राजस्थान की प्राकृतिक वनस्पति एवं वन संसाधन (Natural Vegetation and Forest Resources of Rajasthan)


1. भारतीय वन स्थिति रिपोर्ट (ISFR 2021) एवं वन सांख्यिकी

1.1 विधिवत वन आवरण एवं वृक्षावरण के आधिकारिक आँकड़े

भारतीय वन सर्वेक्षण (Forest Survey of India - FSI, देहरादून) द्वारा द्विवार्षिक आधार पर जारी की जाने वाली **17वीं भारतीय वन स्थिति रिपोर्ट (ISFR 2021)** के अनुसार राजस्थान के वन संसाधनों की आधिकारिक स्थिति निम्न प्रकार है:
घटक (Component) क्षेत्रफल (वर्ग किमी) राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का %
अभिलेखित वन क्षेत्र (Recorded Forest Area - RFA) 32,864.62 9.60%
वनावरण (Forest Cover) 16,654.96 4.87%
वृक्षावरण (Tree Cover) 8,733.00 2.55%
कुल हरित आवरण (Forest + Tree Cover) 25,387.96 7.42%
प्रति व्यक्ति वन क्षेत्र (Per Capita Forest Area) 0.03 हेक्टेयर राष्ट्रीय औसत (0.08 हे.) से अत्यधिक कम

वनावरण का कैनोपी घनत्व के आधार पर वर्गीकरण (Canopy Density Classes):

1. **अत्यधिक सघन वन (Very Dense Forest - VDF):** - कैनोपी घनत्व (वृक्ष छत्र घनत्व): **70% या अधिक**। - क्षेत्रफल: मात्र **78.15 वर्ग किमी (0.02%)**। - मुख्य जिले: अलवर, जयपुर, सिरोही। 2. **मध्यम सघन वन (Moderately Dense Forest - MDF):** - कैनोपी घनत्व: **40% से 70%** के मध्य। - क्षेत्रफल: **4,368.65 वर्ग किमी (1.28%)**। - मुख्य जिले: उदयपुर, प्रतापगढ़, सिरोही, करौली। 3. **खुले वन (Open Forest - OF):** - कैनोपी घनत्व: **10% से 40%** के मध्य। - क्षेत्रफल: **12,208.16 वर्ग किमी (3.57%)** (राज्य के वनावरण का सबसे बड़ा भाग)। 4. **झाड़ीदार वन (Scrub Forest):** - कैनोपी घनत्व: **10% से कम** (तकनीकी रूप से वनावरण में शामिल नहीं)। - क्षेत्रफल: **4,808.51 वर्ग किमी (1.40%)**।

1.2 जिलेवार वनावरण सांख्यिकी (District-Wise Forest Extremes)

क्षेत्रफल की दृष्टि से (Area-wise):

- **सर्वाधिक वनावरण वाले शीर्ष 4 जिले:** 1. **उदयपुर:** 2,753.39 वर्ग किमी (प्रथम स्थान) 2. **अलवर:** 1,195.91 वर्ग किमी 3. **प्रतापगढ़:** 1,033.77 वर्ग किमी 4. **बारां:** 1,010.42 वर्ग किमी - **न्यूनतम वनावरण वाले 4 जिले:** 1. **चूरू:** मात्र 77.69 वर्ग किमी (सबसे कम) 2. **हनुमानगढ़:** 89.69 वर्ग किमी 3. **जोधपुर:** 109.25 वर्ग किमी 4. **गंगानगर:** 113.25 वर्ग किमी

प्रतिशत की दृष्टि से (% of Geographical Area):

- **सर्वाधिक वनावरण प्रतिशत वाले शीर्ष 4 जिले:** 1. **उदयपुर:** 23.49% 2. **प्रतापगढ़:** 23.24% 3. **सिरोही:** 17.49% 4. **करौली:** 15.28% - **न्यूनतम वनावरण प्रतिशत वाले 4 जिले:** 1. **जोधपुर:** 0.48% (सबसे कम प्रतिशत) 2. **चूरू:** 0.56% 3. **जैसलमेर:** 0.84% 4. **बीकानेर:** 0.92%

राजस्थान वन अधिनियम, 1953 (Rajasthan Forest Act, 1953) के अंतर्गत राज्य के 32,864.62 वर्ग किमी अभिलेखित वन क्षेत्र को तीन विधिक श्रेणियों में विभाजित किया गया है:

विधिक श्रेणी (Legal Category) कुल क्षेत्रफल (वर्ग किमी) RFA का प्रतिशत विधिक स्थिति एवं प्रतिबंध
1. आरक्षित वन (Reserved Forests) 12,176.24 37.05% पूर्णतः सुरक्षित; सरकारी अनुमति के बिना लकड़ी काटना, चराई कराना या प्रवेश करना पूर्णतः गैर-कानूनी और दंडनीय अपराध है। राज्य सरकार का पूर्ण एकाधिकार होता है।
2. संरक्षित वन (Protected Forests) 18,543.22 56.49% सर्वाधिक विस्तृत श्रेणी; सरकार की पूर्व अनुमति व नियंत्रण के तहत स्थानीय निवासियों को सीमित चराई तथा सूखी लकड़ी बीनने के पारंपरिक अधिकार दिए जाते हैं।
3. अवर्गीकृत वन (Unclassed Forests) 2,145.16 6.46% शेष वन क्षेत्र; इस पर सरकारी नियंत्रण अपेक्षाकृत शिथिल होता है; सरकार निर्धारित शुल्क (Royalty) लेकर पशु चराने व लकड़ी काटने की अनुमति देती है।

3. राजस्थान में वनों का भौगोलिक एवं जलवायुविक वर्गीकरण (Forest Types of Rajasthan)

एच. जी. चैंपियन एवं एस. के. सेठ (Champion & Seth, 1968) के वन वर्गीकरण के अनुसार राजस्थान में 5 प्रमुख वन प्रकार पाए जाते हैं:

3.1 शुष्क धोक वन (Dry Dhok Forests - Anogeissus pendula)

- **विस्तार प्रतिशत:** राज्य के कुल वनों का लगभग **58% भाग** (राजस्थान में सर्वाधिक पाया जाने वाला वन प्रकार)। - **भौगोलिक क्षेत्र:** अरावली पर्वतमाला के ढलानों एवं पूर्वी मैदानों—सवाई माधोपुर, करौली, अलवर, बूंदी, चित्तौड़गढ़, जयपुर, राजसमंद। - **औसत वर्षा:** 50 से 80 सेमी। - **प्रमुख वनस्पति:** **धोक या धोकड़ा (Anogeissus pendula)** प्रमुख वृक्ष है। इसकी लकड़ी मजबूत होती है और इसका कोयला सर्वोच्च गुणवत्ता का माना जाता है। सहायक वृक्ष: अरूंज, खैरी, तेंदू।

3.2 शुष्क सागवान वन (Dry Teak Forests - Tectona grandis)

- **विस्तार प्रतिशत:** राज्य के कुल वनों का लगभग **6.87% भाग**। - **भौगोलिक क्षेत्र:** दक्षिणी राजस्थान—**बांसवाड़ा (सर्वाधिक)**, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, उदयपुर (झाड़ोल/कोटड़ा), झालावाड़, कोटा, बारां। - **औसत वर्षा:** 75 से 110 सेमी (उच्च वर्षा वाले क्षेत्र)। - **ऊंचाई सीमा:** समुद्र तल से 250 से 450 मीटर। - **प्रमुख वनस्पति:** **सागवान (Teak - Tectona grandis)**। सागवान अत्यधिक पाले (Frost) को सहन नहीं कर सकता, इसलिए केवल दक्षिणी राजस्थान में फलता-फूलता है। सहायक वृक्ष: तेंदू, धावड़ा, महुआ, बहेड़ा, बांस।

3.3 मिश्रित पर्णपाती वन (Mixed Deciduous Forests)

- **विस्तार प्रतिशत:** लगभग **28.38% भाग**। - **भौगोलिक क्षेत्र:** उदयपुर, चित्तौड़गढ़, सिरोही, राजसमंद, भीलवाड़ा, अलवर, करौली। - **औसत वर्षा:** 60 से 90 सेमी। - **प्रमुख वनस्पति:** सालर (Boswellia serrata - गोंद व पैकिंग पेटियों हेतु), ढाक/पलाश (Butea monosperma), सफेद धावड़ा, खैरी, बहेड़ा, जामुन।

