राजस्थान की लवणीय एवं क्षारीय मिट्टी GK

भाग - 16: राजस्थान की लवणीय एवं क्षारीय मिट्टी


विस्तृत विषय-सूची

खंड विषय परीक्षा में महत्व
16.1 रासायनिक संकल्पना एवं त्रिकोणीय वर्गीकरण ★★★★★
16.2 विस्तृत रासायनिक भेद (लवणीय बनाम क्षारीय) ★★★★★
16.3 स्थानीय नामकरण एवं पारिभाषिक शब्दावली ★★★★★
16.4 लवणता एवं क्षारीयता की उत्पत्ति के भू-वैज्ञानिक कारण ★★★★★
16.5 जिलेवार स्थानिक वितरण ★★★★★
16.6 मृदा स्वास्थ्य एवं पादप क्रिया-विज्ञान पर दुष्प्रभाव ★★★★
16.7 सुधार एवं पुनरुद्धार के वैज्ञानिक उपाय ★★★★★
16.8 लवण-सहिष्णु फसलें एवं विशिष्ट किस्में ★★★★
16.9 संस्थागत प्रयास एवं विशिष्ट परियोजनाएँ ★★★★
16.10 परीक्षा-उपयोगी मुख्य बिंदु ★★★★★

📖 16.1 रासायनिक संकल्पना एवं त्रिकोणीय वर्गीकरण

मृदा विज्ञान एवं संयुक्त राज्य अमेरिका लवणता प्रयोगशाला (USSL, Riverside) के मानकों के अनुसार, लवण-प्रभावित मृदाओं को उनके तीन मुख्य रासायनिक प्राचलों—विद्युत चालकता (EC), विनिमेय सोडियम प्रतिशतता (ESP), तथा मृदा अभिक्रिया (pH मान) के आधार पर तीन सुस्पष्ट श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है:

प्राचल वैज्ञानिक परिभाषा एवं मापक इकाई सामान्य मृदा लवणीय मृदा क्षारीय/सोडिक मृदा लवणीय-क्षारीय मृदा
मृदा अभिक्रिया (pH) हाइड्रोजन आयनों की सांद्रता का ऋणात्मक लघुगणक 6.5 - 7.5 < 8.5 > 8.5 (8.5 - 10.5) परिवर्ती (प्रायः ≈ 8.5)
विद्युत चालकता (EC) मृदा घोल में घुलनशील लवणों की मात्रा (25°C पर dS/m या mmhos/cm) < 4.0 > 4.0 < 4.0 > 4.0
विनिमेय सोडियम (ESP) विनिमेय धनायनों में सोडियम आयन का आनुपातिक प्रतिशत < 15% < 15% > 15% (15 - 50%+) > 15%
सोडियम अधिशोषण अनुपात (SAR) जल में विलेय सोडियम, कैल्शियम व मैग्नीशियम का अनुपात < 13 < 13 > 13 > 13
रूसी/अंतर्राष्ट्रीय नाम तकनीकी मृदा वैज्ञानिक नामकरण Zonal सोलोनचाक सोलोनेत्ज Solonchak-Solonetz
सामान्य बोलचाल का नाम भौतिक स्वरूप के आधार पर सफेद ऊसर काली ऊसर भूरी ऊसर


📖 16.2 विस्तृत रासायनिक भेद

1. लवणीय मृदा (सोलोनचाक)

पहलू विवरण
विद्यमान लवण सोडियम, कैल्शियम एवं मैग्नीशियम के क्लोराइड तथा सल्फेट लवणों की अधिकता (उदा. NaCl, Na₂SO₄, CaCl₂, MgCl₂)
भौतिक स्वरूप उच्च वाष्पीकरण के कारण जल वाष्पीकृत हो जाता है और सतह पर लवणों की चमकदार सफेद परत जम जाती है, जिससे इसे 'श्वेत क्षार' कहा जाता है
भौतिक गुण घुलनशील लवणों की उच्च सांद्रता के कारण मृदा कण परस्पर जुड़े रहते हैं; अतः इसकी संरचना और पारगम्यता नष्ट नहीं होती

