राजस्थान की मिट्टी की समस्याएँ एवं मृदा संरक्षण GK
भाग - 18: मिट्टी की समस्याएँ एवं मृदा संरक्षण#
विस्तृत विषय-सूची#
| खंड |
विषय |
परीक्षा में महत्व |
| 18.1 |
मृदा अवनयन: मूल संकल्पना एवं वर्गीकरण |
★★★★★ |
| 18.2 |
राजस्थान में मृदा अपरदन के प्रमुख प्रकार |
★★★★★ |
| 18.3 |
अवनालिका अपरदन एवं चंबल के बीहड़ |
★★★★★ |
| 18.4 |
मरुस्थलीकरण एवं 'मरुस्थल का मार्च' |
★★★★★ |
| 18.5 |
नहरी जलभराव एवं 'सैम' की समस्या |
★★★★★ |
| 18.6 |
औद्योगिक अपशिष्ट एवं रासायनिक मृदा प्रदूषण |
★★★★ |
| 18.7 |
मृदा संरक्षण की वैज्ञानिक विधियाँ |
★★★★★ |
| 18.8 |
प्रमुख सरकारी नीतियाँ एवं परियोजनाएँ |
★★★★ |
| 18.9 |
परीक्षा-उपयोगी मुख्य बिंदु |
★★★★★ |
📖 18.1 मृदा अवनयन: मूल संकल्पना एवं वर्गीकरण
मृदा अवनयन का तात्पर्य मिट्टी की भौतिक, रासायनिक और जैविक गुणवत्ता में होने वाले उस ह्रास से है, जिसके कारण उसकी प्राकृतिक उत्पादकता तथा पादप पोषण क्षमता घट जाती है।
| संकल्पना |
वैज्ञानिक परिभाषा |
राजस्थान के संदर्भ में स्थिति |
| मृदा अपरदन |
बाह्य भौतिक कारकों (पवन, जल, गुरुत्व) द्वारा मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत का कटकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित होना। |
इसे 'मृदा की रेंगती हुई मृत्यु' कहा जाता है। राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का एक बड़ा हिस्सा किसी न किसी रूप में अपरदन से प्रभावित है। |
| मरुस्थलीकरण |
शुष्क, अर्द्ध-शुष्क एवं उप-आर्द्र क्षेत्रों में जलवायुविक परिवर्तनों तथा अनियंत्रित मानवीय हस्तक्षेपों के कारण भूमि की जैविक उत्पादकता का समाप्त हो जाना। |
अरावली के विच्छिन्न अंतरालों के माध्यम से थार मरुस्थल का पूर्व की ओर प्रसार निरंतर जारी है। |
| जलभराव / 'सैम' |
अत्यधिक सिंचाई या रिसाव के कारण भू-जल स्तर का धरातल के अत्यंत निकट आ जाना, जिससे जड़ों में वायु-संचार अवरुद्ध हो जाता है। |
IGNP नहरी कमान क्षेत्र (हनुमानगढ़, गंगानगर) की प्रमुख पारिस्थितिकीय समस्या। |
| रासायनिक प्रदूषण |
औद्योगिक अपशिष्ट, रसायनों एवं खारे जल के अनियंत्रित निकास से मिट्टी की उर्वरता का नष्ट होना। |
रंगाई-छपाई उद्योग (पाली, जोधपुर, बालोतरा) द्वारा नदियों के कछार में मृदा विषाक्तता। |
📖 18.2 राजस्थान में मृदा अपरदन के प्रमुख प्रकार
राजस्थान में मृदा अपरदन के दो मुख्य प्राकृतिक कारक हैं—वायु (पवन) तथा प्रवाही जल। राज्य के भू-आकृतिक स्वरूप के अनुसार इनका क्षेत्रीय प्रभाव भिन्न-भिन्न है:
[राजस्थान में मृदा अपरदन के मुख्य रूप]
│
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[1. वायु द्वारा अपरदन] [2. जल द्वारा अपरदन]
• राज्य में सर्वाधिक क्षेत्रफल पर प्रभावित • पूर्वी एवं दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान में प्रभावी
• मुख्य कारक: तेज ग्रीष्मकालीन हवाएँ / 'लू' ┌───────────────────┼───────────────────┐
