राजस्थान की मिट्टी — सामान्य परिचय GK

भाग - 14: राजस्थान की मिट्टी — सामान्य परिचय


विस्तृत विषय-सूची

खंड विषय परीक्षा में महत्व
14.1 मृदा विज्ञान: मूल संकल्पना एवं राजस्थान का संदर्भ ★★★★★
14.2 मृदा निर्माण को नियंत्रित करने वाले पंच-कारक ★★★★★
14.3 राजस्थान की मृदा का भौतिक एवं रासायनिक संघटन ★★★★★
14.4 मृदा कणों का आकार एवं गठन ★★★★
14.5 राजस्थान की मिट्टियों का सामान्य वर्गीकरण ★★★★★
14.6 मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना एवं राजस्थान ★★★★★
14.7 परीक्षा-उपयोगी मुख्य बिंदु ★★★★★
14.8 तुलनात्मक अध्ययन ★★★★

📖 14.1 मृदा विज्ञान: मूल संकल्पना एवं राजस्थान का संदर्भ

मृदा (Soil) भू-पर्पटी (Earth's Crust) की सबसे ऊपरी असंगठित एवं बारीक कणों वाली परत है, जो खनिज कणों, कार्बनिक पदार्थों (ह्यूमस), जल, वायु और सूक्ष्म जीवाणुओं के जटिल मिश्रण से निर्मित होती है।

संकल्पना / आयाम वैज्ञानिक परिभाषा राजस्थान के संदर्भ में स्थिति
मृदा (Soil) अपक्षयित चट्टानों एवं जैव पदार्थों का प्राकृतिक गतिकीय समुच्चय जो पादप वृद्धि का माध्यम बनता है। राज्य के कुल 3,42,239 वर्ग किमी क्षेत्रफल में जलवायु एवं मूल चट्टानों की विविधता के कारण अत्यधिक भिन्नता पाई जाती है।
मृदा निर्माण (Pedogenesis) भौतिक, रासायनिक एवं जैविक प्रक्रियाओं द्वारा चट्टानों के विखंडन से मिट्टी बनने की दीर्घकालिक प्रक्रिया। राज्य में वर्षा की कमी तथा उच्च तापमान के कारण भौतिक एवं यांत्रिक अपक्षय अत्यंत तीव्र है, जबकि रासायनिक अपक्षय गौण है।
मृदा परिच्छेदिका (Soil Profile) सतह से नीचे मूल चट्टान तक मृदा की ऊर्ध्वाधर काट जिसमें विभिन्न संस्तर (A, B, C) पाए जाते हैं। पश्चिमी राजस्थान की रेतीली मिट्टी में मृदा संस्तरों का विकास न्यूनतम (अविकसित) है, जबकि पूर्वी मैदान की जलोढ़ मृदा में संस्तर अपेक्षाकृत स्पष्ट हैं।
मृदा की प्रकृति पादप पोषक तत्वों एवं जल धारण क्षमता की स्थिति। राज्य की मिट्टी में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस तथा ह्यूमस की भारी कमी पाई जाती है, जबकि पोटैशियम एवं कैल्शियम पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं।


📖 14.2 मृदा निर्माण को नियंत्रित करने वाले पंच-कारक

रूसी वैज्ञानिक डोकुचाएव एवं हैंस जेनी के अनुसार मृदा निर्माण पाँच प्रमुख कारकों का फलन है:

$$S = f(cl, o, r, p, t)$$

(जहाँ cl = जलवायु, o = जैव मंडल/जीव, r = उच्चावच, p = पैतृक शैल, t = समय)

1. पैतृक शैल / मूल चट्टानें (p)

चट्टान का प्रकार क्षेत्र निर्मित मृदा
अरावली की प्राचीन शैलें (क्वार्ट्जाइट, शिस्ट, नीस, ग्रेनाइट) अरावली ढलान पथरीली, लाल-पीली व भूरी मृदा
दक्कन ट्रैप की बेसाल्ट शैलें हाड़ौती का पठार (कोटा, झालावाड़, बारां) काली चिकनी मृदा (रेगुर)
विंध्यन बलुआ पत्थर एवं चूना-पत्थर पश्चिमी व मध्य राजस्थान (जोधपुर, नागौर, जैसलमेर) क्वार्ट्ज-प्रधान रेतीली मृदा

2. जलवायु (cl)