2. क्षारीय/सोडिक मृदा (सोलोनेत्ज)

पहलू विवरण
विद्यमान लवण सोडियम कार्बोनेट (Na₂CO₃) और सोडियम बाइकार्बोनेट (NaHCO₃) की प्रधानता
भौतिक स्वरूप उच्च pH (>8.5) के कारण कार्बनिक पदार्थ घुलकर सतह पर आ जाता है और सूखने पर गहरे भूरे या काले रंग के धब्बे बनाता है, जिससे इसे 'काली क्षार' कहा जाता है
भौतिक गुण विनिमेय सोडियम के आधिक्य से मृदा कोलाइड्स छितर जाते हैं। मृदा के रंध्राकाश बंद हो जाते हैं, जिससे मिट्टी कठोर, अभेद्य, संवातन-विहीन और दलदली हो जाती है


📖 16.3 स्थानीय नामकरण एवं पारिभाषिक शब्दावली

राजस्थान के विभिन्न अंचलों में लवणीय एवं क्षारीय मृदाओं हेतु प्रयुक्त पारंपरिक शब्दावली:

स्थानीय नाम प्रचलित अंचल विशिष्ट अर्थ एवं स्वरूप
रेह संपूर्ण राजस्थान सतह पर जमा लवणों की बारीक, सफेद, राख जैसी चूर्णित परत
ऊसर पूर्वी एवं मध्य राजस्थान संस्कृत शब्द 'उष्ट्र' या 'उत्सर्ग' से व्युत्पन्न; बंजर, अनुत्पादक भूमि जहाँ बीज अंकुरित न हो सके
कल्लर उत्तरी राजस्थान (गंगानगर, हनुमानगढ़) सिंचाई के उपरांत लवणों के जमाव से कठोर व बंजर बनी भूमि
खार / खारी पश्चिमी मरुस्थल (बाड़मेर, जैसलमेर) अत्यधिक खारे जल के जमाव एवं वाष्पीकरण से बनी नमकीन भूमि
चोपन हाड़ौती एवं चंबल कछार अत्यधिक सोडिक चिकनी मिट्टी, जो भीगने पर चिपचिपी और सूखने पर पत्थर जैसी कठोर हो जाती है
नेहड़ सांचौर एवं जालोर कच्छ के रण से समुद्री जल के प्रवेश एवं दलदल के सूखने से बनी लवणीय पट्टी
लाटा / खारिया शेखावाटी एवं नागौर अंतःस्थलीय नमकीन झीलों के बेसिन की परिधीय लवणीय मृदा


📖 16.4 लवणता एवं क्षारीयता की उत्पत्ति के भू-वैज्ञानिक कारण

राजस्थान में लवण-प्रभावित मृदाओं का निर्माण केवल प्राकृतिक प्रक्रियाओं का परिणाम नहीं है, बल्कि मानव-जनित नहरी अविवेक भी इसके लिए उत्तरदायी है:

1. पुरा-भौगोलिक अवशेष (टेथिस सागर)

  • पश्चिमी राजस्थान भू-गर्भिक दृष्टि से टेथिस भूसन्नति का भाग रहा है।
  • अधोभूमि की चट्टानों में माइका-शिल्ट और समुद्री लवणों का प्राकृतिक निक्षेप मौजूद है। अपक्षय के दौरान ये लवण भू-जल और मृदा में घुलते रहते हैं।

2. शुष्क जलवायु एवं तीव्र केशिका क्रिया

  • पश्चिमी राजस्थान में औसत वार्षिक वर्षा मात्र 10-30 सेमी है, जबकि विभव वाष्पोत्सर्जन दर 200 सेमी से अधिक है।
  • अल्प वर्षा के कारण लवण नीचे की ओर निक्षालित नहीं हो पाते। ग्रीष्मकाल में धरातल अत्यधिक गर्म होने पर अधोभूमि की नमी केशिका नलिकाओं द्वारा सतह की ओर खिंचती है। जल वाष्पीकृत होकर उड़ जाता है और उसमें घुले लवण सतह पर सफेद पपड़ी के रूप में छूट जाते हैं।

