राजस्थान का कृषि वर्गीकरण GK
भाग - 17: राजस्थान का कृषि वर्गीकरण#
विस्तृत विषय-सूची#
| खंड |
विषय |
परीक्षा में महत्व |
| 17.1 |
ऋतुओं / सस्य काल के आधार पर वर्गीकरण |
★★★★★ |
| 17.2 |
उपयोगिता एवं आर्थिक महत्व के आधार पर वर्गीकरण |
★★★★★ |
| 17.3 |
जल आपूर्ति एवं नमी के आधार पर वर्गीकरण |
★★★★ |
| 17.4 |
पारंपरिक एवं विशिष्ट कृषि प्रणालियाँ |
★★★★★ |
| 17.5 |
राजस्थान के 10 कृषि-जलवायु प्रदेश |
★★★★★ |
| 17.6 |
भारत में राजस्थान का कृषिगत स्थान |
★★★★★ |
| 17.7 |
सस्य गहनता एवं भूमि उपयोग शब्दावली |
★★★★ |
| 17.8 |
परीक्षा-उपयोगी मुख्य बिंदु |
★★★★★ |
📖 17.1 ऋतुओं / सस्य काल के आधार पर वर्गीकरण
राजस्थान में कृषि फसलों को बुआई, वृद्धि काल एवं कटाई के समय के आधार पर तीन प्रमुख मौसमी संवर्गों में विभाजित किया जाता है:
[राजस्थान का मौसमी फसल चक्र]
│
┌────────────────────────────┼────────────────────────────┐
▼ ▼ ▼
[1. खरीफ (सियालू / सावणी)] [2. रबी (उनालू)] [3. जायद]
• बुआई: जून - जुलाई • बुआई: अक्टूबर - नवम्बर • बुआई: मार्च - अप्रैल
• कटाई: सितम्बर - अक्टूबर • कटाई: मार्च - अप्रैल • कटाई: मई - जून
• मुख्य: बाजरा, मक्का, ग्वार • मुख्य: गेहूँ, सरसों, चना • मुख्य: तरबूज, ककड़ी, सब्जियाँ
| फसल वर्ग |
स्थानीय नाम |
बुआई की अवधि |
कटाई की अवधि |
जलवायुविक आवश्यकताएँ |
प्रमुख फसलें |
| खरीफ |
सियालू / सावणी |
जून से जुलाई |
सितम्बर से अक्टूबर |
उच्च तापमान (30°C-40°C), उच्च आर्द्रता एवं पर्याप्त मानसूनी वर्षा |
खाद्यान्न: बाजरा, मक्का, ज्वार, धान दलहन: मूँग, मोठ, उड़द, चौंला, अरहर तिलहन: मूँगफली, सोयाबीन, तिल, अरण्डी नकदी: कपास, ग्वार, गन्ना |
| रबी |
उनालू |
अक्टूबर से नवम्बर |
मार्च से अप्रैल |
प्रारंभिक वृद्धि में शीतोष्ण एवं शुष्क मौसम, पकते समय स्वच्छ धूप व उच्च तापमान |
खाद्यान्न: गेहूँ, जौ दलहन: चना, मटर, मसूर तिलहन: राई/सरसों, तारामीरा, अलसी, सूरजमुखी मसाले: जीरा, धनिया, सौंफ, मेथी, लहसुन |
| जायद |
जायद फसलें |
मार्च से अप्रैल |
मई से जून |
शुष्क वातावरण, तेज धूप एवं निरंतर कृत्रिम सिंचाई |
फलदार सब्जियाँ: तरबूज, खरबूजा, खीरा, ककड़ी, मतीरा, टिंडा, लौकी चारा: रिजका, चरी, सूडान घास अल्पकालिक दलहन: मूँग व उड़द |
📖 17.2 उपयोगिता एवं आर्थिक महत्व के आधार पर वर्गीकरण
कृषक के उत्पादन उद्देश्य, बाजार मूल्य एवं उपभोग प्रारूप के अनुसार फसलों का वर्गीकरण:
[आर्थिक उपयोगिता आधारित फसल संवर्ग]
│