• सर्वाधिक प्रभावित: जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर ▼ ▼ ▼
[अवनालिका अपरदन] [चादरी अपरदन] [रिल अपरदन]
• चंबल कछार/बीहड़ • अरावली ढलानों पर • मैदानी भागों में
• कोटा, धौलपुर • सिरोही, राजसमंद • जयपुर, अलवर
अपरदन के रूपों की तुलनात्मक तालिका#
| अपरदन का प्रकार |
प्रमुख प्रेरक कारक |
क्रियाविधि |
सर्वाधिक प्रभावित जिले |
प्रभाव |
| वायु अपरदन |
तीव्र पवनें (30-40 किमी/घंटा), वनस्पति का अभाव |
उच्छलन, निलंबन एवं सतह सर्पण द्वारा रेत कणों का विस्थापन |
जैसलमेर (शीर्ष), बाड़मेर, बीकानेर, फलौदी, चूरू |
उपजाऊ खेतों पर बालू के टीलों का जमाव; मरुस्थलीकरण में वृद्धि। |
| अवनालिका अपरदन |
भारी मानसूनी वर्षा, तीव्र ढाल, वनों की कटाई |
तेज जलधारा द्वारा सतह को काटकर गहरी नालियों का निर्माण |
सवाई माधोपुर, कोटा, धौलपुर, करौली |
बीहड़ व उत्खात भूमि का निर्माण; कृषि भूमि का विनाश। |
| चादरी अपरदन |
मूसलाधार वर्षा, पहाड़ी ढाल |
मिट्टी की सबसे उपजाऊ ऊपरी परत का चादर के रूप में बह जाना |
सिरोही (शीर्ष), राजसमंद, उदयपुर |
पोषक तत्वों और ह्यूमस का तीव्र क्षरण। |
| रिल अपरदन |
मध्यम वर्षा का सतही बहाव |
खेत में पतली अँगुलियों जैसी नालियाँ बनना |
जयपुर, अलवर, दौसा |
जुताई द्वारा अस्थायी रूप से समतल, किंतु अवनालिका में रूपांतरित। |
📖 18.3 अवनालिका अपरदन एवं चंबल के बीहड़
राजस्थान में जल अपरदन का सबसे विकराल रूप अवनालिका अपरदन है, जो मुख्य रूप से चंबल नदी एवं उसकी सहायक नदियों (कालीसिंध, पार्वती, बनास) के बेसिन में पाया जाता है:
[मूसलाधार वर्षा + तीव्र ढाल] ──> [मिट्टी में छोटी नालियाँ (Rills)]
│
▼
[गहरी खाइयों में रूपांतरण (Gullies: 5 से 30 मीटर गहरी)]
│
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[उत्खात भूमि / बीहड़ (Badland Topography)]
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[कृषि एवं मानव बसाव हेतु पूर्णतः अनुपयुक्त कंदरायुक्त क्षेत्र]
1. डांग एवं बीहड़ क्षेत्र#
| शब्द |
विवरण |
| बीहड़ |
चंबल नदी द्वारा मिट्टी के भीषण कटाव से निर्मित गहरी घाटियों, खाइयों और टीलों के संयुक्त संकुल को 'बीहड़' या 'उत्खात स्थलाकृति' कहते हैं। |
| डांग क्षेत्र |
बीहड़ प्रभावित पठारी व बीहड़ कंदराओं वाले क्षेत्र को स्थानीय भाषा में 'डांग' कहा जाता है। |
| डांग का राजा |
धौलपुर |
| डांग की रानी |
करौली |
| सर्वाधिक बीहड़ क्षेत्र वाला जिला |
सवाई माधोपुर (क्षेत्रफल के अनुपात में: धौलपुर) |
2. बीहड़ सुधार हेतु संचालित योजनाएँ#
| योजना |
विवरण |
| कंदरा सुधार कार्यक्रम |
1987-88 में केंद्र सरकार द्वारा राज्य के 8 जिलों (सवाई माधोपुर, धौलपुर, करौली, भरतपुर, कोटा, बूँदी, बारां, झालावाड़) में प्रारंभ। |
| डांग क्षेत्रीय विकास कार्यक्रम |
डांग क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक उत्थान एवं बीहड़ों के स्थिरीकरण हेतु राज्य सरकार द्वारा पुनर्गठित योजना। |