3. नहरी कमान क्षेत्रों में 'सैम' की समस्या

पहलू विवरण
क्षेत्र इंदिरा गांधी नहर परियोजना (IGNP) के प्रथम व द्वितीय चरण - बड़ोपल, पीलीबंगा, रावतसर (हनुमानगढ़), अनूपगढ़ व सूरतगढ़
वैज्ञानिक कारण इन क्षेत्रों में सतह के नीचे 2-5 मीटर की गहराई पर जिप्सम एवं चूने की अभेद्य कंकड़ परत स्थित है
प्रक्रिया जब अत्यधिक सिंचाई की जाती है, तो अतिरिक्त पानी नीचे रिसने के बजाय इस कठोर परत पर रुक जाता है, जिससे भू-जल स्तर प्रतिवर्ष 0.5-1 मीटर ऊपर उठने लगता है। जल स्तर सतह के निकट आने पर लवणीय जल जमा हो जाता है और विस्तृत दलदली-लवणीय 'सैम' क्षेत्र बन जाता है

4. खारे एवं लवणीय भू-जल द्वारा निरंतर सिंचाई

  • पश्चिमी एवं मध्य राजस्थान (जोधपुर, नागौर, बाड़मेर, पाली, जालौर) के लगभग 60-70% नलकूपों एवं कुओं का जल लवणीय या क्षारीय है।
  • इस जल के बार-बार उपयोग से घुलनशील सोडियम आयन मृदा के क्ले कणों पर जमा हो जाते हैं, जिससे उपजाऊ खेत भी क्षारीय ऊसर में बदल जाते हैं।

5. कच्छ के रण की समुद्री हवाएँ एवं ज्वारीय प्रवाह

  • सांचौर, बाड़मेर और जालोर के सीमावर्ती क्षेत्र कच्छ के रण से जुड़े हैं। दक्षिण-पश्चिमी मानसूनी हवाएँ अपने साथ समुद्री लवण कणों को उड़ाकर लाती हैं और धरातल पर निक्षेपित करती हैं।


📖 16.5 जिलेवार स्थानिक वितरण

राजस्थान में लगभग 3.74 लाख हेक्टेयर भूमि लवणता एवं क्षारीयता से गंभीर रूप से ग्रस्त है:

जिला / संभाग प्रमुख प्रभावित तहसीलें एवं क्षेत्र लवणता का प्रकार मुख्य कारण
हनुमानगढ़ बड़ोपल (राज्य में सर्वाधिक सैम-ग्रस्त), पीलीबंगा, रावतसर, नोहर लवणीय-क्षारीय (सैम) IGNP नहरी जल रिसाव, नीचे जिप्सम हार्डपैन
श्रीगंगानगर सूरतगढ़, अनूपगढ़, रायसिंहनगर लवणीय घग्गर बाढ़ क्षेत्र एवं नहरी अति-सिंचाई
सांचौर एवं जालौर नेहड़ क्षेत्र, भीनमाल, बागोड़ा, रानीवाड़ा प्राकृतिक लवणीय (सोलोनचाक) कच्छ के रण की निकटता, लूनी नदी का मुहाना
बाड़मेर एवं बालोतरा पचपदरा बेसिन, बायतू, चौहटन, सिवाना लवणीय अंतःस्थलीय लवणीय जल, सोडियम लवण जमाव
नागौर व डीडवाना-कुचामन डीडवाना, कुचामन, नावां, लाडनूँ, रियांबड़ी लवणीय-क्षारीय खारी झीलें, खारा भू-जल, केशिका क्रिया
जयपुर एवं अजमेर सांभर झील बेसिन (फुलेरा, जोबनेर), किशनगढ़, रूपनगढ़ लवणीय अंतःप्रवाह नदियों द्वारा लवण निक्षेपण
पाली एवं जोधपुर ग्रामीण रोहट, सुमेरपुर, बिलाड़ा, बालेसर क्षारीय (सोडिक) लूनी व बांडी नदी कछार, रासायनिक रंगाई-छपाई अपशिष्ट
कोटा एवं बूँदी चंबल कमान क्षेत्र (केशोरायपाटन, लाडपुरा) क्षारीय (चोपन) भारी काली मिट्टी में जल निकासी का अभाव


