Chapter 12: राजस्थान में जनजाति आंदोलन
(Tribal Movements in Rajasthan)
Exam Relevance: RPSC (RAS Pre & Mains, School Lecturer, 2nd Grade, College Assistant Professor) / RSSB (CET Graduate & 12th Level, Patwar, VDO, Police Constable) / REET Mains
1. अध्याय और परीक्षा उपयोगिता#
- सामरिक महत्व: राजस्थान के जनजातीय एवं पर्यावरण आंदोलन ब्रिटिश साम्राज्यवाद और सामंती अत्याचार के विरुद्ध भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे तेजस्वी, संगठित और जुझारू अध्यायों में से एक हैं। सदियों से अरावली की उपत्यकाओं में स्वतंत्रतापूर्वक जीने वाले वनवासियों ने अपने पारंपरिक अधिकारों, वनों और संस्कृति की रक्षा हेतु सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
- RPSC व RSSB परीक्षाओं में भारांक: इस अध्याय से राजस्थान लोक सेवा आयोग तथा कर्मचारी चयन बोर्ड की परीक्षाओं में प्रतिवर्ष 3 से 5 प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं।
- प्रमुख पाठ्यक्रम बिंदु:
- 19वीं सदी के प्रारंभिक भील विद्रोह (बोलाई व रखवाली कर) तथा 1841 ई. में खेरवाड़ा में मेवाड़ भील कोर (MBC) की स्थापना।
- गोविंद गुरु द्वारा संचालित भगत आंदोलन: 1883 ई. में सिरोही में संप सभा की स्थापना, सामाजिक-धार्मिक सुधार तथा 17 नवंबर 1913 का ऐतिहासिक मानगढ़ नरसंहार (राजस्थान का जलियांवाला बाग)।
- मोतीलाल तेजावत ('बावजी') का एकी आंदोलन (भौमट भील आंदोलन): मातृकुंडिया (1921) से सूत्रपात, 'मेवाड़ पुकार' (21 सूत्रीय मांग-पत्र), तथा 7 मार्च 1922 का नीमड़ा (पाल-चितरिया) हत्याकांड।
- मीणा आंदोलन: 1924 का क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट, 1930 का जरायम पेशा कानून (12 वर्ष से अधिक उम्र के स्त्री-पुरुषों की दैनिक थाने में हाजिरी), 1944 में नीम का थाना में जैन मुनि मगन सागर की अध्यक्षता में महासम्मेलन, 'मीणा पुराण', 28 अक्टूबर 1946 का बागावास मुक्ति दिवस (26,000 चौकीदार मीणाओं का इस्तीफा) तथा 1952 में कानून का पूर्ण उन्मूलन।
- पर्यावरण संरक्षण एवं बिश्नोई आंदोलन: गुरु जांभोजी (1451 ई., 29 नियम) तथा 12 सितंबर 1730 (भाद्रपद शुक्ल दशमी) का खेजड़ली बलिदान (अमृता देवी बिश्नोई सहित 363 शहीदों का वृक्ष रक्षा हेतु आत्मोत्सर्ग)।
- प्रमुख संस्थाएँ एवं समाज सुधारक: संप सभा, वनवासी सेवा संघ, भील सेवा मंडल, ठक्कर बापा, भोगीलाल पांड्या ('वागड़ के गांधी')।
2. परीक्षा दृष्टि से महत्वपूर्ण अवधारणाएँ एवं पृष्ठभूमि#
2.1 राजस्थान में जनजातीय प्रतिरोध का स्वरूप#
- किसान आंदोलनों के विपरीत, जनजातीय आंदोलन केवल भू-राजस्व में कमी तक सीमित नहीं थे; वे वस्तुतः अपनी **सांस्कृतिक स्वायत्तता, वनों पर पारंपरिक अधिकारों और स्वाभिमान** की रक्षा के संग्राम थे।
- रियासती काल में भील और मीणा समुदाय अरावली के पहाड़ी रास्तों से गुजरने वाले व्यापारियों से **'बोलाई'** (मार्ग-रक्षा कर) तथा सीमावर्ती गाँवों से **'रखवाली'** (सुरक्षा कर) वसूलते थे।
- 1818 ई. की ईस्ट इंडिया कंपनी की संधियों के बाद ब्रिटिश प्रशासनिक हस्तक्षेप ने इन पारंपरिक अधिकारों को छीन लिया, महुआ की शराब बनाने पर आबकारी पाबंदी लगा दी और वनों पर राजकीय नियंत्रण स्थापित कर दिया।
2.2 सामाजिक एवं धार्मिक नवजागरण#
- राजस्थान के जनजातीय आंदोलनों की अनूठी विशेषता यह थी कि वे केवल सशस्त्र विद्रोह नहीं थे, बल्कि उनमें व्यापक आंतरिक सुधार जुड़ा हुआ था:
- **गोविंद गुरु** ने बंजारा परिवार में जन्म लेकर भीलों को 'भगत' बनाकर मद्यपान, चोरी, अंधविश्वास व बेगार से मुक्त किया और संप सभा के माध्यम से एकीकृत किया।
- **मोतीलाल तेजावत** ने ओसवाल जैन होते हुए भी भीलों व गरासियाओं के बीच रहकर उन्हें जागीरदारों की 84 प्रकार की लाग-बाग व बेगार के विरुद्ध 'एकी' (एकता) के सूत्र में पिरोया।
- **जैन मुनि मगन सागर** ने 'मीणा पुराण' रचकर मीणा समाज को अपनी गौरवशाली मत्स्य अवतार की वैदिक व क्षत्रिय परंपरा का बोध कराया।
3. राजस्थान के जनजातीय समुदाय एवं असंतोष के कारण#
3.1 प्रमुख जनजातियाँ#
- **1. भील:** राजस्थान की सबसे प्राचीन और जनसंख्या की दृष्टि से **सबसे बड़ी जनजाति**। मुख्य रूप से दक्षिणी राजस्थान (उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़) में निवास करती है। महाराणा प्रताप के समय से ही इनकी धनुर्विद्या और निष्ठा विख्यात रही है।
- **2. मीणा:** राजस्थान की **दूसरी सबसे बड़ी जनजाति**। पूर्वी राजस्थान (जयपुर, दौसा, अलवर, सवाई माधोपुर, करौली) में बहुतायत से निवास करती है। ऐतिहासिक दृष्टि से दो प्रमुख वर्गों में विभाजित:
- *जमींदार मीणा:* जो कृषि और पशुपालन से जुड़े थे।
- *चौकीदार मीणा:* जिन्हें किलों, राजकोष और गाँवों की चौकीदारी का कार्य सौंपा गया था। चोरी होने पर इनसे 'गौ-चौथ' या हरजाना वसूला जाता था।
- **3. गरासिया:** सिरोही (पिंडवाड़ा, आबू रोड) और उदयपुर (कोटड़ा, गोगुंदा) के पहाड़ी क्षेत्रों में निवास करने वाली जनजाति। इनके मेले 'घौड़ का मेला' आदि प्रसिद्ध हैं।
- **4. सहरिया:** बारां जिले की शाहबाद और किशनगंज तहसीलों में निवास करने वाली राजस्थान की **एकमात्र आदिम जनजाति समूह (PVTG - Particularly Vulnerable Tribal Group)**।
- **5. डामोर:** डूंगरपुर जिले की सीमलवाड़ा तहसील में बहुतायत।
- **6. कथौड़ी:** उदयपुर के कोटड़ा व झाड़ोल क्षेत्र में निवास करने वाली जनजाति, जो मूलतः महाराष्ट्र से खैर के वृक्षों से कत्था तैयार करने हेतु लाई गई थी।
3.2 असंतोष के मूलभूत कारण#
- **1. पारंपरिक कर अधिकारों (बोलाई व रखवाली) की समाप्ति:** ब्रिटिश नियंत्रण के बाद अंग्रेजों ने भीलों के आय के प्रमुख स्रोत बोलाई और रखवाली कर को बलपूर्वक बंद करवा दिया।
- **2. महुआ शराब पर प्रतिबंध:** भील संस्कृति में धार्मिक अनुष्ठानों व सामाजिक उत्सवों में महुआ के फूलों से बनी मदिरा का उपयोग स्वाभाविक था। ब्रिटिश सरकार ने 1878 के आबकारी नियमों द्वारा घर में शराब बनाने पर रोक लगा दी और ठेकेदारी व्यवस्था लागू कर दी।
- **3. वन अधिकारों का हनन:** नए वन कानूनों के तहत भीलों को वनों से लकड़ी काटने, गोंद व महुआ एकत्र करने तथा वालरा (स्थानांतरित) कृषि करने से रोक दिया गया।
- **4. जागीरदारों की बेगार एवं लाग-बाग:** जागीरदारों द्वारा 84 प्रकार की लागतें वसूली जाती थीं तथा बिना पारिश्रमिक के बेगार कराई जाती थी।
- **5. जनगणना एवं डाकण प्रथा निषेध की अफवाहें:** 1881 ई. की प्रथम वैज्ञानिक जनगणना के समय भीलों में यह भ्रांति फैल गई कि अंग्रेजों द्वारा युवाओं को चिन्हित कर सेना में जबरन भर्ती किया जाएगा अथवा ईसाई बनाया जाएगा।
4. भगत आंदोलन, गोविंद गुरु एवं मानगढ़ नरसंहार#
4.1 गोविंद गुरु (1858–1931 ई.)#
- **जन्म एवं पृष्ठभूमि:** गोविंद गुरु का जन्म **20 दिसंबर 1858** को डूंगरपुर रियासत के **बांसिया (बेड़सा) गाँव** में एक **बंजारा परिवार** में हुआ था।
- **आध्यात्मिक प्रेरणा:** 1880–81 ई. में उदयपुर में गोविंद गुरु की भेंट आर्य समाज के संस्थापक **स्वामी दयानंद सरस्वती** से हुई। स्वामी जी के विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने वनवासियों के उद्धार, स्वधर्म, नशामुक्ति और आत्मनिर्भरता का संकल्प लिया।
