राजस्थान में जल संरक्षण एवं परंपरागत जल-संचयन (Water Conservation and Traditional Water Harvesting in Rajasthan)
1. राजस्थान का जल परिदृश्य एवं जल का त्रि-रूप दार्शनिक व वैज्ञानिक वर्गीकरण#
1.1 भू-जलवैज्ञानिक पृष्ठभूमि एवं जल संकट की विभीषिका#
राजस्थान क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का सबसे बड़ा राज्य है, जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का **10.41% (3,42,239 वर्ग किमी)** धारित करता है। इसके विपरीत, जल संसाधनों के वितरण में राज्य अत्यधिक विपन्न स्थिति में है:
- **देश के कुल सतही जल (Surface Water) का हिस्सा:** मात्र **1.16%**
- **देश के कुल भूजल (Groundwater) का हिस्सा:** मात्र **1.72%**
- **राज्य की जनसंख्या:** देश की कुल जनसंख्या का लगभग **5.66%** तथा पशुधन देश का **10.60%** है।
- **औसत वार्षिक वर्षा:** राज्य की औसत वार्षिक वर्षा लगभग **57.51 सेमी** है, जिसमें अत्यंत विषम क्षेत्रीय भिन्नता पाई जाती है—पश्चिमी राजस्थान के जैसलमेर में यह **10 से 15 सेमी** के बीच सीमित रहती है, जबकि दक्षिण-पूर्वी राजस्थान के झालावाड़ में **100 सेमी** तथा माउंट आबू (सिरोही) में **150 सेमी** से अधिक दर्ज की जाती है।
- **अनावृष्टि एवं अकाल की आवृत्ति:** राजस्थान के 60% से अधिक भाग पर फैले थार मरुस्थल में वर्षा अत्यंत अनिश्चित, अनियमित और अल्पकालिक मूसलाधार बौछारों के रूप में होती है। ऐतिहासिक रूप से मरुभूमि के निवासियों के लिए जल संरक्षण केवल एक इंजीनियरिंग तकनीक नहीं, अपितु जीवन-रक्षा का सर्वोच्च सांस्कृतिक एवं सामाजिक धर्म रहा है।
1.2 अनुपम मिश्र का लोक-दर्शन एवं जल का त्रि-रूप वर्गीकरण#
गांधीवादी पर्यावरणविद् **अनुपम मिश्र (Anupam Mishra)** ने अपनी अमर कृतियों **"आज भी खरे हैं तालाब" (1993)** तथा **"राजस्थान की रजत बूँदें" (1995)** में राजस्थान के लोक-समाज द्वारा विकसित अद्वितीय जल-विज्ञान को लिपिबद्ध किया। मरुस्थलीय समाज ने प्रकृति में उपलब्ध जल को उसकी उपस्थिति, शुद्धता और भूगर्भीय स्तर के आधार पर तीन विशिष्ट रूपों में विभाजित किया:
| जल का रूप (Form of Water) |
भूगर्भीय स्थिति एवं स्रोत |
गुणवत्ता एवं उपयोग |
प्रमुख संचयन संरचनाएँ |
| 1. पालर पानी (Paalar Paani) |
आकाश से सीधे बरसने वाला वर्षाजल, जो धरातल पर बहता है। |
जल का सबसे शुद्धतम एवं अमृततुल्य रूप; शून्य लवणता; सर्वोच्च पेय जल। |
टांका (Tanka), नाड़ी, तालाब, बावड़ी, कुंड। |
| 2. पाताल पानी (Paataal Paani) |
वह वर्षाजल जो धरातल से रिसकर सीधे गहरे भूगर्भ (Underground Aquifer) में चला जाता है। |
प्रायः अत्यधिक खारा (Brackish), फ्लोराइड, नाइट्रेट व भारी लवणों से युक्त; सामान्यतः पीने योग्य नहीं। |
गहरे कुएं (Wells), नलकूप (Tubewells), बावड़ियां (गहराई पर)। |
| 3. रेजवाणी पानी (Rejwaani Paani) |
वह वर्षाजल जो रेत में समाता तो है, परंतु नीचे स्थित खड़िया/जिप्सम पत्थर की कठोर परत के कारण पाताल पानी में नहीं मिल पाता। |
मीठा, शीतल और पेय जल; बालू के कणों में नमी के रूप में समाहित रहता है। |
कुईं (Kui) अथवा बेरी (Beri)। |
'रेज' एवं 'रेजवाणी' की वैज्ञानिक अवधारणा:#
- **रेज (Rej):** मरुभूमि में वर्षा की मात्रा को मापने के लिए इंच या सेंटीमीटर के स्थान पर **'रेज'** शब्द का प्रयोग होता है। रेज का अर्थ है—वह वर्षा जो रेत के धरातल को 5 से 6 अंगुल गहराई तक भिगो दे।
- यदि वर्षा रेज के बराबर हो, तो उस नमी को रेत अपने भीतर समेट लेती है। नीचे **खड़िया पट्टी (Gypsum / Kankar Pan)** की अभेद्य चट्टानी परत होने के कारण यह जल नीचे स्थित खारे पाताल पानी में मिलकर खारा होने से बच जाता है। इसी संचित नमी को जब कुईं खोदी जाती है, तो बूंद-बूंद करके रिसाव (Capillary Seepage) के माध्यम से एकत्रित किया जाता है।
2. मरुस्थलीय परंपरागत जल संचयन संरचनाएँ (Desert Traditional Water Harvesting Structures)#
2.1 टांका (Tanka / Taanka)#
टांका पश्चिमी राजस्थान (विशेषकर थार मरुस्थल के बाड़मेर, बीकानेर, जैसलमेर, जोधपुर, नागौर और फलौदी) में वर्षाजल संचयन की सर्वाधिक लोकप्रिय और अनिवार्य पारिवारिक एवं सामुदायिक भूमिगत संरचना है।
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│ अगोर / पायतान (Catchment Area) │
│ (चूने, राख, मुरम से लीपा गया स्वच्छ ढलान) │
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│ ढलान द्वारा प्रवाह
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│ जालियाँ / तलछट कक्ष │
│ (Silt & Debris Catchers)│
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│
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│ भूमिगत पक्का टांका │
│ (Underground Cistern) │
│ (चूने/सीमेंट से प्लास्टर)│
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संरचनात्मक एवं तकनीकी विशेषताएं:#
1. **आकार एवं गहराई:** यह सामान्यतः 15 से 20 फीट गहरा तथा 8 से 10 फीट व्यास वाला बेलनाकार (Cylindrical) अथवा आयताकार भूमिगत गड्ढा होता है।