📖 16.6 मृदा स्वास्थ्य एवं पादप क्रिया-विज्ञान पर दुष्प्रभाव

मृदा में लवणों एवं सोडियम के संकेंद्रण से उत्पन्न होने वाले जैविक संकट:

प्रभाव विवरण
शारीरिक शुष्कता मृदा जल का परासरण दाब पौधों के मूल रोमों के आंतरिक दाब से अधिक हो जाता है। मिट्टी में पानी उपस्थित होने के बावजूद पौधे उसे ग्रहण नहीं कर पाते और सूखने लगते हैं।
मृदा भौतिक संरचना का विनाश क्षारीय मृदा में सोडियम आयन मृदा के क्ले कणों को अलग-अलग कर देते हैं। मिट्टी की सरंध्रता शून्य हो जाती है, जिससे जड़ों को श्वसन हेतु ऑक्सीजन नहीं मिल पाती।
पोषक तत्वों का स्थिरीकरण उच्च pH (>8.5) पर पौधों हेतु आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व जैसे आयरन, जस्ता, मैंगनीज, ताँबा तथा फॉस्फोरस अघुलनशील यौगिकों में बदलकर निष्क्रिय हो जाते हैं।
नाइट्रीकरण में बाधा अत्यधिक लवणता से मृदा में उपस्थित लाभदायक नाइट्रीकारी जीवाणु नष्ट हो जाते हैं, जिससे नाइट्रोजन चक्र रुक जाता है।


📖 16.7 सुधार एवं पुनरुद्धार के वैज्ञानिक उपाय

A. लवणीय मृदा का सुधार — भौतिक विधियाँ

चूँकि लवणीय मृदा में उपस्थित लवण जल में घुलनशील होते हैं, अतः इनका सुधार बिना रसायनों के केवल जल प्रबंधन द्वारा किया जाता है:

विधि विवरण
खुरचना (Scraping) सतह पर जमी सफेद लवण की परत को यंत्रों द्वारा खुरचकर खेत से बाहर निकालना (अस्थायी उपाय)
निक्षालन (Leaching) खेत की मजबूत मेड़बंदी करके उसमें स्वच्छ मीठा पानी भर दिया जाता है। लवण पानी में घुलकर पौधों के जड़ क्षेत्र से नीचे चले जाते हैं
उप-सतही जल निकासी (Sub-surface Drainage - SSD) खेत की सतह से 1-1.5 मीटर नीचे छिद्रयुक्त कोरुगेटेड पीवीसी पाइपों का जाल बिछाया जाता है। अतिरिक्त लवणीय जल रिसकर चैनलों के माध्यम से बाहर निकल जाता है

B. क्षारीय/सोडिक मृदा का सुधार — रासायनिक सुधारक (Chemical Amendments)

क्षारीय मृदा से विनिमेय सोडियम (Na⁺) को हटाने के लिए द्विसंयोजी कैल्शियम (Ca²⁺) आयन प्रदान करने वाले रासायनिक सुधारकों का उपयोग अनिवार्य है:

[क्षारीय मृदा: क्ले पर अधिशोषित Na⁺] + [जिप्सम: CaSO₄·2H₂O]
                         │
                         ▼ (आयन विनिमय अभिक्रिया)
[सुधरी हुई मृदा: क्ले पर अधिशोषित Ca²⁺] + [सोडियम सल्फेट: Na₂SO₄ (घुलनशील लवण)]
                         │
                         ▼ (सिंचाई जल द्वारा निक्षालन / जल निकासी)
              [Na₂SO₄ खेत से बाहर बह जाता है]