- **संप सभा की स्थापना (1883 ई.):**
- **1883 ई.** में गोविंद गुरु ने **सिरोही** में **'संप सभा'** की स्थापना की।
- 'संप' राजस्थानी व गुजराती भाषा का शब्द है जिसका अर्थ **'परस्पर प्रेम, एकता और सद्भाव'** होता है।
- संप सभा के **10 नियम** थे: एकेश्वरवाद, मद्यपान का पूर्ण त्याग, शाकाहार, चोरी व व्यभिचार न करना, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, बेगार न करना, तथा अपने आपसी विवादों को अदालतों के बजाय अपनी पंचायतों में सुलझाना।
- **भगत पंथ:** दीक्षित भीलों को 'भगत' कहा गया। वे गले में रुद्राक्ष या तुलसी की माला पहनते थे, सफेद/केसरिया वस्त्र धारण करते थे तथा घरों में पवित्र **धूनी** और **निशान** (ध्वज) स्थापित करते थे।
4.2 मानगढ़ पहाड़ी का प्रथम अधिवेशन (1903 ई.)#
- 1903 ई. में गोविंद गुरु ने राजस्थान व गुजरात की सीमा पर स्थित बांसवाड़ा रियासत की **मानगढ़ पहाड़ी** पर संप सभा का पहला विशाल वार्षिक अधिवेशन आयोजित किया।
- इसके बाद प्रतिवर्ष **मार्गशीर्ष पूर्णिमा** के दिन मानगढ़ पर विशाल मेला भरता था जहाँ हजारों भील धूनी में आहुति देने और प्रवचन सुनने एकत्रित होते थे।
4.3 मानगढ़ नरसंहार (17 नवंबर 1913)#
- **विवाद की पृष्ठभूमि:** भीलों में बढ़ती राजनीतिक चेतना, बेगार करने से इनकार तथा शराबबंदी से देशी राजाओं (बांसवाड़ा, डूंगरपुर, संतरामपुर) की आबकारी आय ठप हो गई। राजाओं ने अंग्रेजों से शिकायत की कि गोविंद गुरु भील राज्य स्थापित करना चाहते हैं।
- **घटना:** 17 नवंबर 1913 (मार्गशीर्ष पूर्णिमा) को मानगढ़ पहाड़ी पर हजारों निःशस्त्र भील एकत्रित थे।
- **नरसंहार:** **मेजर एस. हैमिल्टन** के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना (मेवाड़ भील कोर - MBC, 104th वेलेजली राइफल्स, 7th राजपूताना राइफल्स तथा बड़ौदा राज्य की सेना) ने मानगढ़ पहाड़ी को चारों तरफ से घेर लिया।
- ब्रिटिश सेना ने मशीनगनों और तोपों से निहत्थे भीलों पर अंधाधुंध गोलियाँ बरसाईं।
- इस भीषण नरसंहार में **1,500 से अधिक भील स्त्री-पुरुष व बच्चे शहीद हो गए**।
- इस वीभत्स घटना को भारतीय इतिहास में **"राजस्थान का जलियांवाला बाग"** कहा जाता है (जो 1919 के अमृतसर हत्याकांड से 6 वर्ष पूर्व घटित हुआ था)।
4.4 गोविंद गुरु का निष्कासन एवं अंतिम समय#
- गोविंद गुरु घायल अवस्था में अपने सहयोगी **पूंजा धीरजी (पूंजा पारछा)** के साथ बंदी बना लिए गए।
- विशेष अदालत ने उन्हें पहले फाँसी की सजा सुनाई, जिसे बाद में आजीवन कारावास और फिर 10 वर्ष के कारावास में बदला गया।
- 1919 ई. में रिहा होने पर उन्हें बांसवाड़ा, डूंगरपुर और संतरामपुर राज्यों में प्रवेश न करने की शर्त पर छोड़ा गया।
- गोविंद गुरु ने अपना शेष जीवन गुजरात के पंचमहल जिले के **कंबोई गाँव** (झालोद के निकट) में रहकर समाज सेवा में बिताया।
- **30 अक्टूबर 1931** को कंबोई में उनका देहावसान हुआ, जहाँ आज भी उनकी पावन समाधि स्थित है। मानगढ़ को आज राष्ट्रीय स्तर पर **'मानगढ़ धाम'** के रूप में जाना जाता है।
- गोविंद गुरु के प्रमुख सहयोगी **सुरजी भगत** ने भी भीलों में भगत पंथ के प्रचार में महान योगदान दिया।
5. एकी आंदोलन, मोतीलाल तेजावत एवं नीमड़ा कांड#
5.1 मोतीलाल तेजावत (1886–1963 ई.)#
- **जन्म एवं परिचय:** मोतीलाल तेजावत का जन्म **1886 ई.** में उदयपुर रियासत के झाड़ोल ठिकाने के **कोलयारी गाँव** में एक **ओसवाल जैन परिवार** में हुआ था।