┌───────────────┬───────────────┼───────────────┬───────────────┐
▼ ▼ ▼ ▼ ▼
[खाद्यान्न] [दलहन] [तिलहन] [नकदी फसलें] [मसाला फसलें]
• बाजरा, गेहूँ • चना, मोठ, • सरसों, • कपास, ग्वार • जीरा,
मूँग सोयाबीन ईसबगोल
1. खाद्यान्न फसलें#
| संवर्ग |
फसलें |
प्रमुख परीक्षा तथ्य |
| मोटे अनाज (पोषक अनाज — 'श्री अन्न') |
बाजरा |
क्षेत्रफल एवं उत्पादन दोनों में राजस्थान का भारत में प्रथम स्थान। पश्चिमी राजस्थान की जीवन रेखा (रेतीली बालू)। |
|
ज्वार |
'गरीब की रोटी' / चारा व खाद्यान्न; अजमेर, भीलवाड़ा, टोंक, पाली में प्रमुख। |
|
मक्का |
दक्षिणी राजस्थान (मेवाड़ — उदयपुर, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, बांसवाड़ा) का मुख्य भोजन; लाल-लोमी मृदा में उत्पादन। |
|
जौ |
लवण-प्रतिरोधी रबी फसल; जयपुर, सीकर, गंगानगर में माल्ट एवं बीयर उद्योग हेतु उपयोगी। |
| उत्कृष्ट खाद्यान्न |
गेहूँ |
राज्य की सबसे बड़ी रबी खाद्यान्न फसल; श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, कोटा, अलवर, जयपुर (जलोढ़ मृदा) में सघन। |
|
धान (चावल) |
अधिक जल-मांग वाली फसल; चंबल कमान (कोटा, बूँदी - 'बासमती'), माही कमान (बांसवाड़ा) एवं घग्गर बाढ़ क्षेत्र (हनुमानगढ़) तक सीमित। |
2. दलहनी फसलें (प्राकृतिक उर्वरता संवर्धक)#
- पारिस्थितिक महत्व: लेग्युमिनोसी कुल की फसलों की जड़ों में राइजोबियम जीवाणु की ग्रंथियाँ पाई जाती हैं, जो वायुमंडलीय नाइट्रोजन का जैविक स्थिरीकरण कर मृदा की खोई उर्वरता को प्राकृतिक रूप से पुनर्स्थापित करती हैं। (अपवाद: राजमा नाइट्रोजन स्थिरीकरण नहीं करता)।
- प्रमुख फसलें:
| फसल |
प्रमुख तथ्य |
| चना |
रबी दलहन में सर्वोच्च स्थान; बीकानेर, चूरू, हनुमानगढ़, झुंझुनूं। |
| मोठ |
मरुस्थलीय शुष्क-सहिष्णु फसल; बीकानेर, चूरू, बाड़मेर (बीकानेरी भुजिया उद्योग का मुख्य कच्चा माल)। |
| मूँग |
नागौर (राज्य की मूँग राजधानी), पाली, जोधपुर, जालौर। |
| उड़द |
हाड़ौती क्षेत्र (कोटा, बारां, झालावाड़) एवं भीलवाड़ा। |
| चौंला |
शेखावाटी एवं नागौर की बारानी भूमि पर। |
3. तिलहनी फसलें#
राजस्थान देश में तिलहन उत्पादन में अग्रणी राज्यों में शीर्ष स्थान पर है:
| तिलहन संवर्ग |
प्रमुख फसलें |
प्रमुख उत्पादक जिले |
विशिष्ट भौगोलिक बिंदु |
| रबी तिलहन |
राई एवं सरसों |
भरतपुर, अलवर, गंगानगर, टोंक, दौसा, सवाई माधोपुर |
सरसों उत्पादन में राजस्थान का देश में प्रथम स्थान। राष्ट्रीय सरसों अनुसंधान केंद्र (DRMR) सेवर (भरतपुर) में स्थित है। |
|
तारामीरा |