2. **अगोर अथवा पायतान (Agor / Paitan):** टांके के चारों ओर का वह स्वच्छ जलग्रहण क्षेत्र जहाँ से वर्षाजल बहकर टांके में प्रवेश करता है। इसे मिट्टी, मुरम, चूना, राख या स्थानीय स्तर पर 'गोबर-मिट्टी' से लीपा जाता है ताकि जल का रिसाव न हो और ढलान तीव्र रहे।
3. **जागोटी (Jagoti):** अगोर की वह विशिष्ट ढलान जो जल को सीधे टांके के संकरे प्रवेश द्वार (Inlet) की ओर निर्देशित करती है।
4. **जल शोधन व्यवस्था (Filtration):** टांके के मुख पर बारीक लोहे या कपड़े की जाली लगाई जाती है ताकि धूल, कीड़े-मकोड़े और पत्ते अंदर न जाएँ। प्रवेश द्वार से पहले एक छोटा 'सिल्ट कैचर' (तलछट गड्ढा) बनाया जाता है जिसमें रेत बैठ जाती है।
5. **भीतरी अस्तर (Lining):** पारंपरिक टांके के भीतर चूने और राख का प्लास्टर किया जाता था, जो पानी को ठंडा और कीटाणुरहित रखता था। आधुनिक काल में इसमें कंक्रीट-सीमेंट का प्रयोग होता है।
6. **ढक्कन एवं सुरक्षा:** टांके के ऊपर एक छोटा मुख रखा जाता है जिसे लोहे या लकड़ी के ढक्कन से ताला लगाकर बंद रखा जाता है ताकि वाष्पीकरण न हो और स्वच्छता बनी रहे।
7. **उपयोग एवं क्षमता:** एक मानक पारिवारिक टांका (20,000 से 50,000 लीटर क्षमता) एक 6-8 सदस्यों वाले परिवार को पूरे वर्ष (अगली मानसूनी वर्षा तक) शुद्धतम पालर पानी उपलब्ध कराता है।
2.2 कुंड अथवा कुंडी (Kund / Kundi)#
कुंड पश्चिमी राजस्थान के रेतीले इलाकों (विशेष रूप से चूरू, बीकानेर, शेखावाटी और झुंझुनूं के मरुस्थलीय प्रसार) में पाया जाने वाला कृत्रिम जलग्रहण युक्त विशिष्ट टांका है।
टांके और कुंड में मूलभूत अंतर:#
- टांका प्राकृतिक ढलान वाले स्थानों पर या मकान के आंगन में बनाया जा सकता है, जबकि **कुंड** खुले रेतीले मैदानों में कृत्रिम रूप से गोल पक्का चबूतरा (पायतान) बनाकर निर्मित किया जाता है।
- **गुंबदनुमा अधिरचना (Domed Superstructure):** कुंड के ऊपर जमीन से 3-4 फीट ऊंचा एक पक्का गुंबद (Dome) बनाया जाता है, जिसके शीर्ष पर एक जालीदार खिड़की या ढक्कन होता है।
- **पायतान का निर्माण:** खुले धरातल पर 30 से 50 फीट व्यास का पक्का ढलानदार गोल फर्श (Catchment) बनाया जाता है, जिसे चूने या सीमेंट से चिकना किया जाता है ताकि हल्की सी बौछार का भी एक-एक बूंद पानी बहकर केंद्र में स्थित कुंड में समा जाए।
- ग्रामीण क्षेत्रों में खेतों और चारागाहों में चरवाहों और राहगीरों के लिए कुंड जीवनदायिनी भूमिका निभाते हैं।
2.3 कुईं अथवा बेरी (Kui / Beri)#
कुईं पश्चिमी राजस्थान के रेतीले धरातल की सबसे चमत्कारिक और कठिन जल संरचना है। यह सामान्य कुएं से बिल्कुल भिन्न होती है।
तकनीकी एवं भूगर्भीय लक्षण:#
1. **आकार एवं माप:** कुईं का व्यास अत्यंत संकरा होता है—मात्र **3 से 4 फीट (लगभग एक मीटर)**। इसकी गहराई सामान्यतः **30 से 60 फीट** तक होती है।
2. **भूगर्भीय शर्त (खड़िया पट्टी):** कुईं केवल उन्हीं क्षेत्रों में सफल होती है जहाँ जमीन से 30-50 फीट नीचे **'खड़िया पत्थर' (Gypsum / Calcareous Hardpan)** की परत पाई जाती है। यह पट्टी बीकानेर, चूरू, जैसलमेर और बाड़मेर के विशिष्ट पट्टों में विस्तृत है।
3. **कार्यप्रणाली:** कुईं किसी भूजल स्रोत (Aquifer) से पानी नहीं खींचती। यह रेत में समाए हुए **'रेजवाणी पानी'** को बूंद-बूंद करके अपने संकरे घेरे में रिसाव (Seepage) द्वारा एकत्रित करती है। संकरे व्यास के कारण पानी का वाष्पीकरण न्यूनतम होता है।
4. **जल संचयन दर:** एक कुईं में दिनभर में मात्र 2 से 3 घड़े पानी ही रिसकर जमा होता है। प्रातःकाल स्त्रियां रस्सी और चमड़े/रबर की छोटी डोलची (चरस/चडस) से यह अमृततुल्य शीतल जल निकालती हैं और पुनः कुईं के मुख को लकड़ी के फट्टों से ढंककर ताला लगा दिया जाता है।
निर्माण कला एवं चेजारो:#
- **चेजारो (Chejaaro):** कुईं का निर्माण करने वाले विशेष सिद्धहस्त कारीगरों को 'चेजारो' कहा जाता है।
- **बसोली (Basoli):** कुईं का घेरा इतना संकरा होता है कि उसमें फावड़ा या कुदाल नहीं चल सकती। चेजारो घुटनों के बल बैठकर **'बसोली'** (एक छोटी कुल्हाड़ीनुमा लोहे की नुकीली छेनी) से रेत व कंकड़ खोदता है।
- **खींप की रस्सी से बंधाई (Choli / Ganthi):** धंसती रेत को रोकने के लिए खींप (Crotalaria burhia) नामक मरुस्थलीय झाड़ी के रेशों से मोटी रस्सी बटी जाती है। खुदाई के साथ-साथ ऊपर से नीचे तक गोलाकार कुंडली बनाकर इस रस्सी को दीवार के सहारे पिरोया जाता है। जहाँ पत्थर सुलभ होते हैं, वहाँ चूने के बिना सूखी पत्थर चिनाई की जाती है।
- **उत्साह एवं सम्मान (अण-प्रथा):** कुईं का निर्माण पूरा होने पर चेजारो को ग्राम समाज द्वारा विशेष विदाई, उपहार, वर्ष भर के त्योहारों पर भेंट और फसल कटाई पर अनाज (लाग-कांस) देने की 'अण-प्रथा' प्रचलित थी।
2.4 नाड़ी (Nadi)#
नाड़ी थार मरुस्थल के ग्रामीण अंचलों में वर्षाजल संचयन का सबसे प्राचीन एवं व्यापक रूप से प्रयुक्त खुला जलाशय है।
ऐतिहासिक संदर्भ एवं संरचना:#
