Chapter 11: 1857 की क्रांति में राजस्थान का योगदान

(Contribution of Rajasthan in the Revolt of 1857)

Exam Relevance: RPSC (RAS Pre & Mains, School Lecturer, 2nd Grade, College Assistant Professor) / RSSB (CET Graduate & 12th Level, Patwar, VDO, Police Constable) / REET Mains


1. अध्याय और परीक्षा उपयोगिता

  • सामरिक महत्व: 1857 की क्रांति राजस्थान के आधुनिक इतिहास का सबसे गौरवमयी और निर्णायक मोड़ है। राजस्थान में यह संग्राम केवल सैन्य विद्रोह तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें असंतुष्ट सामंतों (जागीरदारों) का सशक्त सशस्त्र प्रतिरोध तथा कोटा, धौलपुर जैसी रियासतों में अभूतपूर्व जन-उभार देखने को मिला।
  • RPSC व RSSB परीक्षाओं में भारांक: इस अध्याय से राजस्थान की सभी प्रमुख प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रतिवर्ष 3 से 6 प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं।
  • प्रमुख पाठ्यक्रम बिंदु:
    • 1857 के समय ब्रिटिश प्रशासनिक ढाँचा: AGG (जॉर्ज पैट्रिक लॉरेंस) और प्रमुख पॉलिटिकल एजेंट (PAs)।
    • राजस्थान की 6 ब्रिटिश सैन्य छावनियाँ: नसीराबाद, नीमच, एरिनपुरा, देवली, ब्यावर और खेरवाड़ा।
    • क्रांति का प्रामाणिक कालक्रम: नसीराबाद (28 मई 1857), नीमच (3 जून 1857), एरिनपुरा (21 अगस्त 1857)।
    • मारवाड़ का महासंग्राम: आउवा के ठाकुर कुशल सिंह चांपावत, बीथोड़ा का युद्ध (8 सितंबर 1857), चेलावास का युद्ध / काले-गोरे का युद्ध (18 सितंबर 1857), सुगाली माता की प्रतिमा और मेजर टेलर कमीशन।
    • कोटा का सुनियोजित जनविद्रोह: लाला जयदयाल, रिसालदार मेहराब खां, मेजर बर्टन का वध, महाराव रामसिंह द्वितीय की नजरबंदी, जनरल रॉबर्ट्स व करौली शासक मदन पाल द्वारा कोटा मुक्ति।
    • अन्य क्षेत्रीय विद्रोह: धौलपुर (देवा गुर्जर व हीरालाल), भरतपुर (गुर्जर व मेव विद्रोह), टोंक (मीर आलम खां व महिलाओं की भागीदारी)।
    • तात्या टोपे का राजस्थान अभियान: कुवाड़ा का युद्ध, झालावाड़ व बांसवाड़ा विजय, मानसिंह नरूका का विश्वासघात, सीपरी (शिवपुरी) में फाँसी और कैप्टन शावर्स की टिप्पणी।
    • राजस्थान का प्रथम शहीद: अमरचंद बांठिया (राजस्थान का मंगल पांडे एवं 1857 का भामाशाह)।
    • देशी शासकों का ब्रिटिश सहयोग बनाम देशभक्त सामंत व राष्ट्रीय कवि (सूर्यमल मिश्रण व बांकीदास आशिया)।

2. परीक्षा दृष्टि से महत्वपूर्ण अवधारणाएँ एवं क्रांति के कारण

2.1 1857 में राजस्थान का ब्रिटिश प्रशासनिक ढाँचा

- **भारत का गवर्नर-जनरल:** लॉर्ड कैनिंग (1856–1862 ई.)। - **राजपूताना का एजेंट टू द गवर्नर-जनरल (AGG):** कर्नल जॉर्ज पैट्रिक लॉरेंस। AGG का मुख्यालय अजमेर था, किंतु 1845 ई. से ग्रीष्मकाल में यह कार्यालय माउंट आबू स्थानांतरित हो जाता था। - **प्रमुख रियासतों के पॉलिटिकल एजेंट (PA):** - **मेवाड़ (उदयपुर):** कैप्टन सी. एल. शावर्स (C. L. Showers) - **मारवाड़ (जोधपुर):** कैप्टन मॉक मेसन (Mock Mason) - **जयपुर:** कैप्टन विलियम ईडन (William Eden) - **कोटा:** मेजर चार्ल्स बर्टन (Charles Burton) - **भरतपुर:** कैप्टन मॉरिसन (Morrison) - **सिरोही:** जे. डी. हॉल (J. D. Hall)