📖 18.4 मरुस्थलीकरण एवं 'मरुस्थल का मार्च'
1. 'मरुस्थल का मार्च' की संकल्पना#
| पहलू |
विवरण |
| परिभाषा |
थार मरुस्थल का अपने मूल स्थान (पश्चिमी राजस्थान) से आगे बढ़कर उत्तर-पूर्व दिशा की ओर (हरियाणा, पंजाब, दिल्ली एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश) गतिशील होना 'मरुस्थल का मार्च' कहलाता है। |
| प्रसार की दिशा |
दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व (मानसूनी पवनों की सामान्य संचरण दिशा के अनुसार)। |
2. अरावली के विच्छिन्न अंतराल — मरुस्थल के प्रवेश द्वार#
[पश्चिमी मरुस्थल] ──(तीव्र पश्चिमी हवाएँ)──> [अरावली के 12 अंतराल] ──> [पूर्वी उपजाऊ मैदान]
• पुष्कर गैप (अजमेर)
• सांभर गैप (जयपुर)
• खेतड़ी-सिंघाना गैप
- अरावली पर्वतमाला मरुस्थल के प्रसार को रोकने वाली प्राकृतिक दीवार है। किंतु अनियंत्रित खनन, अवैज्ञानिक निर्माण और वनों की अंधाधुंध कटाई से अरावली शृंखला में लगभग 12 प्रमुख संवेदनशील अंतराल बन चुके हैं।
- इन अंतरालों से होकर ग्रीष्मकाल में चलने वाली धूल भरी आँधियाँ रेत को पूर्वी मैदानों (जयपुर, दौसा, अलवर) में निक्षेपित कर रही हैं।
📖 18.5 नहरी जलभराव एवं 'सैम' की समस्या
इंदिरा गांधी नहर परियोजना (IGNP) के आगमन से पश्चिमी राजस्थान में जहाँ हरित क्रांति आई, वहीं दूसरी ओर इसने एक गंभीर पारिस्थितिकीय आपदा को जन्म दिया जिसे स्थानीय भाषा में 'सैम' कहा जाता है:
[IGNP की कच्ची नहरों से जल रिसाव + अत्यधिक सिंचाई]
│
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[जल का भू-गर्भ में नीचे की ओर रिसाव]
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[अधोभूमि में 2-5 मीटर नीचे जिप्सम / कंकड़ की अभेद्य परत]
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[जल का नीचे न रिस पाना ──> भू-जल स्तर का प्रतिवर्ष ऊपर उठना]
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[सतह का दलदली बनना + केशिका क्रिया द्वारा लवणों का ऊपर आना]
│
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[कृषि योग्य भूमि का स्थायी ऊसर बनना / 'सैम']
'सैम' से जुड़े प्रमुख तथ्य#
| बिंदु |
विवरण |
| सर्वाधिक प्रभावित गाँव |
बड़ोपल (हनुमानगढ़) — यह गाँव सैम की समस्या का राज्य में सबसे बड़ा केंद्र है। |
| अन्य प्रभावित क्षेत्र |
पीलीबंगा, रावतसर (हनुमानगढ़); सूरतगढ़, अनूपगढ़ (श्रीगंगानगर); नाचना (जैसलमेर)। |
| डच परियोजना |
नीदरलैंड सरकार के तकनीकी एवं वित्तीय सहयोग से हनुमानगढ़ के बड़ोपल क्षेत्र में जल निकासी हेतु संचालित परियोजना। |
| बायो-ड्रेनेज |
सैम प्रभावित क्षेत्रों में अत्यधिक जल सोखने वाले सफेदा के वृक्षों की कतारें लगाकर भू-जल स्तर को नीचे लाना। |
📖 18.6 औद्योगिक अपशिष्ट एवं रासायनिक मृदा प्रदूषण
राजस्थान के औद्योगिक केंद्रों में अपशिष्ट जल के उचित उपचार के अभाव ने कृषि भूमि को विषाक्त बना दिया है:
| उद्योग |
स्थान |
प्रभाव |
| रंगाई-छपाई उद्योग |
पाली (बांडी नदी बेसिन) |