- **ऐतिहासिक साक्ष्य:** नाड़ी निर्माण का सर्वाधिक प्रामाणिक ऐतिहासिक साक्ष्य **1520 ई.** का मिलता है, जब मारवाड़ के शासक **राव जोधा** ने जोधपुर के समीप एक विशाल नाड़ी का निर्माण करवाया था, जिसे 'जोधा जी की नाड़ी' कहा गया।
- **भौगोलिक चयन:** यह प्राकृतिक ढलानों के संगम पर निचले बेसिन में मिट्टी की पाल (Embankment) बांधकर बनाई जाती है। इसकी गहराई सामान्यतः 3 से 12 फीट (1 से 4 मीटर) होती है।
- **मदार (Madaar / Agor):** नाड़ी का वह जलग्रहण क्षेत्र जिससे पानी बहकर नाड़ी में आता है। मदार को पवित्र रखा जाता है; वहाँ शौच, पशु चराना या पेड़ काटना पूर्णतः वर्जित होता था।
- **नेहटा (Nehta):** जब नाड़ी पूरी भर जाती है, तो अतिरिक्त अधिशेष जल को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए बना प्राकृतिक या पक्का स्पिलवे 'नेहटा' कहलाता है।
- **सीमाएं एवं चुनौतियाँ:** खुले धरातल पर होने के कारण ग्रीष्म ऋतु में नाड़ी का 50% से अधिक जल तीव्र वाष्पीकरण से उड़ जाता है। इसके अलावा मदार से बहकर आने वाली गाद (Silt) के कारण नाड़ी उथली हो जाती है, जिसके लिए ग्राम स्तर पर प्रतिवर्ष **'गाद निकासी' (Desiltation / गाद काढना)** का सामुदायिक श्रमदान किया जाता था।
3. कृषि, जलग्रहण एवं पहाड़ी परंपरागत जल संरचनाएँ#
3.1 खड़ीन (Khadin / Khadeen)#
खड़ीन मरुस्थलीय भूगोल में वर्षाजल संचयन और शुष्क कृषि (Arid Agriculture) का विश्व का सबसे अनुपम एवं वैज्ञानिक समन्वय है।
पहाड़ी ढलान (Runoff Hills) पहाड़ी ढलान (Runoff Hills)
╲ ╱
╲ खड़ीन भूमि ╱
╲ (Cultivable Bed - Silt Deposition) ╱
╲ ╱
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खड़ीन बांध / मिट्टी का पक्का धोरा (Dhora)
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▼ खड़िया / स्पिलवे (Spillway)
निचली खड़ीन या नाला
उत्पत्ति एवं ऐतिहासिक विकास:#
- **पालीवाल ब्राह्मणों की देन:** खड़ीन प्रणाली का विकास **15वीं शताब्दी** में जैसलमेर के मेधावी **पालीवाल ब्राह्मणों (Paliwal Brahmins)** द्वारा किया गया था।
- जैसलमेर की पथरीली और रेतीली भूमि के मध्य उन्होंने जल और कृषि का ऐसा पारिस्थितिकीय संतुलन बनाया कि अकाल के वर्षों में भी पालीवाल समाज प्रचुर खाद्यान्न उत्पादन करता था।
खड़ीन की कार्यप्रणाली एवं वैज्ञानिक घटक:#
1. **जलग्रहण क्षेत्र (Catchment):** खड़ीन का चुनाव दो या तीन तरफ से छोटी पथरीली पहाड़ियों (Gravelly ridges) से घिरे प्राकृतिक बेसिन में किया जाता है। जलग्रहण क्षेत्र और खड़ीन कृषि क्षेत्र का अनुपात सामान्यतः **15:1** होता है।
2. **धोरा / खड़ीन बांध (Dhora / Earthen Bund):** ढलान के निचले मुहाने पर मिट्टी और पत्थरों का एक विशाल, मजबूत अर्धचंद्राकार बांध (पाल) बनाया जाता है, जिसे 'धोरा' कहते हैं।
3. **जल भराव एवं भूमि संवर्धन:** मानसून के दौरान पहाड़ियों से बहकर आने वाला जल खड़ीन के खेत में 2 से 4 फीट की गहराई तक भर जाता है। यह जल 2-3 महीने तक खेत में खड़ा रहता है। इस दौरान:
- पहाड़ियों से बहकर आई उपजाऊ बारीक मिट्टी (Nutrient-rich Silt) खेत में बैठ जाती है।
- भूमि की गहराई तक जल समाहित होकर नमी (Soil Moisture) को संतृप्त कर देता है।
- मिट्टी में उपस्थित हानिकारक लवण लीचिंग (Leaching) होकर भूगर्भ में गहरे चले जाते हैं।
4. **खड़िया (Khadia / Sluice Gate):** जब पानी एक निश्चित सीमा से अधिक भर जाता है, तो बांध के किनारे बने पत्थर के निकास द्वार (स्पिलवे), जिसे 'खड़िया' कहते हैं, से अतिरिक्त पानी को निचली खड़ीन या नाले में छोड़ दिया जाता है।
5. **रबी की चमत्कारी फसल:** अक्टूबर-नवंबर में जब पानी सूख जाता है अथवा निकाल दिया जाता है, तो उस अत्यधिक नम और उपजाऊ भूमि में बिना किसी अतिरिक्त सिंचाई के रबी की फसलें—**चना (Gram), गेहूं (Wheat), सरसों (Mustard)** बोई जाती हैं, जो अभूतपूर्व पैदावार देती हैं।
3.2 जोहड़ (Johad)#
जोहड़ राजस्थान के गैर-मरुस्थलीय एवं अर्द्ध-शुष्क अंचलों—विशेषकर **शेखावाटी (सीकर, झुंझुनूं, चूरू)** तथा पूर्वी राजस्थान के **अलवर, भरतपुर और जयपुर** के पहाड़ी-मैदानी इलाकों में वर्षाजल संचयन की पारंपरिक संरचना है।
संरचनात्मक स्वरूप एवं कार्यप्रणाली:#
- जोहड़ मूलतः प्राकृतिक वर्षाजल नाले के बहाव क्षेत्र में बनाया गया मिट्टी का छोटा, अर्धचंद्राकार चेकडैम या कच्चा तालाब होता है।
- **भूजल पुनर्भरण का प्राथमिक यंत्र:** जोहड़ का मुख्य उद्देश्य केवल सतही जल रोकना नहीं, बल्कि भूमिगत जलभृतों (Aquifers) को निरंतर रीचार्ज करना है।
- जोहड़ में रुका हुआ पानी धीरे-धीरे जमीन में रिसता है, जिससे उसके बहाव क्षेत्र में स्थित मीलों दूर के कुओं और बावडियों का जलस्तर बढ़ जाता है।
आधुनिक युग में जोहड़ क्रांति: राजेंद्र सिंह एवं तरुण भारत संघ:#
- 1980 के दशक में अलवर का थानागाजी और सरिस्का क्षेत्र भीषण सूखे और 'डार्क जोन' की विभीषिका झेल रहा था।
- **राजेंद्र सिंह (Waterman of India)** ने अपनी संस्था **तरुण भारत संघ (Tarun Bharat Sangh - TBS)** के माध्यम से ग्रामीणों को संगठित किया और पारंपरिक ज्ञान के आधार पर **8,600 से अधिक जोहड़ों** का निर्माण करवाया।