2.2 क्रांति के आधारभूत कारण

- **1. सामंतों (जागीरदारों) में गहरा असंतोष:** - 1817–1818 की अधीनस्थ संधियों के बाद ब्रिटिश अधिकारियों ने जागीरदारों के पारंपरिक अधिकारों, सैनिक सेवाओं व चुंगी करों (राहदारी) को समाप्त कर दिया। - शासक अब रक्षा के लिए अंग्रेजों पर निर्भर हो गए, जिससे राजाओं और सामंतों के बीच संतुलन बिगड़ गया (जैसे- जोधपुर के तख्त सिंह व आउवा के ठाकुर कुशल सिंह का विवाद)। - **2. आर्थिक शोषण एवं खिराज का भार:** - रियासतों पर भारी वार्षिक खिराज लाद दिया गया। - अंग्रेजों ने सांभर झील नमक समझौता व अफीम व्यापार पर एकाधिकार स्थापित कर स्थानीय व्यापारियों और किसानों की कमर तोड़ दी। - **3. आंतरिक मामलों व उत्तराधिकार में हस्तक्षेप:** - राजाओं के दत्तक पुत्रों को मान्यता देने में विलंब व नाबालिग शासकों के समय रीजेंसी कौंसिलों के माध्यम से मनमाना शासन थोपा गया। - **4. सामाजिक एवं धार्मिक आक्रोश:** - अजमेर में ईसाई मिशनरियों का बढ़ता प्रभाव, आटे में हड्डियों का चूरा मिलाने की अफवाहें और एनफील्ड राइफलों में चर्बीयुक्त कारतूसों के प्रयोग ने हिंदू व मुस्लिम दोनों सैनिकों में तीव्र रोष उत्पन्न किया। - **5. केवल भारतीय सैनिकों की तैनाती:** - राजस्थान की 6 छावनियों में लगभग 5,000 सैनिक तैनात थे, किंतु आश्चर्यजनक रूप से **इनमें एक भी यूरोपीय (अंग्रेज) सैनिक नहीं था**, केवल सैन्य अधिकारी ही अंग्रेज थे। अधिकांश सैनिक अवध व बंगाल प्रांत के थे, जो मेरठ व दिल्ली की घटनाओं से अत्यधिक उद्वेलित थे।

3. क्रांति का सूत्रपात एवं 6 सैन्य छावनियाँ

3.1 राजस्थान की 6 ब्रिटिश सैन्य छावनियाँ

1857 में राजस्थान में निम्नलिखित 6 सैन्य छावनियाँ थीं: 1. **नसीराबाद (अजमेर):** 15वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री, 30वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री, 1st बॉम्बे लांसर्स और तोपखाना। 2. **नीमच (वर्तमान मध्य प्रदेश):** 1st बंगाल कैवेलरी, 72वीं नेटिव इन्फैंट्री, ग्वालियर कंटिंजेंट की पैदल सेना। 3. **एरिनपुरा (पाली):** जोधपुर लीजन का मुख्यालय। 4. **देवली (टोंक):** कोटा कंटिंजेंट की टुकड़ी। 5. **ब्यावर (अजमेर):** मेरवाड़ा बटालियन (मेर सैनिक)। **इस छावनी ने क्रांति में भाग नहीं लिया।** 6. **खेरवाड़ा (उदयपुर):** मेवाड़ भील कोर (MBC)। **इस छावनी ने क्रांति में भाग नहीं लिया।**

परीक्षा तथ्य: राजस्थान की 6 में से केवल 4 छावनियों (नसीराबाद, नीमच, एरिनपुरा, देवली) ने विद्रोह किया। ब्यावर और खेरवाड़ा छावनियाँ पूर्णतः शांत रहीं और विप्लव से अलग रहीं।

3.2 राजस्थान में क्रांति का प्रथम विस्फोट: नसीराबाद (28 मई 1857)

- **विद्रोह का कारण:** मेरठ विद्रोह के बाद अजमेर दुर्ग के शस्त्रागार की सुरक्षा में तैनात 15वीं नेटिव इन्फैंट्री को अविश्वास के आधार पर नसीराबाद भेज दिया गया तथा बॉम्बे लांसर्स से उन पर गश्त कराई गई। इस अपमान से सैनिकों में भारी आक्रोश भड़क गया। - **क्रांति का आरंभ:** **28 मई 1857** को दोपहर के समय सूबेदार बख्तावर सिंह ने ब्रिटिश अधिकारियों से उनकी वफादारी पर संदेह करने का तीखा सवाल पूछा। इसके बाद 15वीं इन्फैंट्री ने तोपखाने पर अधिकार कर लिया, जिसमें 30वीं इन्फैंट्री भी शामिल हो गई। - **हताहत अधिकारी:** मेजर स्पोटिसवुड और कर्नल न्यूबरी मारे गए। लेफ्टिनेंट लॉक और कैप्टन हार्डी घायल हुए। लेफ्टिनेंट पेनी की घबराहट में दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई। - **दिल्ली कूच:** नसीराबाद के विद्रोही सैनिक छावनी को लूटकर और सैन्य बंगलों को आग लगाकर सीधे **दिल्ली** की ओर प्रस्थान कर गए।

3.3 नीमच का विद्रोह (3 जून 1857)