नागौर, जयपुर, चूरू, सीकर |
अत्यंत कम वर्षा एवं रेतीली-कंकरीली भूमि में उगने वाला सूखा-प्रतिरोधी तिलहन। |
|
अलसी |
कोटा, बारां, झालावाड़, नागौर |
औद्योगिक तेल एवं रेशे (Flax) हेतु उपयोगी। |
| खरीफ तिलहन |
सोयाबीन |
झालावाड़, बारां, कोटा, चित्तौड़गढ़ |
हाड़ौती की मध्यम काली (वर्टीसोल्स) मृदा में सघन; प्रोटीन (40%) एवं तेल (20%) का समृद्ध स्रोत। |
|
मूँगफली |
बीकानेर, जोधपुर, जयपुर, सीकर |
बीकानेर का लूणकरणसर क्षेत्र मूँगफली उत्पादन के कारण 'राजस्थान का राजकोट' कहलाता है। |
|
तिल |
पाली, जोधपुर, सवाई माधोपुर |
असिंचित बारानी क्षेत्रों में उगाई जाने वाली प्राचीन स्वदेशी तिलहन फसल। |
|
अरण्डी |
जालौर, बाड़मेर, सिरोही |
शुष्क एवं लवणीय क्षेत्रों में औद्योगिक ल्यूब्रिकेंट तेल हेतु। |
4. नकदी एवं व्यावसायिक फसलें#
| फसल |
प्रमुख तथ्य |
| कपास |
स्थानीय भाषा में 'बणिया' तथा इसके रेशे को 'सफेद सोना' कहा जाता है। मुख्य किस्में: अमेरिकन कपास (श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़) तथा देशी/मालवी कपास (हाड़ौती एवं मेवाड़)। |
| ग्वार |
विश्व के कुल ग्वार का लगभग 70% उत्पादन राजस्थान करता है। औद्योगिक उपयोग: इसके बीजों से प्राप्त 'ग्वार गम' का अमेरिका व यूरोप को भारी निर्यात शेल गैस निष्कर्षण (Fracking प्रक्रिया) एवं खाद्य प्रसंस्करण हेतु होता है। |
| गन्ना |
अत्यधिक जल-मांग वाली फसल; श्रीगंगानगर, बूँदी, कोटा और चित्तौड़गढ़ तक सीमित। |
5. विशिष्ट मसाला एवं औषधीय फसलें#
[जोधपुर / बाड़मेर / नागौर] ──> जीरा एवं मथानिया लाल मिर्च
[जालौर / सांचौर / बाड़मेर] ──> ईसबगोल (घोड़ा जीरा)
[हाड़ौती (कोटा, बारां)] ──> धनिया एवं लहसुन
[नागौर (मेड़ता सिटी)] ──> हरी मेथी (कस्तूरी / पान मेथी - विशिष्ट सुगंध)
[चित्तौड़गढ़ / प्रतापगढ़] ──> अफ़ीम ('काला सोना')
[पाली (सोजत)] ──> मेंहदी (GI Tag प्राप्त)
| मसाला/औषधीय फसल |
प्रमुख तथ्य |
| ईसबगोल |
इसे 'घोड़ा जीरा' भी कहते हैं। जालौर व सांचौर भारत के सबसे बड़े उत्पादन केंद्र हैं। पेट के रोगों हेतु औषधीय भूसी बनती है। |
| धनिया |
बारां जिले की सीमा पर स्थित रामगंजमंडी (कोटा) एशिया की सबसे बड़ी धनिया मंडी है। |
| पान मेथी |
नागौर जिले की मेथी अपनी विशिष्ट खुशबू के लिए विश्व प्रसिद्ध है। |
| अफ़ीम |
चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़, झालावाड़ (नारकोटिक्स विभाग की कड़ी निगरानी में अनुबंध कृषि)। स्थानीय भाषा में 'अमल' या 'काला सोना'। |
📖 17.3 जल आपूर्ति एवं नमी के आधार पर वर्गीकरण