- **नदियों का पुनर्जीवन:** जोहड़ों के निरंतर रीचार्ज प्रभाव से अलवर की पाँच मृत और मौसमी नदियाँ—**अरवरी (Arvari), रूपारेल (Ruparel), सरसा (Sarsa), भगानी (Bhagani) और जहाजवाली (Jahajwali)** बारहमासी (Perennial) धाराओं में पुनर्जीवित हो गईं।
- **अरवरी संसद (Arvari Parliament):** 1999 में अरवरी नदी बेसिन के 72 गांवों ने मिलकर सामुदायिक जल प्रबंधन हेतु देश की पहली नदी संसद 'अरवरी संसद' की स्थापना की।
- **वैश्विक मान्यता:** राजेंद्र सिंह को इस युगांतरकारी कार्य हेतु **2001 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार** तथा **2015 में स्टॉकहोम वाटर प्राइज** (जल का नोबेल पुरस्कार) से सम्मानित किया गया।
3.3 बावड़ी (Bawari / Stepwells)#
बावड़ी भारत की स्थापत्य कला और जल प्रबंधन का चरम शिखर है। राजस्थान में बावड़ियों का निर्माण जल संचयन के साथ-साथ सामाजिक मिलन, धार्मिक अनुष्ठान और ग्रीष्मकालीन विश्राम के भव्य केंद्रों के रूप में किया गया।
प्राचीन वास्तुशास्त्र के अनुसार बावड़ियों के चार प्रकार:#
प्राचीन भारतीय वास्तु ग्रन्थों—**'अपराजितपृच्छा' (Aparajitaprichha)** एवं **'मानसार'** में सीढ़ियों और प्रवेश द्वारों की संख्या के आधार पर बावड़ियों को चार श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है:
| प्रकार (Category) |
प्रवेश द्वारों की संख्या (Entrances) |
तलों/मंडपों की संख्या (Storeys) |
स्थापत्य विशेषताएँ |
| 1. नंदा (Nanda) |
1 (एक मुख) |
3 तल |
सबसे सामान्य और सरल सीढ़ीदार बावड़ी। |
| 2. भद्रा (Bhadra) |
2 (दो मुख) |
6 तल |
दोनों विपरीत दिशाओं से सीढ़ियाँ उतरती हैं। |
| 3. जया (Jaya) |
3 (तीन मुख) |
9 तल |
तीन दिशाओं से प्रवेश; अत्यंत कलात्मक व विशाल। |
| 4. सर्वतोभद्रा / विजया |
4 (चार मुख) |
12 तल |
चारों दिशाओं से सीढ़ियों का भव्य जाल; स्थापत्य का सर्वोच्च रूप। |
राजस्थान की प्रमुख ऐतिहासिक बावडियाँ:#
| बावड़ी का नाम |
स्थान एवं जिला |
निर्माणकर्ता एवं काल |
प्रमुख ऐतिहासिक व वास्तुशिल्पीय विशेषता |
| रानी जी की बावड़ी |
बूंदी (Bundi) |
रानी नाथावती (1699 ई., राव राजा अनिरुद्ध सिंह की पत्नी) |
बूंदी को "बावड़ियों का शहर" (City of Stepwells) कहा जाता है। यह बावड़ी अपने उत्कृष्ट तोरण द्वारों, नक्काशीदार खंभों और 300 फीट गहरी सीढ़ियों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। |
| चांद बावड़ी |
आभानेरी (दौसा) |
राजा निकुंभ / चांद (8वीं-9वीं शताब्दी, प्रतिहार काल) |
विश्व की सबसे गहरी और भव्य सीढ़ीदार बावड़ी; 13 तल, 100 फीट गहराई, तथा भूलभुलैया जैसी 3,500 संकरी सीढ़ियाँ। इसके सम्मुख हर्षत माता मंदिर स्थित है। |
| चांद बावड़ी (जोधपुर) |
जोधपुर |
राव जोधा की रानी चांद कंवर (1460 ई.) |
मारवाड़ की प्राचीन जल स्थापत्य धरोहर। |
| नवलखा / नौलखा बावड़ी |
डूंगरपुर |
रानी प्रीमल देवी (1586 ई., महारावल आसकरण की पत्नी) |
सोमनाथ मंदिर शैली में निर्मित; शिलालेख युक्त उत्कृष्ट 3-तलीय बावड़ी। |
| मेड़तणी जी की बावड़ी |
झुंझुनूं |
खेतड़ी के ठाकुर शार्दुल सिंह की पत्नी (18वीं सदी) |
शेखावाटी के भित्ति चित्रों और भव्य मेहराबों से सुसज्जित। |
| बाटाडू का कुआं |
बायतु (बालोतरा / बाड़मेर) |
रावल गुलाब सिंह (1947) |
सफेद संगमरमर से निर्मित भव्य जल महलनुमा कुआं; इसे "थार का जलमहल" कहा जाता है। |
| चमना बावड़ी |
शाहपुरा (भीलवाड़ा) |
महाराजा उम्मेद सिंह प्रथम (1858 ई.) |
चमना नामक गणिका की स्मृति में निर्मित 3-मंजिला बावड़ी। |
| दूध बावड़ी |
माउंट आबू (सिरोही) |
अचलगढ़ तलहटी |
अधर देवी (अर्बुदा माता) मंदिर के नीचे स्थित; जल का रंग दूधिया होने के कारण प्रसिद्ध। |
| अनारकली की बावड़ी |
बूंदी |
अनारकली (रानी नाथावती की दासी) |
बूंदी की कलात्मक दो-तलीय बावड़ी। |
| तापी बावड़ी |
जोधपुर |
17वीं सदी |
जोधपुर शहर के परकोटे में स्थित विशाल बावड़ी। |
3.4 झालरा (Jhalra)#
झालरा राजस्थान की एक अत्यंत विशिष्ट और अनूठी जल संरचना है जो देखने में बावड़ी जैसी प्रतीत होती है, परंतु इसका जलविज्ञान पूर्णतः अलग होता है।
झालरे के विशिष्ट लक्षण एवं कार्यप्रणाली:#
1. **प्राकृतिक स्रोत का अभाव:** झालरे का अपना कोई स्वतंत्र भूजल सोता (Spring) अथवा जलग्रहण क्षेत्र (Catchment) नहीं होता।
2. **रिसाव आधारित जलभरण:** यह सदैव किसी ऊंचे भूभाग पर स्थित विशाल झील, तालाब या बांध के निचले भाग में निर्मित किया जाता है। उस जलाशय से जमीन के भीतर रिसने वाला जल (Seepage / Percolation) झालरे में आकर एकत्रित होता है।
3. **पेयजल के रूप में उपयोग निषेध:** झालरे के पानी का उपयोग **पीने के लिए कभी नहीं किया जाता**। इसका जल केवल धार्मिक स्नान, मंदिर के अनुष्ठानों, यज्ञों, पवित्र वस्त्र धोने और पशुओं के उपयोग हेतु आरक्षित रहता था।
4. **जोधपुर के प्रसिद्ध झालरे:**