कपड़ा मिलों से निकलने वाले सोडियम सल्फेट, कास्टिक सोडा और भारी धातुओं युक्त रासायनिक पानी ने निकटवर्ती कुओं और खेतों की मिट्टी को स्थायी रूप से बंजर बना दिया है। |
|
जोधपुर (जोजरी नदी बेसिन) |
औद्योगिक अपशिष्ट से भूमिगत जल एवं मृदा क्षारीय हो चुकी है। |
|
बालोतरा (लूनी नदी बेसिन) |
लूनी नदी का कछार औद्योगिक जल से प्रदूषित। |
|
भीलवाड़ा (बेड़च एवं कोठारी बेसिन) |
टेक्सटाइल प्रोसेसिंग से मिट्टी की लवणता में वृद्धि। |
📖 18.7 मृदा संरक्षण की वैज्ञानिक विधियाँ
मृदा अपरदन और अवनयन को रोकने हेतु तीन प्रमुख स्तरों पर उपाय किए जाते हैं:
[मृदा संरक्षण के त्रिविमीय उपाय]
│
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[1. सस्यीय / जैविक उपाय] [2. यांत्रिक / अभियांत्रिकी] [3. वानस्पतिक / वन संवर्धन]
• समोच्च जुताई • समोच्च मेड़बंदी • वायुरोधी पट्टियाँ
• पट्टीदार खेती • चेकडैम / गेबियन • बालुका स्तूप स्थिरीकरण
• पलवार / मल्चिंग • जल निकास नालियाँ • 'ग्रीन वॉल ऑफ अरावली'
1. सस्यीय एवं जैविक विधियाँ#
| विधि |
विवरण |
| समोच्च जुताई |
ढाल के विपरीत आड़ी जुताई करना, जिससे प्रत्येक कूंड एक छोटे बाँध की तरह कार्य कर पानी के बहाव को धीमा करता है। |
| पट्टीदार खेती |
कटाव को बढ़ावा देने वाली फसलों (जैसे मक्का, बाजरा) के बीच अपरदन-रोधी फसलों (जैसे चना, मूँग, उड़द) की पट्टियाँ उगाना। |
| मल्चिंग / पलवार |
फसल के अवशेषों, सूखी घास या प्लास्टिक फिल्म से खेत की नग्न सतह को ढकना। |
| फसल चक्र |
भूमि की उर्वरता बनाए रखने हेतु गहरी जड़ वाली और उथली जड़ वाली फसलों को बारी-बारी से बोना। |
2. यांत्रिक एवं इंजीनियरिंग विधियाँ#
| विधि |
विवरण |
| समोच्च मेड़बंदी |
पहाड़ी ढलानों पर निश्चित दूरी पर ढाल के लंबवत मिट्टी की मजबूत मेड़ें बनाना। |
| सीढ़ीदार खेत |
अरावली के खड़े ढलानों को काटकर समतल सीढ़ियों का निर्माण करना। |
| चेकडैम एवं गेबियन |
अवनालिकाओं के मुहाने पर पत्थरों, कंक्रीट या लोहे के तारों की जाली में पत्थर भरकर छोटे अवरोधक बाँध बनाना। |
3. वानस्पतिक एवं शुष्क वन संवर्धन उपाय#
| विधि |
विवरण |
| वायुरोधी पट्टियाँ |
पश्चिमी राजस्थान में हवा की दिशा के समकोण पर बहु-स्तरीय वृक्षों और झाड़ियों की कतारें लगाना। उपयुक्त प्रजातियाँ: खेजड़ी, रोहिड़ा, विलायती बबूल, सूडान घास। |
| बालुका स्तूप स्थिरीकरण |
गतिशील रेत के धोरों पर सूखने वाली झाड़ियों (जैसे फोग, कैर) से शतरंज के आकार में बाड़बंदी करना और उस पर सेवण घास तथा कुमुट के बीज छिड़कना। |
📖 18.8 प्रमुख सरकारी नीतियाँ एवं परियोजनाएँ
1. अनुसंधान एवं तकनीकी संस्थान#
| संस्थान |
स्थापना |
कार्य |
| काजरी (CAZRI), जोधपुर |
1959 (1952 में स्थापित 'मरु वनीकरण एवं मृदा संरक्षण स्टेशन' का पुनर्गठन) |
मरुस्थलीकरण पर नियंत्रण, बालुका स्तूप स्थिरीकरण, शुष्क बागवानी एवं चारागाह प्रबंधन। |
| आफरी (AFRI), जोधपुर |
1987 (पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के अधीन) |