1. जिप्सम (CaSO₄·2H₂O) का उपयोग — सर्वोत्तम एवं सर्वाधिक प्रचलित

  • क्रियाविधि: जिप्सम में उपस्थित कैल्शियम (Ca²⁺) मृदा कणों पर बैठे हानिकारक सोडियम (Na⁺) को विस्थापित कर स्वयं जुड़ जाता है। विस्थापित सोडियम जल-घुलनशील सोडियम सल्फेट (Na₂SO₄) बनाता है, जो निक्षालन द्वारा बह जाता है:

$$2Na\text{-Clay} + CaSO_4 \rightleftharpoons Ca\text{-Clay} + Na_2SO_4 \downarrow$$

  • राजस्थान सरकार क्षारीय भूमि सुधार हेतु किसानों को जिप्सम पर भारी अनुदान (सब्सिडी) प्रदान करती है।

2. आयरन पाइराइट्स (FeS₂) का उपयोग

  • उपयुक्तता: उन क्षारीय मृदाओं में जहाँ चूना पत्थर (CaCO₃) पहले से प्राकृतिक रूप से विद्यमान हो।
  • क्रियाविधि: पाइराइट्स मृदा में वायु एवं जल से क्रिया करके सल्फ्यूरिक अम्ल (H₂SO₄) बनाता है, जो मृदा के अघुलनशील चूने को सक्रिय कैल्शियम में बदल देता है।

C. जैविक एवं सस्यीय प्रबंधन

प्रबंधन विधि विवरण
हरी खाद — ढैंचा का विशेष महत्व ढैंचा (Sesbania aculeata): यह क्षारीय भूमि सुधार हेतु रामबाण है। वैज्ञानिक कारण: ढैंचा का पादप रस अम्लीय (pH ≈ 4.0) होता है। हरी अवस्था में खेत में दबाने पर (हरी खाद), अपघटन के दौरान कार्बनिक अम्ल एवं प्रचुर कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) मुक्त होती है, जो मृदा के pH को तेजी से कम करती है
गोबर की खाद (FYM) एवं प्रेसमड चीनी मिलों का सह-उत्पाद 'प्रेसमड' सल्फेट्स एवं कार्बनिक अम्लों से भरपूर होता है, जो क्षारीयता को उदासीन करता है
जैव-जल निकासी (Bio-drainage) जलभराव एवं सैम प्रभावित क्षेत्रों (हनुमानगढ़-बड़ोपल) में अधिक जल अवशोषण करने वाले वृक्षों की कतारें लगाना: सफेदा (Eucalyptus tereticornis), विलायती बबूल (Prosopis juliflora), सुआंजना/कैजुराइना (Casuarina equisetifolia), झाऊ (Tamarix dioica)


📖 16.8 लवण-सहिष्णु फसलें एवं विशिष्ट किस्में

लवण-प्रभावित क्षेत्रों में सामान्य फसलों के स्थान पर लवण-प्रतिरोधी प्रजातियों का चयन किया जाता है:

सहिष्णुता स्तर फसल वर्ग प्रमुख फसलें एवं वृक्ष CSSRI द्वारा विकसित उन्नत किस्में
उच्च सहिष्णु खाद्यान्न, फल एवं चारा जौ, चुकंदर, ढैंचा, खजूर, अनार, बेर, आंवला, विलायती बबूल, सूडान घास • जौ: बिलारा-2, RD-2552, आजाद (K-125) • खजूर: हलावी, खदरावी
मध्यम सहिष्णु तिलहन, नकदी व अनाज सरसों, कपास, गेहूँ, बाजरा, रागी, पालक, ग्वार • गेहूँ: KRL-19, KRL-210, राज-3077 • सरसों: CS-52, CS-54, नरेंद्र राई
संवेदनशील / न्यून सहिष्णु दलहन एवं तिलहन चना, मूँग, उड़द, मटर, मसूर, सोयाबीन (दलहन लवणता के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं)