- **वफादारी की शपथ की घटना:** 2 जून 1857 को अंग्रेज अधिकारी कर्नल एबॉट ने परेड ग्राउंड में भारतीय सैनिकों को कुरान व गीता की सौगंध दिलाकर वफादारी की शपथ दिलवाई। इस पर वीर सैनिक **मोहम्मद अली बेग** ने कड़ा प्रतिवाद करते हुए कहा: *"क्या अंग्रेजों ने अपनी शपथ का पालन किया था? क्या आपने अवध को नहीं हड़पा? इसलिए हमसे शपथ का पालन करने की आशा मत कीजिए।"* - **विस्फोट:** **3 जून 1857 को रात्रि 11 बजे** मोहम्मद अली बेग और हीरा सिंह के नेतृत्व में नीमच के सैनिकों ने क्रांति का बिगुल फूँक दिया और सरकारी शस्त्रागार व छावनी में आग लगा दी। - **डूंगला की शरण एवं जगमंदिर:** - नीमच से भागे 40 अंग्रेज अधिकारियों व उनके बाल-बच्चों को चित्तौड़गढ़ के **डूंगला गाँव** में किसान **रूघाराम पटेल** ने अपने घर में शरण दी। - मेवाड़ के पॉलिटिकल एजेंट कैप्टन शावर्स ने उन्हें सुरक्षित निकाला और उदयपुर पहुँचाया। - मेवाड़ के महाराणा स्वरूप सिंह ने इन 40 ब्रिटिश शरणार्थियों को पिछोला झील के **जगमंदिर महल** में सुरक्षित ठहराया तथा उनकी देखरेख का दायित्व मेहता गोकुलचंद को सौंपा।

4. मारवाड़ में क्रांति: एरिनपुरा, आउवा एवं ऐतिहासिक युद्ध

4.1 एरिनपुरा का विद्रोह एवं खेरवा मिलन

- **माउंट आबू की घटना (21 अगस्त 1857):** माउंट आबू में प्रशिक्षण ले रही जोधपुर लीजन की टुकड़ी ने सूबेदार मोतीराम, सूबेदार तिलकराम और सूबेदार शीतल प्रसाद के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया। उन्होंने कैप्टन हॉल के बंगले पर हमला किया और एरिनपुरा पहुँचे। - **एरिनपुरा का विद्रोह (23 अगस्त 1857):** आबू से आए सैनिकों ने एरिनपुरा छावनी के सैनिकों के साथ मिलकर छावनी को लूटा और ऐतिहासिक नारा दिया: **"चलो दिल्ली, मारो फिरंगी"**। - **खेरवा में ठाकुर कुशल सिंह से भेंट:** दिल्ली जाते समय पाली के निकट **खेरवा** नामक स्थान पर विद्रोही सैनिकों की भेंट **आउवा के ठाकुर कुशल सिंह चांपावत** से हुई। कुशल सिंह ने इन सैनिकों को आउवा आमंत्रित किया और क्रांति का नेतृत्व अपने हाथों में ले लिया।

4.2 आउवा के ठाकुर कुशल सिंह चांपावत

- कुशल सिंह मारवाड़ के चांपावत राठौड़ों के प्रमुख सरदार थे। जोधपुर महाराजा तख्त सिंह के साथ उनके पुराने उत्तराधिकार व सामंती विवाद चल रहे थे। - कुशल सिंह को मारवाड़ के अन्य देशभक्त सामंतों का पूर्ण सहयोग प्राप्त हुआ: - गूलर के ठाकुर बिशन सिंह - आसोप के ठाकुर शिवनाथ सिंह - आलनियावास के ठाकुर अजीत सिंह - लांबिया, बंता, राणियावास आदि के जागीरदार।

4.3 आउवा के ऐतिहासिक युद्ध

1. बीथोड़ा का युद्ध (8 सितंबर 1857)

- **प्रतिद्वंद्वी:** ठाकुर कुशल सिंह के क्रांतिकारी vs. जोधपुर महाराजा तख्त सिंह व अंग्रेजों की संयुक्त सेना। - **नेतृत्व:** जोधपुर सेना का सेनापति ओनाड़ सिंह पंवार (कुँवर ओनाड़ सिंह), राजमल लोढ़ा और अंग्रेज अधिकारी कैप्टन हीथकोट। - **परिणाम:** क्रांतिकारियों की ऐतिहासिक विजय हुई। जोधपुर का सेनापति ओनाड़ सिंह पंवार रणभूमि में मारा गया। कैप्टन हीथकोट जान बचाकर भाग निकला। क्रांतिकारियों ने भारी मात्रा में तोपें और हथियार जब्त किए।

2. चेलावास का युद्ध / काले-गोरे का युद्ध (18 सितंबर 1857)

- **प्रतिद्वंद्वी:** बीथोड़ा की पराजय का बदला लेने स्वयं AGG जॉर्ज पैट्रिक लॉरेंस अजमेर से सेना लेकर आया, जिसके साथ जोधपुर का पॉलिटिकल एजेंट कैप्टन मॉक मेसन भी था। - **स्थान:** आउवा के निकट चेलावास। राजस्थानी लोकगीतों में इसे **"काले-गोरे का युद्ध"** कहा गया, क्योंकि एक तरफ काले भारतीय क्रांतिकारी थे और दूसरी तरफ गोरे अंग्रेज सैनिक। - **परिणाम:** कुशल सिंह की सेना ने अंग्रेजों को बुरी तरह परास्त किया। AGG लॉरेंस भागकर अजमेर पहुँचा। - **मॉक मेसन का वध:** युद्ध में जोधपुर का पॉलिटिकल एजेंट कैप्टन मॉक मेसन मारा गया। क्रांतिकारियों ने उसका सिर काटकर **आउवा के किले के मुख्य द्वार पर टांग दिया**।