- **तूरजी का झालरा (Toorji Ka Jhalra):** जोधपुर के महाराजा अभय सिंह की रानी तंवरजी (तूरजी) द्वारा 1740 के दशक में निर्मित। लाल बलुआ पत्थर पर नक्काशीदार हाथियों, शेरों और गायों की मूर्तियों वाला यह झालरा विश्वस्तरीय पर्यटन केंद्र है।
- **महिला बाग झालरा (Mahila Bagh Jhalra):** जोधपुर में गुलाब सागर झील के रिसाव से भरने वाला भव्य झालरा।
3.5 तालाब, सागर एवं सरोवर (Lakes, Tanks & Reservoirs)#
राजस्थान में वर्षाजल को बड़े पैमाने पर रोकने के लिए रियासत काल में विशाल तालाबों और कृत्रिम झीलों की एक परस्पर जुड़ी हुई श्रृंखला (Cascading Tank System) बनाई गई थी।
ऊंचा तालाब (Upper Reservoir) ──(अधिशेष जल)──► मध्य तालाब ──(अधिशेष जल)──► निचली झील/बावड़ी
[उदा. रंगसागर] [उदा. स्वरूपसागर] [उदा. पिछोला/फतेहसागर]
- उदयपुर की इंटरलिंक्ड झील प्रणाली: 16वीं से 19वीं सदी के मध्य मेवाड़ के महाराणाओं ने पिछोला, अमरकुंड, रंगसागर, स्वरूपसागर, फतेहसागर और बड़ी झील को नहरों व नालों से इस प्रकार जोड़ा कि जब ऊपरी झील भरती है, तो अतिरिक्त पानी स्वतः निचली झील में चला जाता है; शहर में कभी बाढ़ नहीं आती और पानी व्यर्थ नहीं बहता।
- प्रमुख ऐतिहासिक तालाब एवं सरोवर:
- राजसमंद झील (कांकरोली): महाराणा राजसिंह द्वारा 1662-1676 ई. में गोमती नदी पर अकाल राहत कार्य के रूप में निर्मित। इसकी उत्तरी पाल पर प्रसिद्ध 'नौचौकी पाल' है, जहाँ 25 काले पत्थरों पर रणछोड़ भट्ट तैलंग द्वारा संस्कृत में 1917 श्लोकों की 'राजप्रशस्ति' (भारत का सबसे बड़ा शिलालेख) उत्कीर्ण है।
- जयसमंद झील (ढेबर झील - सलूम्बर/उदयपुर): महाराणा जयसिंह द्वारा 1685-1691 ई. में गोमती, जाखम व केलवा नदियों पर निर्मित; एशिया की दूसरी सबसे बड़ी कृत्रिम मीठे पानी की झील (क्षेत्रफल ~87 वर्ग किमी)। इसमें 7 प्रमुख टापू हैं (सबसे बड़ा 'बाबा का मगरा' / भभाड़ा तथा सबसे छोटा 'प्यारी')।
- गड़ीसर / घड़सीसर सरोवर (जैसलमेर): रावल घड़सी सिंह द्वारा 1367 ई. में निर्मित। इसके चारों ओर सुंदर छतरियां, मंदिर और प्रसिद्ध 'टीलों की पोल' प्रवेश द्वार स्थित है।
- आनासागर झील (अजमेर): 1137 ई. में चौहान शासक अर्णोराज (आनाजी) द्वारा चंद्रा नदी पर निर्मित। यहाँ जहांगीर ने 'दौलत बाग' (सुभाष उद्यान) तथा शाहजहां ने संगमरमर की 'बारादरी' बनवाई।
- फॉय सागर (अजमेर): 1891-92 में अंग्रेज इंजीनियर मि. फॉय के निर्देशन में अजमेर नगर परिषद द्वारा अकाल राहत कार्य हेतु बांडी नदी पर निर्मित।
4. आधुनिक वर्षाजल संचयन, जलग्रहण प्रबंधन एवं भूजल पुनर्भरण विज्ञान#
4.1 रूफटॉप रेनवाटर हार्वेस्टिंग (Rooftop RWH System)#
शहरीकरण और कंक्रीटीकरण के कारण वर्षाजल का प्राकृतिक रिसाव अवरुद्ध होने पर छतों से वर्षाजल संचयन (Rooftop Rainwater Harvesting) अनिवार्य वैज्ञानिक तकनीक बन चुका है।
वैधानिक अनिवार्यता:#
- **राजस्थान नगरपालिका (नगरीय भूमि निष्पादन एवं भवन) विनियम:** राजस्थान सरकार के स्वायत्त शासन विभाग के आदेशानुसार **300 वर्ग मीटर या उससे अधिक क्षेत्रफल** वाले सभी नए आवासीय, व्यावसायिक एवं संस्थागत भवनों में रूफटॉप वर्षाजल संचयन संरचना की स्थापना कानूनी रूप से अनिवार्य है। इसके अभाव में भवन निर्माण की पूर्णता स्वीकृति (Completion Certificate) जारी नहीं की जाती।
प्रणाली के प्रमुख घटक:#
1. **कैचमेंट (छत):** टाइल, कंक्रीट या स्लेट की स्वच्छ छत जहाँ वर्षा की बूंदें गिरती हैं।
2. **कन्वेयंस (Conveyance System):** पीवीसी या जस्तीकृत पाइप जो पानी को नीचे लाते हैं।
3. **फर्स्ट फ्लश वाल्व (First Flush Device):** मानसून की पहली वर्षा की 15-20 मिनट की बौछार छत पर जमी धूल, पक्षियों की बीट और प्रदूषण को बहा ले जाती है। इसे मुख्य टैंक में जाने से रोकने के लिए बाईपास वाल्व लगाया जाता है।
4. **फिल्टर मीडिया (Filtration Unit):**
- शीर्ष स्तर: बारीक बालू रेत (Fine Sand - 40 सेमी)
- मध्य स्तर: बजरी / कंकड़ (Gravel - 20 सेमी)
- निचला स्तर: बड़े पत्थर / रोड़ी (Boulders - 20 सेमी)
- जीवाणुरोधी परत: सक्रिय चारकोल (Activated Charcoal) की परत जो गंध और कार्बनिक तत्वों को सोखती है।
5. **संचयन अथवा पुनर्भरण:** छाने गए जल को या तो सीधे घरेलू भूमिगत संप (Sump/Tanka) में पेय जल हेतु संचित किया जाता है, अथवा **'रीचार्ज पिट' (Recharge Pit)** या सूखे बोरवेल में भेजकर सीधे भूजल तालिका (Water Table) को रिचार्ज किया जाता है।
4.2 जलग्रहण प्रबंधन (Watershed Management) एवं 'रिज-टू-वैली' सिद्धांत#
जलग्रहण (Watershed) एक ऐसा भौगोलिक व भू-आकृतिक क्षेत्र है जिसका समस्त वर्षाजल ढलान से बहकर एक साझा जलधारा, नाले या नदी में एकत्र होता है।
'रिज-टू-वैली' (Ridge to Valley) उपागम:#
वैज्ञानिक जल संरक्षण का आधारभूत नियम है कि कार्य पहाड़ी के सर्वोच्च शिखर (**रिज - Ridge**) से प्रारंभ करके नीचे घाटी (**वैली - Valley**) की ओर क्रमिक रूप से किया जाए:
शिखर (Ridge) ──► कंटूर ट्रेंच (CCT) एवं ढीले पत्थरों के चेकडैम (LBCD)
│
▼ ढलान (Slope) ──► गेबियन संरचना (Gabion) एवं खेत तलाई
│