- **प्रेरणा:** झाड़ोल ठिकाने के कामदार के पद पर कार्य करते हुए तेजावत ने अपनी आँखों से जागीरदारों द्वारा भील और गरासिया किसानों पर ढहाए जाने वाले अमानवीय अत्याचार और 84 प्रकार की लाग-बाग देखी।
- उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी और वनवासियों की सेवा का बीड़ा उठाया। भील व गरासिया लोग उन्हें अत्यंत आदर से **"बावजी"** (पिता तुल्य आदरणीय) कहकर पुकारते थे।
5.2 एकी आंदोलन का आरंभ (1921 ई.)#
- **1921 ई.** में मोतीलाल तेजावत ने चित्तौड़गढ़ जिले में राशमी के निकट बनास नदी के तट पर स्थित पवित्र तीर्थ **मातृकुंडिया** (जिसे **'राजस्थान का हरिद्वार'** कहा जाता है) से **'एकी आंदोलन'** (भौमट भील आंदोलन) का शंखनाद किया।
- 'एकी' का अर्थ था **'एकता'**। हजारों वनवासियों ने गंगाजल हाथ में लेकर शपथ ली कि वे जागीरदारों की किसी भी अनुचित आज्ञा का पालन नहीं करेंगे, बेगार नहीं करेंगे और गैर-कानूनी लाग-बाग नहीं देंगे।
5.3 'मेवाड़ पुकार' (21 सूत्रीय मांग-पत्र)#
- मोतीलाल तेजावत ने आदिवासियों पर हो रहे अत्याचारों और मांगों को संकलित कर **'मेवाड़ पुकार'** नाम से **21 सूत्रीय मांग-पत्र** तैयार किया और उदयपुर में पिछोला झील के किनारे महाराणा **फतेह सिंह** के समक्ष प्रस्तुत किया।
- महाराणा फतेह सिंह ने 21 में से **18 मांगें स्वीकार कर लीं**, किंतु 3 प्रमुख मांगों को अस्वीकार कर दिया:
- 1. बेगार प्रथा का पूर्ण उन्मूलन।
- 2. वनों से लकड़ी काटने के पारंपरिक अधिकार।
- 3. फसलों को नष्ट करने वाले जंगली सूअरों को मारने की अनुमति।
5.4 नीमड़ा / पाल-चितरिया हत्याकांड (7 मार्च 1922)#
- आंदोलन का विस्तार मेवाड़ से निकलकर सिरोही, ईडर और विजयनगर रियासतों तक फैल गया।
- **7 मार्च 1922** को विजयनगर राज्य (ईडर एजेंसी, गुजरात सीमा) के **पाल-चितरिया** के निकट **नीमड़ा (नीमड़ा/दधवाव)** गाँव में हजारों भीलों का शांतिपूर्ण सम्मेलन चल रहा था।
- मेवाड़ भील कोर (MBC) के अंग्रेज कमांडर **मेजर एच. जी. सटन** ने सेना को गोली चलाने का आदेश दिया।
- इस गोलीकांड में **1,200 से अधिक निर्दोष आदिवासी मारे गए**।
- मोतीलाल तेजावत के पैर में गोली लगी, किंतु उनके विश्वस्त भील साथी उन्हें सुरक्षित निकालकर सिरोही की दुर्गम पहाड़ियों में ले गए।
- इसके बाद मई 1922 में सिरोही के **सियावा** गाँव में भी गरासिया आदिवासियों पर गोलियाँ बरसाई गईं।
5.5 समर्पण एवं वनवासी सेवा संघ#
- तेजावत लगभग 7 वर्षों तक भूमिगत रहे। **महात्मा गांधी** और **मणिलाल कोठारी** के परामर्श पर उन्होंने **1929 ई.** में ईडर के **खेडब्रह्मा** में आत्मसमर्पण कर दिया।
- उन्हें उदयपुर सेंट्रल जेल में रखा गया और 1936 ई. में इस शर्त पर रिहा किया गया कि वे बिना अनुमति मेवाड़ से बाहर नहीं जाएँगे।
- रिहाई के पश्चात तेजावत ने **'वनवासी सेवा संघ'** की स्थापना कर जनजातीय शिक्षा, खादी और समाज सुधार में जीवन समर्पित किया। **1963 ई.** में उनका देहांत हुआ।
6. 19वीं सदी के भील विद्रोह एवं मेवाड़ भील कोर (MBC)#
6.1 19वीं सदी के प्रारंभिक भील विद्रोह (1818–1826 ई.)#
- 1818 ई. में मेवाड़ महाराणा भीम सिंह द्वारा अंग्रेजों से संधि करने के बाद अंग्रेजी सेना ने भीलों के भौमट क्षेत्र में दखल देना शुरू किया।
- 1818 ई. में **दौलत सिंह** और **गोविंद राम** के नेतृत्व में भीलों ने विद्रोह किया तथा बोलाई कर छोड़ने से इनकार कर दिया।
- 1826–1828 ई. में मेरपुर में भीलों का व्यापक उपद्रव हुआ जिसे दबाने हेतु ब्रिटिश सेना को कड़ी मशक्कत करनी पड़ी।