| कृषि पद्धति |
वार्षिक वर्षा सीमा |
जल का स्रोत |
तकनीकी विशेषताएँ एवं राजस्थान में क्षेत्र |
| 1. शुष्क कृषि |
< 500 मिमी |
पूर्णतः वर्षा पर निर्भर |
• नमी संरक्षण की विधियाँ (मल्चिंग, गहरी जुताई) • कम पानी व शीघ्र पकने वाली फसलें (मोठ, बाजरा, ग्वार) • क्षेत्र: जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, फलौदी |
| 2. शुष्क-भूमि कृषि |
500-750 मिमी |
वर्षा आधारित, आकस्मिक सिंचाई |
• जल संचयन (फार्म पॉन्ड) एवं अंतरा-सस्यन • फसलें: ज्वार, मूँग, मक्का, तिल • क्षेत्र: अरावली के पश्चिमी ढलान, शेखावाटी, मध्य राजस्थान |
| 3. सिंचित कृषि |
वर्षा अपर्याप्त, किंतु जल स्रोत उपलब्ध |
नहरें, नलकूप, कुएँ एवं बाँध |
• वर्ष में दो से तीन फसलें (सघन सस्यन तीव्रता >150%) • फसलें: गेहूँ, नरमा कपास, गन्ना, धान, सरसों • क्षेत्र: गंगानगर-हनुमानगढ़ (IGNP), कोटा-बूँदी (चंबल नहर), जयपुर (नलकूप) |
📖 17.4 पारंपरिक एवं विशिष्ट कृषि प्रणालियाँ
1. वालरा कृषि (झूमिंग / स्थानांतरित कृषि)#
दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी अंचलों (डूंगरपुर, बांसवाड़ा, उदयपुर, सिरोही) में भील, गरासिया और डामोर जनजातियों द्वारा वनों को काटकर और जलाकर की जाने वाली 'काटो और जलाओ' कृषि को 'वालरा' कहते हैं। इसके दो रूप हैं:
| रूप |
विवरण |
| चिमाता |
जब आदिवासी किसान पहाड़ी ढलानों पर स्थित वनों को जलाकर राख में खेती करते हैं। |
| दजिया |
जब मैदानी भागों में पेड़ों और झाड़ियों को साफ करके समतल भूमि पर खेती की जाती है। |
(नोट: मृदा अपरदन और वनों के विनाश के कारण सरकार द्वारा इस पर प्रतिबंध लगाया गया है)।
2. खड़ीन कृषि प्रणाली (जैसलमेर)#
| पहलू |
विवरण |
| प्रवर्तक |
15वीं शताब्दी में जैसलमेर के पालीवाल ब्राह्मणों द्वारा विकसित जल संचयन एवं सस्यन की अनूठी तकनीक। |
| कार्यप्रणाली |
मरुस्थलीय ढलानों के निचले भाग में तीन तरफ मिट्टी का मजबूत अर्ध-चंद्राकार बाँध (धोरा) बनाकर वर्षा जल रोका जाता है। |
| कृषि चक्र |
वर्षा का पानी महीनों तक रुककर जमीन में पूरी तरह समा जाता है। अक्टूबर-नवंबर में जब पानी सूखता है, तो जमीन में बची गहरी नमी में बिना किसी अतिरिक्त सिंचाई के रबी की उत्कृष्ट फसलें (चना, गेहूँ, सरसों) ली जाती हैं। |
3. मिश्रित कृषि#
| पहलू |
विवरण |
| स्वरूप |
जब कृषक फसल उत्पादन के साथ-साथ आर्थिक सुरक्षा हेतु पशुपालन भी करता है। |
| राजस्थान में प्रासंगिकता |
अकाल और सूखे की बारंबारता के कारण राजस्थान का लगभग 80% ग्रामीण समाज मिश्रित कृषि पर आश्रित है। |