3.4 उप-उष्णकटिबंधीय सदाबहार पर्वतीय वन (Sub-Tropical Broad-Leaved Hill Forests)

- **विस्तार प्रतिशत:** मात्र **0.5% से भी कम (लगभग 32 वर्ग किमी)**। - **भौगोलिक क्षेत्र:** केवल **माउंट आबू (सिरोही)** में समुद्र तल से 1,200 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में। - **औसत वर्षा:** 150 सेमी से अधिक (राज्य का सर्वाधिक वर्षा वाला क्षेत्र)। - **प्रमुख वनस्पति:** आम (Mangifera indica), जामुन, बांस, अंबरवात (Carissa carandas), कारा (Strobilanthes callosus), डिकिल्पटेरा आबूएंसिस (स्थानीय दुर्लभ वनस्पति)।

3.5 उष्णकटिबंधीय कंटीले मरुस्थलीय वन (Tropical Thorn / Scrub Forests)

- **विस्तार प्रतिशत:** लगभग **6.26% भाग**। - **भौगोलिक क्षेत्र:** पश्चिमी शुष्क राजस्थान—जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, जोधपुर, नागौर, जालौर, चूरू, सीकर। - **औसत वर्षा:** 25 सेमी से कम। - **अनुकूलन (Xerophytic Adaptation):** पत्तियाँ छोटी या कांटों में रूपांतरित, छाल मोटी, तना गूदेदार और जड़ें जल की खोज में अत्यधिक गहरी। - **प्रमुख वनस्पति:** खेजड़ी (Prosopis cineraria), रोहिड़ा (Tecomella undulata), बेर (Ziziphus mauritiana), कैर (Capparis decidua), फोग (Calligonum polygonoides), थूर (Euphorbia), बबूल (Acacia nilotica)।

4. राजस्थान के राज्य वृक्ष एवं राज्य पुष्प का संपूर्ण वैज्ञानिक विवरण

4.1 खेजड़ी (Prosopis cineraria) - 'राजस्थान का कल्पवृक्ष'

- **राज्य वृक्ष का दर्जा:** **31 अक्टूबर 1983** को राज्य वृक्ष घोषित। - **वैज्ञानिक नाम:** *Prosopis cineraria* - **पारंपरिक उपनाम:** राजस्थान का कल्पवृक्ष, मरुस्थल का गौरव, थार का कल्पतरु, समी (वैदिक नाम), जांटी (स्थानीय राजस्थानी), पेमे (तमिल), छोंकड़ा (ब्रज), बन्ना-बन्नी (कन्नड़)। - **धार्मिक महत्व:** विजयादशमी (दशहरा) के पर्व पर खेजड़ी की विशेष पूजा की जाती है। गोगाजी, पाबूजी, झुंझारजी आदि लोक देवताओं के थान प्रायः खेजड़ी के नीचे होते हैं। - **उपयोगिता:** - **सांगरी (Sangari):** खेजड़ी की हरी फली, जिसे सुखाकर 'पंचकूटा' की विश्वप्रसिद्ध सब्जी बनाई जाती है। - **खोखा (Khokha):** पकने के बाद सूखी सांगरी को खोखा कहा जाता है (प्राकृतिक मीठा फल)। - **लूम / लूँग (Loom / Loong):** खेजड़ी की हरी पत्तियों का सूखा चारा, जो ऊंटों, बकरियों और भेड़ों के लिए पौष्टिकता से भरपूर होता है। - **रोग एवं संकट:** 'सेलोस्ट्रेना' (Celostrena) नामक कीड़ा तथा 'ग्लाइकोट्रोमा' (Glycotroma) नामक कवक द्वारा खेजड़ी के वृक्षों में क्षरण। - **ऑपरेशन खेजड़ा:** खेजड़ी के संरक्षण हेतु 1991 में राज्य सरकार द्वारा प्रारंभ किया गया विशेष अभियान। - **डाक टिकट:** 5 जून 1988 को विश्व पर्यावरण दिवस पर खेजड़ी पर 60 पैसे का डाक टिकट जारी किया गया।

4.2 रोहिड़ा (Tecomella undulata) - 'मरुस्थल का सागवान'