शुष्क एवं अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में वानिकी अनुसंधान एवं ईको-रेस्टोरेशन। |
2. विशिष्ट संरक्षण परियोजनाएँ#
| परियोजना |
विवरण |
| ग्रीन वॉल ऑफ अरावली |
अफ्रीका की 'ग्रेट ग्रीन वॉल' की तर्ज पर गुजरात के पोरबंदर से दिल्ली तक अरावली पर्वतमाला के दोनों ओर 5 किमी चौड़ी हरित पट्टी विकसित करना। |
| राजस्थान बंजर भूमि एवं चारागाह विकास बोर्ड |
राज्य की लगभग एक-तिहाई अकृष्य/बंजर भूमि को चारागाहों (गोचर एवं ओरण) में परिवर्तित करने हेतु नोडल संस्था। |
| राजाड परियोजना |
चंबल कमान क्षेत्र में जल निकासी द्वारा क्षारीयता व जलभराव सुधार की बहुउद्देश्यीय परियोजना। |
📖 18.9 परीक्षा-उपयोगी मुख्य बिंदु
| तथ्य |
विवरण |
| मृदा की रेंगती हुई मृत्यु |
मृदा अपरदन को किसानों की मूक एवं रेंगती हुई मृत्यु कहा जाता है। |
| सर्वाधिक अपरदन का स्वरूप |
राजस्थान में क्षेत्रफल के आधार पर सर्वाधिक अपरदन वायु द्वारा होता है। |
| सर्वाधिक जल अपरदन |
चंबल नदी द्वारा अवनालिका अपरदन सर्वाधिक होता है। |
| चादरी अपरदन का शीर्ष जिला |
सिरोही (अरावली के खड़े ढलानों के कारण)। |
| सैम का केंद्र |
बड़ोपल गाँव (हनुमानगढ़); समाधान हेतु प्रयुक्त वृक्ष: सफेदा। |
| डांग की रानी बनाम राजा |
डांग की रानी = करौली। डांग का राजा = धौलपुर। |
| काजरी (CAZRI) का मुख्यालय |
जोधपुर (स्थापना वर्ष: 1959)। |
| ओरण |
राजस्थान के ग्रामीण अंचलों में लोक देवताओं के नाम पर छोड़े गए वे पवित्र वन/चारागाह जहाँ पेड़ काटना सामाजिक व धार्मिक रूप से वर्जित होता है। |
परीक्षा पुनरावृत्ति#
मृदा की रेंगती हुई मृत्यु: मृदा अपरदन -> प्रमुख प्राकृतिक कारक: वायु (पश्चिमी राजस्थान, सर्वाधिक क्षेत्रफल - जैसलमेर) एवं जल (पूर्वी/दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान) -> जल अपरदन के रूप: अवनालिका अपरदन (चंबल बेसिन, सवाई माधोपुर, कोटा, धौलपुर, करौली), चादरी अपरदन (अरावली ढलान - सिरोही), रिल अपरदन (मैदान) -> डांग क्षेत्र: उत्खात स्थलाकृति / बीहड़; डांग का राजा = धौलपुर, डांग की रानी = करौली -> मरुस्थल का मार्च: अरावली के 12 अंतरालों (पुष्कर, सांभर) से दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व प्रसार -> सैम (जलभराव): IGNP कमान, अधोभूमि में जिप्सम हार्डपैन, बड़ोपल गाँव (हनुमानगढ़), इंडो-डच परियोजना, सफेदा द्वारा बायो-ड्रेनेज -> औद्योगिक मृदा प्रदूषण: बांडी नदी (पाली), जोजरी (जोधपुर), लूनी (बालोतरा) में रंगाई-छपाई उद्योग -> संरक्षण उपाय: समोच्च जुताई, पट्टीदार खेती, पलवार/मल्चिंग, समोच्च मेड़बंदी, चेकडैम व गेबियन, वायुरोधी पट्टियाँ, बालुका स्तूप स्थिरीकरण (सेवण घास), ग्रीन वॉल ऑफ अरावली (पोरबंदर से दिल्ली, 5 किमी चौड़ी), ओरण (पवित्र वन) -> संस्थान: काजरी (CAZRI 1959), आफरी (AFRI 1987) -> 18.9 परीक्षा-उपयोगी बिंदु
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