3. आउवा का पतन (जनवरी 1858)

- लॉर्ड कैनिंग ने पालनपुर व नसीराबाद से भारी तोपखाने के साथ **जनरल होम्स (कर्नल होम्स)** के नेतृत्व में विशाल ब्रिटिश सेना भेजी। - भीषण घेराबंदी के बाद ठाकुर कुशल सिंह **20 जनवरी 1858** को किले का भार अपने भाई पृथ्वी सिंह को सौंपकर गुप्त रूप से आउवा से निकल गए और कोठारिया (मेवाड़) के रावत जोधसिंह तथा सलूंबर के रावत केसरी सिंह के यहाँ शरण ली। - **24 जनवरी 1858** को कर्नल होम्स ने आउवा पर अधिकार कर लिया। अंग्रेजों ने आउवा के परकोटे को बारूद से उड़ा दिया और क्रांतिकारियों की कुलदेवी **सुगाली माता** (10 सिर और 54 भुजाओं वाली देवी) की प्रतिमा को जब्त कर अजमेर ले गए (वर्तमान में यह पाली के बांगड़ संग्रहालय में सुरक्षित है)।

4. मेजर टेलर कमीशन

- 8 अगस्त 1860 को ठाकुर कुशल सिंह ने नीमच में अंग्रेजों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। - अंग्रेजों ने मॉक मेसन की हत्या की जाँच हेतु **मेजर टेलर कमीशन** का गठन किया। - टेलर कमीशन ने कुशल सिंह को निर्दोष पाया और उन्हें बरी कर दिया, क्योंकि उनका संघर्ष जोधपुर दरबार के सामंती मतभेदों से प्रेरित था, न कि अंग्रेजों की हत्या के उद्देश्य से। 1864 ई. में उदयपुर में ठाकुर कुशल सिंह का देहांत हुआ।

5. कोटा का सुनियोजित जनविद्रोह एवं अन्य जन-उभार

5.1 कोटा क्रांति की प्रकृति एवं नेतृत्व

- कोटा में हुआ विप्लव 1857 के संग्राम का **सर्वाधिक सुनियोजित, व्यापक और लोकतांत्रिक जन-विद्रोह** था। यहाँ कोई छावनी नहीं थी, बल्कि रियासती सेना और आम जनता ने मिलकर ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंका। - **प्रमुख नेता:** - **लाला जयदयाल भटनागर:** कोटा रियासत के पूर्व वकील और प्रसिद्ध विद्वान। - **रिसालदार मेहराब खां:** करौली निवासी, कोटा सेना की तोपखाना व अश्वारोही टुकड़ी के रिसालदार।

5.2 विद्रोह का विस्फोट एवं मेजर बर्टन का वध (15 अक्टूबर 1857)

- **कारण:** कोटा के पॉलिटिकल एजेंट मेजर चार्ल्स बर्टन ने नीमच से लौटकर महाराव रामसिंह द्वितीय से गुप्त मंत्रणा की तथा जयदयाल, मेहराब खां आदि विद्रोही अधिकारियों को पदच्युत व दंडित करने की सलाह दी। दरबार के गुप्तचरों ने यह बात विद्रोहियों तक पहुँचा दी। - **हमला:** **15 अक्टूबर 1857** को नारायण सिंह, भवानी सिंह, जयदयाल और मेहराब खां के नेतृत्व में कोटा की नारायण पल्टन और जनता ने रेजीडेंसी पर हमला कर दिया। - **मेजर बर्टन की हत्या:** मेजर बर्टन, उनके दो पुत्रों (फ्रैंक व आर्थर), डॉक्टर सैडलर और मिस्टर कॉन्टी की हत्या कर दी गई। मेजर बर्टन का सिर काटकर पूरे कोटा शहर में घुमाया गया।

5.3 छह माह का स्वतंत्र जन-प्रशासन

- क्रांतिकारियों ने महाराव रामसिंह द्वितीय को उनके राजमहल (गढ़ पैलेस) में नजरबंद कर दिया। - विद्रोही नेताओं ने महाराव से **9 शर्तों वाले दस्तावेज** पर जबरन हस्ताक्षर करवाए, जिसमें यह स्वीकारोक्ति शामिल थी कि मेजर बर्टन की हत्या महाराव के आदेश से हुई है। - लगभग **छह माह तक कोटा का संपूर्ण शासन, दीवानी न्यायालय, खजाना और कर प्रणाली** लाला जयदयाल और मेहराब खां के हाथों में रही, जिसे अत्यंत सुव्यवस्थित ढंग से संचालित किया गया।