6.2 मेवाड़ भील कोर (MBC) की स्थापना (1841 ई.)#
- अरावली की विषम पहाड़ियों में नियमित ब्रिटिश व राजपूत सेना के असफल होने पर ब्रिटिश अधिकारी **जेम्स आउटरम (James Outram)** ने स्थानीय भीलों को ही भर्ती कर एक अर्द्धसैन्य बल बनाने की अनुशंसा की।
- फलस्वरूप **1841 ई.** में **मेवाड़ भील कोर (Mewar Bhil Corps - MBC)** की स्थापना की गई।
- **मुख्यालय:** उदयपुर जिले के **खेरवाड़ा** में स्थापित किया गया, तथा एक सहायक छावनी **कोटड़ा** में बनाई गई।
- इसका खर्च मेवाड़ राज्य और ब्रिटिश कंपनी द्वारा संयुक्त रूप से वहन किया जाता था। कालांतर में इसी MBC ने मानगढ़ (1913) और नीमड़ा (1922) में भील आंदोलनों का दमन किया।
6.3 1881–1882 ई. का बारपाल व पदूणा भील विद्रोह#
- मार्च 1881 में मेवाड़ के **बारपाल** और **पदूणा** गाँवों में भीलों ने भीषण बगावत कर दी।
- **कारण:** 1881 की जनगणना से फैली भ्रांतियाँ, राज्य के अधिकारियों द्वारा एक भील गमेती की हत्या, तथा महुआ शराब व वनों पर पाबंदी।
- भीलों ने थानों पर हमले किए और डाक व सड़कों का आवागमन रोक दिया।
- **ऋषभदेव समझौता (25 अप्रैल 1881):**
- स्थिति की गंभीरता को देखते हुए मेवाड़ के प्रसिद्ध दरबारी इतिहासकार **कविराजा श्यामलदास** ('वीर विनोद' के रचयिता) और **मामा अमान सिंह** को बातचीत हेतु भेजा गया।
- **ऋषभदेव (धुलेव)** के मंदिर में भील नेताओं के साथ समझौता हुआ, जिसमें दरबार ने भीलों की **21 मांगें स्वीकार कर लीं**, भू-राजस्व आधा कर दिया और महुआ शराब के अधिकार लौटा दिए।
7. मीणा आंदोलन एवं जरायम पेशा कानून विरोधी संघर्ष#
7.1 मीणा समाज का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य#
- कछवाहा राजपूतों के आगमन से पूर्व ढूंढाड़ (आमेर) पर मीणा सरदारों का शासन था। कछवाहा शासकों के राज्याभिषेक के समय मीणा सरदार अपने अंगूठे के रक्त से राजतिलक करते थे।
- रियासती काल में मीणा समाज दो वर्गों में बँटा था:
- **जमींदार मीणा:** जो सामान्य किसान थे।
- **चौकीदार मीणा:** जो गाँवों व किलों की सुरक्षा करते थे। परंतु यदि किसी क्षेत्र में चोरी हो जाती थी तो चौकीदार मीणाओं से **'गौ-चौथ'** (हरजाना) जबरन वसूला जाता था।
7.2 क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट (1924) एवं जरायम पेशा कानून (1930)#
- 1924 ई. में भारत सरकार ने **क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट** (आपराधिक जनजाति अधिनियम) पारित किया।
- इसी के आधार पर जयपुर रियासत ने **1930 ई.** में कुख्यात **'जरायम पेशा कानून' (Jairam Pesha Act)** लागू किया।
- **कठोर प्रावधान:**
- प्रत्येक मीणा स्त्री, पुरुष और **12 वर्ष से अधिक उम्र के बच्चों** को प्रतिदिन निकटतम थाने में जाकर हाजिरी (उपस्थिति) दर्ज कराना अनिवार्य कर दिया गया।
- हाजिरी न देने पर कठोर कारावास का दंड दिया जाता था, जिससे पूरे समाज में अपमान और आक्रोश की ज्वाला धधक उठी।
7.3 संगठित विरोध एवं नीम का थाना सम्मेलन (1944 ई.)#
- इस अपमानजनक कानून के विरुद्ध मीणा समाज ने संगठित आंदोलन शुरू किया:
- **1933 ई.:** **मीणा क्षत्रिय महासभा** का गठन हुआ।
- **नीम का थाना महासम्मेलन (अप्रैल 1944):**
- सीकर के **नीम का थाना** में प्रसिद्ध जैन मुनि **मगन सागर जी** की अध्यक्षता में मीणा समाज का ऐतिहासिक विराट सम्मेलन आयोजित हुआ।
- मुनि मगन सागर जी ने **'मीणा पुराण'** ग्रंथ की रचना कर मीणाओं को भगवान मत्स्य का वंशज बताकर उनमें स्वाभिमान जगाया।