4. जैविक कृषि#
| पहलू |
विवरण |
| डूंगरपुर जिला |
राजस्थान का प्रथम पूर्ण जैविक जिला। |
| विधि |
रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर गोबर खाद, वर्मीकम्पोस्ट, जीवामृत एवं नीम आधारित कीटनाशकों का प्रयोग। |
📖 17.5 राजस्थान के 10 कृषि-जलवायु प्रदेश
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और राज्य कृषि विभाग ने राजस्थान को मृदा, वर्षा, तापमान और फसल प्रारूप के आधार पर 10 कृषि-जलवायु खंडों में बाँटा है:
| जोन कोड |
कृषि-जलवायु खंड का नाम |
सम्मिलित जिले |
औसत वर्षा |
प्रमुख फसलें |
परीक्षा-उपयोगी विशिष्टता |
| I A |
शुष्क पश्चिमी मैदानी खंड |
बाड़मेर, बालोतरा, जोधपुर शहर, जोधपुर ग्रामीण, फलौदी (द.) |
20-37 सेमी |
बाजरा, मोठ, मूँग, ग्वार, तिल, जीरा |
काजरी एवं आफरी संस्थान इसी जोन (जोधपुर) में स्थित हैं। |
| I B |
सिंचित उत्तर-पश्चिमी मैदानी खंड |
श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, अनूपगढ़ |
10-30 सेमी |
अमेरिकन कपास (नरमा), गेहूँ, सरसों, किन्नू, चना |
राज्य का सर्वाधिक सिंचित खंड। घग्गर का नाली क्षेत्र एवं IGNP नहरी कमान। |
| I C |
अति-शुष्क आंशिक सिंचित पश्चिमी खंड |
बीकानेर, जैसलमेर, चूरू, फलौदी (उ.) |
10-30 सेमी |
बाजरा, मोठ, ग्वार, मूँगफली (सिंचित), इसबगोल |
क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान का सबसे बड़ा कृषि-जलवायु खंड। |
| II A |
अंतःस्थलीय जल अपवाह का अंतर्वर्ती खंड |
सीकर, झुंझुनूं, नीम का थाना, नागौर, डीडवाना-कुचामन |
30-50 सेमी |
बाजरा, ग्वार, मूँग, चना, मेथी, सरसों |
इसे 'शेखावाटी खंड' भी कहते हैं। दलहन एवं पान मेथी का प्रमुख क्षेत्र। |
| II B |
लूनी बेसिन का संक्रांति मैदानी खंड |
जालौर, सांचौर, पाली, सिरोही |
30-50 सेमी |
बाजरा, तिल, गेहूँ, जीरा, ईसबगोल, अरण्डी |
इसे 'गोडवाड़ प्रदेश' कहते हैं। ईसबगोल और जीरे की सघन व्यावसायिक खेती। |
| III A |
अर्द्ध-शुष्क पूर्वी मैदानी खंड |
जयपुर, जयपुर ग्रामीण, दौसा, दूदू, अजमेर, ब्यावर, टोंक |
50-70 सेमी |
गेहूँ, जौ, सरसों, बाजरा, ज्वार, मूँगफली |
कछारी-दोमट मृदा; कृषि विश्वविद्यालय जोबनेर (जयपुर) इसी जोन में स्थित है। |
| III B |
बाढ़ संभाव्य पूर्वी मैदानी खंड |
अलवर, खैरथल-तिजारा, भरतपुर, डीग, धौलपुर, करौली, सवाई माधोपुर |
50-80 सेमी |
सरसों, गेहूँ, बाजरा, चना |
राज्य का सर्वाधिक सरसों उत्पादक खंड। बाणगंगा व चंबल बेसिन का बाढ़ क्षेत्र। |