5.4 कोटा की मुक्ति एवं परिणाम

- मार्च 1858 में ब्रिटिश सेनापति **जनरल एच. जी. रॉबर्ट्स** विशाल सेना लेकर कोटा पहुँचा। - **करौली के महाराजा मदन पाल** ने कोटा महाराव की सहायता हेतु अपनी 2,000 सैनिकों की सेना भेजी। - 22 मार्च 1858 को ब्रिटिश सेना ने तोपों से हमला किया और **30 मार्च 1858** को कोटा को क्रांतिकारियों से मुक्त कराया गया। - **दंड एवं पुरस्कार:** - लाला जयदयाल और मेहराब खां को पकड़कर कोटा में उसी रेजीडेंसी के सामने सार्वजनिक रूप से फाँसी दे दी गई। - लॉर्ड रॉबर्ट्स आयोग की जाँच के बाद महाराव रामसिंह द्वितीय को हत्या के दोष से तो मुक्त किया गया, किंतु बर्टन की रक्षा न कर पाने के दंडस्वरूप उनकी **तोपों की सलामी 17 से घटाकर 11 कर दी गई**। - इसके विपरीत अंग्रेजों की सहायता करने वाले करौली के महाराजा मदन पाल की **तोपों की सलामी 15 से बढ़ाकर 17 कर दी गई**, उनका राज्य-ऋण माफ कर दिया गया और उन्हें G.C.S.I. का खिताब दिया गया।

6. अन्य प्रमुख क्षेत्रीय केंद्र: धौलपुर, भरतपुर, टोंक व मेवात

6.1 धौलपुर: बाहरी क्रांतिकारियों का विद्रोह (अक्टूबर 1857)

- अक्टूबर 1857 में ग्वालियर और इंदौर के विद्रोही सैनिक **देवा गुर्जर (देवा हंसा)** और **हीरालाल** के नेतृत्व में धौलपुर पहुँचे। - धौलपुर की स्थानीय सेना विद्रोहियों से मिल गई। महाराजा भगवंत सिंह को उनके महल में नजरबंद कर दिया गया और लगभग दो माह तक धौलपुर का शासन क्रांतिकारियों के नियंत्रण में रहा। - **विशिष्टता:** धौलपुर राजस्थान की एकमात्र ऐसी रियासत थी जहाँ **विद्रोह करने वाले भी बाहर के थे और विद्रोह को शांत करने वाली सेना भी बाहर (पटियाला) की थी**। - दिसंबर 1857 में पटियाला के महाराजा द्वारा भेजी गई 2,000 सिख सैनिकों की सेना ने धौलपुर में व्यवस्था बहाल की।

6.2 भरतपुर: किसान व मेव-गुर्जर विद्रोह

- आगरा व मथुरा सीमा पर स्थित भरतपुर में गुर्जर व मेव जनता ने खुलकर बगावत की। - पॉलिटिकल एजेंट कैप्टन मॉरिसन को भरतपुर छोड़कर भागना पड़ा। नाबालिग महाराजा जसवंत सिंह के कारण प्रशासन ब्रिटिश संरक्षकों के हाथ में था।

6.3 टोंक: नवाब के विरुद्ध सामंतों व महिलाओं का संघर्ष

- टोंक के नवाब वज़ीरुद्दौला अंग्रेजों के कट्टर समर्थक थे। - किंतु उनके मामा **मीर आलम खां** ने विद्रोही सैनिकों का नेतृत्व किया, नवाब का विरोध किया और तात्या टोपे की सेना में शामिल हो गए। - टोंक के विद्रोह की सबसे उल्लेखनीय विशेषता **महिलाओं द्वारा भी शस्त्र उठाकर भाग लेना** था, जिसका उल्लेख प्रसिद्ध नाटककार मोहम्मद मुजीब के शोधग्रंथों में मिलता है।

7. तात्या टोपे का राजस्थान में अभियान

7.1 उद्देश्य एवं राजस्थान में आगमन

- पेशवा नाना साहब के योग्य सेनापति **रामचंद्र पांडुरंग येवलकर (तात्या टोपे)** ने ग्वालियर व कानपुर के पतन के बाद राजस्थान में दो बार प्रवेश किया। - उनका उद्देश्य राजस्थान के राजाओं का समर्थन प्राप्त करना, तोपें व धन जुटाना तथा अंग्रेजों के विरुद्ध पश्चिमी मोर्चा खोलना था।

7.2 प्रथम अभियान (जून – अगस्त 1858)

- तात्या टोपे जून 1858 में भीलवाड़ा के रास्ते मेवाड़ में प्रविष्ट हुए। सलूंबर के रावत केसरी सिंह और कोठारिया के रावत जोधसिंह ने उन्हें रसद व गुप्त सहयोग दिया। - **कुवाड़ा का युद्ध (9 अगस्त 1858):** भीलवाड़ा के निकट कोठारी नदी के तट पर ब्रिटिश सेनापति जनरल रॉबर्ट्स ने तात्या टोपे को पराजित किया। - **झालावाड़ पर अधिकार (अगस्त 1858):** तात्या टोपे झालावाड़ पहुँचे। राणा पृथ्वी सिंह भागकर मऊ मैदान चले गए। तात्या ने झालावाड़ की सेना व तोपखाने पर अधिकार कर लिया तथा 5 लाख रुपये हर्जाना वसूला।