- **राज्य पुष्प का दर्जा:** **31 अक्टूबर 1983** को राज्य पुष्प घोषित। - **वैज्ञानिक नाम:** *Tecomella undulata* - **पारंपरिक उपनाम:** मरुस्थल का सागवान (Teak of Marwar), राजस्थान की मरुशोभा (Glory of Desert), रेगिस्तान का गुलाब। - **पुष्प खिलने का समय:** चैत्र मास (मार्च-अप्रैल); इसके फूल गहरे नारंगी, पीले और लाल रंग के होते हैं। - **लकड़ी की विशेषता:** इसकी लकड़ी बहुत हल्की, टिकाऊ और दीमक-प्रतिरोधी होती है, जिसका उपयोग बंदूक की बट, कलात्मक खिलौने और नक्काशीदार फर्नीचर बनाने में होता है। - **संकट:** 'टिकोमा स्टैन' (Tecoma stans) और जरबिल चूहे द्वारा इसकी जड़ों को नुकसान।

5. लघु वनोपज एवं आर्थिक वानिकी (Minor Forest Produce - NTFP)

राजस्थान के वन आदिवासी समाज की आजीविका का मुख्य आधार हैं:

लघु वनोपज (Forest Produce) संबंधित वृक्ष / वनस्पति प्रमुख उत्पादक जिले आर्थिक उपयोग एवं राज्य नीति
तेंदू पत्ता (Tendu Leaves) तेंदू (Diospyros melanoxylon) / स्थानीय नाम 'टिमरू' उदयपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, झालावाड़, चित्तौड़गढ़ बीड़ी निर्माण हेतु कच्चा माल। राजस्थान सरकार द्वारा 1974 में तेंदू पत्ता व्यापार का राष्ट्रीयकरण किया गया। टिमरू फल को 'वागड़ का चीकू' कहा जाता है।
कत्था (Katha) खैर (Acacia catechu) उदयपुर, चित्तौड़गढ़, झालावाड़, बारां कथोड़ी जनजाति (Kathodi Tribe) द्वारा पारंपरिक हांडी प्रणाली (Handi Method) से खैर वृक्ष की छाल से कत्था तैयार किया जाता है।
गोंद (Gum) कुमट, सालर, खाखरा, बबूल चौहटन (बाड़मेर) - 'गोंद उत्पादन की राजधानी'; सवाई माधोपुर, करौली चौहटन का 'गोंद कतीरा' विश्व प्रसिद्ध है। सालर का गोंद दवाइयों व अगरबत्ती में, कुमट का खाने में उपयोग होता है।
खस घास (Khas Grass) खस (Vetiveria zizanioides) भरतपुर, सवाई माधोपुर, टोंक इसकी सुगंधित जड़ों से इत्र (Perfume), शरबत और कूलरों के पर्दे (खस की टट्टियां) बनाए जाते हैं।
महुआ (Mahua) महुआ (Madhuca indica) / 'आदिवासियों का कल्पवृक्ष' सिरोही, उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ आदिवासियों द्वारा इसके फूलों से 'महुड़ी' (पारंपरिक देशी मदिरा) तैयार की जाती है। बीज (डोलमा) से तेल निकाला जाता है।
पलाश / ढाक (Flame of Forest) पलाश (Butea monosperma) राजसमंद, चित्तौड़गढ़, उदयपुर बसंत ऋतु में इसके लाल-केसरिया फूलों के कारण इसे "जंगल की ज्वाला" कहा जाता है। पत्तों से पत्तल-दोने तथा फूलों से प्राकृतिक गुलाल/रंग।
बांस (Bamboo) बांस (Dendrocalamus strictus) / 'हरा सोना' बांसवाड़ा (बांसों की अधिकता), उदयपुर, सिरोही आदिवासियों का "हरा सोना"। टोकरी निर्माण, झोपड़ी और हस्तशिल्प। भारतीय वन संशोधन अधिनियम 2017 द्वारा गैर-वन भूमि पर बांस को वृक्ष की परिभाषा से मुक्त कर दिया गया।

6. राजस्थान की प्रमुख घासें (Nutritious Grasses of Thar)