| IV A |
उप-आर्द्र दक्षिणी मैदानी एवं अरावली पहाड़ी खंड |
भीलवाड़ा, शाहपुरा, राजसमंद, चित्तौड़गढ़, उदयपुर (उ.) |
50-90 सेमी |
मक्का, ज्वार, मूँगफली, गेहूँ, चना, अफ़ीम |
अरावली की तलहटी; लाल-पीली व भूरी मृदा; मक्का एवं अफ़ीम की खेती। |
| IV B |
आर्द्र दक्षिणी मैदानी खंड |
डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, सलूंबर, उदयपुर (द.) |
70-110 सेमी |
मक्का, चावल, उड़द, सोयाबीन, चना |
क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान का सबसे छोटा कृषि-जलवायु खंड। लाल-लोमी मृदा। |
| V |
आर्द्र दक्षिण-पूर्वी मैदानी खंड |
कोटा, बूँदी, बारां, झालावाड़ |
70-100 सेमी+ |
सोयाबीन, धनिया, लहसुन, संतरा, गेहूँ, धान, सरसों |
हाड़ौती का पठार; गहरी मध्यम काली (वर्टीसोल्स) मृदा। राज्य का सर्वोच्च वर्षा खंड। |
📖 17.6 भारत में राजस्थान का कृषिगत स्थान
भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के नवीनतम उत्पादन आंकड़ों के आधार पर:
| फसल / उत्पाद |
देश में राजस्थान का स्थान |
देश के कुल उत्पादन में योगदान |
मुख्य उत्पादक संभाग / जिले |
| बाजरा |
प्रथम |
लगभग 40-45% |
जोधपुर, बीकानेर, जयपुर, शेखावाटी |
| राई एवं सरसों |
प्रथम |
लगभग 40-45% |
भरतपुर, अलवर, गंगानगर, टोंक |
| कुल तिलहन |
प्रथम |
लगभग 20-22% |
संपूर्ण राजस्थान |
| कुल दलहन |
द्वितीय / शीर्ष |
लगभग 18-20% |
नागौर, बीकानेर, चूरू, झुंझुनूं |
| चना |
द्वितीय (म.प्र. के बाद) |
लगभग 19-22% |
बीकानेर, हनुमानगढ़, चूरू, झुंझुनूं |
| सोयाबीन |
तृतीय (म.प्र., महाराष्ट्र के बाद) |
लगभग 8-10% |
कोटा, बारां, झालावाड़, चित्तौड़गढ़ |
| मूँगफली |
द्वितीय (गुजरात के बाद) |
लगभग 18-20% |
बीकानेर (लूणकरणसर), जोधपुर, जयपुर |
| ग्वार |
प्रथम |
लगभग 70-75% |
बाड़मेर, बीकानेर, जैसलमेर, चूरू |
| ईसबगोल / जीरा / सौंफ |
शीर्ष स्थान |
लगभग 40-50% |
जालौर, बाड़मेर, जोधपुर, नागौर |
📖 17.7 सस्य गहनता एवं भूमि उपयोग शब्दावली
1. सस्य गहनता / फसल सघनता#
एक कृषि वर्ष में एक ही भूमि पर कितनी बार फसलें उगाई गईं, उसका प्रतिशत अनुपात:
$$\text{सस्य गहनता (%)} = \left(\frac{\text{सकल कृषित क्षेत्रफल}}{\text{शुद्ध बोया गया क्षेत्रफल}}\right) \times 100$$
- राजस्थान की औसत सस्य गहनता लगभग 140%-145% है (गंगानगर में 170%+ तथा जैसलमेर में 110% के निकट)।
2. शुद्ध बोया गया क्षेत्रफल#
- राजस्थान के कुल प्रतिवेदित क्षेत्रफल (342.87 लाख हेक्टेयर) का लगभग 52%-53% भाग शुद्ध बोया गया क्षेत्र है।