  • शुष्क पश्चिमी भाग: वर्षा (10-30 सेमी) अत्यंत कम और तापमान (45°-50°C) बहुत अधिक। जल की अनुपस्थिति में रासायनिक अपघटन नहीं हो पाता, बल्कि तापीय प्रसार व संकुचन से चट्टानें टूटकर महीन बालू में बदल जाती हैं।
  • आर्द्र दक्षिणी-पूर्वी भाग: अधिक वर्षा के कारण निक्षालन और रासायनिक क्रियाएँ प्रभावी होती हैं।

3. स्थलाकृति एवं उच्चावच (r)

उच्चावच प्रकार प्रक्रिया मृदा प्रकार
तीव्र ढाल (अरावली) गुरुत्वाकर्षण एवं तेज बहाव से क्षरण उथली, पथरीली एवं अपरिपक्व (लिथोसोल्स)
मंद ढाल / मैदानी भाग बनास, बाणगंगा एवं चंबल बेसिन में अवसाद जमाव गहरी एवं उपजाऊ जलोढ़ मृदा

4. जैविक कारक एवं वनस्पति (o)

  • राजस्थान का वानस्पतिक आवरण अत्यंत विरल (कुल भौगोलिक क्षेत्र का मात्र लगभग 9.6%) है।
  • मरुस्थलीय क्षेत्रों में तीव्र सौर विकिरण और उच्च तापमान (>45°C) के कारण कार्बनिक पदार्थों का सूक्ष्मजीवों द्वारा तेजी से ऑक्सीकरण हो जाता है। परिणामस्वरूप, राज्य की अधिकांश मृदाओं में ह्यूमस की मात्रा 0.5% से भी कम पाई जाती है।

5. समय (t)

  • पश्चिमी राजस्थान की रेतीली मृदा पवन द्वारा निरंतर स्थानान्तरित होती रहती है, अतः यह भू-वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत नवीन, गतिशील एवं असंगठित (एंटीसोल्स) है।
  • इसके विपरीत, हाड़ौती की काली मिट्टी और अरावली की लाल मिट्टी लंबे समय के स्थलीय अपक्षय से निर्मित परिपक्व मृदाएँ हैं।


📖 14.3 राजस्थान की मृदा का भौतिक एवं रासायनिक संघटन

राजस्थान की मृदा का रासायनिक चरित्र देश के अन्य भागों से काफी भिन्न है:

रासायनिक घटक राजस्थान में उपलब्धता वैज्ञानिक कारण एवं प्रभाव
नाइट्रोजन (N) अत्यधिक न्यून वनस्पति एवं जीवांश के अभाव के कारण राज्य की 90% से अधिक मिट्टियों में नाइट्रोजन की भारी कमी है। यूरिया व हरी खाद का प्रयोग अनिवार्य होता है।
फॉस्फोरस (P) न्यून से मध्यम जड़ीय विकास हेतु आवश्यक फॉस्फेट यौगिक अधिकांश क्षेत्रों में कम हैं (अपवाद: झामर-कोटड़ा रॉक फॉस्फेट क्षेत्र)। डीएपी व सुपर फॉस्फेट की आवश्यकता पड़ती है।
पोटाश (K) प्रचुर / पर्याप्त पैतृक चट्टानों में फेल्डस्पार एवं अभ्रक खनिजों की उपस्थिति के कारण राजस्थान की बालू रेत में भी पोटाश की प्राकृतिक प्रचुरता पाई जाती है।
कैल्शियम कार्बोनेट (CaCO₃) अत्यधिक प्रचुर मरुस्थलीय क्षेत्रों में कम वर्षा एवं उच्च वाष्पीकरण के कारण केशिका क्रिया द्वारा चूने का निक्षेपण धरातल के नीचे कंकड़ की कठोर परत (कंकर पैन) के रूप में हो जाता है।
ह्यूमस / कार्बनिक कार्बन अत्यंत न्यून (<0.5%) उच्च तापमान के कारण कार्बनिक पदार्थों का तीव्र अपघटन। मृदा की जल-धारण क्षमता कम होने का यह मुख्य कारण है।
मृदा अभिक्रिया (pH मान) प्रायः क्षारीय (7.5 से 8.5+) पश्चिमी एवं आंतरिक जल प्रवाह वाले क्षेत्रों में सोडियम, कैल्शियम और मैग्नीशियम के लवण जमा होने से मृदा क्षारीय व लवणीय बन जाती है।


📖 14.4 मृदा कणों का आकार एवं गठन

कणों के व्यास के आधार पर राजस्थान की मृदाओं का भौतिक स्वरूप:

[मोटे कण / रेतीली मृदा] ────────> [मध्यम कण / दोमट मृदा] ────────> [अति-बारीक कण / चिकनी मृदा]
  • व्यास: > 0.05 मिमी             • व्यास: 0.002 - 0.05 मिमी        • व्यास: < 0.002 मिमी
  • जल धारण: न्यूनतम                • जल धारण: संतुलित                 • जल धारण: उच्चतम
  • पारगम्यता: सर्वाधिक              • कृषि हेतु सर्वोत्तम               • शुष्क होने पर दरारें
  • क्षेत्र: पश्चिमी मरुस्थल        • क्षेत्र: पूर्वी मैदान           • क्षेत्र: हाड़ौती का पठार

1. रेतीली / बलुई बनावट (Sandy Texture)

- बड़े कणों के कारण रंध्रावकाश (Pore Space) बड़े होते हैं। - **पारगम्यता (Permeability) अत्यंत तीव्र** होती है, जिससे वर्षा का जल शीघ्रता से नीचे रिस जाता है और मृदा की जल धारण क्षमता न्यूनतम रहती है।

2. दोमट बनावट (Loamy Texture)

- बालू, सिल्ट एवं क्ले का संतुलित मिश्रण। - पूर्वी मैदानी जिलों (जयपुर, अलवर, भरतपुर) में पाई जाती है; कृषि उत्पादन हेतु आदर्श।

3. मृत्तिका / चिकनी बनावट (Clayey Texture)

- कण अत्यंत बारीक (< 0.002 मिमी) होते हैं। - **जल धारण क्षमता उच्चतम** होती है। गीली होने पर चिपचिपी व फूलने वाली और सूखने पर चौड़ी दरारें उत्पन्न करने वाली (हाड़ौती की काली मृदा)।

📖 14.5 राजस्थान की मिट्टियों का सामान्य वर्गीकरण

पारंपरिक भौगोलिक आधार पर राजस्थान की मिट्टियों को 8 प्रमुख वर्गों में विभाजित किया गया है:

क्र.सं. मृदा का प्रकार मुख्य विस्तार क्षेत्र (जिले) रंग एवं गठन प्रमुख उपयुक्त फसलें
1. रेतीली / मरुस्थलीय मृदा जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, फलौदी, जोधपुर, चूरू पीला-भूरा / मोटा कण बाजरा, मोठ, मूँग, ग्वार
2. लाल-पीली मृदा सवाई माधोपुर, करौली, भीलवाड़ा, टोंक, अजमेर लाल से पीला / दोमट मूँगफली, कपास, मक्का
3. लाल-लोमी मृदा डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, उदयपुर (दक्षिणी) गहरा लाल / बारीक कण मक्का, चावल, गन्ना
4. मध्यम काली मृदा (रेगुर) कोटा, बूँदी, बारां, झालावाड़ (हाड़ौती) गहरा काला-भूरा / क्ले कपास, सोयाबीन, गेहूँ, संतरा
5. जलोढ़ / कछारी मृदा जयपुर, दौसा, अलवर, भरतपुर, धौलपुर हल्का भूरा / सिल्ट-दोमट गेहूँ, सरसों, जौ, तरकारी
6. भूरी रेतीली मृदा नागौर, पाली, सिरोही, सीकर, झुंझुनूं धूसर-भूरा / मध्यम दोमट बाजरा, दलहन, गेहूँ, सरसों
7. पर्वतीय मृदा (लिथोसोल्स) उदयपुर, राजसमंद, सिरोही (अरावली ढलान) लाल-कंकड़युक्त / उथली वनस्पति, मक्का, चारा
8. लवणीय मृदा (सोलोनचक) बाड़मेर, सांचौर, जालौर, नागौर (झीलों के निकट) सफेद लवणीय परत कृषि अनुपयुक्त (नमक उत्पादन)


📖 14.6 मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना एवं राजस्थान

राजस्थान की मृदा में पोषक तत्वों के असंतुलन को दूर करने हेतु एक ऐतिहासिक राष्ट्रीय पहल का प्रारंभ इसी राज्य से हुआ था:

तथ्य विवरण
योजना का शुभारंभ 19 फरवरी 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा
उद्घाटन स्थल सूरतगढ़ (श्रीगंगानगर जिला, राजस्थान)
आधिकारिक ध्येय वाक्य "स्वस्थ धरा, खेत हरा"
जाँचे जाने वाले 12 मानक प्राचल 1. प्राथमिक पोषक तत्व: नाइट्रोजन (N), फॉस्फोरस (P), पोटैशियम (K) 2. द्वितीयक पोषक तत्व: सल्फर (S) 3. सूक्ष्म पोषक तत्व: जिंक (Zn), आयरन (Fe), कॉपर (Cu), मैंगनीज (Mn), बोरॉन (B) 4. भौतिक-रासायनिक संकेतक: pH मान, विद्युत चालकता (EC - लवणता मापक), कार्बनिक कार्बन (OC - जीवांश मापक)


📖 14.7 परीक्षा-उपयोगी मुख्य बिंदु

तथ्य विवरण
योजना का स्थल मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना 19 फरवरी 2015 को सूरतगढ़ (श्रीगंगानगर) से प्रारंभ की गई थी।
सर्वाधिक कमी वाला तत्व राजस्थान की मिट्टियों में सबसे व्यापक स्तर पर नाइट्रोजन और कार्बनिक पदार्थ (ह्यूमस) की कमी पाई जाती है।
सर्वाधिक प्राकृतिक प्रचुरता पश्चिमी राजस्थान की रेतीली बालू में भी पोटाश (K) और कैल्शियम (Ca) पर्याप्त मात्रा में विद्यमान हैं।
मृदा परिच्छेदिका का अभाव थार मरुस्थल की वातोढ़ रेतीली मिट्टी में संस्तरों का विकास नहीं हो पाता; यह एक अक्षेत्रीय मृदा है।
कंकड़ पट्टी पश्चिमी राजस्थान में कम वर्षा व तीव्र वाष्पीकरण के कारण सतह के नीचे कैल्शियम कार्बोनेट की कठोर चूना परत का निर्माण होता है, जिसे स्थानीय स्तर पर 'खड़िया पट्टी' भी कहा जाता है।
मक्का उत्पादन हेतु विशिष्ट मृदा दक्षिणी राजस्थान (डूंगरपुर-बांसवाड़ा-उदयपुर) में पाई जाने वाली लाल-लोमी मृदा मक्का की फसल के लिए राज्य में सर्वाधिक प्रसिद्ध है।


📖 14.8 तुलनात्मक अध्ययन

पहलू रेतीली मृदा लाल-पीली मृदा काली मृदा जलोढ़ मृदा
क्षेत्र पश्चिमी मरुस्थल अरावली ढलान हाड़ौती पठार पूर्वी मैदान
रंग पीला-भूरा लाल से पीला गहरा काला हल्का भूरा
गठन मोटा कण दोमट क्ले सिल्ट-दोमट
जल धारण न्यूनतम मध्यम उच्चतम उच्च
मुख्य फसलें बाजरा, मोठ, ग्वार मूँगफली, कपास, मक्का कपास, सोयाबीन गेहूँ, सरसों
जिले जैसलमेर, बीकानेर सवाई माधोपुर, भीलवाड़ा कोटा, झालावाड़ जयपुर, भरतपुर


परीक्षा पुनरावृत्ति

मृदा निर्माण समीकरण: $S = f(cl, o, r, p, t)$ -> सक्रिय कारक: जलवायु एवं जीव -> निष्क्रिय कारक: उच्चावच, मूल शैल, समय -> मृदा स्वास्थ्य कार्ड: 19 फरवरी 2015 (सूरतगढ़, श्रीगंगानगर) -> ध्येय वाक्य: 'स्वस्थ धरा, खेत हरा' -> 12 मानक प्राचल -> सर्वाधिक कमी: नाइट्रोजन एवं ह्यूमस (<0.5%) -> प्राकृतिक प्रचुरता: पोटाश एवं कैल्शियम -> अक्षेत्रीय मृदा (Azonal): थार मरुस्थल की वातोढ़ रेतीली बालू -> खड़िया पट्टी: $CaCO_3$ / जिप्सम की उप-सतही कठोर परत -> लाल-लोमी मृदा: मक्का (डूंगरपुर-बांसवाड़ा-उदयपुर) -> मध्यम काली मृदा (रेगुर): कपास व सोयाबीन (हाड़ौती) -> जलोढ़ मृदा: गेहूँ व सरसों (पूर्वी मैदान) -> 14.8 तुलनात्मक अध्ययन

AI-Friendly Tags

rajasthan-gk, rajasthan-soils, pedology, soil-formation-factors, dokuchaev-factors, hans-jenny, soil-texture, soil-health-card-scheme, swasth-dhara-khet-hara, suratgarh, soil-horizons, comparative-study