📖 16.9 संस्थागत प्रयास एवं विशिष्ट परियोजनाएँ

संस्थान/परियोजना विवरण
राजाड परियोजना क्रियान्वयन: चंबल कमान क्षेत्र (कोटा एवं बूँदी) सहयोग: कनाडा की अंतर्राष्ट्रीय विकास एजेंसी (CIDA) के वित्तीय एवं तकनीकी सहयोग से उद्देश्य: क्षारीयता, जलभराव और 'चोपन' मृदा की समस्या से निपटने हेतु बड़े पैमाने पर अधोभूमि जल निकासी प्रणाली स्थापित करना
केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान (CSSRI), करनाल यह संस्थान लवण प्रतिरोधी फसलों की किस्मों (KRL गेहूँ, CS सरसों) और लवणीय जल प्रबंधन तकनीकों का विकास करता है
केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (CAZRI), जोधपुर खारे भू-जल के सिंचाई में उपयोग, बायो-ड्रेनेज तथा शुष्क-लवणीय पारिस्थितिकी में खजूर व बेर की बागवानी पर शोध


📖 16.10 परीक्षा-उपयोगी मुख्य बिंदु

तथ्य विवरण
सुधार रसायनों का नियम क्षारीय मृदा (pH > 8.5) के सुधार हेतु → जिप्सम या पाइराइट्स। अम्लीय मृदा (pH < 6.0) के सुधार हेतु → चूनालवणीय मृदा (EC > 4) के सुधार हेतु → निक्षालन एवं जल निकासी
हरी खाद में सर्वश्रेष्ठ क्षारीय भूमि सुधार हेतु सर्वश्रेष्ठ हरी खाद ढैंचा है
सर्वाधिक लवण-सहिष्णु खाद्यान्न फसल सभी खाद्यान्नों में जौ लवणता के प्रति सर्वाधिक प्रतिरोधी फसल है
सैम की समस्या का केंद्र राज्य में सैम से सर्वाधिक प्रभावित गाँव बड़ोपल (हनुमानगढ़) है
नेहड़ पट्टी सांचौर जिले में स्थित 'नेहड़' क्षेत्र कच्छ के रण से जुड़ा एक विस्तृत प्राकृतिक लवणीय दलदली क्षेत्र है
सफेद ऊसर बनाम काली ऊसर श्वेत ऊसर = लवणीय मृदा (सोडियम क्लोराइड व सल्फेट की सफेद पपड़ी)। काली ऊसर = क्षारीय मृदा (सोडियम कार्बोनेट द्वारा ह्यूमस का विघटन, जिससे सतह काली/भूरी दिखती है)


परीक्षा पुनरावृत्ति

लवणीय मृदा: pH < 8.5, EC > 4.0 dS/m, ESP < 15%, सोलोनचाक, श्वेत ऊसर (NaCl, Na₂SO₄) -> क्षारीय मृदा: pH > 8.5, EC < 4.0 dS/m, ESP > 15%, सोलोनेत्ज, काली ऊसर (Na₂CO₃ द्वारा ह्यूमस विघटन) -> भू-वैज्ञानिक कारण: टेथिस सागर के अवशेष, शुष्क केशिका क्रिया, नहरी सेम समस्या (बड़ोपल, हनुमानगढ़) -> मृदा सुधार: क्षारीय मृदा हेतु जिप्सम ($CaSO_4 \cdot 2H_2O$) ($$2Na\text{-Clay} + CaSO_4 \rightleftharpoons Ca\text{-Clay} + Na_2SO_4 \downarrow$$), लवणीय मृदा हेतु निक्षालन (Leaching) एवं उप-सतही जल निकासी (SSD) -> हरी खाद: ढैंचा (Sesbania aculeata, अम्लीय रस pH ≈ 4.0) -> लवण-सहिष्णु फसलें: जौ (सर्वाधिक सहिष्णु खाद्यान्न), खाड़चिया-65 गेहूँ, चुकंदर -> संस्थान: राजाड परियोजना (RAJAD - चंबल कमान, कनाडा CIDA), CSSRI करनाल, CAZRI जोधपुर -> 16.10 तुलनात्मक अध्ययन

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