▼ घाटी (Valley) ──► पक्के एनीकट (Anicut), जोहड़ एवं परकोलेशन टैंक
प्रमुख संरचनात्मक उपाय:#
1. **कंटूर ट्रेंच (Continuous Contour Trench - CCT):** पहाड़ी ढलानों पर समान ऊंचाई वाली समोच्च रेखाओं (Contours) के सहारे खोदी गई खाइयाँ। ये पानी के नीचे बहने की गति (Velocity) को तोड़ती हैं, मृदा अपरदन रोकती हैं और पानी को पहाड़ी में समाने का समय देती हैं।
2. **लूज बोल्डर चेकडैम (Loose Boulder Check Dam - LBCD):** छोटे नालों में बिना सीमेंट के पत्थरों को जमाकर बनाए गए अवरोधक, जो ऊपरी गाद को रोकते हैं।
3. **गेबियन संरचना (Gabion Structure):** लोहे के तार की मजबूत जाली (Galvanized Iron Mesh) में बड़े पत्थरों को भरकर नाले के आर-पार बनाया गया अर्ध-पारगम्य चेकडैम। यह बाढ़ के वेग को झेल लेता है और पानी को छानते हुए बहने देता है।
4. **एनीकट (Anicut):** मौसमी नदियों व नालों के तल पर चिनाई या कंक्रीट से निर्मित 1 से 2 मीटर ऊंचा पक्का अवरोधक, जो ऊपरी क्षेत्र में पानी का ठहराव कर कुओं का जलस्तर बढ़ाता है।
5. **परकोलेशन टैंक (Percolation Tank):** अत्यधिक पारगम्य (Permeable) चट्टानों वाले निचले बेसिन में निर्मित तालाब, जिसका उद्देश्य पानी रोकना नहीं, बल्कि उसे तीव्रता से भूगर्भ में उतारना होता है।
6. **खेत तलाई (Farm Pond):** किसान के खेत के सबसे निचले कोने पर बनाया गया तालाब, जिसमें खेत का अतिरिक्त वर्षाजल एकत्रित होता है। राजस्थान सरकार इस पर 60% से 70% तक अनुदान देती है।
4.3 केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) वर्गीकरण एवं राजस्थान के 'डार्क जोन्स'#
केंद्रीय भूजल बोर्ड (Central Ground Water Board - CGWB) तथा राजस्थान भूजल विभाग (RGWD) प्रतिवर्ष **गतिशील भूजल संसाधन आकलन (Dynamic Groundwater Resource Assessment)** रिपोर्ट जारी करते हैं।
भूजल दोहन की दर को निम्न सूत्र से मापा जाता है:
$$ ext{SOE (\%)} = \left( rac{ ext{वार्षिक भूजल दोहन}}{ ext{वार्षिक पुनर्भरणीय भूजल संसाधन}}
ight) imes 100$$
ब्लॉकों की वैधानिक श्रेणियां (Assessment Categories):#
1. **सुरक्षित ब्लॉक (Safe Blocks):** जहाँ दोहन दर **70% से कम** हो।
2. **अर्ध-नाजुक ब्लॉक (Semi-Critical Blocks):** जहाँ दोहन दर **70% से 90%** के बीच हो।
3. **नाजुक ब्लॉक (Critical Blocks):** जहाँ दोहन दर **90% से 100%** के बीच हो।
4. **अति-दोहित ब्लॉक (Over-Exploited / Dark Zones):** जहाँ दोहन दर **100% से अधिक** हो (अर्थात वार्षिक पुनर्भरण की तुलना में भूजल की निकासी अधिक हो रही हो)।
5. **लवणीय ब्लॉक (Saline Blocks):** जहाँ भूजल की गुणवत्ता अत्यधिक खारी होने के कारण उपयोग योग्य न हो।
राजस्थान की भयावह भूजल स्थिति:#
- राज्य के कुल **302 मूल्यांकन ब्लॉकों** में से **219 से अधिक ब्लॉक 'अति-दोहित' (Over-Exploited)** श्रेणी में आ चुके हैं।
- राज्य की औसत भूजल दोहन दर **150% से अधिक** पहुंच चुकी है (अर्थात प्रकृति जितना 100 लीटर पानी जमीन में डालती है, राजस्थान की ट्यूबवेलें 150 लीटर पानी बाहर निकाल लेती हैं)।
- जयपुर, दौसा, अलवर, सीकर, झुंझुनूं और जोधपुर जैसे जिलों में भूजल स्तर प्रतिवर्ष 1 से 3 मीटर नीचे गिर रहा है, जिससे यूरेनियम, फ्लोराइड और टीडीएस की सांद्रता जानलेवा स्तर तक बढ़ रही है।
5. जल संरक्षण के नीतिगत उपाय, कानून एवं प्रमुख सरकारी योजनाएँ#
5.1 राजस्थान राज्य जल नीति 2010 (State Water Policy 2010)#
राजस्थान देश का पहला राज्य था जिसने जल क्षेत्र में समग्र सुधारों को वैधानिक दिशा देने के लिए **18 फरवरी 2010** को अपनी राज्य जल नीति अधिसूचित की।
जल आवंटन की बहु-क्षेत्रीय प्राथमिकता (Multi-Sectoral Water Allocation Priority):#
नीति के तहत किसी भी बेसिन या जलाशय में उपलब्ध जल के उपयोग की प्राथमिकता का क्रम इस प्रकार निर्धारित किया गया है:
1. **पेयजल (Drinking Water):** मानव उपभोग हेतु शुद्ध पेय जल (सर्वोच्च एवं अनुल्लंघनीय प्राथमिकता)।
2. **घरेलू एवं पशुधन उपयोग (Domestic & Livestock):** ग्रामीण व नगरीय घरेलू आवश्यकताएं एवं मवेशियों का पोषण।
3. **कृषि एवं सिंचाई (Agriculture & Irrigation):** खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु।
4. **विद्युत उत्पादन (Power Generation):** थर्मल व हाइड्रो पावर प्लांट्स।
5. **औद्योगिक एवं वाणिज्यिक उपयोग (Industrial & Commercial):** विनिर्माण उद्योग।
6. **पर्यटन, पर्यावरण एवं मनोरंजन (Tourism, Ecology & Recreation):** वन्यजीवों, आर्द्रभूमियों एवं हरित क्षेत्रों का संरक्षण।
नीति के मुख्य सिद्धांत:#
- जल को एक दुर्लभ राष्ट्रीय एवं सामाजिक संपत्ति मानना।
- नदी बेसिन एवं उप-बेसिन को योजना एवं प्रबंधन की मूल इकाई मानना।
- भूजल के अति-दोहन पर नियंत्रण हेतु जल नियामक प्राधिकरण का गठन।
- सिंचाई प्रबंधन में किसानों की प्रत्यक्ष सहभागिता (PIM)।
5.2 मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान (MJSA)#