- सम्मेलन में **'जयपुर राज्य मीणा सुधार समिति'** का गठन हुआ, जिसके अध्यक्ष **बंशीधर शर्मा** तथा सचिव **लक्ष्मीनारायण झरवाल** बने।
7.4 बागावास मुक्ति दिवस (28 अक्टूबर 1946) एवं कानून की समाप्ति#
- लक्ष्मीनारायण झरवाल, रावत जयराम मीणा, तथा प्रजामंडल नेता **टीकाराम पालीवाल** के नेतृत्व में आंदोलन उग्र हो गया।
- **28 अक्टूबर 1946** को जयपुर के निकट **बागावास** में एक विशाल सम्मेलन हुआ, जिसमें **26,000 चौकीदार मीणाओं ने चौकीदारी के पदों से सामूहिक इस्तीफा दे दिया**। इस दिन को मीणा समाज में **'मुक्ति दिवस'** के रूप में मनाया गया।
- भारी जनाक्रोश के कारण 1946 में स्त्रियों व बच्चों को हाजिरी से छूट मिली।
- स्वतंत्रता के पश्चात निरंतर संघर्ष के फलस्वरूप **1952 ई.** में राजस्थान की लोकतांत्रिक सरकार ने **जरायम पेशा कानून को पूर्णतः समाप्त (निरस्त)** कर दिया।
8. पर्यावरण एवं संरक्षण आंदोलन: बिश्नोई संप्रदाय एवं खेजड़ली बलिदान#
8.1 गुरु जांभोजी एवं 29 नियम (1451–1536 ई.)#
- **जन्म:** 1451 ई. (भाद्रपद कृष्ण अष्टमी / जन्माष्टमी) को नागौर जिले के **पीपासर** गाँव में लोहट जी पंवार व हंसा देवी के घर।
- **संप्रदाय की स्थापना:** 1485 ई. में बीकानेर के **समराथल धोरा** पर तपस्या कर **बिश्नोई संप्रदाय** की स्थापना की।
- **नामकरण:** **'बीस' (20) + 'नौ' (9) = 29 नियमों** के कारण यह संप्रदाय 'बिश्नोई' कहलाया।
- **प्रमुख सिद्धांत:** जीव दया, हरे वृक्षों (विशेषकर खेजड़ी) को न काटना, वन्यजीवों (विशेषकर काले हिरण व चिंकारा) की रक्षा, नशामुक्ति, तथा सत्य आचरण।
- **प्रमुख तीर्थ:** समराथल धोरा, मुकाम (तालवा, नोखा, बीकानेर - समाधि स्थल जहाँ फाल्गुन अमावस्या को मेला भरता है), तथा लालासर।
8.2 अमर खेजड़ली बलिदान (12 सितंबर 1730 ई.)#
- **ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:** 1730 ई. (विक्रम संवत 1787, भाद्रपद शुक्ल दशमी) में मारवाड़ (जोधपुर) के महाराजा **अभय सिंह** को मेहरानगढ़ दुर्ग में फूलमहल के निर्माण हेतु चूना पकाने के लिए लकड़ियों की आवश्यकता पड़ी।
- दीवान **गिरिधर भंडारी** ने राजसी सैनिकों को जोधपुर के निकट **खेजड़ली गाँव** में खेजड़ी के हरे वृक्ष काटने भेजा।
- **बलिदान:** जब सैनिक वृक्ष काटने लगे, तो वीर महिला **अमृता देवी बिश्नोई** ने पेड़ों से लिपटकर विरोध किया और अमर उद्घोष किया:
> *"सिर साठे रूंख रहे, तो भी सस्तो जाण"*
> (अर्थात यदि सिर कटवाने के बदले एक पेड़ भी बच जाए, तो भी यह सौदा बहुत सस्ता है!)
- सैनिकों ने क्रूरतापूर्वक अमृता देवी का सिर काट दिया। उनकी तीन पुत्रियों—**आसू, रत्नी और भागू**—तथा पति **रामू खोड़** ने भी पेड़ों से चिपटकर अपने प्राण दे दिए। देखते ही देखते 84 गाँवों के बिश्नोई स्त्री-पुरुष पेड़ों से लिपट गए।
- इस महाबलिदान में कुल **363 बिश्नोई (294 पुरुष और 69 महिलाएँ)** शहीद हो गए।
- **राजकीय पश्चाताप:** जब महाराजा अभय सिंह को इस नरसंहार का पता चला, तो उन्होंने तुरंत आदेश वापस लिया, खेजड़ली आकर क्षमा माँगी और ताम्रपत्र पर राजाज्ञा जारी कर बिश्नोई क्षेत्रों में हरे वृक्ष काटने व शिकार करने पर आजीवन प्रतिबंध लगा दिया।
8.3 वैश्विक महत्व एवं वर्तमान मान्यताएँ#
- खेजड़ली बलिदान आधुनिक पर्यावरण संरक्षण के **चिपको आंदोलन (1970 के दशक)** की मूल प्रेरणा है।
- **विश्व का एकमात्र वृक्ष मेला:** प्रतिवर्ष **भाद्रपद शुक्ल दशमी** को खेजड़ली गाँव में लगता है।
