय |
माउंट आबू स्थानांतरित |
10. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय तथ्य, अंतर व स्मरण-सूत्र#
10.1 अक्सर भ्रमित करने वाले परीक्षा बिंदु#
- **राजस्थान में अंग्रेजों से पहली संधि:** भरतपुर (सितंबर 1803) व अलवर (नवंबर 1803) — लॉर्ड वेलेजली के काल में।
- **1817–1818 की पहली अधीनस्थ संधि:** **करौली** (9 नवंबर 1817) — लॉर्ड हेस्टिंग्स के काल में।
- **सबसे अंतिम अधीनस्थ संधि:** **सिरोही** (11 सितंबर 1823) — राव शिव सिंह के काल में।
- **संधि वार्ताकार:** चार्ल्स मेटकॉफ (दिल्ली के रेजिडेंट) — लगभग सभी प्रमुख संधियों के निर्माता।
- **प्रथम AGG:** मिस्टर अब्राहम लॉकेट (1832 ई.)।
- **1857 में AGG:** जॉर्ज पैट्रिक लॉरेंस।
- **प्रथम पॉलिटिकल एजेंट:** कर्नल जेम्स टॉड (पश्चिमी राजपूताना राज्य)।
- **खिराज से मुक्त रियासतें:** करौली, जैसलमेर, अलवर।
- **नवीनतम रियासत:** झालावाड़ (1838 ई.)।
10.2 याद रखने के सूत्र (Mnemonics)#
- **स्मरण-सूत्र 1: प्रमुख ब्रिटिश अधिकारी (वे-हे-मे-लॉ)**
- सूत्र: **"वे-हे-मे-लॉ"** = **वे**लेजली (1798), **हे**स्टिंग्स (1817), **मे**टकॉफ (वार्ताकार), **लॉ**केट (प्रथम AGG 1832)।
- **स्मरण-सूत्र 2: 1817–1818 की प्रथम 9 संधियाँ (क-टों-को-जो-उ-बू-बी-कि-जै)**
- सूत्र: **"क-टों-को-जो-उ-बू-बी-कि-जै"**
- क्रम: **क**रौली (9 नव.) -> **टों**क (15 नव.) -> **को**टा (26 दिस.) -> **जो**धपुर (6 जन.) -> **उ**दयपुर (13 जन.) -> **बू**ंदी (10 फर.) -> **बी**कानेर (9 मार्च) -> **कि**शनगढ़ (26 मार्च) -> **जै**पुर (2 अप्रैल)।
- **स्मरण-सूत्र 3: ब्रिटिश सैन्य बटालियनें (मे-शे-जो-को-भी)**
- सूत्र: **"मे-शे-जो-को-भी"**
- क्रम: **मे**रवाड़ा बटालियन (1822, ब्यावर) -> **शे**खावाटी ब्रिगेड (1835, झुंझुनूँ) -> **जो**धपुर लीजन (1835, एरिनपुरा) -> **को**टा कंटिंजेंट (1838, देवली) -> मेवाड़ **भी**ल कोर (1841, खेरवाड़ा)।
11. परीक्षा अभ्यास और विषय संरचना#
11.1 विषय संरचना एवं अभ्यास परीक्षाएँ#
- इस अध्याय के संपूर्ण अभ्यास हेतु **60 उच्च-स्तरीय द्विभाषी प्रश्नों** को छह केंद्रित अभ्यास परीक्षाओं में विभाजित किया गया है:
- **सेट 1: संधियों की पृष्ठभूमि, वेलेजली की संधियाँ व ब्रिटिश नीतियाँ (5 प्रश्न)**
- **सेट 2: 1817–1818 की संधियाँ — तिथियाँ, शासक व प्रमुख शर्तें (15 प्रश्न)**
- **सेट 3: विशिष्ट संधियाँ — कोटा पूरक संधि, सिरोही विवाद व प्रमुख राज्य (10 प्रश्न)**
- **सेट 4: ब्रिटिश प्रशासनिक ढाँचा — AGG, PA व सैन्य बटालियनें (5 प्रश्न)**
- **सेट 5: संधियों के सामाजिक, आर्थिक व सामंती प्रभाव (5 प्रश्न)**
- **सेट 6: समग्र क्षेत्रीय पुनरावृत्ति एवं तुलनात्मक अभ्यास (20 प्रश्न)**
| परीक्षा सेट |
केंद्र बिंदु |
प्रश्न संख्या |
| सेट 1 - संधियों की पृष्ठभूमि, वेलेजली व नीतियाँ |
मराठा-पिंडारी प्रभाव, हुरड़ा सम्मेलन, 1803 की संधियाँ, हेस्टिंग्स की नीति |
5 |
| सेट 2 - 1817–1818 की संधियाँ, तिथियाँ व शासक |
संधियों का प्रामाणिक कालक्रम, शासक, मेटकॉफ वार्ता, खिराज निर्धारण |
15 |
| सेट 3 - विशिष्ट संधियाँ — कोटा, सिरोही व मेवाड़-मारवाड़ |
जालिम सिंह पूरक संधि, सिरोही विलंब, आसींद ठाकुर, खिराज मुक्ति |
10 |
| सेट 4 - प्रशासनिक ढाँचा, AGG व सैन्य बटालियनें |
AGG पद, अब्राहम लॉकेट, आबू ग्रीष्मकालीन राजधानी, 5 सैन्य टुकड़ियाँ |
5 |
| सेट 5 - आर्थिक, सामाजिक व सामंती प्रभाव |
सामंतों के अधिकार हनन, नमक-अफीम एकाधिकार, लाग-बाग, बेगार |
5 |
| सेट 6 - समग्र क्षेत्रीय पुनरावृत्ति अभ्यास |
बहु-कथनीय प्रश्न, सुमेलन, कालानुक्रम, उच्च-स्तरीय अभ्यास |
20 |
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