7.3 द्वितीय अभियान (दिसंबर 1858)

- तात्या ने चंबल नदी पार कर वागड़ में प्रवेश किया और **बांसवाड़ा पर अधिकार** कर लिया (बांसवाड़ा के महारावल लक्ष्मण सिंह जंगलों में भाग गए)। - इसके बाद वे बीकानेर पहुँचे। बीकानेर के महाराजा सरदार सिंह ने खुला समर्थन नहीं दिया, किंतु गुप्त रूप से तात्या को 10 घोड़े व आर्थिक सहायता दी।

7.4 विश्वासघात, गिरफ्तारी एवं शहादत

- अप्रैल 1859 में नरवर के जंगलों (पारोन) में विश्राम करते समय तात्या के विश्वासपात्र मित्र **मानसिंह नरूका** ने अंग्रेजों से मिलकर विश्वासघात कर दिया। - 7 अप्रैल 1859 को मेजर मीड की सेना ने तात्या टोपे को सोते हुए पकड़ लिया। - **18 अप्रैल 1859** को मध्य प्रदेश के **सीपरी (शिवपुरी)** में तात्या टोपे को सार्वजनिक रूप से फाँसी दे दी गई। - **ऐतिहासिक टिप्पणी:** मेवाड़ के पॉलिटिकल एजेंट कैप्टन सी. एल. शावर्स ने इस फाँसी की तीखी भर्त्सना करते हुए लिखा: *"आने वाली पीढ़ियाँ पूछेंगी कि तात्या टोपे को किस अपराध में फाँसी दी गई? जब वह ब्रिटिश प्रजा नहीं था और उसने कंपनी की कोई नौकरी स्वीकार नहीं की थी।"*

8. प्रमुख जननायक, क्रांतिकारी एवं अमर शहीद

8.1 अमरचंद बांठिया (राजस्थान का प्रथम शहीद)

- बीकानेर के निवासी अमरचंद बांठिया ग्वालियर राजघराने के मुख्य कोषाध्यक्ष (नगर सेठ) थे। - उन्होंने अपनी मातृभूमि के प्रति असीम निष्ठा दिखाते हुए ग्वालियर का शाही खजाना **रानी लक्ष्मीबाई** और तात्या टोपे के लिए खोल दिया, जिससे क्रांतिकारी सेना को विशाल आर्थिक संबल मिला। - अंग्रेजों ने उन्हें राजद्रोह का दोषी मानकर **22 जून 1858** को ग्वालियर के सराफा बाजार में एक नीम के पेड़ पर सार्वजनिक रूप से फाँसी पर लटका दिया। - इतिहास में उन्हें **"राजस्थान का मंगल पांडे"** (1857 में राजस्थान का प्रथम शहीद) तथा **"1857 की क्रांति का भामाशाह"** कहा जाता है।

8.2 ठाकुर कुशल सिंह चांपावत (आउवा)

- मारवाड़ में स्वतंत्रता संग्राम के अमर नायक, जिन्होंने बीथोड़ा और चेलावास के मैदानों में अंग्रेजों व रियासती सेना को धूल चटाई।

8.3 लाला जयदयाल एवं रिसालदार मेहराब खां (कोटा)

- कोटा के जनविद्रोह के शीर्ष नेता, जिन्होंने 6 माह तक सफल समानांतर लोक-प्रशासन संचालित किया और कोटा में फाँसी का फंदा चूमकर अमर हुए।

8.4 सूबेदार बख्तावर सिंह (नसीराबाद)

- राजस्थान की धरती पर 28 मई 1857 को क्रांति का प्रथम शंखनाद करने वाले वीर सेनानी।

8.5 मोहम्मद अली बेग (नीमच)

- कर्नल एबॉट के सामने कुरान की शपथ को चुनौती देने वाले और नीमच में क्रांति का बिगुल फूँकने वाले तेजस्वी सैनिक।

9. देशी शासकों, सामंतों एवं कवियों की भूमिका

9.1 अंग्रेजों का सहयोग करने वाले रियासती शासक

1857 के समय राजस्थान के लगभग सभी प्रमुख शासकों ने अपनी प्रजा और विद्रोही सैनिकों के विरुद्ध जाकर अंग्रेजों का निष्ठापूर्वक साथ दिया: - **जयपुर (सवाई रामसिंह द्वितीय):** जयपुर में पूर्ण शांति बनाए रखी, अंग्रेजों को सैन्य रसद पहुँचाई। पुरस्कार स्वरूप **'सितार-ए-हिंद'** की उपाधि तथा **कोटपूतली परगना** प्राप्त किया। - **बीकानेर (महाराजा सरदार सिंह):** राजस्थान के **एकमात्र ऐसे शासक** थे जो अपनी सेना लेकर राज्य से बाहर (पंजाब व हरियाणा के बाडलू, हांसी, सिरसा) अंग्रेजों की सहायता हेतु गए। अंग्रेजों ने इन्हें **टिब्बी परगने के 41 गाँव** उपहार में दिए। - **मेवाड़ (महाराणा स्वरूप सिंह):** 40 अंग्रेज शरणार्थियों को जगमंदिर में शरण दी और अपने सामंतों को अंग्रेजों के विरुद्ध न जाने का कड़ा फरमान जारी किया। - **जोधपुर (महाराजा तख्त सिंह):** आउवा के विरुद्ध अपनी राजकीय सेना भेजी जिसका सेनापति ओनाड़ सिंह पंवार मारा गया। - **करौली (महाराजा मदन पाल):** कोटा के विद्रोह को दबाने हेतु 2,000 सैनिक भेजे, जिसके उपलक्ष्य में उनकी तोपों की सलामी 15 से बढ़ाकर 17 की गई।