- **अमृता देवी बिश्नोई स्मृति पुरस्कार:** राजस्थान सरकार द्वारा **1994 ई.** से वन्यजीव एवं वन संरक्षण में उत्कृष्ट कार्य हेतु यह प्रतिष्ठित पुरस्कार प्रदान किया जाता है।
9. प्रमुख संगठन, समाज सुधारक एवं जनजातीय उत्थान#
9.1 प्रमुख सुधारवादी संगठन#
| संगठन |
स्थापना वर्ष |
संस्थापक / प्रमुख नेता |
मुख्य उद्देश्य |
| संप सभा |
1883 ई. |
गोविंद गुरु |
भीलों में मद्यपान निषेध, बंधुत्व, 10 नियम, स्वदेशी, बेगार मुक्ति |
| मेवाड़ भील कोर (MBC) |
1841 ई. |
जेम्स आउटरम / ब्रिटिश प्रशासन |
भौमट क्षेत्र में भीलों के नियंत्रण हेतु स्थापित ब्रिटिश सैन्य टुकड़ी |
| मीणा क्षत्रिय महासभा |
1933 ई. |
मीणा समाज के प्रबुद्ध नेता |
मीणा समाज में शिक्षा का प्रसार, जरायम पेशा कानून का विरोध |
| जयपुर राज्य मीणा सुधार समिति |
1944 ई. |
मुनि मगन सागर, बंशीधर शर्मा |
जरायम पेशा कानून को रद्द करवाने हेतु संगठित राजनीतिक आंदोलन |
| वनवासी सेवा संघ |
1936 ई. |
मोतीलाल तेजावत |
आदिवासियों में शिक्षा, खादी, स्वास्थ्य एवं आर्थिक स्वावलंबन |
| राजस्थान सेवा संघ |
1919 ई. |
विजय सिंह पथिक, रामनारायण चौधरी |
किसान व जनजातीय आंदोलनों को राष्ट्रीय मंच प्रदान करना |
9.2 प्रमुख समाज सुधारक#
- **भोगीलाल पांड्या (1904–1981 ई.):** **'वागड़ के गांधी'** के रूप में विख्यात। उन्होंने डूंगरपुर में वागड़ सेवा मंदिर की स्थापना की और भील बालकों में शिक्षा की अलख जगाई।
- **ठक्कर बापा (अमृतलाल विट्ठलदास ठक्कर):** 1922 में भील सेवा मंडल की स्थापना की तथा दक्षिणी राजस्थान के वनवासी क्षेत्रों में भ्रमण कर सेवा कार्य किए।
- **माणिक्यलाल वर्मा एवं बलवंत सिंह मेहता:** प्रजामंडल आंदोलन के दौरान आदिवासियों के कल्याण हेतु खांडलाई आश्रम आदि की स्थापना की।
10. संपूर्ण कालक्रम, परीक्षा सारणियाँ एवं स्मरण-सूत्र#
10.1 प्रमुख प्रामाणिक कालक्रम (1730–1952 ई.)#
| वर्ष / तिथि |
ऐतिहासिक घटना |
परीक्षा महत्व |
| 1451 ई. |
गुरु जांभोजी का जन्म (पीपासर, नागौर) |
बिश्नोई संप्रदाय एवं 29 नियमों के प्रणेता |
| 12 सितंबर 1730 ई. |
खेजड़ली बलिदान (जोधपुर) |
अमृता देवी सहित 363 बिश्नोई वृक्ष रक्षा हेतु शहीद |
| 1841 ई. |
मेवाड़ भील कोर (MBC) की स्थापना |
मुख्यालय खेरवाड़ा (उदयपुर); जेम्स आउटरम की योजना |
| 1858 ई. |
गोविंद गुरु का जन्म (बांसिया, डूंगरपुर) |
भगत आंदोलन के जनक |
| 1881–1882 ई. |
बारपाल व पदूणा में भील विद्रोह |
कविराजा श्यामलदास की मध्यस्थता से ऋषभदेव समझौता |
| 1883 ई. |
सिरोही में संप सभा की स्थापना |
गोविंद गुरु द्वारा 10 सुधार नियमों की घोषणा |
| 1886 ई. |
मोतीलाल तेजावत का जन्म (कोलयारी, उदयपुर) |
एकी आंदोलन के अमर नायक |
| 1903 ई. |
मानगढ़ पहाड़ी पर पहला वार्षिक अधिवेशन |
प्रतिवर्ष मार्गशीर्ष पूर्णिमा को मेले का आरंभ |
| 17 नवंबर 1913 ई. |
मानगढ़ नरसंहार (बांसवाड़ा) |
1,500 भील शहीद; 'राजस्थान का जलियांवाला बाग' |
| 1921 ई. |
मातृकुंडिया से एकी आंदोलन का आरंभ |
मोतीलाल तेजावत द्वारा 'मेवाड़ पुकार' 21 मांगें |
| 7 मार्च 1922 ई. |
नीमड़ा / पाल-चितरिया हत्याकांड |
मेजर सटन द्वारा 1,200 आदिवासी गोलियों से भुने गए |
| 1924 ई. |
क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट पारित |
मीणाओं को आपराधिक जनजाति घोषित किया गया |
| 1930 ई. |
जरायम पेशा कानून (जयपुर रियासत) |
12 वर्ष से ऊपर के स्त्री-पुरुषों की दैनिक थाने में हाजिरी |
| अप्रैल 1944 ई. |
नीम का थाना मीणा सम्मेलन (सीकर) |
जैन मुनि मगन सागर की अध्यक्षता; 'मीणा पुराण' |