राजस्थान में गिरते भूजल स्तर और सूखे की समस्या से निपटने के लिए प्रारंभ किया गया यह देश का सबसे बड़ा जन-सहभागिता आधारित जल संरक्षण अभियान है।
┌───────────────────────────────────────────────────────────────┐
│ मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान (MJSA) │
├───────────────────────────────┬───────────────────────────────┤
│ MJSA 1.0 │ MJSA 2.0 │
├───────────────────────────────┼───────────────────────────────┤
│ • शुभारंभ: 27 जनवरी 2016 │ • शुभारंभ: बजट 2024-25 │
│ • स्थान: गर्दनखेड़ी (झालावाड़) │ • अवधि: 4 वर्ष │
│ • 4 चरणों में 21,000+ गांव │ • 20,000 गांवों में 5 लाख कार्य│
│ • जनसहभागिता व क्राउडफंडिंग │ • अनुमानित बजट: ₹11,200 करोड़ │
└───────────────────────────────┴───────────────────────────────┘
MJSA 1.0 (प्रथम चरण से चतुर्थ चरण):#
- **शुभारंभ तिथि:** **27 जनवरी 2016**
- **शुभारंभ स्थल:** झालावाड़ जिले की पिड़ावा तहसील का **गर्दनखेड़ी (Gardankheri) गांव**।
- **मुख्य रणनीति:**
- सरकारी विभागों (पंचायती राज, जलग्रहण, वन, कृषि) के बजट का कन्वर्जेंस (अभिसरण)।
- 'क्राउड फंडिंग' और कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) के तहत आम जनता और उद्योगपतियों से दान।
- जीआईएस और रिमोट सेंसिंग तकनीक द्वारा जल संरचनाओं (एनिकट, जोहड़, टांके, खेत तलाई, कंटूर ट्रेंच) की वैज्ञानिक मैपिंग।
- चार चरणों में प्रदेश के 21,000 से अधिक गांवों को जल के मामले में आत्मनिर्भर बनाया गया।
MJSA 2.0 (मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान 2.0):#
- **घोषणा एवं क्रियान्वयन:** राजस्थान सरकार के बजट **2024-25** में अभियान के द्वितीय संस्करण 'MJSA 2.0' की घोषणा की गई।
- **लक्ष्य:** आगामी 4 वर्षों में प्रदेश के **20,000 गांवों** में लगभग **5 लाख जल संरक्षण कार्य** संपन्न करवाना।
- **वित्तीय प्रावधान:** योजना हेतु लगभग **₹11,200 करोड़** का भारी-भरकम वित्तीय प्रावधान किया गया है।
5.3 राजीव गांधी जल संचय योजना (RGJSY)#
- **प्रथम चरण का शुभारंभ:** **20 अगस्त 2019** (पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की 75वीं जयंती पर)।
- **कवरेज:** राज्य के 33 जिलों के 295 ब्लॉक की 1,450 ग्राम पंचायतों के लगभग 4,000 गांव।
- **द्वितीय चरण (RGJSY Phase-2):** वित्तीय वर्ष 2022-23 में 352 पंचायत समितियों के 4,500 गांवों में ₹2,600 करोड़ की लागत से 2 लाख जल संरक्षण कार्य कराने का लक्ष्य रखा गया।
- **प्रमुख कार्य:** परंपरागत जल स्रोतों (बावड़ी, तालाब, जोहड़) का जीर्णोद्धार, नए एनीकट व चेकडैम, और सघन वृक्षारोपण।
5.4 अटल भूजल योजना (Atal Bhujal Yojana - ABHY)#
अटल भूजल योजना भारत सरकार के जल शक्ति मंत्रालय द्वारा विश्व बैंक के सहयोग से संचालित एक अत्यंत महत्वाकांक्षी संस्थागत भूजल सुधार कार्यक्रम है।
योजना के मुख्य आयाम:#
- **शुभारंभ:** **25 दिसंबर 2019** (पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की 95वीं जयंती पर)।
- **वित्तीय संरचना:** कुल बजट ₹6,000 करोड़, जिसमें **50% हिस्सा भारत सरकार** तथा **50% हिस्सा विश्व बैंक (World Bank)** द्वारा वित्तपोषित है।
- **राजस्थान में क्रियान्वयन:**
- देश के 7 राज्यों (गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश) में लागू।
- राजस्थान के **17 जल-तनावग्रस्त (Water-Stressed) जिलों** की **38 पंचायत समितियों (ब्लॉक)** की **1,144 ग्राम पंचायतों** में क्रियान्वयन।
- **अनूठी कार्यप्रणाली (Community-Led Demand Management):**
- यह योजना केवल बांध बनाने की नहीं, अपितु 'मांग-पक्ष प्रबंधन' (Demand Side Management) पर केंद्रित है।
- प्रत्येक ग्राम पंचायत में **'जल सुरक्षा योजना' (Water Security Plan - WSP)** तैयार की जाती है।
- किसानों को कम पानी वाली फसलों (फव्वारा व बूंद-बूंद सिंचाई, सौर ऊर्जा पंप) के उपयोग के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
- योजना 'परिणाम-आधारित प्रोत्साहन' (Disbursement Linked Indicators - DLI) मॉडल पर कार्य करती है।
5.5 सहभागी सिंचाई प्रबंधन एवं अन्य वैधानिक तंत्र#
1. **राजस्थान सिंचाई प्रणाली प्रबंधन में कृषकों की सहभागिता अधिनियम, 2000 (PIM Act 2000):**
- नहरों और जलाशयों के जल वितरण, मरम्मत और आबियाना (जल कर) संग्रहण का अधिकार सीधे किसानों की निर्वाचित संस्थाओं—**जल उपभोक्ता संगम (Water Users Associations - WUAs)** को सौंपा गया।
2. **राष्ट्रीय जल पुरस्कार (National Water Awards):**
- जल संरक्षण और कुशल प्रबंधन के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन हेतु राजस्थान के जिलों (जैसे बांसवाड़ा को जनजातीय क्षेत्र में जल संचयन तथा उदयपुर को जलग्रहण विकास) को केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया गया है।
6. सामुदायिक सहभागिता, जल आन्दोलन एवं सांस्कृतिक परंपराएँ#
6.1 राजस्थान के लोक-संस्कृति में जल का धार्मिक संरक्षण: ओरण एवं गोचर#