9.2 क्रांतिकारियों का साथ देने वाले देशभक्त सामंत

जहाँ शासक अंग्रेजों के शरणागत थे, वहीं स्वाभिमानी सामंतों ने अपनी जागीरें दांव पर लगाकर क्रांति की मशाल जलाई: - **मारवाड़:** आउवा के कुशल सिंह चांपावत, आसोप के शिवनाथ सिंह, गूलर के बिशन सिंह, आलनियावास के अजीत सिंह। - **मेवाड़:** सलूंबर के रावत केसरी सिंह तथा कोठारिया के रावत जोधसिंह ने महाराणा के आदेशों की अवहेलना करते हुए कुशल सिंह और तात्या टोपे को धन, शस्त्र व शरण प्रदान की।

9.3 राष्ट्रीय चेतना जगाने वाले चारण कवि

- **सूर्यमल मिश्रण (बूंदी राजकवि):** 'वीर सतसई' व 'वंश भास्कर' के रचयिता। उन्होंने राजस्थान के राजाओं को पत्र लिखकर उनकी दासता की भर्त्सना की और स्वतंत्रता हेतु प्रेरित किया। - **बांकीदास आशिया (जोधपुर राजकवि):** प्रसिद्ध डिंगल गीत **"आयो अंग्रेज मुलक रे ऊपर"** की रचना की, जिसमें अंग्रेजों की धूर्तता और राजाओं की कायरता का पर्दाफाश किया। - **मारवाड़ के लोकगीत:** लोकगीतों में आउवा की वीरता और मॉक मेसन के सिर काटे जाने की गाथा गाई गई: *"ढोल बाजे चंग बाजे, भलो बाजे बांकियो / एजेंट ने मारके दरवाजे पे टांगियो!"*

10. संपूर्ण कालक्रम, परीक्षा सारणियाँ एवं स्मरण-सूत्र

10.1 क्रांति का प्रमुख प्रामाणिक कालक्रम (1857–1859 ई.)

तिथि ऐतिहासिक घटना परीक्षा महत्व
28 मई 1857 नसीराबाद में विद्रोह राजस्थान में क्रांति का आरंभ (15वीं नेटिव इन्फैंट्री)
3 जून 1857 नीमच में विद्रोह मोहम्मद अली बेग का नेतृत्व; डूंगला में 40 अंग्रेजों की शरण
21 अगस्त 1857 माउंट आबू में विद्रोह जोधपुर लीजन की टुकड़ी द्वारा विद्रोह
23 अगस्त 1857 एरिनपुरा में विद्रोह "चलो दिल्ली, मारो फिरंगी" नारा; खेरवा में कुशल सिंह से मिलन
8 सितंबर 1857 बीथोड़ा का युद्ध कुशल सिंह ने हीथकोट व ओनाड़ सिंह को हराया; ओनाड़ सिंह मारा गया
18 सितंबर 1857 चेलावास का युद्ध (काले-गोरे) लॉरेंस पराजित; मॉक मेसन का सिर काटकर आउवा किले पर टांगा
15 अक्टूबर 1857 कोटा में जनविद्रोह जयदयाल व मेहराब खां का नेतृत्व; मेजर बर्टन का वध
24 जनवरी 1858 आउवा का पतन कर्नल होम्स का अधिकार; सुगाली माता की मूर्ति जब्त
30 मार्च 1858 कोटा की मुक्ति जनरल रॉबर्ट्स व मदन पाल (करौली) द्वारा विद्रोह का दमन
22 जून 1858 अमरचंद बांठिया की शहादत ग्वालियर में फाँसी; राजस्थान के प्रथम शहीद
9 अगस्त 1858 कुवाड़ा का युद्ध जनरल रॉबर्ट्स द्वारा तात्या टोपे पराजित
18 अप्रैल 1859 तात्या टोपे की शहादत सीपरी (शिवपुरी) में फाँसी; मानसिंह नरूका का विश्वासघात
8 अगस्त 1860 कुशल सिंह का आत्मसमर्पण नीमच में आत्मसमर्पण; टेलर कमीशन द्वारा दोषमुक्त