  1. सेवण घास (Lasiurus scindicus):
    • क्षेत्र: पश्चिमी राजस्थान, विशेष रूप से जैसलमेर के पोकरण से मोहनगढ़ तक विस्तृत 60 किमी लंबी भूगर्भीय जल-पट्टी 'लाठी सीरीज' (Lathi Series) में।
    • विशेषता: प्रोटीन से भरपूर (10-12% प्रोटीन), अत्यधिक पौष्टिक बारहमासी घास। मरुस्थलीय पशुओं (गाय, भेड़) के लिए दुग्धवर्धक।
    • स्थानीय बोली में इसके सूखे रूप को 'लीलण' (Leelan) कहा जाता है। यह गोडावण (Great Indian Bustard) की मुख्य प्रजनन स्थली और शरणगाह है।
  2. धामण घास (Cenchrus ciliaris):
    • दुधारू गायों के लिए अत्यधिक सुपाच्य पौष्टिक घास।
  3. करण / करड़ घास (Dichanthium annulatum):
    • शुष्क व अर्द्ध-शुष्क चरागाहों की उत्तम चारा घास।
  4. अंजन घास (Cenchrus setigerus):
    • बाड़मेर व जोधपुर के रेतीले टीलों पर मृदा अपरदन रोकने वाली मजबूत जड़ों वाली घास।
  5. मोथिया घास (Cyperus rotundus):
    • ताल छापर अभयारण्य (चूरू) में उगने वाली कंदयुक्त मुलायम घास, जिसे काले हिरण (Blackbuck) बड़े चाव से खाते हैं।
  6. खस घास: भरतपुर, सवाई माधोपुर में इत्र और तेल हेतु।

7. वन संरक्षण के ऐतिहासिक आंदोलन एवं आधुनिक नीतियां

7.1 खेजड़ली बलिदान (Khejarli Massacre 1730 AD)

- **तिथि:** भाद्रपद शुक्ल दशमी, विक्रम संवत 1787 (**12 सितंबर 1730 ई.**)। - **स्थान:** खेजड़ली गाँव (जोधपुर)। - **ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:** जोधपुर के तत्कालीन महाराजा **अभय सिंह** ने मेहरानगढ़ दुर्ग में नए महलों के निर्माण हेतु चूने की भट्टियाँ पकाने के लिए खेजड़ी के हरे वृक्ष काटने का आदेश अपने दीवान **गिरधरदास भंडारी** को दिया। - **बलिदान:** विश्नोई समाज की वीरांगना **अमृता देवी विश्नोई (Amrita Devi Bishnoi)** के नेतृत्व में उनकी तीन पुत्रियों (आसू, रतनी, भागू) सहित कुल **363 विश्नोई स्त्री-पुरुषों** ने पेड़ों से लिपटकर (चिपको आंदोलन की ऐतिहासिक जननी) अपने प्राणों की आहुति दे दी। - **अमृता देवी का अमर उद्घोष:** > *"सिर साठे रूंख रहे, तो भी सस्तो जाण"* (यदि सिर कटने के बदले एक वृक्ष बच जाए, तो भी यह सौदा सस्ता है)। - **खेजड़ली मेला:** प्रतिवर्ष **भाद्रपद शुक्ल दशमी** को खेजड़ली में **विश्व का एकमात्र वृक्ष मेला** आयोजित होता है। - **अमृता देवी विश्नोई वन्यजीव संरक्षण पुरस्कार:** राजस्थान सरकार द्वारा **1994 में स्थापित**; वन्यजीव संरक्षण हेतु राज्य का सर्वोच्च पुरस्कार (संस्था को ₹1,00,000 तथा व्यक्ति को ₹50,000)। प्रथम पुरस्कार 1994 में **गंगाराम विश्नोई** (पाली) को मरणोपरांत दिया गया था।

7.2 राजस्थान की वन नीतियां (Forest Policies)

1. **राजस्थान राज्य वन नीति, 2010:** **18 फरवरी 2010** को अपनी स्वतंत्र वन नीति घोषित करने वाला राजस्थान **देश का पहला राज्य** बना। लक्ष्य: राज्य के 20% भूभाग को वनाच्छादित करना। 2. **नवीन राजस्थान राज्य वन नीति, 2023:** 5 जून 2023 को अनुमोदित। - **आगामी 20 वर्षों में राज्य के कुल हरित आवरण को 20% तक पहुंचाने का लक्ष्य**। - जलवायु परिवर्तन अनुकूलन, नगर वन योजना और आजीविका संवर्धन पर विशेष बल।