| 28 अक्टूबर 1946 ई. |
बागावास मुक्ति दिवस (जयपुर) |
26,000 चौकीदार मीणाओं का सामूहिक इस्तीफा |
| 1952 ई. |
जरायम पेशा कानून पूर्णतः समाप्त |
मीणा समाज को अनिवार्य हाजिरी से स्थायी मुक्ति |
10.2 प्रमुख आंदोलनों की तुलनात्मक सारणी#
| आंदोलन |
प्रमुख नायक |
मुख्य क्षेत्र |
मूल उद्देश्य |
ऐतिहासिक घटना |
| भगत आंदोलन |
गोविंद गुरु, सुरजी भगत |
डूंगरपुर, बांसवाड़ा, ईडर |
नशामुक्ति, संप सभा 10 नियम, बेगार मुक्ति |
मानगढ़ नरसंहार (17 नव. 1913) |
| एकी आंदोलन |
मोतीलाल तेजावत ('बावजी') |
मेवाड़ (भौमट), सिरोही, विजयनगर |
84 लाग-बाग व बेगार का सामूहिक बहिष्कार |
नीमड़ा हत्याकांड (7 मार्च 1922) |
| मीणा आंदोलन |
मुनि मगन सागर, लक्ष्मीनारायण झरवाल |
जयपुर, सीकर, अलवर |
जरायम पेशा कानून व दैनिक हाजिरी की समाप्ति |
बागावास मुक्ति दिवस (28 अक्टू. 1946) |
| खेजड़ली आंदोलन |
अमृता देवी बिश्नोई |
खेजड़ली (जोधपुर) |
खेजड़ी के हरे वृक्षों की रक्षा |
363 शहीदों का बलिदान (12 सित. 1730) |
10.3 उच्च-स्तरीय स्मरण-सूत्र (Mnemonics)#
- स्मरण-सूत्र 1: राजस्थान के चार प्रमुख आंदोलन (भ-ए-मी-बि)
- सूत्र: "भ-ए-मी-बि"
- क्रम: भगत आंदोलन (गोविंद गुरु) -> एकी आंदोलन (मोतीलाल तेजावत) -> मीणा आंदोलन (मुनि मगन सागर) -> बिश्नोई आंदोलन (अमृता देवी)।
- स्मरण-सूत्र 2: राजस्थान के तीन प्रमुख नरसंहार (खे-मां-नी)
- सूत्र: "खे-मां-नी"
- क्रम: खेजड़ली (1730, 363 शहीद) -> मांनगढ़ (1913, 1500 शहीद) -> नीमड़ा (1922, 1200 शहीद)।
- स्मरण-सूत्र 3: प्रमुख नायक व व्यक्तित्व (जां-अ-गो-मो-म)
- सूत्र: "जां-अ-गो-मो-म"
- क्रम: जांभोजी (29 नियम) -> अमृता देवी (खेजड़ली) -> गोविंद गुरु (संप सभा) -> मोतीलाल तेजावत (मेवाड़ पुकार) -> मुनि मगन सागर (मीणा पुराण)।
11. परीक्षा अभ्यास और विषय संरचना#
11.1 विषय संरचना एवं अभ्यास परीक्षाएँ#
- इस अध्याय के संपूर्ण अभ्यास हेतु **60 उच्च-स्तरीय द्विभाषी प्रश्नों** को छह केंद्रित अभ्यास परीक्षाओं में विभाजित किया गया है:
- **सेट 1: भगत आंदोलन एवं गोविंद गुरु (5 प्रश्न)**
- **सेट 2: एकी आंदोलन एवं मोतीलाल तेजावत (15 प्रश्न)**
- **सेट 3: मीणा आंदोलन एवं जरायम पेशा कानून (10 प्रश्न)**
- **सेट 4: 19वीं सदी के भील विद्रोह एवं MBC (5 प्रश्न)**
- **सेट 5: खेजड़ली बलिदान एवं बिश्नोई संप्रदाय (5 प्रश्न)**
- **सेट 6: समग्र जनजातीय आंदोलन पुनरावृत्ति एवं तुलनात्मक अभ्यास (20 प्रश्न)**
| परीक्षा सेट |
केंद्र बिंदु |
प्रश्न संख्या |
| सेट 1 - भगत आंदोलन एवं गोविंद गुरु |
गोविंद गुरु, संप सभा 1883, 10 नियम, मानगढ़ नरसंहार 1913, कंबोई समाधि |
5 |
| सेट 2 - एकी आंदोलन एवं मोतीलाल तेजावत |
तेजावत 'बावजी', मातृकुंडिया 1921, मेवाड़ पुकार 21 मांगें, नीमड़ा गोलीकांड 1922 |
15 |
| सेट 3 - मीणा आंदोलन एवं जरायम पेशा कानून |
क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट 1924, जरायम पेशा 1930, मुनि मगन सागर, बागावास मुक्ति दिवस |
10 |
| सेट 4 - 19वीं सदी के भील विद्रोह एवं MBC |
1818 विद्रोह, मेवाड़ भील कोर 1841 (खेरवाड़ा), 1881 बारपाल-पदूणा विद्रोह |
5 |
| सेट 5 - खेजड़ली बलिदान एवं बिश्नोई संप्रदाय |
गुरु जांभोजी, 29 नियम, खेजड़ली 1730, अमृता देवी, 363 शहीद, वृक्ष मेला |
5 |
| सेट 6 - समग्र जनजातीय आंदोलन पुनरावृत्ति अभ्यास |
बहु-कथनीय प्रश्न, सुमेलन, कालानुक्रम, उच्च-स्तरीय विश्लेषणात्मक अभ्यास |
20 |
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