10.2 परीक्षा तुलनात्मक सारणी: 1857 के शासक व पॉलिटिकल एजेंट

रियासत शासक (1857) पॉलिटिकल एजेंट (PA) मुख्य भूमिका / घटना
मेवाड़ (उदयपुर) महाराणा स्वरूप सिंह कैप्टन सी. एल. शावर्स 40 अंग्रेजों को जगमंदिर में शरण दी
मारवाड़ (जोधपुर) महाराजा तख्त सिंह कैप्टन मॉक मेसन बीथोड़ा में सेना भेजी; मेसन आउवा में मारा गया
जयपुर सवाई रामसिंह द्वितीय कैप्टन विलियम ईडन शांति रखी; कोटपूतली परगना व सितार-ए-हिंद मिला
कोटा महाराव रामसिंह द्वितीय मेजर चार्ल्स बर्टन बर्टन मारा गया; 6 माह नजरबंद; सलामी घटी
भरतपुर महाराजा जसवंत सिंह (नाबालिग) कैप्टन मॉरिसन मॉरिसन भागा; मेव-गुर्जर विद्रोह
करौली महाराजा मदन पाल आगरा नियंत्रण कोटा मुक्ति हेतु 2,000 सैनिक भेजे; सलामी बढ़ी
बीकानेर महाराजा सरदार सिंह AGG नियंत्रण राज्य से बाहर सेना लेकर गए; 41 गाँव मिले
धौलपुर महाराजा भगवंत सिंह आगरा नियंत्रण ग्वालियर के बागियों का कब्जा; पटियाला सेना ने छुड़ाया

10.3 उच्च-स्तरीय स्मरण-सूत्र (Mnemonics)

  • स्मरण-सूत्र 1: राजस्थान की 6 छावनियाँ (न-नी-ए-दे-ब्या-खे)
    • सूत्र: "न-नी-ए-दे-ब्या-खे"
    • क्रम: नसीराबाद -> नीमच -> एरिनपुरा -> देवली -> ब्यावर -> खेरवाड़ा।
    • विशेष नियम: प्रथम 4 छावनियों ने विद्रोह किया; अंतिम 2 (ब्यावर व खेरवाड़ा) शांत रहीं!
  • स्मरण-सूत्र 2: आउवा के तीन प्रमुख पड़ाव (बी-चे-आ)
    • सूत्र: "बी-चे-आ"
    • क्रम: बीथोड़ा (8 सित.) -> चेलावास (18 सित.) -> आउवा पतन (जनवरी 1858)।
  • स्मरण-सूत्र 3: शीर्ष जननायक व क्रांतिकारी (बां-कु-जय-मेह-ता)
    • सूत्र: "बां-कु-जय-मेह-ता"
    • क्रम: अमरचंद बांठिया -> ठाकुर कुशल सिंह -> लाला जयदयाल -> रिसालदार मेहराब खां -> तात्या टोपे।

11. परीक्षा अभ्यास और विषय संरचना

11.1 विषय संरचना एवं अभ्यास परीक्षाएँ

- इस अध्याय के संपूर्ण अभ्यास हेतु **60 उच्च-स्तरीय द्विभाषी प्रश्नों** को छह केंद्रित अभ्यास परीक्षाओं में विभाजित किया गया है: - **सेट 1: क्रांति का सूत्रपात एवं 6 सैन्य छावनियाँ (5 प्रश्न)** - **सेट 2: मारवाड़ में क्रांति — एरिनपुरा व आउवा के संग्राम (15 प्रश्न)** - **सेट 3: कोटा का जनविद्रोह एवं क्षेत्रीय जन-उभार (10 प्रश्न)** - **सेट 4: तात्या टोपे का राजस्थान में अभियान (5 प्रश्न)** - **सेट 5: देशी शासकों, सामंतों की भूमिका व अमरचंद बांठिया (5 प्रश्न)** - **सेट 6: समग्र 1857 क्रांति पुनरावृत्ति एवं तुलनात्मक अभ्यास (20 प्रश्न)**
परीक्षा सेट केंद्र बिंदु प्रश्न संख्या
सेट 1 - क्रांति का सूत्रपात एवं 6 सैन्य छावनियाँ प्रशासनिक ढाँचा, 6 छावनियाँ, नसीराबाद, नीमच, डूंगला शरण 5
सेट 2 - एरिनपुरा एवं आउवा के संग्राम माउंट आबू, एरिनपुरा, कुशल सिंह, बीथोड़ा, चेलावास, सुगाली माता, टेलर कमीशन 15
सेट 3 - कोटा का जनविद्रोह एवं क्षेत्रीय जन-उभार लाला जयदयाल, मेहराब खां, बर्टन वध, रॉबर्ट्स अभियान, मदन पाल (करौली) 10
सेट 4 - तात्या टोपे का राजस्थान में अभियान कुवाड़ा युद्ध, झालावाड़, बांसवाड़ा, मानसिंह नरूका विश्वासघात, सीपरी फाँसी 5
सेट 5 - देशी शासक, सामंत व अमरचंद बांठिया बांठिया शहादत, सरदार सिंह बीकानेर, रामसिंह द्वितीय, सूर्यमल मिश्रण, बांकीदास 5
सेट 6 - समग्र 1857 क्रांति पुनरावृत्ति अभ्यास बहु-कथनीय प्रश्न, सुमेलन, कालानुक्रम, उच्च-स्तरीय विश्लेषणात्मक अभ्यास 20

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