3. बंजर एवं अकृष्य भूमि#
- राज्य का लगभग 10%-11% भाग चट्टानी पहाड़ियों, रेत के टीलों व बीहड़ों के रूप में स्थायी रूप से अनुपजाऊ है।
4. पड़त भूमि#
| प्रकार |
विवरण |
| चालू पड़त |
वह भूमि जो चालू वर्ष में उपजाऊपन बढ़ाने हेतु खाली छोड़ी गई हो। |
| पुरातन पड़त |
जो लगातार 1 से 5 वर्षों तक बिना बोए खाली पड़ी रही हो। |
📖 17.8 परीक्षा-उपयोगी मुख्य बिंदु
| तथ्य |
विवरण |
| सबसे बड़ा कृषि-जलवायु खंड |
Zone I C (अति-शुष्क आंशिक सिंचित पश्चिमी खंड - बीकानेर, जैसलमेर, चूरू) |
| सबसे छोटा कृषि-जलवायु खंड |
Zone IV B (आर्द्र दक्षिणी मैदानी खंड - डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़) |
| सर्वाधिक सिंचित खंड |
Zone I B (सिंचित उत्तर-पश्चिमी मैदान - गंगानगर, हनुमानगढ़) |
| वालरा के भेद |
चिमाता: भील जनजाति द्वारा पहाड़ी ढालों पर झूमिंग खेती। दजिया: मैदानी वनों को साफ करके खेती। |
| सफेद सोना vs काला सोना |
सफेद सोना = कपास (बणिया)। काला सोना = अफ़ीम। |
| DRMR स्थान |
सेवर (भरतपुर), स्थापना: 20 अक्टूबर 1993। |
| CAZRI स्थान |
जोधपुर, स्थापना: 1959। |
| सोजत की मेंहदी |
पाली जिले के सोजत की मेंहदी को GI Tag प्राप्त है। |
| दलहन में नाइट्रोजन स्थिरीकरण जीवाणु |
राइजोबियम। |
| खड़ीन का आविष्कार |
15वीं सदी में जैसलमेर के पालीवाल ब्राह्मणों द्वारा। |
परीक्षा पुनरावृत्ति#
खरीफ (सियालू/सावणी): बुआई जून-जुलाई, कटाई सितम्बर-अक्टूबर (बाजरा, ज्वार, मक्का, कपास, ग्वार, मूँगफली, सोयाबीन) -> रबी (उनालू): बुआई अक्टूबर-नवम्बर, कटाई मार्च-अप्रैल (गेहूँ, जौ, चना, सरसों, तारामीरा, मसाले) -> जायद: बुआई मार्च-अप्रैल, कटाई मई-जून (तरबूज, खरबूजा, ककड़ी, सब्जियाँ) -> 10 कृषि-जलवायु खंड: सबसे बड़ा = Zone I C (अति-शुष्क पश्चिमी: बीकानेर, जैसलमेर, चूरू), सबसे छोटा = Zone IV B (आर्द्र दक्षिणी: डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़), सर्वाधिक सिंचित = Zone I B (गंगानगर, हनुमानगढ़) -> विशिष्ट कृषि: वालरा (पहाड़ी ढालों पर चिमाता, मैदानी वनों में दजिया), खड़ीन (15वीं सदी में जैसलमेर के पालीवाल ब्राह्मणों द्वारा जल संचयन) -> भारत में प्रथम स्थान: बाजरा, सरसों, कुल तिलहन, ग्वार (विश्व का 70%) -> DRMR सेवर भरतपुर, CAZRI जोधपुर (1959), AFRI जोधपुर -> सफेद सोना: कपास (बणिया); काला सोना: अफ़ीम -> प्रथम जैविक जिला: डूंगरपुर -> 17.8 परीक्षा-उपयोगी बिंदु
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