- **ओरण (Oran):** राजस्थान के ग्रामीण समाज में किसी स्थानीय लोक देवता (जैसे बाबा रामदेवजी, गोगाजी, पाबूजी, तेजाजी, करणी माता, मेहाजी) के नाम पर छोड़ी गई पवित्र वन-भूमि को 'ओरण' कहा जाता है।
- **पर्यावरणीय व जलवैज्ञानिक महत्व:** ओरण केवल वृक्षों का झुंड नहीं होता, बल्कि यह गाँव के मुख्य तालाब या नाड़ी का **प्राकृतिक जलग्रहण क्षेत्र (Catchment Area)** होता है।
- धर्म और आस्था के भय से ओरण में कुल्हाड़ी चलाना, पेड़ काटना या गंदगी फैलाना सामाजिक पाप माना जाता था। इस परंपरा के कारण जल स्रोत की पाल और उसका जलग्रहण क्षेत्र सदियों तक बिना किसी सरकारी कानून के अतिक्रमण और प्रदूषण से मुक्त रहता था।
- **गोचर (Gauchar):** गाँव के मवेशियों के चरने के लिए छोड़ी गई चरागाह भूमि, जो वर्षा के पानी को धीरे-धीरे सोखकर भूमिगत जलभंडारों को तृप्त करती है।
6.2 जल आंदोलन एवं वाटरमैन राजेंद्र सिंह#
- **तरुण भारत संघ (TBS):** 1975 में स्थापित एवं 1985 से अलवर के भीकमपुरा में राजेंद्र सिंह के नेतृत्व में कार्यरत गैर-सरकारी संगठन।
- **अरवरी नदी का पुनर्जन्म:** अरवरी नदी 1980 के दशक तक पूर्णतः सूख चुकी थी। भांवता-कोल्याला और निकटवर्ती गांवों में सैकड़ों जोहड़ बनाकर नदी के जलभृतों को रीचार्ज किया गया, जिससे 1990 के दशक में 45 किमी लंबी यह सूखी धारा पुनः 12 महीने बहने वाली सदानीरा नदी बन गई।
- **जल बिरादरी (Jal Biradari):** जल संरक्षण के लिए देश भर के सामाजिक कार्यकर्ताओं, नदी प्रेमियों और किसानों का एक साझा राष्ट्रीय नेटवर्क, जिसने 'नदी जोड़ो' की जगह 'नदियों को प्रदूषण-मुक्त कर पुनर्जीवित करने' की अलख जगाई।
7. मास्टर तुलनात्मक सारणी एवं तकनीकी पारिभाषिक शब्दावली#
7.1 परंपरागत जल संरचनाओं का मास्टर तुलनात्मक मैट्रिक्स#
| संरचना (Structure) |
प्रमुख भौगोलिक क्षेत्र |
जल का प्रकार |
निर्माण प्रकृति |
मुख्य तकनीकी विशेषता / पहचान |
| टांका (Tanka) |
बाड़मेर, जैसलमेर, बीकानेर, नागौर |
पालर पानी |
भूमिगत पक्का गड्ढा |
अगोर (पायतान), जागोटी ढलान, सिल्ट कैचर जाली। |
| कुंड / कुंडी (Kund) |
चूरू, बीकानेर, शेखावाटी |
पालर पानी |
जमीन के ऊपर पक्का चबूतरा + गड्ढा |
30-50 फीट व्यास का गोल फर्श, ऊपर गुंबदनुमा अधिरचना। |
| कुईं / बेरी (Kui) |
बीकानेर, चूरू, जैसलमेर, बाड़मेर |
रेजवाणी पानी |
गहरा संकरा गड्ढा |
व्यास 3-4 फीट, गहराई 30-60 फीट, खड़िया पट्टी, चेजारो, बसोली, खींप रस्सी। |
| नाड़ी (Nadi) |
संपूर्ण थार मरुस्थल (मारवाड़) |
पालर पानी |
खुला कच्चा तालाब |
प्राकृतिक ढलान पर मिट्टी की पाल, मदार (कैचमेंट), नेहटा (स्पिलवे)। |
| खड़ीन (Khadin) |
जैसलमेर (पालीवाल ब्राह्मण) |
पालर पानी (कृषि हेतु) |
3 तरफ पहाड़ी + 1 तरफ मिट्टी का धोरा |
15वीं सदी, 15:1 जलग्रहण अनुपात, खड़िया स्पिलवे, रबी की बिना सिंचाई की फसल। |
| जोहड़ (Johad) |
शेखावाटी, अलवर, भरतपुर |
भूजल पुनर्भरण + पशु जल |
मिट्टी का अर्धचंद्राकार कच्चा बांध |
बरसाती नालों पर अवरोधक, राजेंद्र सिंह (TBS), नदियों का पुनर्जीवन। |
| बावड़ी (Bawari) |
बूंदी, आभानेरी, शेखावाटी, मेवाड़ |
पालर + भूजल |
सीढ़ीदार पक्का स्थापत्य |
नंदा (1 मुख), भद्रा (2), जया (3), सर्वतोभद्रा (4); स्थापत्य का शिखर। |
| झालरा (Jhalra) |
जोधपुर (तूरजी, महिला बाग) |
रिसाव जल (Seepage) |
सीढ़ीदार पक्का जलाशय |
स्वतंत्र स्रोत नहीं, ऊपरी तालाब/झील से रिसाव, पेयजल हेतु निषेध, धार्मिक स्नान। |
7.2 महत्वपूर्ण पारिभाषिक शब्दावली कोष (Glossary)#
1. **अगोर / पायतान (Agor / Paitan):** टांके, कुंड या नाड़ी के चारों ओर का स्वच्छ, लीपा हुआ जलग्रहण क्षेत्र जहाँ से वर्षा का पानी बहकर संरचना में जाता है।
2. **जागोटी (Jagoti):** अगोर की वह विशिष्ट तीव्र ढलान जो पानी को सीधे टांके के संकरे प्रवेश द्वार की ओर धकेलती है।
3. **मदार (Madaar):** नाड़ी या बड़े तालाब का विस्तृत प्राकृतिक जलग्रहण बेसिन जहाँ हर प्रकार की गंदगी वर्जित होती है।
4. **नेहटा (Nehta):** नाड़ी या तालाब के पूर्ण भर जाने पर अधिशेष (Surplus) पानी के सुरक्षित निकास हेतु बना मार्ग या स्पिलवे।
5. **धोरा (Dhora):** खड़ीन के खेत के निचले सिरे पर बना मिट्टी और पत्थरों का विशाल मजबूत बांध।
6. **खड़िया (Khadia):** खड़ीन बांध में अतिरिक्त जल को आगे निकालने के लिए बना पत्थर का नियंत्रित निकास द्वार।
7. **चेजारो (Chejaaro):** कुईं की संकरी गहराई में खुदाई और चिनाई करने वाले पारंपरिक सिद्धहस्त शिल्पकार।
8. **बसोली (Basoli):** कुईं के संकरे व्यास में बैठकर मिट्टी-कंकड़ खोदने के लिए चेजारो द्वारा प्रयुक्त छोटी कुल्हाड़ीनुमा लोहे की छेनी।
9. **चोली / गांथी (Choli / Ganthi):** कुईं में बालू के धंसाव को रोकने के लिए खींप की रस्सी से बनाई जाने वाली गोलाकार लड़ीदार चिनाई।
10. **चडस / चरस (Chadas):** कुईं या कुएं से पानी खींचने के लिए प्रयुक्त चमड़े या मोटे रबर का थैला।
11. **आबियाना (Aabiyana):** नहरी या राज्य संरक्षित स्रोतों से सिंचाई जल उपयोग के बदले किसानों से लिया जाने वाला कानूनी जल-कर।